पत्र-पत्रिकाएं : साहित्यिक सरोकार एवं प्रसार

गुंजन  कैहरबा

सृजन उत्सव के दौरान 25 फरवरी को ‘पत्र-पत्रिकाएः साहित्यिक सरोकार एवं प्रसार विषय पर परिसंवाद का आयोजन हुआ। जिसमें ‘युवा संवाद’ पत्रिका के संपादक डा. अरुण कुमार, ‘बनास जन’ पत्रिका के संपादक पल्लव, ‘हस’ पत्रिका से संबंद्ध विभास वर्मा तथा अहा-जिंदगी’ के पूर्व संपादक आलोक श्रीवास्तव ने शिरकत की। इसका संयोजन किया ‘देस हरियाणा’  के संपादन सहयोगी डा. कृष्ण कुमार ने। प्रस्तुत है चर्चा की रिपोर्ट- सं.

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कृष्ण कुमार – संभवतः हजार दो हजार या तीन हजार से ऊपर कोई सरकुलेशन नहीं है। इस स्थिति में हम साहित्य को जनता के पास किस ढंग से लेकर जाएं। और जब साहित्य जनता के पास नहीं जा रहा तो साहित्यकर्मियों की भी क्या हैसियत होगी। उनके दिमाग में क्या इमेज बनेगी। इस स्थिति से हम किस प्रकार से निपटें कि हम पत्रिकाएं निकालते हैं – छापते हैं। लेकिन हम जिनके लिए छापते हैं वहां तक पत्रिकाएं पहुंच नहीं पाती हैं।  पाठकों की रुचि का भी इसमें कोई ना कोई सवाल जुड़ा है।

डॉ. एके अरुण – सबसे पहले ‘देस हरियाणा’ व हरियाणा सृजन उत्सव का आभार व्यक्त करता हूं। एक जटिल समय में एक सार्थक काम आप कर रहे हैं। सवाल इतना बड़ा है कि इसका जवाब दूसरे बड़े लोग देंगे। कुछ पत्रिकाएं हैं जो ज्यादा बिकती हैं। ‘अहा जिन्दगी’ के पाठक लाखों में हैं। शायद आपका इशारा लघु पत्रिकाओं व सरोकारी पत्रिकाओं की तरफ है। निश्चित रूप से सरोकारी पत्रिकाओं का प्रसार सीमित है। इसकी कई वजहें हैं। उन वजहों में कुछ वजहें हमसे जुड़ी हैं। हम पत्रिकाओं के लोग साधन सम्पन्न नहीं हैं। मैं एक छोटा सा वाकया आपको बताऊंगा ‘युवा संवाद’ पत्रिका से जुड़ा। जाहिर है सत्ता में, सरकार में शामिल लोगों की बहुत भागीदारी होती है पत्र-पत्रिकाओं को चलने-चलाने में। दिल्ली में जो सरकार है लघु पत्रिकाओं के प्रति उसका बहुत ही बेरूखा नजरिया है। वर्तमान में जो सरकार है जिनसे लोगों ने अपेक्षाएं की थी। उनकी उम्मीदें ज्यादा थी कि लोगों के हितों को लोगों की राय से, लोगों की बातचीत से, लोगों के वोट से ये सरकार बनकर आई है। निश्चित रूप से लघु पत्रिकाओं को कुछ बल मिलेगा। केन्द्र सरकार की बात करें तो वहां तो एक अलग किस्म की विचारधारा है। हमारी जो एक समस्या है जो निकल के आ रही है, कि हम पहुंच पाठकों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं, साधन के अभाव में। ऐसा नहीं है कि पाठक हमसे जुड़ना नहीं चाहते हैं। डाक-व्यवस्था ऐसी है कि उन तक पत्रिका पास पहुंच नहीं पाती है। एक पाठक जो प्रतिबद्ध पाठक है, उस तक पत्रिका पहुंचाने में हम लोगों को तीन से चार अंक गंवाने पड़ते हैं।

बहुत सारे सवाल हैं लेकिन पत्रिकाओं की ऐसे समय में जरूरत ज्यादा है। ऐसे ही समय में पत्रिकाओं की जरूरत है जब अंधेरा गहरा रहा हो। जब स्थितियां विकट हों और जब विमर्श पर ताला लगाया जा रहा हो। ऐसे समय में हमारी ज्यादा जरूरत है। हम लोग अपनी हिम्मत से अपने दमखम से आप सब की ताकत से खड़े रहें, खड़े रहेंगे। मुझे तो भरोसा है 15 वर्षों से युवा संवाद लगातार निकल रही है। हमारी भी दुविधाएं रही। लेकिन हम लोग रुके नहीं, विज्ञापन का इंतजार नहीं किया। तमाम उन मुद्दों पर जो जनता के मुद्दे हैं उनके साथ अपना जुड़ाव रखा। और आज हम बुलंदी के साथ खड़े हैं।

कृष्ण कुमार – पाठकीयता का सवाल है। पारंपरिक जो पाठक था जो कभी धार्मिक साहित्य पढ़ता था। वो वहां से कट तो रहा है। लेकिन वैज्ञानिक सोच व प्रगतिशील साहित्य की ओर नहीं जा रहा, बल्कि जो खाली जगह हुई वो या तो वो कोई विवादित चीज ढूंढ रहा है या हम ये कहे कि वो अश्लील साहित्य की ओर वो लगातार बढ़ रहा है। ऐसा समाज जो अश्लील साहित्य की ओर बढ़ रहा हो, विवादित चीजों को ढूंढ रहा हो तो उस स्थिति में हम पाठकीयता का निर्माण किस प्रकार कर सकेंगे।

 विभास वर्मा- मैं भी सबसे पहले धन्यवाद देना चाहता हूं कि मुझे इस कार्यक्रम में आने का अवसर दिया गया। और इसलिए भी कि मैं दिल्ली में बहुत सारे कार्यक्रमों में गया हूं लेकिन यहां पर आने का मेरा अनुभव कुछ अलग हैं। यहां आकर आस्था बढ़ती है, हिम्मत मिलती है कि जिस प्रकार का आपका जोश है, सक्रिय भागीदारी मैं यहां देख रहा हूं।

पाठकीयता की जहां तक बात है पत्रकारिता के संदर्भ में पाठकीयता कम रही है हमेशा। लेकिन इन दिनों उसके कम होने के कारण और बढ़ते जा रहे हैं। गंभीर चीजों की ओर रुझान लोगों का कम रहता है। कभी भी बहुत सारे लोगों का रुझान नहीं रहता है।

जब से टेलीविज़न घर-घर पहुंच गया तो लोगों का बहुत सारा समय टेलीविजन देखने में चला गया। बहुत सारी चीजें पढ़ने के लिए लोग पत्रिकाओं का इस्तेमाल करते थे। छिटपुट कहानियां पढ़ने के बजाए अब लोग टेलीविजन सीरियल देखने लगे। उनकी जो एक प्यास है वो बुझने लगी। दूसरी बात ये कि पत्रिकाओं में जो विमर्श होता था। उसके जगह टेलीविजन चैनल पर चलने वाले विमर्श ने ले ली है। लेकिन टेलीविजन की प्रकृति ऐसी है कि उस पर कोई भी बहुत गंभीर विमर्श नहीं हो सकता है। वो दृश्य की और श्रव्य की या पाठकीय प्रकृति का अंतर है। आप किसी भी चीज को सुनते हैं तो एक तरह की झांव- झांव में या आप अपनी बात कह लेंगे, दूसरी तीसरी बात कहेंगे और वो दोनों बातों के मेल से कोई तीसरी बात निकलने का होगा तो समय खत्म हो जाएगा। या बात किसी ओर दिशा में बदल जाएगी। क्योंकि समय का दबाव और आपका दिमाग सुनने और देखने दोनों चीजों में सक्रिय होता है तो उस गंभीरता के साथ बातों को पकड़ता नहीं है जिस तरह आप पढ़ते वक्त उसको पकड़ते हैं।  वह एक चीज चल गई है, लोगों के लिए सुविधाजनक है सुनना। एक तीसरी चीज जो आ गई है – सोशल मीडिया।  जो हर समय वाट्सअप व फेसबुक पर बहुत सारी सूचनाएं आ जाती हैं।

साहित्यिक पत्रिका की बात करते समय एक अन्तर ये है कि सामान्यत: पत्रिकाएं सूचनाओं के प्रसार से जुड़ी हुई चीज होती है। लेकिन साहित्य मात्र सूचना नहीं है वो सूचनाओं के परे जाता है हमेशा। और सूचनाओं के परे जाने के लिए एक अवकाश चाहिए होता है। आज की जीवन-शैली में अवकाश सिमटता जा रहा है। और ये सबसे बड़ा कारण है कि हमारी पाठकीयता में कमी आ रही है। दूसरी चीज – लोगों के पास जितनी आसानी से टेलिविजन पहुंचता है एक साथ। पत्रिकाएं उस तरह से नहीं पहुंच सकती है। पत्रिकाओं को फिजीकली ले जाना होता है, उसे कहीं पहुंचाना होता है। वो डिजीटली अब तो जा सकती है जैसे इस माध्यम से। एक साथ कई जगह पर। यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन है। ठीक उसी तरह से छापाखाना एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाया था। कि एक साथ बहुत बड़ी बात बहुत बड़ी जगह पर पहुंच सकती थी। वाचक संस्कृति से जो प्रिंट संस्कृति का जो परिवर्तन है उसी तरह ये परिवर्तन आ रहा है।

मुझे लगता है कि अंतत: दृश्य लिखित शब्द का विकल्प नहीं हो सकता यह समझना जरूरी है। स्क्रीन पर पढ़ें चाहे हम पन्ने पर पढ़ें, लिखित शब्द की महत्ता कम नहीं हो सकती। छवियां उसका विकल्प नहीं बन सकती। इसलिए लिखित शब्द को बचाए रखना जरूरी है। डिजीटल पर बचता है, चाहे पन्नों पर बचता है, उसकी मुझे बहुत ज्यादा चिंता नहीं होती।

दूस��ा पहलू यह है कि कई बार हम यह समझते हैं कि हमने कुछ लिख दिया है और हमारा काम हो गया है। हम उस लिखे हुए को पहुंचाने के प्रति उतने चिंतित नहीं होते हैं। हमारा पाठक वर्ग कौन, कैसा है, उसको लेकर हमारी समझ बहुत साफ नहीं होती है। उससे किस भाषा में बात करनी है। उसको किन-किन चीजों की जरूरत है। इसके बारे में हमारी समझ साफ नहीं है। हम अपने ज्ञान को उस पर कई बार थोंप देना चाहते हैं। इस कारण से भी हम वहां तक नहीं पहुंच पाते हैं।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जो पाठक को  पसंद है, उसको आप वही दीजिए। वह एक तरह की लोकप्रियता के खाते में जाता है और वह पोपुलर फिल्में  कि पब्लिक को यही पसंद है। पब्लिक की जरूरत क्या है और पब्लिक आपके कहे को समझती है या नहीं। समझ में आने की चीज और सम्प्रेषण की जो बातें हैं। कम्यूनिकेट कर पा रही हैं या नहीं चीजे।

साहित्य में मेरे ख्याल से सम्प्रेषण और गुणवत्ता इसका एक संतुलन होना बहुत जरूरी है। गुणवत्ता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी संप्रेषण है। और इस संतुलन का सबसे सही अनुपात मैं प्रेम चन्द के साहित्य को मानता हूं। और ‘हंस’ की विशेषता यही है कि इसने प्रेमचन्द को अपना आदर्श बनाया है। जो इस बात को लेकर इतना चिंतित थे कि हमें लोगों तक चीज पहुंचानी है उतने ही चिंतित इस बात से भी थे कि हमें किस भाषा में पहुंचानी है। और इसको कितने अलग-अलग स्तर के लोग पढ़ेंगे। वो सब इस चीज को समझ पाएंगे या नहीं।

कई बार राजेन्द्र यादव पर एक आरोप लगता था कि वो विमर्श को बहुत एक तरफा बना देते हैं थोड़ा सतही बना देते हैं, लेकिन वो सतही बनाना शायद सम्प्रेषण के लेकर कर था मैं ये नहीं कहता कि वो एक गंभीर विर्मशकार थे। लेकिन उनकी अपनी बहुत सारी कमजोरियां भी हो सकती हैं।

हंस के साथ मेरा पाठक होने के नाते जो सम्बंध रहा हैं। मैं ये कह सकता हूं कि हंस की पाठकीयता या प्रसारण संख्या काफी कम हुई है पहले के हिसाब से। लेकिन अभी वो दस हजार के आस-पास है। कई अंकों की मांग हमारे पास और भी ज्यादा आती है। इस बार हमने विश्व पुस्तक मेले में स्टाल लगाया तो बहुत सारी मांग आई।  यह हमने देखा कि बहुत सारी चीजें शायद पाठकों तक पहुंच नहीं पा रही हैं। हमारा जो वितरण-तंत्र हैं हमको इसपर काम करना चाहिए।

एक बार बहुत पहले लघु पत्रिकाओं के एक समूह ने मिलकर यह कोशिश की थी। लघु पत्रिकाओं से संबंधित कलकत्ता में एक सम्मेलन हुआ था। मिलजुल कर कुछ योजनाएं बनाई। लघु पत्रिकाएं ऐसी चीज हैं, जो एक दूसरे के साथ सहयोग में विकसित हुई।

आजादी से पहले और बाद में भी साहित्यिक पत्रिकाओं का अपना एक लेखक वर्ग होता था। आज के दिन में ऐसा कोई लेखक वर्ग नहीं होता हैं। एक लेखक हर तरह की पत्रिका में छपना चाहता हैं। एक संपादक दूसरी पत्रिका में छपता हैं। दूसरा संपादक तीसरी पत्रिका में छपता हैं। यह सहयोग की भावना विकसित हुई हैं। इसी सहयोग की भावना से एक वितरण-तंत्र का विकास करना आज के दौर में सबसे बड़ी जरूरत हैं।

एक चीज और मैं कहूंगा संसाधन को लेकर। लघु पत्रिकाओं का जो सम्मेलन हुआ था, उसमें यह तय किया गया था कि सरकार जो मदद देती हैं। वह जनता के पैसे की मदद हैं। इसलिए जनता के पैसे जो सरकारी विज्ञापन होते हैं, उसको लघु पत्रिकाओं को हक से मांगना चाहिए और उस पर दावेदारी करनी चाहिए। कम से कम दिल्ली में सरकारें यह मदद देती थी और वह बड़ी मदद होती थी। इस सरकार ने वह मदद बंद कर दी और मदद का सारा पैसा एक पत्रिका में सीमित कर दिया हैं, जोकि हिन्दी अकादमी की अपनी ही पत्रिका हैं। जोकि व्यावसायिक पत्रिका जैसे पन्ने पर निकलती हैं।

खैर, मुझे लगता हैं सरकारें हमेशा आपकी मदद करने के लिए नहीं आएंगी। सरकारों का मुंह नहीं देखना चाहिए। सरकारों से मांग जरूर रखनी चाहिए, अपने हक के लिए लड़ना चाहिए। लेकिन उनका मुंह जोहते हुए हम नहीं रह सकते। हमको अपने तौर पर एक तंत्र विकसित करना चाहिए।

कृष्ण कुमार – मुझे अष्टभुजा शुक्ल की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

भाग रहा हूं निपट अकेला,

ढूंढ़ रहा हूं साथी को,

हाथ से हाथ मिलेंगे साथी,

तो कस लेंगे हाथी को।

हम देखते हैं कि एक तरफ तो साहित्यिक गतिविधियों को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। चाहे पाठ्यक्रम से साहित्य को हटाया जा रहा हैं या उसकी उपेक्षा की जा रही है। दूसरी तरफ से हम देखते हैं कि साहित्यकारों को पुरस्कारों से नवाजा जा रहा है। बिल्कुल दो विपरीत स्थितियां हैं। इस परिस्थिति को तोड़ने के लिए लघु पत्रिकाएं क्या कर सकती हैं?

पल्लव- मैंने पिछले 10-12सालों में ऐसा बढ़िया आयोजन जनता के सहयोग से जनता के द्वारा नहीं देखा। यह कहते हुए मैं बहुत खुश हो रहा हूं। मैं ‘बनासजन’ नाम की पत्रिका निकालता हूं। पत्रिका निकालने से पहले मैं कहानियां लिखा करता था। जब से मैं पत्रिका निकालने लगा हूं, मेरा सारा समय पत्रिका में जाता है। मेरा अपना लिखना बहुत कम हो गया है। कई बार मेरे मन में यह विचार आता है कि अब पत्रिका बंद कर देनी चाहिए। इतने सारे मित्र पत्रिका निकाल रही रहे हैं। यहां आकर मैं इतने सारे लोगों को देख रहा हूं। मेरे मन में यह संकल्प मजबूत हुआ कि चाहे धीरे-धीरे ही सही साल में एक अंक ही सही, मुझे पत्रिका निकालते रहना है। सबसे पहले तो ‘हरियाणा सृजन उत्सव’ और ‘देस हरियाणा’ की पूरी टीम के संकल्प को नमन करता हूं। यह आप जबरदस्त काम कर रहे हैं।

मुझसे जो सवाल पूछा गया उस पर मुझे कविता की कुछ पंक्तियां ध्यान आ रही हैं –  “हिन्दी का आखिरी कवि भी पुरस्कृत हो गया, कोई नहीं बचा।”

इस कविता में कवि विडंबना की तरफ इशारा कर रहा है। सारी सरकारें ऐप्रोपरिएशन का काम करती हैं। चाहे हमारा साहित्य हो, चाहे कलाएं हों, चाहे मीडिया हो, चाहे हमारी सांस्कृतिक रवायतें हो, सरकारें सबका अनुकूलन करना चाहती हैं। यह इसी सरकार की बात नहीं है। तमाम सरकारों की यह प्रवृत्ति रही है। मौजूदा सरकार यह काम जल्दी, क्रूर और भौंडे तरीके से हम पर थोपना चाहती है। इस वजह से इसका विरोध भी ज्यादा हो रहा है। पुरानी सरकारें भी दूध की धुली हुई नहीं थी। सही बात है कि आप एक तरफ तो साहित्यकारों को इनाम दे रहे हो, दूसरी तरफ पाठ्यक्रमों और समाज में से किताबें और साहित्य की जगह कम करते जा रहे हैं। मैं छोटा सा उदाहरण देता हूं। देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है – दिल्ली विश्वविद्यालय। उस विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय के बगल में एक छोटी सी किताब की दुकान होती थी। आज से पांच-छह साल पहले तक। उस दुकान पर हिन्दी की लगभग सभी लघु पत्रिकाएं मिल जाती थी। बड़ी पत्रिकाएं भी मिल जाती थी-‘हंस’, ‘कथादेश’ व ‘ज्ञानोदय’ सरीखी और छोटी-छोटी पत्रिकाएं भी मिल जाती थी। अचानक एक दिन दुकान बंद हो गई। हम सोच रहे थे कि इसका ठेका होगा। अब कोई और ठेका लेगा। लेकिन किसी को ठेका नहीं मिला। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में अब कोई किताब की दुकान नहीं है। यह जगह खत्म हो गई हमारी। उस दुकान से किताब लेकर आप पढ़ सकते थे। अच्छी लगे तो खरीद लें नहीं तो उठकर आ जाएं। यह सुविधा थी।

कोई भी सरकार विचार को पसंद नहीं करती। कोई भी सरकार ऐसे विचार को हरगिज पसंद नहीं करती, जो कि व्यवस्था का विरोध करने की ताकत देता हो। आप देखिए मैं छोटा सा उदाहरण और देता हूं। हमें सरकार की बजाय व्यवस्थ�� और इससे भी बेहतर हमें पूंजीवादी व्यवस्था शब्द को काम में लेना चाहिए। यह शब्द थोड़ा पुराना हो गया हैं, लेकिन इस शब्द को समझना चाहिए। ऐसा किस्सा मैंने सुना कि धीरूभाई अंबानी ने अपने इंजीनियरों से कहा कि हम मोबाइल का काम करना चाहते हैं। मैं चाहता हूं कि पोस्टकार्ड से सस्ता एसएमएस हो जाए। तब तो कोई मतलब है मोबाइल का और उसमें भी मैं कमाऊं। तो उनके इंजीनियरों ने कहा – यह कैसे संभव है। अंबानी ने कहा कि यह तुम्हारा काम है। और यह हो गया। इसका दूसरा पहलू देखिए इसके होने से क्या हुआ। इसके होने से हमारा चिट्ठी लिखना बंद हो गया। चिट्टी लिखते थे तो सोचते और विचार करते थे। चिट्ठी के साथ-साथ विचार करने की प्रक्रिया समाप्त हो गई। जब मैं छोटा था तो चिट्ठी लिखता था। अपने घरवालों और रिश्तेदारों को चिट्ठी लिखता था। चिट्ठी में मैं जमाने भर की बातें लिखता था। आज किसी छठी-सातवीं कक्षा के विद्यार्थी को चिट्ठी लिखने के बारे में कहिए तो वह तीसरे-चौथे वाक्य में पूछेगा कि अब क्या लिखूं। यह स्थिति हो गई है।

आज हम ऐसे समाज की तरफ बढ़ रहे हैं, जो विचार विरोधी समाज है। इस समाज में साहित्य की क्या स्थिति होगी। यह अपने आप में विचारणीय है। यह स्थितियां तो रहेंगी। स्थितियां और ज्यादा खराब होंगी। सरकारें इनसे ज्यादा खराब आएंगी। भली सरकारों की उम्मीद तो करनी ही चाहिए, लेकिन है मुश्किल। तो ऐसे में हम क्या करें। हम लोग यह कर सकते हैं। मैं जो करता हूं, आपके साथ साझा करता हूं। मैं यह करता हूं कि जब भी मैं कोई बहुत अच्छी पत्रिका, किताब पढ़ता हूं तो अपने मित्रों के साथ साझा करने की कोशिश करता हूं। मैंने अपने छात्र जीवन में यह काम खूब किया, पूरे उत्साह के साथ किया। कोई लघु पत्रिका मुझे अच्छी लगी तो आस-पास घूम कर उसके सदस्य बनाए। ‘समयांतर’ नाम की पत्रिका है। एक बार मध्यप्रदेश की सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया। मैं उदयपुर में रहता था, मुझे बहुत बुरा लगा कि पत्रिका पर प्रतिबंध क्यों लगाया। प्रतिरोध का क्या तरीका हो सकता है तो मैंने एक मित्र से बात की। हमने उदयपुर में ‘समयांतर’ के कई सदस्य बनाए। पुस्तक मेला आने वाला था। हमने 15-20 हजार रुपये सदस्यता के ‘समयांतर’ को दिए। हम यह कर सकते हैं। पहला काम तो यह करें कि किसी ना किसी एक साहित्यिक लघु पत्रिका की सदस्यता हम लें। आप शुरूआत ‘देस हरियाणा’ से कीजिए। दूसरा काम हम यह कर सकते हैं कि आस-पास के लोगों को जागरूक करने की कोशिश करें। साहित्य और संस्कृति की पत्रिका के बारे में बताएं। तीसरा सोशल मीडिया की पहुंच बहुत ज्यादा है। अपने अनुभव के बारे में बताता हूं। मेरी पत्रिका ‘नॉटनल’ पर उपलब्ध है। मैं सोचता था कि इस पर कौन देखता होगा। लेकिन जब दो-डेढ़ साल इन्होंने मेरी पत्रिका ‘नॉटनल’ पर रखी तो एक दिन अचानक इन्होंने मुझे अच्छा-खासा चैक भेजा। मैंने पूछा कि यह किस बात का है तो इन्होंने कहा कि आपकी पत्रिका को इतने सारे लोगों ने पढ़ा और उन्होंने जो पैसा दिया, यह वही है। मैंने आंकड़ा पूछा तो मेरे लिए हैरत की बात थी कि जितनी प्रतियां मैं छापता ही नहीं, उससे ज्यादा ‘नॉटनल’ पर देखने-पढ़ने वाले हो गए। सोशल मीडिया का अधिकाधिक प्रयोग करें। हिन्दी साहित्य की अच्छी से अच्छी पत्रिकाएं – हंस, कथादेश, अहा जिंदगी, युवा संवाद, बनासजन, देस हरियाणा सहित सभी पत्रिकाओं ने फेसबुक पर अपने अकाउंट बना रखे हैं। कुछ ने पेज भी बना रखे हैं। आप उनके पेज से जुड़िये। आपको निरंतर वहां पत्रिकाओं के बारे में अपडेट मिलते रहेंगे। देखिए सीधी सी बात है यदि हम अपने देश से प्रेम करते हैं। इसकी संस्कृति व विरासत से प्रेम करते हैं तो यह बात समझ लेनी पड़ेगी कि अमेरिका इन्हें नहीं बचाएगा। हमीं को बचाना होगा। कोई सरकार इन्हें नहीं बचाएगी। हमें ही प्रयास करने होंगे।

कृष्ण कुमार- हमारा विकास किस तरह से हमारे ज्ञान को उजाड़ रहा है। इससे बढ़िया उदाहरण संभवत: नहीं होगा। पाश कितने महत्वपूर्ण कवि रहे हैं। सब जानते हैं। बहुत बार यह देखा जाता है कि जिस सरकार की हम आलोचना करते हैं, कई बार पत्रिका में उसका विज्ञापन भी छपता है। क्या हमारा लोकतंत्र हमें इतनी असहमति की इजाजत देता है। या फिर यह वैचारिक विचलन है या फिर कहीं ना कहीं प्रबंधकीय दबाव हैं। आपने दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका ‘अहा जिंदगी’ का दस साल संपादन किया। जरूर आप इस तरह के सवालों से रूबरू हुए होंगे।

आलोक श्रीवास्तव– मैं ‘अहा जिंदगी’ का संपादक था। करीब ढ़ाई महीने पहले मैंने छोड़ दिया है। दैनिक भास्कर समूह भी मैंने छोड़ दिया है। पत्रकारिता से पूरा विराम ले लिया है। 1991 से 96 तक ‘धर्मयुग’ में रहा मैं। फिर नवभारत टाइम के मुंबई संस्करण में और फिर ‘अहा जिंदगी’ में। विज्ञापन वाले सवाल पर बहुत शोध की जरूरत नहीं है। सब चीजें ऐसे तय नहीं होती हैं। चीजें बहुत बदल गई हैं। आज हमें बहुत व्यापक फलक में देखना होगा। उनके स्रोतों को देखना होगा। कारणों की तलाश करनी होगी। कारणों की श्रृंखलाओं को टटोलना पड़ेगा। तब जाकर हम वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने और उसकी काट ढूंढ़ पाने में सक्षम होंगे। बहुत विस्तार में जाने का समय नहीं है।

संक्षेप में बता दूं कि पिछले तीस वर्षों का समाज है, जो भूमंडलीकरण के बाद का समाज है। भूमंडलीकरण की सतत प्रक्रिया का समाज है। उसने पिछड़े देशों में क्या किया है। उसने एशिया में क्या किया हैं। उसने हिन्दोस्तान में क्या किया है। यह सब बहुत गौर करने वाली चीजें हैं। मसलन जिस संचार क्रांति ने, साइबर क्रांति ने हिन्दोस्तान में बेतहाशा मीडिया की पकड़ मजबूत की, उसका प्रसार मजबूत किया। तीन तरह के रूप सामने आए- टेलीविजन चैनल, प्रिंट मीडिया और डिजीटल। जब टेलीविजन का प्रसार हो रहा था, तब उस समय यह कहा जाता था कि अखबार खत्म हो जाएंगे। हकीकत यह सामने आई कि अखबार बहुत ज्यादा आ गए। जब हम पत्रिकाओं के संदर्भ में बात कर रहे हैं तो मैं मीडिया के व्यापक संदर्भों को छोड़ते हुए पत्रिका के बारे में बात करूंगा। जितने बड़े मीडिया घराने थे, उन्होंने पत्रिकाओं को समेट दिया। यह बात इस ढंग से फैली कि पाठक खत्म हो गए हैं। ऐसा नहीं हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया भारत का सबसे बड़ा समूह है और भूमंडलीकरण का सबसे पहले और बड़ा असर उस पर पड़ा। सबसे ज्यादा फायदा उसने लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रिकाएं निकलती थी – धर्मयुग, सारिका, दिनमान, पराग। इन पत्रिकाओं की हिन्दी क्षेत्र में बहुत गहरी पहुंच थी। पकड़ और प्रभाव था। जब पत्रिकाएं 1990 के बाद से बंद होनी शुरू हुई। हम भारत के लोग विशेषकर हिन्दी क्षेत्र, भाषा, साहित्य के लोग थोड़ा ज्यादा भावुक होते हैं, हमने इसे हिन्दी विरोध के रूप में देखा। यह हिन्दी का विरोध नहीं था। अंग्रेजी की पत्रिकाएं भी बंद हुई। इलस्ट्रेटिड विकली थी, यूथ थी, सांईंस टूडे थी, सब बंद हुई। दरअसल जो व्यापार का मॉडल बन रहा था, उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया का टर्न ओवर सौ करोड़ सालाना से दस हजार-बीस हजार सालाना की ओर बढ़ रहा था। उस स्थिति में यह पत्रिकाएं चाहे दस लाख का प्रसार रखें, चाहे बीस लाख का प्रसार रखें। चाहे दस करोड़ का विज्ञापन लाएं, चाहे बीस करोड़ का। वह बहुत छोटा खेल है। इस कारण उन घरानों को वे पत्रिकाएं बंद करनी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि पिछले 25-30 सालों में व्यापक प्रसार वाली पत्रिकाएं बंद हो गई।

हमारे समस्त हिन्दी क्षेत्र का जो यथार्थ हैं, वह यह हैं कि वह किसी महानगर में बसने वाला समाज नहीं है। चार पाठक छपरा में हैं तो दस पाठक आरा में हैं तो दस पाठक उत्तराखंड में ह��ं या किसी ओर कस्बे में हैं। बहुत फैला हुआ, बिखरा हुआ समाज है। इस पूरे हिन्दी बेल्ट में पत्रिकाओं की पहुंच हो सके, इसके लिए जिस व्यापक नेटवर्क की जरूरत थी, वह नेटवर्क टूट गया। जोकि बड़े कमर्शियल हाउसिस के पास था। फिर ले-देकर बची व्यक्तिगत प्रयासों से निकाली जाने वाली पत्रिका। यह व्यापक परिदृश्य हैं – हिन्दी की पत्रिकाओं का, साहित्यिक पत्रिकाओं का, उससे जुड़ी हुई चुनौतियों का, उसके प्रसार की कठिनाइयों का। इन सब चीजों पर थोड़ा यथार्थवादी ढंग से, थोड़ा बारीकी से सोचने-समझने की जरूरत है। मूल संकट भाषा, सोच, विचार व मानव सभ्यता का है।

करीब 1950 के आस-पास की बात है। हिन्दी के बड़े प्रसिद्ध कवि थे – कैलाश वाजपेयी। उनका एक गद्य का पीस छपा था। 1950-55 के दौरान वह यूरोप, अमेरिका के बहुत सारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे। घूमते थे वे इन दिनों। पश्चिमी के बहुत बड़े बुद्धिजीवी थे – एल्डस हक्सले। उनसे कैलाश वाजपेयी की बातचीत हुई। तो उन्होंने इसका ब्यौरा लिखा है। ब्यौरे में यह है कि कैलाश वाजपेयी ने अमेरिकन उपभोक्तावाद-भौतिकतावाद की आलोचना की है। एल्डस हक्सले ने बहुत छोटा सा जवाब दिया – जो हमारे यहां आज हो रहा है। आपके यहां कल होगा।

पिछड़ा देश जब उपभोक्तवादी होता है तो किस तरह से वह उपभोक्तवादी होता है। यह मूल संकट है पूंजी का, निवेश का, उससे निर्मित संस्कृति का। यह चक्र यूं ही चलते रहना है, आने वाले 20-25 वर्षों तक। इसी में से इसकी काट भी निकलनी है। हम लोग इसकी काट  निकालने, चिंगारियां निकालने व राख हटाने का काम करने वाले थोड़े बहुत लोग हैं। यह काम ज्यादा मुस्तैदी और कारगर ढंग से कर सकें, इसके लिए हमें अपनी सोच को और व्यापक करने की जरूरत है।

कृष्ण कुमार- यदि हम अपने आस-पास की दुनिया को गौर से देखें तो वह तकनीकी कृत हो चुकी है। उसे समझने के लिए हमें वैज्ञानिक सोच की जरूरत है। ‘हंस’ में मैंने दलित साहित्य पर बहुत सी कहानियां देखी। नारी-विमर्श पर बहुत सी कहानियां देखी। वैज्ञानिक विषयों पर कहानियां लिखना बहुत महत्वपूर्ण विषय है ताकि पाठक अपने आस-पास की दुनिया को अच्छी तरह से समझ पाएं। नहीं तो होता ये है कि दुनिया बदल जाती है और हम उसी तरह से जी रहे होते हैं।

विभास वर्मा – इसका जवाब मैं दो तरीके से दूंगा। पहला तो जवाब में मैं सवाल पूछूंगा कि आपने किस पत्रिका में वैज्ञानिक कहानियां देखी हैं। यह मेरा जवाब का ही तरीका है। आप जो कह रहे हैं, वह सही बात है। वैज्ञानिक किस्म की कहानियां हिन्दी में लिखी ही कम गई हैं। दरअसल कहानियां निकलती हैं हमारे समाज से और हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच व विज्ञान के प्रति सकारात्मक रवैया हमारी जीवन शैली में रचा-बसा नहीं है। जब तक यह रवैया जीवन शैली में नहीं रचेगा, तब तक वैज्ञानिक कहानियां अजूबे की तरह लिखी जाएंगी। उस तरह से नहीं लिखी जाएंगी, कि जिस तरह दूसरी कहानियां हमारे जीवन को छूती हैं, मुद्दों से संबद्ध होती हैं। जब वैज्ञानिक चेतना का प्रसार हमारे अंदर शुरू होगा, तब अच्छे किस्म की वैज्ञानिक कहानियां आएंगी। मुझे लगता है कि बहुत कम कहानियां हिन्दी में उस तरह की हैं।

‘हंस’ में नहीं आई हैं तो इसका दूसरा जवाब यह हो सकता है कि ‘हंस’ को इस तरह की कहानी लिखकर किसी ने भेजी नहीं है। बहुत कम ऐसा होता है कि हम किसी को कहते हैं कि आप इस तरह की कहानी लिखें। लेकिन पहले कहानी का ट्रेंड रचनाकारों से ही बनता है। यह सही बात है कि दलित कहानियों को ‘हंस’ ने व्यापकता दी। शुरूआत ‘हंस’ से शायद नहीं हुई थी। मराठी साहित्य का असर था कि यहां के साहित्यकारों ने दलित कहानियां लिखना शुरू किया। ‘सारिका’ के एक अंक में कमलेश्वर ने दलित कहानी पर छापा था। लेकिन दलित कहानियों को नियमित रूप से जगह देने की शुरूआत ‘हंस’ ने की। तब वे ‘हंस’ के साथ नहीं जुड़े थे, राजेन्द्र जी से ‘संगमन’ के उत्सव में ओमप्रकाश वाल्मिकी मिले। वहां पर दलित कहानियों के प्रकाशन के सवाल पर राजेन्द्र यादव जी ने हर अंक में कम-से-कम दो कहानियां दलित विषय पर निकालने की बात की। यह भी तय किया कि बाकी जगह गुणवत्ता का प्रतिमान सख्ती से लागू किया जाएगा, लेकिन दलित कहानी की गुणवत्ता परखने के मानदंड अभी बने नहीं हैं, इसलिए उन्हें स्थान दिया जाएगा। यह बात अर्चना जी ने मुझे बताई थी। लेकिन पहले वे कहानियां आई तो प्रकाशित हुई। वैज्ञानिक कहानियां भी यदि आएंगी तो ‘हंस’ व दूसरी पत्रिकाओं में भी उन्हें जगह मिलेगी।

मोनिका भारद्वाज- तमाम उपलब्धियां आपने गिनाई बावजूद जो हाल के दिनों में पत्रिकाओं में जो चीजें उभर कर आ रही हैं। वे वाकई खेदजनक हैं। एक बात और जो आपने बताई कि साहित्य के पाठक बहुत कम होते हैं, उसका एक कारण मुझे यह लगता है कि जो लघु पत्रिकाओं में व्यक्ति-चालिसाएं छपती हैं, विज्ञापन छपते हैं। उसे जीविकोपार्जन का साधन बनाया जा रहा है। उसमें क्रिएटिविटी कम हो रही है और मुनाफा ज्यादा देखा जा रहा है। शायद इसलिए लघु पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या कम हो रही है। उस पर कैसे नकेल कैसे कसी जा सकती है।

पल्लव- सबसे पहले तो मैं उस दिन सबसे ज्यादा खुश होऊंगा, जबकि ‘देस हरियाणा’ इतनी बिकने लगे, इतने लोग पढ़ने लगें कि सुभाष जी को नौकरी करने की जरूरत ना रह जाए और वे आराम से जीवन जीएं। दूसरी बात – हिन्दी में एक भी पत्रिका नहीं है, जिसके दम पर उसका संपादक अपना व अपने परिवार का गुजारा कर सके। आपका यह आरोप पूरी तरह से निराधार है। हिन्दी में मुश्किल से 300-400 पत्रिकाएं निकल रही हैं। यह आपके विवेक पर निर्भर करता हैं कि आप ‘देस हरियाणा’ व ‘अभियान’ को पत्रिका मानते हैं या किसी सस्ती-बाजारू पत्रिका को मानते हैं। हां यहां आपकी बात से सहमत हूं कि हमारे समाज को, पढ़ने-लिखने वाले लोगों को अच्छी पत्रिकाओं के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा बताएं ताकि उनका विवेक मजबूत हो सके।

आलोक श्रीवास्तव – आपने दो चीजें मिक्स कर दी। आपका सवाल बहुत संजीदा और मेरे नजरिये से हिन्दी क्षेत्र की रचनात्मकता का अहम सवाल है। हालांकि आपने जिस पुड़िया में उसे लपेटा वह गैर जरूरी थी। पत्रिका के मुनाफे वाला, जिसका जवाब दे दिया गया है। पत्रिकाओं में मुनाफे के कारण क्रिएटिविटी पर असर नहीं पड़ रहा है। हां यह बहुत चिंता की बात है। हिन्दी की क्रिटिविटी किस दौर से गुजर रही है। तमाम पत्रिकाओं में किस तरह की रचनाएं सामने आ रही हैं। मेरा 25 साल का हिन्दी पत्रकारिता का ओब्जर्वेशन है कि हमने कविता, कहानी, आलोचना, उपन्यास के खांचे बना लिए हैं। स्टीरियोटाइप बना लिए हैं। इनके भीतर अच्छे किस्म की रचनाएं लिखी जा रही हैं और छप रही हैं। लेकिन ऐसी रचनाएं, जो पाठक के दिमाग में उजाला पैदा कर दें, एक रोशनी का विस्फोट कर दें, एक नए मनुष्य का रूपांतरण कर दें, जीवन के बारे में किसी एक दृष्टिकोण से दिखा दें, जो उसने नहीं देखा था, वे नहीं आ रही हैं। हमारा लेखक वर्ग बहुत सुविधाजीवी है। वह प्रेमचंद के जमाने से बहुत आगे निकल आया है। उस पर कोई आरोप नहीं है। ना ही मैं किसी मसीहाई अंदाज में बोल रहा हूँ, लेकिन हिन्दी के वास्तविक लेखक व कवि अभी नेपथ्य में पड़े हैं। शायद कोई आंदोलन या आने वाला समय उनको सामने की कतारों में ला देगा। इसलिए आपके सवाल का मैं अभिनंदन करता हूं और धन्यवाद देता हूं।

प्रश्न – हम जो आम पाठक हैं या आम सृजनकर्मी हैं। हमारे दिमागों में रहता हैं कि इसने अवार्ड ले रखा है, तो बड़ा लेखक है। जिन सत्ताओं को लताड़ने का काम करते हैं, उन्हीं से हम पुरस्कार भी पाते हैं।

विभास वर्मा – आप दो चीजों को आपस में मिला रहे हैं। लेखक समाज अलग समाज हैं। पत्रकारिता का एक अलग ढांचा हैं, हालांकि वह उसी में से पैदा होता है। पुरस्कारों को लेकर यह कहा जा सकता है। जैसे मैं ‘हंस’ का उदाहरण दूं। ‘हंस’ में बहुत सारे विज्ञापन ऐसे विज्ञापन छपते हैं, सरकारों के छपते हैं, जिनकी नीतियों की आलोचना ‘हंस’ में होती है। इसको लेकर एक दुविधा हमारे मन में बनी रहती है। एक तो विज्ञापन के स्रोत बहुत कम हैं। दूसरे सरकार ऐसे विज्ञापन बनवाती हैं, कि वह पार्टी का प्रचार हो जाता है। सरकारी विज्ञापनों में प्रशासनिक योजनाओं का विज्ञापन होना चाहिए। वह जनता का  पैसा है। वह उनका पार्टी फंड का पैसा नहीं है। वह पैसा किसी और काम में लगे, उस पर हम अपना अधिकार क्यों ना मानें। यह बात हम जानते हैं कि पाठकों को यह देखकर अजीब लगता होगा। यह दुविधा हमारे यहां बनी रहती है। अभी भी इससे उबरने का कोई जरिया नहीं है। वैकल्पिक स्रोत का अभाव है। पत्रिकाएं उस तरह से नहीं निकल सकती है। या तो आप पूरी तरह से डिजीटल हो जाएं। जितनी पत्रिकाएं बिकती हैं, उसके हिसाब से पत्रिका का कभी भी खर्चा नहीं चल सकता है। यह अन्तर्विरोध बना हुआ है। बड़ी कंपनियां साहित्यिक पत्रिकाओं को विज्ञापन नहीं देती हैं। उनको लगता है कि इनकी प्रसार संख्या बहुत कम हैं। यह एक दुष्चक्र है कि प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए आपको विज्ञापन चाहिए और प्रसार संख्या कम होने के कारण विज्ञापन नहीं मिलता है। लेकिन हमें वितरण-तंत्र विकसित करने की जरूरत है। यह सामूहिक प्रयासों से ही हो सकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में पल्लव जी ने यह शुरूआत की। एक स्थान पर पत्रिकाएं रखनी शुरू कर दी और अन्य पत्रिकाओं के लोगों को भी उस स्थान की सूचना दी। फेसबुक पर उसकी सूचना दे दी। मेज के आकार का खोखा है। आज वह पत्रिकाओं का एक अड्डा बन गया है। बड़ी या छोटी जो भी पत्रिकाएं  आती हैं, वहां मिल जाती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को पता है कि यहां पत्रिकाएं मिल जाती हैं। इस प्रकार के और भी प्रयास हमें करने पड़ेंगे कि कैसे दूर तक पत्रिका मिल सके। अनेक प्रकार की शिकायतें मिलती हैं कि पत्रिका का अंक नहीं मिला और हम परेशान होते हैं। डाकखाने को भी शिकायतें भेजते हैं। एक बार पता चला कि डाकखाने से पहले ही पत्रिकाएं कोई ले जाता था। हमने शिकायत की। पुरस्कार को लेकर लेखकों की अपनी समस्याएं हैं।

डॉ. ए.के. अरुण- युवा संवाद’ को मिलने वाला विज्ञापन पिछले एक साल से बंद है। गैर-आधिकारिक तौर पर हमें बताया कि इसमें आप सरकार का तो कुछ छापते ही नहीं। हमने कहा कि हम पत्रिका 15 साल से छाप रहे हैं, कभी भी नहीं छापा। लोगों की चीज है, हम उस पर कायम हैं। तो उन्होंने कहा कि भूल जाईये। तो हमने उनका विज्ञापन लेना बंद कर दिया। हमें आपकी जरूरत है। एक लघु पत्रिका को यदि पांच हजार भी ग्राहक मिल जाएं तो पत्रिका मुल्क में बड़ा काम कर देगी।

प्रो. जोगा सिंह- जब जीवन के क्षेत्रों से भाषाएं ही गायब हो रही हैं तो पत्रिकाएं कहां बचेंगी। हिन्दी भाषा के प्रेमी जब बात भी करते हैं तो उनकी यह चिंता रहती है कि बेंगलुरू व चेन्नई की मेट्रो में हिन्दी में लिखा जाए, लेकिन हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी का क्या बन रहा है, इसके बारे में किसी को कोई चिंता नहीं है। स्कूलों में जब शिक्षा का माध्यम हिन्दी होगी, तब पत्रिकाएं बचेंगी। पिछले कुछ सालों में अनेक हवाई अड्डों पर मैंने हिन्दी की कोई पुस्तक नहीं देखी। दिल्ली के अन्तर्राज्जीय बस अड्डे पर भी अब हिन्दी की किताबें नहीं मिलती। पत्रिकाओं का मध्यवर्गीय पाठक भारतीय भाषाओं को छोड़ चुका है। इसलिए नहीं कि पत्रिकाओं की संख्या बढ़े, बल्कि भारत को बचाने के लिए भाषाओं को बचाना चाहिए। जहां तक पाठकीयता का सवाल है कि पाठक नहीं मिलते, मुझे इस बात पर संदेह है। मैंने 2013जून में मैंने एक छोटी सी पुस्तिका लिखी। तीन सालों में 9 भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद हो गया है। कितनी ही पत्रिकाओं में वह छप चुकी है। लेकिन उन 20 पन्नों के लिए मुझे सात साल लगे थे। सात साल के अन्वेषण के बाद वह लिखी गई। जीवन के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को बचाने की जरूरत है। दूसरी बात, जो प्रामाणिक भाषा होती है, उसमें सब पत्रिकाएं होती हैं। जैसे ‘देस हरियाणा’ में हरियाणवी का छोटा हिस्सा आ जाता है। मैं तो उसे मुर्दा भाषा मानता हूँ। वह जो प्रामाणिक भाषा होती है, वह औपचारिक संवाद की भाषा होती है। जो औपचारिक विषय होगा, उसे लोग पढ़ भी लेंगे। असली जिंदा भाषाएं तो उपभाषाएं हैं। इसलिए गुरदयाल सिंह को पढ़ा जाता है। फणीश्वरनाथ रेणू व प्रेमचंद को इसलिए पढ़ा जाता है। इसलिए इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि राजस्थानी, गढ़वाली आदि को भाषाओं के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

विभास वर्मा- भारतीय भाषाएं समाप्त हो रही हैं। इसके बारे में हमें सोचना चाहिए। औपचारिक अनौपचारिक भाषा के बारे में कहना चाहूंगा कि विमर्श की भाषा हो सकता है औपचारिक हो। लेकिन साहित्य में आज जो प्रवृत्ति है, जिसे गंभीर या बनावटी भाषा की रचनाओं को पाठक रिजेक्ट करता है। हो सकता है उसमें बोलियों का असर रेणू जैसा ना हो, लेकिन फिर भी उसमें आम बोलचाल की भाषा को ही पाठक पसंद करते हैं। एक संपादक होने के नाते मैं इसका जिक्र कर सकता हूं। ‘हंस’ में जो कहानियां छपती हैं, उनमें बोलियों का बहुत असर होता है। औपचारिक भाषा में जब हम बात करते हैं तो जैसे हम अपने आप से ही बात कर रहे हों, या खुद को समझाने की कोशिश कर रहे हों। हम लोगों से संवाद स्थापित करना चाहते हैं या नहीं। यह पहला मुद्दा होना चाहिए। पठनीयता के ह्रास के बारे में मैंने यह कहा।

बोलियां बचेंगी तो हिन्दी बची रहेगी। बोलियां वह जड़ हैं, जहां से हिन्दी प्राण लेती है। अंग्रेजी वह जड़ नहीं है। हिन्दी का प्राण रस बोलियां हैं। इसलिए बोलियां बनाम हिन्दी को हिन्दी बनाम अंग्रेजी की तरह एक वर्ग उभारने की कोशिश करता है। लेकिन उसकी बहुत गलत समझ है। हिन्दी बनाम अंग्रेजी एक अलग युद्ध क्षेत्र है। हिन्दी बनाम भारतीय बोलियां छद्म युद्ध है। बोलियों को बचाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। तद्भव भाषा ही वास्तव में हिन्दी भाषा है। तद्भवता को हम आशय के साथ समझौता ना करें। मुझे लगता है कि हिन्दी बनती हुई भाषा है। इसमें कैसे ज्यादा अर्थ पैदा हो सकें। उसके प्रयत्न करते रहने चाहिए।

आलोक श्रीवास्तव- आपका सवाल इतना संजीदा है कि सवाल भाषा का नहीं भारत को बचाने का सवाल है। इस पर मैं अनौपचारिक ढंग से दो बातें कहना चाहूंगा कि अंग्रेजी बनाम हिन्दी से भी बहुत आगे समय आ चुका है। अंग्रेजी हिन्दोस्तान की गहरी नीवों में धंस चुकी है और धंसी रहेगी। अब सवाल दूसरा है कि क्या अंग्रेजी सीखने के लिए हिन्दी भूलना जरूरी है। क्या एक भाषा दूसरी भाषा की विरोधी होती है। हम अपनी मातृभाषाओं के साथ, मैं अपना सवाल वहीं जोड़ता हूं, भारत में साम्यवाद से लेकर और हमारी समझ से लेकर, भाषा, साहित्य से लेकर सभी चीजों पर मेरी सुई एक ही जगह पर टिकती है कि जब एक पिछड़ा समाज उपभोक्तावाद सहित नई अवधारणाओं को ग्रहण करता है तो उसे अपने पिछड़ेपन में रूपांतरण करके अपने ढंग से अपना संस्करण बना लेता है। पिछले तीस वर्षों से मैं हिन्दी के हजारों लेखकों के घर गया हूँ। हिन्दी के लेखकों की संख्या बहुत बड़ी है। बहुत दुर्लभ ढंग से मुझे हिन्दी लेखकों के घरों में हिन्दी भाषा के प्रति अगली पीढ़ियों में अल्पतम रुचि के दर्शन हुए हैं। बहुत बार लड़ाइयां हमारे सामने होती हैं।

भाषा के सवाल पर मुझे अपने सामने दो मोर्चे दिखाई देते हैं। घरों में हम हिन्दी पठन-पाठन की संस्कृति को बचा पा रहे हैं या नहीं बचा पा रहे हैं। इसके लिए विशेष प्रयत्न की जरूरत होती है। यह आसान मोर्चा नहीं है। इसको लेकर लेखकों में कितनी संवेदनशीलता है यह बहुत जरूरी बात है। दूसरा यह राजनैतिक विषय है। पिछले 20-25 सालों से गली-गली उग आए अंग्रेजी स्कूलों ने ऐसा माहौल बनाया है कि आपको अपनी मातृभाषा व हिन्दी में नहीं बोलना है और ना ही बातचीत करनी है। यह पूरी तरह से राष्ट्रद्रोह का काम है। मैं यह नहीं कहता कि अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई ना हो, लेकिन हिन्दी पर जो प्रतिबंध लगे हैं, उन प्रतिबंधों को हटाना होगा। उन स्कूलों के मानस को बदलना पड़ेगा।

ऋषिकेश राजली- कई बार देखते हैं कि पत्रिकाओं के सदस्य अलग जगह खड़े होते हैं और जिनके लिए पत्रिका निकाल रहे हैं, वे अलग दिखाई दे रहे हैं। किस तरह से पत्रिकाओं को जन-संगठनों से जोड़ा जाए। यदि संगठन के नेता यह कह दें कि पत्रिका अपने विचारों को आगे बढ़ाने वाली है तो उस पत्रिका का ज्यादा प्रचार-प्रसार हो सकता है और वे पत्रिकाएं घर-घर पहुंच सकती हैं।

दूसरा वैचारिक पत्रिकाओं के चक्कर में छोटे-छोटे गांवों के नवोदित रचनाकारों को जगह नहीं मिल पाती। संपादक नवोदित रचनाकारों की रचनाएं छापने में संकोच करते हैं कि कहीं पत्रिका का स्तर ना गिर जाए। तो नवोदित रचनाकारों को पत्रिकाएं कैसे जोड़ सकती हैं।

सुरेंद्र भारती- अभियान निकाल रहे हैं पिछले 30 सालों से। सौवां अंक निकल चुका है। दो हजार से तीन हजार से प्रतियां हर अंक की निकालने की कोशिश रहती है। 10वें या 12वें अंक में फैसला किया कि संपादक नहीं रहेगा, संपादक मंडल रहेगा। फिर फैसला लिया कि अभियान में कोई भी विज्ञापन नहीं दिया जाएगा। कई बार ऑफर हुई। लेकिन हमने नीति बनाकर विज्ञापन नहीं छापने का निर्णय लिया। उसके बाद भी जनता की पत्रिका जनता के सहयोग से निकल रही है। मेरे दो प्रश्न हैं- एक तो विभास जी ने जो बात रखी है, उससे मैं उलझ गया हूं। अभियान पर आक्षेप लगता है कि नीरस पत्रिका है। कभी अभियान ने जनता के अलावा किसी से कोई सहयोग नहीं लिया। अभियान में नीरसता है। व्याकरण की गलतियां है। कई चीजों को ठीक करने की कोशिश करते हैं। क्या शब्दों के साथ पत्रिका में चित्र डालने की जरूरत नहीं है।

विभास वर्मा- नवोदित रचनाकारों तक पत्रिका कैसे पहुंचे। ‘हंस’ में कई लोग नए छपते हैं। मुबारक पहला कदम करके हमने किताब छापी, जोकि किसी लेखक की पहली रचना को ‘हंस’ ने स्थान दिया। नए लिखने वालों को कई बार भेजने का पता नहीं होता कि कैसे भेजें। पत्रिका में पेज की भी सीमा होती है। संपादक के विवेक पर भी काफी कुछ निर्भर करता है। एक पत्रिका में ना छपे नवोदित लेखक तो उसे दूसरी पत्रिका के लिए कोशिश करते रहना चाहिए।

मैंने यह नहीं कहा था छवि से ज्यादा शब्द महत्वपूर्ण होते हैं। मैं विमर्श के बारे में कह रहा था। जो विमर्श टेलीविजन में जो टॉक शो चलते हैं, उसमें वह गहराई नहीं आ सकती, जो लिखे हुए में आ सकती है। टॉक शो की अपनी सीमा होती है। छवि के रूप में, कहानी के रूप में व सिनेमा की प्रकृति ही अलग-अलग है। मीडियम ही अलग-अलग हैं। किसी भी समस्या पर जब आप विचार करते हैं। लिखित पठित में विचार करने में बहुत अवकाश मिलता है। चीजों को समझने में लेखक समय देता है। आप खाने के साथ टीवी देख सकते है। खाने के साथ गंभीर चीज पढ़ी नहीं जा सकती।

संपादक को यह अधिकार होना चाहिए कि चूड़ियां पहन रखी हैं – जैसे वाक्य को काट दे। पत्रिका की वैचारिक समझ में फिट नहीं होने वाली बात को नहीं छापा जा सकता। रचनाकार को कह कर बदलाव किया जा सकता है। रचनाकार को बताए बिना बदलाव नहीं किया जा सकता। रचनाकार यदि उसकी अनुमति नहीं देता है तो भी आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। रचनाकार के पास उसका कॉपीराइट है। आपके पास कॉपीराइट नहीं है। यदि रचनाकार नहीं मानता है तो आप उसे ना छापिये। आप जनता की दूसरी चीज छापिये।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 14 से 21

 

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