मातम

डा. पूरन सिंह 

ब लगभग सभी के घरों में कच्चे चमड़े का काम होता था। लोग कच्चे चमड़े के जूते बनाते थे। कुछ लोग मरे हुए जानवरों की खाल उतारते थे और उन्हें उस घर से जहां वह जानवर मरा होता था वहां से खींचकर पीछे वाले खेतों में लाते थे। कितने ही लोग तो मरे हुए जानवरों की खाल को पकाते भी थे फिर उससे कच्चा चमड़ा बनाया जाता था। एैसे लोगों को आप आसानी से पहचान सकते थे क्योंकि इनके नाखून हमेशा लाल होते थे। इन लोगों के पास धन-सम्पदा की कमी नहीं होती थी। इनकी औरतों पर सोने, चांदी के आभूषण भी होते थे जिन्हें वे तीज त्यौहारों पर पहनती थीं। कुछ एैसे भी थे जो जितना कमाते थे उससे कहीं ज्यादा दारू में खर्च करते थे या फिर चोरी छिपे जुआ खेलते थे या सट्टा लगाते थे। कभी-कभी पुलिस भी पकड़कर ले जाती थी उन्हें और उनकी कमाई का काफी हिस्सा लेकर ही छोड़ती थी।

मेरे पिताजी तथा बहुत कम लोग ही थे जो इस काम को नहीं करते थे। वे लोग मजदूरी करते, मेहनत करके कमाते, खाई खोदते, ईटें पाथते, लोगों के घरों में तीज-त्यौहार या फिर शादी-ब्याह पर रंग-रोगन करते थे। इन लोगों को समाज के अन्य लोग अच्छा नहीं मानते थे। इनके जीवन-यापन में विभिन्न तरह की बाधाएं पैदा करते थे। उन्हें नीचा दिखाने की तरकीबें ढूंढते थे। लेकिन ये लोग भी जिद्दी थे, ‘चमड़े का काम या जानवरों की खिंचाई हम कतई नहीं करेंगे, चाहे प्राण रहें या जाये।’  

होली-दीवाली या अन्य त्यौहारों पर भी हिन्दुओं के त्यौहारों की तरह ही उत्सव मनाए जाते थे। होली पर होलिका दहन होता था। खूब ऊंची होली रखी जाती थी जिस पर कई क्विंटल लकड़ियां स्वाहा हो जाती थीं। लोग एक दूसरे पर रंग डालते और खूब नाचते गाते। उस दिन खूब शराब पीते और आपस में लड़ते-झगड़ते थे। बाद में नशा उतरने पर गले में बाहें डाले घूमते भी दिखाई देते थे। अच्छे-अच्छे कपड़े बनवाए जाते थे जिन्हें पहनकर सभी लोग एक दूसरे के घर पर जाते और आपस में गले मिलते थे। बच्चे, बड़ों के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते।

आपस में खूब खुशियां मनाई जाती थीं।

दीवाली पर भी इसी तरह का उत्सव मनाया जाता था। खूब पटाखे चलाए जाते। दीपकों का यह उत्सव एक दूसरे को खुशियां बांटने से शुरू होकर रात में जुआ खेलने से ही समाप्त होता। दीवाली वाले दिन खूब अच्छा खाना पकाया जाता और लोग खूब शराब भी पीते थे। रात में महिलाएं अपने घरों से दीपक ले जाकर दूसरों के घरों में रखतीं और खील-बतासे बांटती थीं और इस तरह से खुशियों का आदान-प्रदान हुआ करता। बहुत अच्छा लगता था।

भगवान कृष्ण के जन्म दिन अर्थात् जन्माष्टमी पर लोग अपने-अपने घरों में भगवान कृष्ण की चित्रकारी करके दीवारों पर उनके चित्र बनाते। लड़कियां और महिलाएं व्रत रखतीं और दीवार पर बने भगवान कृष्ण के चित्र के मुंह पर भोग लगातीं। पूरे मोहल्ले में भगवान कृष्ण की झांकियां सजायी जाती थीं।

ये सब काम मेरे घर में भी होते थे। पिता दारू नहीं पीते थे। जुआ नहीं खेलते थे लेकिन घर में भगवान शंकर का फोटो था जो शीशे में जड़ा हुआ था। भगवान कृष्ण का फोटो भी था। फोटो में गाय माता थी और उनके साथ भगवान कृष्ण बांसुरी बजाते दिखाई देते थे। उसी चित्र पर लिखा था, ‘गाय हमारी माता है यह देश धर्म का नाता है।’ 

घर में बच्चे पैदा होते तो पंडितजी के पास ही उनके नामकरण और छठी आदि के बारे में पूछने जाया जाता था। पण्डित जी का नाम जिन्ना था। मैं यह नहीं समझ पाता था कि पण्डित जी तो ब्राह्मण है फिर उनका नाम मुसलमानों के नाम पर जिन्ना क्यों रखा गया। खैर होगी कोई इसकी भी कहानी मुझे क्या लेना। जिन्ना ब्राह्मण होने के साथ -साथ सहृदय भी थे। हमारे मुहल्ले के लोग जब अपने बच्चों के नामकरण के लिए उनके पास जाते तो वे पहला सवाल यही पूछते थे, ‘कौन जाति के हो।’

‘साब जाटवान मुहल्ला में रहते हैं।’

‘अच्छा।’

‘बच्चा, लड़का हैं या लड़की।’

‘लड़का’

‘कौन से दिन पैदा हुआ।’

‘दीवाली को।’

‘तो ठीक हैं उसका नाम दिवारी लाल ठीक रहेगा।’

यदि बच्चा सोमवार को पैदा हुआ तो सोमा, मंगल को पैदा हुआ तो मंगली या फिर चैत में हुआ तो चैतुआ, भादों में हुआ तो भदई आदि नाम पण्डितजी रखते थे जिसे हमारे मुहल्ले के लोग सहर्ष स्वीकार कर लेते थे।

पण्डित जी का दिया हुआ नाम ही अंतिम होता था जिसे लोग अमृतवाणी समझ कर स्वीकार कर लेते। कुछ पढ़े-लिखे लोग थोड़ा सा संशोधन भी कर लेते थे जैसे जिन्ना पण्डितजी ने किसी का नाम प्रकासी रख दिया तो वे उसे थोड़ा सा संशोधित करके प्रकाश कर देते थे।

फिर भी, जिन्ना पण्डितजी हमारी जाति के लोगों के नाम रखने में इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वे नाम अपमानजनक और तिरस्कार से भरे हों ताकि आसानी से जाना जा सके कि वह व्यक्ति समाज में निचले पायदान पर हैं।

एक काम और भी होता था। लोग तीज-त्यौहारों पर हवन कराते थे। हवन करते समय लोगों पर देवी आ जाती। बड़ा मजा आता था। एक आदमी औरत की भाषा में भयानक तरह से बोलता। फिर दूसरा आदमी जो भगत टाइप का धूर्त और लुच्चा व्यक्ति होता वह देवी को शांत करता। उस अवसर पर शराब और बकरे का मीट चढ़ाया जाता था हवन-कुंड में।

मुहल्ले में एक ही जाति के लोग रहते थे। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि पहले इस मुहल्ले का नाम चमट्टोला था। बाद में कुछ पढ़े-लिखे और समझदार लोगों ने इसका नाम बदलकर जाटवान कर दिया अर्थात् चमार का संशोधित रूप जाटवान। मैं जब पैदा हुआ तब इस मौहल्ले का नाम जाटवान था जिसे बाद में और परिष्कृत करके भीमनगर कर दिया गया। भीमनगर नाम महामानव बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम पर रखा गया था जो आज तक चल रहा हैं।

मुहल्ले के साथ ही जुड़ा हुआ बाल्मीकियों का भी मुहल्ला था जिसे ‘भंगियों का मुहल्ला’ कहते थे बाद में उसका भी परिष्कृत रूप हुआ और उसे अब बाल्मकि बस्ती कहा जाने लगा। हालांकि उन्हें कहा भी था भीमनगर मुहल्ले के लोगों ने कि आप भी इसे बाल्मीकि बस्ती न कहकर भीमनगर ही कहें तो उनका तर्क था हम आपके बाबा साहेब अम्बेडकर को नहीं गांधी बाबा को मानते हैं और हमारे देवता भी बाल्मीकि जी ही हैं हम तो बाल्मीकि बस्ती ही कहलवाएंगे तुम भीमनगर कहो या जो भी तुम्हें अच्छा लगे।

बाल्मीकियों और जाटवों में छत्तीस का आंकड़ा था। हमेशा तलवार खिंची रहती लेकिन इस युद्ध को शांत करने में एक ही चीज बहुत ही सक्षम थी और वह थी शराब। मैं तो कहता हूं शराब, शराब न होकर अमृत थी, यदि अमृत जैसा कुछ होता हैं तो। बाल्मीकि और जाटव खूब लड़ते थे और बाद में साथ बैठकर शराब पीते फिर एक हो जाते थे।

बाल्मीकियों के घरों और जाटवों के घरों से ही सटी हुई एक और बस्ती थी मुसलमानों की और वैसे भी आप यदि गहनता से अध्ययन करेंगे तो जहां भंगी होगें वहीं चमार होंगे और उनके साथ ही मुसलमान भी होंगे। यह सवर्ण समाज की व्यवस्था हैं। यहां यह भी बताऊं कि मुसलमान वैसे तो चमारों-भंगियों से मेल रखते हैं लेकिन एक दो मसले ऐसे हैं जहां वे भी हमें भंगी और चमार ही समझते हैं ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मण और शेष हिन्दू समझते हैं। तब स्थिति सांप नाथ या नाग नाथ वाली हो जाती हैं। इन मुसलमानों और शहर के सभी मुसलमानों का एक कब्रिस्तान था जहां मृतक मुसलमानों की कब्रें थीं और इस कब्रिस्तान में पीरबाबा की मजार भी थी जो अब भी हैं। पीरबाबा की मजार को सभी लोग मीराजीबली की मजार कहते थे जहां बरसात के दिनों में मेला (उर्स) लगता था और कव्वालियों का कार्यक्रम भी होता था। आज भी होता हैं। हम लोग अपनी-अपनी कक्षाओं में पास होते तो अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थानुसार वहां बतासे चढ़ाने जाते और किसी की नौकरी लगती तो चद्दर चढ़ाई जाती थी। विश्वास और आस्था यह थी कि मीराजीबली की दुआओं से ही नौकरी मिली हैं। मेरी नौकरी लगने पर भी अम्मा ने चद्दर चढ़ाई थी।

इसी कब्रिस्तान से लगी हुई एक जगह और हैं जो हमारे मुहल्ले के बुजुर्गों ने बनवाई थी जिसे रविदास मंदिर कहा जाता था। जहां संत रविदास का मंदिर तो मैंने नहीं देखा था लेकिन  भगवान शंकर के लिंग की पूजा हमारे सभी बुजुर्ग किया करते थे। उस लिंग पर पुष्प, प्रसाद और अमृत चढ़ाया जाता था। कुछ बुजुर्ग यहां पहलवानी भी करते थे। बहुत ही रमणीय स्थान था यह।

मुहल्ले में उस समय बहुत कम लोग ग्रेजुएट थे और जितने भी पढ़े लिखे थे वे लगभग नौकरी पर थे। मेरे भइया के बराबर के लोग पढ़ रहे थे और धीरे-धीरे जागृति की ओर अग्रसर थे और अंधविश्वास तथा ढोंग ढकोसले से दूर रहने में प्रयासरत थे।

चेतना का संचार हमारे बुजुर्गों में भी धीरे-धीरे होने लगा था। नवयुवाओं में महामानव बाबा साहेब डॉक्टर अम्बेडकर का प्रभाव बढ़ रहा था। कांग्रेस की सरकार भले ही थी लेकिन तब कांग्रेसी, नेता होने के साथ-साथ इंसान भी थे। दूसरे नेता भी थोड़े से सहृदय थे।

उन्हीं दिनों, जब मैं कक्षा तीन में पढ़ता था मुझे भली-भांति याद आता हैं कि मेरे भइया के साथी, गांव के चाचा, ताऊ आदि लोगों ने दस-दस पैसे और पच्चीस-पच्चीस पैसे अपने खर्चों में से निकालकर इकट्ठे किए थे। मुहल्ले के बड़े बुजुर्गों से भी कुछ योगदान लिया गया था। तब एक रिक्शे पर बाबासाहेब अम्बेडकर की तस्वीर रखकर फूल-मालाओं से उस तस्वीर को सजाकर एक छोटा सा माइक लेकर पूरे शहर में चौदह अप्रैल के दिन जुलूस निकाला गया था। ‘बाबासाहेब अमर रहे’  और ‘ जब तक सूरज चांद रहेगा, बाबा तेरा नाम रहेगा’  या फिर, ‘इधर भी देखो-बाबा साहेब, उधर भी देखो बाबा साहेब, इग्लैण्ड में देखो-बाबासाहेब…….।’  जैसे नारों से पूरे शहर में धूम मचाई गई थी। शहर के लोगों ने पूछा भी था, ‘मुहल्ले के जाटव ये किसकी जय-जयकार रहे हैं।’  तो लोगों ने जबाब दिया था,‘ ये इनके भगवान हैं।’  जिस दिन पूरे मुहल्ले में बाबा साहेब अम्बेडकर की पहली जन्म-जयंती निकली थी। उसी दिन शाम को पढ़े-लिखे और समाज के प्रतिष्ठित लोगों की मुहल्ले के ‘जनमासे’  में पहली मीटिंग हुई थी जिसमें समाज के प्रति बाबा सहेब के योगदान और उनके जीवन पर बातें भी हुई थीं। 

घरों में महिलाओं ने मंगलाचार गाए थे। भजन हिन्दुओं के ही थे। महिलाएं राम-सीता या शंकर-कृष्ण की जगह बाबासाहेब का नाम ले लेती थीं। यह श्रद्धा थी या भक्ति, कोई नहीं जानता लेकिन शुरूआत बेहद अच्छी थी। अपने आराध्य के प्रति आस्था और विश्वास देखकर आज भी मन भर आता हैं। महिलाएं अपनी-अपनी छतों पर ढोलक और मजीरा बजाकर गाती हुई कैसी भोली और मासूम लगती थीं कि उनके लिए मन श्रद्धा और सम्मान से झुक-झुक जाता था तब-

मेरे घर आए हैं बाबा साहेब

सहेली गाओ मंगलाचार

या फिर

मैंने सोने की थाली में भुजना परोसे

जैलेओ, जैलेओ मेरे बाबा साहेब

सोने के गढ़ुआ गंगाजल पानी

पीलेउ पीलेउ मेरे बाबा साहेब

खूब नाच-नाच कर गाए थे ये गीत मुहल्ले की मांओं, बड़ी अम्माओं, भाभियों और बहिनों ने। कोई छल नहीं कोई कपट नहीं सिर्फ आस्था और विश्वास था। तब लगा था सभी के देवताओं की तरह हमारा भी कोई आराध्य हैं। हमारा भी कोई मार्गदर्शक हैं। हमारा भी कोई दाता हैं।

और यहीं से समाज में परिवर्तन की शुरूआत हो गई थी। बाबासाहेब की लिखी किताबें मुहल्ले में आ गई थीं। लोग एक दूसरे से मांग-मांग कर पढ़ते थे। उन पर अमल भी करने लगे थे।

पहली साल शुरूआत थी फिर वह जन्म-जयंती समारोह थोड़ा बड़ा हुआ….फिर और ….फिर और……फिर और बढ़ता गया। और साथ ही बढ़ता गया समाज का रूप। मौहल्ले में पढ़े लिखे लोगों की संख्या दिनों दिन बढ़ने लगी थी। डाक्टर, इंजीनियर से लेकर अध्यापक, बाबू और अधिकारियों के अंबार भी लगने लगे। हर घर में कोई ने कोई नौकरी कर रहा था।

बस्ती के सभी लोगों ने महामानव के इस सूत्र-शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो, को अपने-अपने जीवन में उतार लेने का संकल्प क्या लिया कि सवर्णों की छाती पर सांप लोटने लगा था। बड़ा हो गया था मैं। अब बारहवीं कक्षा में था।

तभी एक दिन मोहल्ले में एक मीटिंग हुई थी। क्यों न अपनी एक समिति गठित की जाए और वह समिति मुहल्ले में विकास कार्य करने के साथ-साथ समाज के लोगों को गंदे काम अर्थात् मरे हुए जानवरों की खाल खींचने, मरे हुए जानवरों को खींचने, जूता गांठने आदि से दूर रखे। इन कामों को बंद करवाए। हालांकि यह काम थोड़ा सा रिस्की था मोहल्ले के लगभग घरों में कोई न कोई व्यक्ति इन कार्यों से जुड़ा हुआ था। इसे रोकना ‘हार्ड नट टु क्रेक’ था फिर भी सफलता मिल रही थी। सफलता मिली भी और लोग जुड़े भी फिर इसी मीटिंग में बात हुई कि मुहल्ले के किनारे दक्षिणी ओर एक बड़ा सा तालाब हैं इस तालाब को मिट्टी डालकर समतल करके महामानव बाबा साहेब की प्रतिमा लगाई जाये। यह ठीक उसी तरह था जैसे पहले लोग मंदिर बनवाने की बात करते थे। अम्बेडकर मूर्ति स्थापना समिति गठित की गई थी। घर-घर से चंदा इकट्ठा किया गया था। आश्चर्य की बात थी कि सभी लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई में से दिल खोलकर चंदा दिया था। अपने मुहल्ले के अलावा शहर के लोगों ने भी सहायता की थी। कुछ लालच भी दिया गया था कि जो व्यक्ति एक निर्धारित राशि देगा उसका नाम महामानव की प्रतिमा के नीचे लगी हुई पट्टियों पर लिखा जाएगा और जब तक महामानव की प्रतिमा रहेगी, उन सभी लोगों के नाम भी अमर हो जाएंगे। इस प्रकार काफी पैसा इकट्ठा हुआ था। और इस पैसे से बाबासाहेब की प्रतिमा मंगाई गई थी। तालाब में डालने की मिट्टी से लेकर ईंट गारा और मजदूरी तक सारा कार्य किया गया था और फिर जिस मुहल्ले का नाम भीमनगर था आज वहीं बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा लग गई थी। मुहल्ले का नाम सार्थक हो गया था।

मुहल्लेवासी बेहद खुश थे।

लोग बाबासाहेब को मानते ही नहीं थे बल्कि उनकी बात भी मानने लगे थे। लोगों ने अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना भी शुरू कर दिया था जिनमें गरीब और निर्धन लोगों से लेकर पियक्कड़ और जुएबाज शामिल थे तो समझदार और असहाय महिलाएं भी थीं। बच्च�� पढ़ रहे थे और नौकरियों में भी लग रहे थे।

पूरे शहर में मुहल्ले का नाम ऊंचाई पर था। लोग मुहल्ले से डर मानने लगे थे। मुहल्ले की एकता का पूरा शहर लोहा मानता था। शहर के बाजार में भी मुहल्ले के लोगों का दबदबा था। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि बाजार में मुहल्ले के लोगों की दुकानें भी हो रही थीं जिनमें जूतों की दुकानों के अलावा, पंसारी, जनरल स्टोर, कपड़े और छोटे-मोटे आभूषणों की दुकानें भी होने लगी थीं। लगने लगा था कि महामानव का सपना साकार हो रहा हो।

अब बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का जुलूस एक रिक्शे पर नहीं निकला जाता था, अब तो बहुत भव्य और शानदार तरीके से निकलने लगा था जिसमें पचासों झांकियां निकाली जाती, चार-चार बैण्ड होते, हाथी, घोड़े, आतिशबाजी चलती। झांकियां की तैयारियों में महीनों लगते थे। महीनों पहले से ही मौहल्ले में उत्सव सा माहौल होता था। अपार खुशियां और उन्हें सहेजे-सहेजे मुहल्ले के लोग अपने-आप पर इतराने लगते।

अधिकांश कच्चे घर अब पक्के और नए बन गए थे। पढ़ने-लिखने वाले और मेहनती लड़के मुहल्ले से बाहर दूसरे शहरों में नौकरी से लग गए थे उन्होंने वहीं अपने घर बना लिए। लोग संपन्न हुए तो अपने घरवालों, भाई-बहिनों का कुछ दिनों तक तो ध्यान रखा, बाद में, धीरे-धीरे अपनी संपन्नता के गुरूर में अपने परिजनों को भुलाने लगे थे जिन मां, बाप, भाई, बहिनों ने अपने घर के एक-एक बच्चे को पढ़ाने में अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया था, उन्हीं पढ़े-लिखे और संपन्न लोगों ने अपने अपनों को भुला दिया। इनमें से कुछ संपन्न लोग ऐसे भी थे जिन्होंने दूसरी जाति की सुन्दर, अमीर और घंमडी लड़कियों से शादी कर ली और वे अब न तो उन जातियों के रह गए थे और न ही अपने अपनों के। अब वही संपन्न लोग अपने ही परिजनों को हेय दृष्टि से देखने लगे। अव्वल तो वे गांव आते ही नहीं थे और आ भी तो उनकी वही सुन्दर, अमीर और घंमडी सवर्ण पत्नियां अपनी देवरानियों, जिठानियों और ननदों तथा देवरों को घृणा और तिरस्कार की नजर से देखतीं। मौका पाते ही उनका अपमान करने में नहीं चूकतीं। उनके पति उल्लुओं की तरह जोरू के गुलाम बने निर्लज्ज हो देखते रहते। परिणाम यह हुआ कि उनके परिजन हताशा और निराशा में जीने लगे थे। और लौटकर वही वापिस आने लगे थे जहां से चले थे। नई-नई उम्र के बच्चे शराब के नशे में धुत रहते। जुआ और सट्टों के अड्डे जमने लगे थे। मां-बाप आपने इन बर्बाद होते बच्चों को देखते तो उनकी आंखें बहने लगतीं। जिन पर गर्व किया था उन्होंने ही ……।

और इन्हीं सब पर गिद्ध नजर टिकाए सवर्ण हिंदूओं ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया था। वे इन नशेड़ी, गंजेड़ी और जुआरियों को बाबा साहेब के प्रति भड़काने लगे। राम-सीता, कृष्ण-राधा की जीवनियां समझाते। उन्हें दारू पीने के लिए पैसे देते और उनसे दुगने-तिगुने वसूलते। नई उम्र के लड़के-लड़़कियां रात दिन मोबाइलों पर आशिकी करते और उन्हीं पर पोर्न फिल्में देखते। आपस में खूब लड़ाइयां होती।

       अभी पिछले महीने ही गया था मैं अपने मुहल्ले। पिता नहीं रहे। दुख में था। एक सप्ताह ही रहना था घर पर। भइया और पूरा परिवार शोक-संतप्त था इसलिए जब भी बातें होतीं तो पिता की यादें ही होती। पिता ने अपना सब कुछ लगाकर, अपने को स्वाहा करके पूरे परिवार को सब लायक बनाया। अनपढ़ पिता, मेहनत मजदूरी करते थे और एक ही बात हमेशा कहते थे, ‘बच्चे पढ़ाइ लेउ फिर आधी मुक्ति मिल गई समझो।’ उन्होंने हम सभी को पढ़ाया और पूरा घर पढ़-लिखकर छोटी-बड़ी नौकरियां कर रहे हैं लेकिन फिर भी पिता के न रहने पर पिता का दर्द सालता हैं। 

अभी हम लोग पिता की यादें कर-करके बातें कर रहे थे कि हमारे पड़ोस के चाचा जी का जवान बेटा आया था और बोला, ‘भइया आज रात को जागरण बजेगा। आइवे की कोशिश करियो …. भइया आपउ आइयो।’ इतना कहकर वह चला गया था।

मैंने भइया से पूछा था, ‘भइया ये वही जागरण हैं जिसमें लोगों पर देवी आती हैं।…..ये सब ढोंग-ढकोसले अभी बंद नहीं हुए। मैं था तब तो लोगों ने स्वेच्छा से इस दुष्कृत्य को बंद कर दिया था। ‘अब किस-किस बात के लिए रोओगे बेटा…….इसी मुहल्ले के लोग उन सभी बातों को मानने लगे जिनसे छुटकारा पाने में हमारी पीढ़ी के लोग बूढ़े हो गए। मैं सेवा से रिटायर हो गया। राजीव, राम सेवक, दीना, पीताम्बर, मोहन, कप्तान सब धीरे-धीरे बुढ़ापे की ओर भाग रहे हैं।  आज के बच्चे बात ही नहीं मानते। कोई वैष्णो देवी जाता हैं तो कोई साईं बाबा को खोजने में लगा हुआ हैं।’  अभी भइया की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि घर के बाहर कुछ लोग आए। उनमें से कुछ को मैं जानता था ये वही लोग थे जो बाबा साहेब का जयकार करने में सबसे आगे रहते थे। पता चला कि इनका कोई बच्चा नौकरी से नहीं लग पाया तो बाबा साहेब को त्याग दिया हैं। अब काली मां और भैरों बाबा की शरण में जीवन का सुख ढूंढ रहे हैं।

इन लोगों ने भइया के बेटे को इशारे से बुलाया था, ‘हम लोग संतोषी माता के मंदिर के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। आप अभी दुख में हो….जब सब ठीक हो जाए तो देख लेना।’ और इतना कहकर वे सभी चले गए थे।

भतीजे ने जब आकर बताया तो मैं रो पड़ा।

कुछ देर बाद भइया और मैं शाम को बाजार की ओर निकले थे। ‘चलो लला शाम के लिए कुछ सब्जी ले आए।‘ कहा था भइया ने।

हम दोनों भाई बाजार के लिए जा रहे थे कि मैंने देखा, एक बहुत ही सुन्दर और लग्जरी बस जिस पर ‘यादव ट्रांसपोर्ट‘ लिखा था। मोहल्ले के बाहरी छोर पर खड़ी थी। कुछ स्त्री-पुरुष उसमें बैठे थे और कुछ बैठने वाले थे और कुछ के आने का अभी इंतजार था शायद। हम दोनों भाइयों को देखते ही संवेदना व्यक्त करने वाले अंदाज में वे सभी एक स्वर में बोले थे, ‘राधे-राधे…..राधे-राधे।’ भइया ने ‘जय भीम साहब’  कहा था।

मैंने भइया से पूछा था,‘ ये राधे-राधे क्या हैं।’

ये सब लोग इस बस में भरकर एक ढोंगी बाबा के ‘प्रवचन‘ सुनने जाते हैं। वहीं सेवा करते हैं और कई-कई दिन अपने परिवार से अलग रहते हैं।’

‘कौन हैं वह नीच’  मैं अपने पिता के दुख को एक पल के लिए भूल गया था।

‘भोले बाबा।’  संक्षिप्त सा उत्तर भइया का था।

 हम दोनों सब्जी लेने चले गए थे और जब सब्जी लेकर घर लौटे तब तक भइया का एक बेटा जो आगरा में पुलिस में नौकरी करता हैं, आ गया था। मैं उसे देखकर खुश हो गया था। उसने मेरे पैर छुए और बोला था, ‘राधे-राधे ,चाचा, राधे-राधे।’

मैं भौंचक्क रह गया और बजाय उसे आशीर्वाद देने के इतना ही बोला था, ‘व्हाट नॉनसेंस’

उस पर इसका कोई असर नहीं हुआ। तब भइया बोले थे, ‘आगरा-मथुरा पास-पास में हैं। मथुरा में अक्सर डयूटी रहती हैं इसकी, इसलिए राधे-राधे बोला इसने गुस्सा मत होओ…….बेटा।’ एक बार को लगा था भइया धृतराष्ट्र हो गए हों।

‘और यहां…इस घर में आपने सिखाया….मैंने सिखाया….मेरे पिता ने सिखाया। सब भूल गया, नीच और सिर्फ राधे-राधे ही याद रह गया इसे….भुला दिया बाबा साहेब को….जा चुल्लू भर पानी में डूब मर कमीने।’ मैं लगभग चीखा था।

भइया मेरे मुंह की ओर देख रहे थे।

 मेरे पिता की मृत्यु वाले दिन, जितना दुख मुझे हुआ था उससे कहीं ज्यादा दुख उस दिन हुआ था और लग रहा था चारों ओर मातम छा गया हो।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 3 से 7

 

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