हरीकेश पटवारी

हरीकेश पटवारी

Mhaara-Haryana_Harikesh-patwri

गांव धनौरी, जिला जीन्द के निवासी थे। रेडियो सिंगर। आजादी के बाद के हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिवेश को बहुत विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करती रचनाएं। रचनाओं में व्यक्त सच्चाई और सहज कला के कारण रागनियां लोकप्रिय हुईं। वैराग्य रत्नमाला, प्रश्नोतरी, आजादी की झलक, हरिकेश पुष्पांजलि में रागनियां संकलित हैं। रचनाओं को देहाती बुक स्टोर नरवाना ने प्रकाशित किया है।

1

सन् 47 मैं हिन्द देश का बच्चा बच्चा तंग होग्या

राज्यों का जंग बन्द होग्या तो परजा का जंग होग्या

जिस दिन मिल्या स्वराज उसी दिन पडग़ी फूट हिन्द म्हं

जितने थे बदमास पड़े बिजळी ज्यों टूट हिन्द म्हं

छुरे बम्ब पस्तौल चले कई होगे शूट हिन्द म्हं

पिटे कुटे और लूटे बड़ी माची लूटे हिन्द म्हं

एक एक नंग साहूकार हुआ एक एक सेठ नंग होग्या

कलकत्ता बम्बई कराची पूना सूरत सितारा

गढ़ गुडग़ांवा रोहतक दिल्ली बन्नू टांक हजारा

हांसी जीन्द हिसार आगरा कोटा बलख बुखारा

लुधियाणा मुलतान सिन्ध बंगाल गया सारा

भारत भूमि तेरा रक्त में गूढ़ सुरख रंग होग्या

कुछ कुछ जबर जुल्म नै सहगे कुछ कमजोर से डरगे

कुछ भय में पागल होगे कुछ खुदे खुदकशी करगे

कुछ भागे कुछ मजहब पलटगे कुछ कटगे कुछ मरगे

खाली पड़े देखल्यो जाकै लाहौर अमृतसर बरगे

जणों दान्यां नै शहर तोड़ दिए साफ इसा ढंग होग्या

ऊपर बच्चे छाळ छाळ कै नीचे करी कटारी

पूत का मांस खिला दिया मां नै इसे जुल्म हुए भारी

जलूस काढे नंगी करकै कई कई सौ नारी

एक एक पतिव्रता की इज्जत सौ सौ दफा उतारी

जुल्म सितम की खबरें पढ़ पढ़ हरिकेश दंग होग्या

2

 

जब से दुनियां बसी आज तक ना ऐसा हाल हुआ

हिन्द के लिए बुरा साबित दो हजार चार का साल हुआ

अंग्रेजां नै म्हारे देश का बिल्कुल चकनाचूर किया

लूट लिया धन माल हिन्द का अपणा घर भरपूर किया

ऐसी डाली फूट सगा भाई भाई से दूर किया

बंधी बुहारी खोल बिखेरी कितना बड़ा कसूर किया

रंगा गादड़ बैठ तख्त पर जिन्हां शेर की खाल होया

इस वजह से सत्पुरुषों का बुरी तरह से काळ होया

ऐसा आया इंकलाब कोई उजड़ग्या कोई बसण लाग्या

कोई मरग्या कोई कटग्या कोई भाग्या कोई फसण लाग्या

कोई हारग्या कोई जीतग्या कोई रोवै कोई हंसण लाग्या

किसे का दीवा गुल होग्या किसी कै लैम्प चसण लाग्या

कोई मिटग्या, पिटग्या,कुटग्या कोई लुटग्या कंगाल होया

कोई-कोई जो जबरदस्त था लूट कै मालामाल होया

किसे की लाकड़ी किसे नै ठाई किसे का धन घर धरै कोई

कोई कमजोरा कोई जोरावर कोई डरावै डरै कोई

कहते सुणे लिख्या भी देख्या भरे वही जो करै कोई

अपणी आंखां देख लिया अब करै कोई और भरै कोई

करोड़ों लाश बही दरिया मैं नहरों का जल लाल होया

सरसा की जा ढाब देखिये जमा खून का ताल होया

सतयुग मैं तो मिथुन-मिथुन नै विकट रूप धर मार दिया

त्रेता मैं तुल नै तुल का कर हनन धरण मैं डार दिया

द्वापर मैं भी मिथुन मिथुन नै पकड़ कै केश सिंहार दिया

कळयुग में बिन जंग कुम्भ नै कुम्भ तख्त से तार दिया

अब मकर के मकर हनेगा निश्चय हरिकेश को ख्याल होया

हिन्द हमारा बिना वजह जेर बे अलीफ और दाल होया

3

भूखे मरते भक्त, ऐश करते ठग चोर जवारी क्यूं

भूखे मरते भक्त, ऐश करते ठग चोर जवारी क्यूं

फिर भगवान तनैं न्यायकारी कहती दुनिया सारी क्यूं

नशे विषे में मस्त दुष्ट सुख की निद्रा सोते देखे

सतवादी सत पुरुष भूख में जिन्दगानी खोते देखे

एम.ए. बी.ए. पढ़े लिखे सिर पर बोझा ढोते देखे

महा लंठ अनपढ़ गंवार कुर्सीनशीन होते देखे

फूहड़ जन्मै बीस एक नै तरसै चातुर नारी कयूं

शुद्ध स्वतंत्र सन्तोषी महाकष्ट विपत भरते देखे

डूबे सुने तैराक बली कायर के हाथ मरते देखे

चालबाज बदमाश मलंग से बड़े-बड़े डरते देखे

शील सन्त और साधारण का सब मखौल करते देखे

सूम माल भरपूर दरबार दाता करे भिखारी क्यूं

कोई निरगुण गुणवान तनै कोई साहूकार कोई नंग कर्या

कोई रोवै कोई सुख से सोवै कहीं सोग कहीं रंग कर्या

कोई खावै कोई खड़्या लखावै सर्वमुखी कोई तंग कर्या

ना कोई दोस्त ना कोई दुश्मन फिर क्यूं ऐसा ढंग कर्या

कोई निर्बल कोई बली बना दिया कोई हल्का कोई भारी क्यूं

जीव के दुश्मन जीव रचे क्यूं सिंह सर्प और सूर तनै

सम्भल वृक्ष किया निष्फल केले में रच्या कपूर तनै

कोयल का रंग रूप स्याह कर दिया बुगले को दिया नूर तनै

सांगर टींड बृज में कर दिये काबुल करे अंगुर तनै

बुधु कानूनगो होग्या रहा हरीकेश पटवारी क्यूं

4

बिगड़ी मैं कोई बाप बणै ना, चलती मैं सौ साळे देखे

बिगड़ी पीछे ठोकर खाते लाख करोड़ों वाळे देखे

चलती मैं छोटे छोट्यां की बड़े बड़े पैंद तोड़ते देखे

बिगड़ी पीछे बड़े बड़्यां के छोटे सिर फोड़ते देखे

चढ़ी हुई मैं दुश्मन आगे दुश्मन हाथ जोड़ते देखे

बिगड़ी मैं सुत-नार-जार मां जाए पीठ मोड़ते देखे

चढ़ी हुई मैं गोरे पर पाणी भरवाते काळे देखे

चढ़ी हुई मैं खून करणिये डाकू बरी छूटते देखे

बिना खोट ही सड़ैं जेळ मैं जिनके करम फूटते देखे

चढ़ी हुई मैं दुष्ट पुरुष भी असरत ऐश लूटते देखे

बिगड़ी मैं सुख सम्पति के सारे प्रबन्ध टूटते देखे

चढ़ी हुई मैं चोर लुटेरे डाकू भी रखवाळे देखे

चढ़ी हुई मैं पांच जणे कितनी बड़ी मार मार गए थे

बिगड़ी मैं कोतर सौ कैरौं बड़े बड़े वीर हार गए थे

चढ़ी हुई मैं जापान जर्मन कई कई मुल्क पार गए थे

जब बिगड़ी एक पल मैं सब योद्धा हथियार डार गए थे

चढ़ी हुई मैं अमरीका के सिक्के अजब निराळे देखे

चढ़ी हुई मैं एक तीर से मछली की चक्षु फूटी

जब बिगड़ी वही बाण चले ना गोपी भीलां नै लूटी

चढ़ी हुई मैं निगल दिया बिगड़ी मैं निगल गई खूंटी

नहीं चढ़ी का मोल तोल और टूटी की कोई ना बूटी

हरिकेश नै चितौड़ मैं मण मण के लागे ताळे देखे

5

माल मस्त कोई खाल मस्त कोई रोणे मैं कोई गाणे म्हं

खुद मस्ती मैं मस्त रहो चाहे कोई कुछ करो जमाने म्हं

कोई अनुरागी कोई त्यागी कोई बल और धन म्हं मस्त कोई

कोई ज्ञानी कोई ब्रह्मज्ञानी खल मूर्खपण म्हं मस्त कोई

रज्या मरै कोई कोई बरत करै और पौ भर अन्न म्हं मस्त कोई

झक मारै कोई बक मारै रह मोनी मन म्हं मस्त कोई

कोई घर कोई बण म्हं मस्त कोई अलमस्त फकीरी बाणे म्हं

पाप करै कोई जाप करै हर के गुण गाकै मस्त रहै

गुरुद्वारे अन्दर कोई मस्जिद अन्दर जाकै मस्त रहै

घरबारी कोई ब्रह्मचारी कोई राख रमाकै मस्त रहै

लठधारी कोई मठधारी कोई धूणा लाकै मस्त रहै

कोई जटा बढ़ाकै मस्त रहै कोई राजी मूंड मुंडाणे म्हं

कोई नशे म्हं कोई विषे म्हं खोदे धन माया सारी

पड़ी चढ़ी का घटी बढ़ी का पता नहीं पता मस्तैं भारी

मगन रहै कोई नगन रहै कपड़े मैं मस्त कपड़धारी

कोई रहै लटपट कोई खटपट खोपरी की मत न्यारी

कोई पुरुष से बणता नारी राजी भेष जनाने म्हं

कोई-कोई पेट्टू पेट का टट्टू पीण खाण म्हं मस्त रहै

कोई भसूरा मूर्ख पूरा आण जाण म्हं मस्त रहै

हो निर्बल वो खल जो बोझ ठाण म्हं मस्त रहै

मुंह बावै ना गाणा आवै फेर गाण म्हं मस्त रहै

हरिकेश यूं ही मस्त रहा सदा पिलसण कलम घिसाणै म्हं

 

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, हरियाणावी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन पंचकुला, पृ. 150 से 155

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