सुघः एक पुराने नगर की कहानी

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सुघः एक पुराने नगर की कहानी

◊ प्रो. सूरजभान

          यमुना नगर जिले में जगाधरी नाम का कस्बा है। जगाधरी के पूर्व में एक छोटा सा गांव है। इसे सुघ कहते हैं। इसके पास ही एक बड़ा टीला है। दूर से देखने में यह छोटी सी पहाड़ी लगती है। पर टीले पर ईंट, रोड़े और ठीकरें बिखरे पड़े हैं। यहां कोई पुराना नगर था, जो उजड़ गया।

          सुघ के उत्तर में दूर हिमालय के काले-काले पहाड़ नजर आते हैं। इसके पूर्व में जमना का खादर है। कभी जमना यहां बहती थी। आज कुछ दूर चली गई है। सुघ के पश्चिम का भाग ऊंचा है। बरसाती 

नदी-नालों ने इसे कुछ ऊबड़-खाबड़ बना दिया है। यहां बारिश खूब होती है। जमीन भी उपजाऊ है। गेहूं, चावल और गन्ने की फसलें देखते ही बनती हैं। चार हजार साल पहले यहां जंगल ही जंगल था। धीरे-धीरे आबादी बढ़ती गई और जंगल साफ होते गए। किसानों की कड़ी मेहनत ने जमीन खेती के लायक बना दी।

          पुराने जमाने में पंजाब से उत्तरी भारत जाने का मुख्य मार्ग सुघ होकर गुजरता था। व्यापारी और फौजें यहीं जमना को पार करते  थे। पहले नदियों पर पुल नहीं होते थे। पैदल या किश्ती से ही पार की जाती थी। सड़कें भी कच्ची थी। आज यहां रेल की लाइन बिछी है। पक्की सड़कें बनी हैं। नदी पर पुल भी हैं।

          सुघ गांव में ज्यादातर लोग कमजोर तबकों से हैं। वे गरीब हैं। उनके घर कच्चे हैं। खेती ही उनके गुजारे का मुख्य साधन है। वे नहीं जानते, उनका गांव कब बसा? इसका नाम सुघ कैसे  पड़ा? लोग बरसों से पास के टीले को देखते आए हैं। पशु चराते बच्चों को कभी-कभी यहां पुराने सिक्के मिल जाते हैं। वे माला के मनके भी इक्_ा कर लेते हैं। पर उन्हें क्या पता ये किस काल के हैं।

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          टीले पर छोटी ईंटाें और चूने की कुछ यादगारें जरूर खड़ी हैं। ये बहुत पुरानी मालूम नहीं देती। होंगी कोई दो सौ – तीन सौ वर्ष पुरानी, लोग इन्हें सतियां कहते हैं। ये किसी लड़ाई की निशानी हैं।

          गांव के दक्षिण में छोटी ईंटों और चूने में बना एक मंदिर भी है। इसकी छत गुंबदनूमा है। मंदिर के सामने पूर्व में एक छोटा तालाब है। इसकी सीढिय़ां पक्की हैं। जालीदार जनाना घाट भी बने हैं। मंदिर में कोई मूर्ति नहीं रखी हुई। इसके फर्श में एक शिवलिंग जरूर पड़ा है। पर लोग इसे सूर्य का मंदिर कहते है। हर साल यहां एक मेला भी लगता है। कहते है कि गुरु गोबिंद सिंह यहां आए थे। परन्तु ये परम्पराएं और स्मारक तीन सौ साल से अधिक पुराने नहीं लगते।

          करीब चौदह सौ साल पहले एक चीनी तीर्थ यात्री यहां आया था। इस यात्री का नाम ह्यूनसांग था। वह बुद्ध धर्म को मानने वाला था। भारत में आकर बुद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त करने की उसकी बड़ी कामना थी। बुद्ध धर्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले भारत में ही पैदा हुआ। इसके संस्थापक महात्मा बुद्ध का नाम दुनिया के बड़े विचारकों और संतों में गिना जाता है। उनकी सोच नए जमाने के मुताबिक थी। वैदिक कर्मकांड, पाखंड और पशुबलि उन्हें पसंद नहीं थी। किसी को जन्म से ब्राह्मण मानने को भी वे तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि न तपस्या लाभदायक है, न भोग-विलास का जीवन। इच्छाओं पर काबू पाने, सही ज्ञान और भले आचरण के द्वारा ही दुखों से छुटकारा मिल सकता है। इन्हीं  शिक्षाओं को बाद में बुद्ध धर्म कहा जाने लगा। महात्मा बुद्ध ने ज्ञान का प्रचार लोगों की बोली में ही किया संस्कृत में नहीं। उस समय संस्कृत पढ़ने का अधिकार उच्च जाति के पुरुषों तक ही सीमित था। स्त्रियों और शुद्र कही जाने वाली जातियों को संस्कृत पढ़ने व बोलने  की मनाही थी। साधारण जनता की भाषा अलग थी। बुद्ध अपना ज्ञान आम जनता तक ले जाना चाहते थे। जल्दी ही बुद्ध धर्म एक मजबूत विद्रोही आंदोलन बन कर दुनिया में दूर-दूर तक फैल गया। भारत में बुद्ध धर्म का एक हजार वर्ष तक बोलबाला रहा।

          चीनी यात्री के समय में आने-जाने के साधन बहुत कम थे। लोग अक्सर पैदल यात्रा करते थे। यात्राएं होती भी बड़ी कठिन थीं। खतरों से खाली भी नहीं थी। उन दिनों पुलिस नहीं होती थी। न आज जैसे स्थायी राज थे। चीनी यात्री इन सब कष्टों को सहते हुए अफगानिस्तान के रास्ते भारत पहुंचा। अफगानिस्तान के पहाड़ी रास्ते बड़े तंग और मुश्किल थे। अनेक खूंखार कबीलों के बीच से होकर गुजरना पड़ता था। लूट लिए जाने का भय सदा बना रहता था।

          चीनी यात्री करीब चौदह वर्ष भारत में रहा। वह बुद्ध धर्म के अनेक तीर्थों पर गया। उन दिनों जगह-जगह बौद्ध साधुओं के ठहरने के लिए आश्रम बने होते थे। उन्हें विहार कहा जाता था। बिहार प्रदेश का नाम इन्हीं बौद्ध विहारों की बहुलता के कारण ही पड़ा। कई विहार तो मशहूर विश्वविद्यालय ही बन गए। नालंदा से दूर-दूर तक के देशों से लोग पढ़ने आते थे। इसके खंडहर बिहार में आज भी मौजूद हैं। ह्यूनसांग यहां कई साल रहा। बड़ा अध्ययन किया। इस चीनी विद्वान की शौहरत दूर-दूर तक फैल गई।

          उत्तर भारत में उस समय महाराजा हर्षवर्धन राज करते थे। उनकी राजधानी कन्नौज थी। यह स्थान उत्तर प्रदेश में है। हर्ष वैसे तो हरियाणा में थानेसर के राजवंश से थे। बुद्ध धर्म में इनकी बड़ी आस्था थी। हुएनसांग से ये बड़े प्रभावित हुए। दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई। हर्ष के बुलावे पर ही ह्यूनसांग कई वर्ष तक कन्नौज में रहे।ancient_sugh_4

          चीनी तीर्थ यात्री घूमता हुआ सुघ नगर भी पहुंचा था। अपनी पुस्तक में उसने इस नगर का जिक्र किया है। उसने लिखा है कि सुघ का राज्य हिमालय की तलहटी में स्थित था। यह जमना नदी के दोनों तरफ फैला हुआ था। राजधानी जमना के पश्चिमी तट पर थी। उस समय सुघ में एक हजार बौद्ध साधु रहते थे, जो भिक्षु कहलाते थे। नगर में साधुओं के रहने के लिए पांच आश्रम थे। बुद्ध धर्म में इन्हें संघाराम कहते थे। यहां बौद्ध साधु पढ़ने-पढ़ाने का काम करते थे। उन दिनों साधुओं में ज्ञान प्राप्त करने की बड़ी लगन थी। नगर में बौद्ध संतों की कई समाधियां भी थीं, जिन्हें  स्तूप कहते थे। ये मिट्टी, ईंट और पत्थर के बने ठोस स्मारक थे। इनके बीच में बौद्ध संतों की अस्थियां या फूल रखे जाते थे। लोग स्तूपों की परिक्रमा करते थे और इन्हें पूजते थे। नीची यात्री ने नगर के पूर्व में एक स्तूप का जिक्र किया है। कहते हैं कि बहहुत पहले महात्मा बुद्ध सुघ आए थे। उन्होंने यहां प्रवचन भी दिया था। यह स्तूप उनक सुघ आने की याद में बनाया गया था। पर यह किसी स्थान या तीर्थ को महत्व देने के लिए ऐसी अनेक परम्पराएं घड़ ली जाती हैं। वे सत्य नहीं होती। पर लोगों का उनमें विश्वास जरूर बन जाता है।

          उन दिनों भारत में बुद्ध धर्म का प्रभाव कुछ घटता जा रहा था। नगर भी उतना खुशहाल नहीं रहा था। इसके कुछ इलाके गैर आबाद हो गए थे। हिन्दू धर्म ���भरने लगा था। नगर में इसके सौ मंदिर थे। इस काल में नगरों का पतन सुघ तक ही सीमित नहीं था। सारे उत्तरी भारत में यही हालात देखने को मिलते हैं। पश्चिमी देशों में भी इस दौर में नगर उजड़ रहे थे। जमाना बदल गया था। सामंतवाद का नया युग शुरू हो चला था। खेती ही समाज का मुख्य आधार बन गई थी। व्यापार घट रहा था। राजसत्ता भी कमजोर पड़ रही थी। इन हालात में सुघ नगर भी छोटी बस्ती का रूप लेता चला गया।

नगर की खोज

          अंग्रेजी हुकूमत ने कोई 150 साल पहले भारत में एक नया महकमा खोला। इसे पुरातत्व विभाग कहते हैं। सन् 1861 में जनरल कनिंघम नामक अंग्रेज को इसका महानिदेशक लगा दिया गया। इस विभाग का काम पुराने खंडहरों और पुरानी वस्तुओं को ढूंढना, उनकी जांच करना और हिफाजत करना था। उन दिनों अंग्रेजों में भारत के प्राचीन धर्मों के बारे में खोजने की होड़ सी लगी थी। कनिंघम ने चीनी यात्री की पुस्तक का सहारा लिया। उन्होंने इस पुस्तक में दिए बौद्ध तीर्थ स्थानों और नगरों को ढूंढना आरंभ किया। अनेक नगरों को ढूंढते-ढूंढते कनिंघम सुघ भी पहुंचे। टीले पर पड़ी चीजों से अंदाजा लगाया कि यहां एक पुराना नगर था। ह्यूनसांग के सुघ नगर के वर्णन से इसका ठीक मेल बैठता था। यह टीला उसी रास्ते पर, जमना के पश्चिमी तट पर ही था। उन्होंने कहा, हो न हो, यही प्राचीन सुघ नगर है। उनका अनुमान ठीक भी था। परन्तु कनिंघम भी इस नगर के बारे में अधिक जानकारी नहीं दे पाए। नगर का सही-सही इतिहास जानने के लिए जरूरत थी खुदाई की।
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          आज से करीब तीस साल पहले पंजाब विश्वविद्यालय के  इतिहासकारों ने इस टीले की खुदाई शुरू की। इस खुदाई में ढाई हजार साल पुराने नगर के खंडहर निकले। टीले में मिट्टी और मलबे की कई परतें पाई गई। क्या आप जानते हैं कि टीले के ऊपर वाले स्तर और उनमें पाई गई सामग्री बाद के होते हैं, नीचे वाले स्तर और उनमें मिली वस्तुएं पहले की होती हैं? शुरू में लोग आए तो वे कुदरती जमीन पर ही आकर बसे थे।

          समय के साथ मकान गिरते गए, उनके मलबे पर नए बनाते गए। मलबा जमा होता गया और टीला ऊपर उठता गया। इस तरह सदियों की बसावट के बाद यह टीला सात-आठ मीटर ऊंचा हो गया। टीले में मिले स्तरों और उनमें पाई गई पुरानी वस्तुओं को वैज्ञानिकों ने पहचाना। उनका समय निश्चित किया। उनकी मदद से नगर की संस्कृति को समझा। तभी तो पता चला कि सुघ नगर चार कालों से होकर गुजरा है।

          टीले की खुदाई को देखकर गांव के लोग हैरान होते थे। उन्हें समझ में नहीं आता था कि यह सब कैसे हुआ? घर, भट्टियां और किला जमीन में कैसे धंस गए? किसी भी लाल बुझक्कड़ की बात उन्हें जंच जाती थी। वे कहते थे, पहले यहां कोई साधु रहता था। नगर के वासियों से किसी बात पर नाराज हो गया। सब कुछ जमीन में धंस गया। ऐसी मनघड़ंत कहानियां अनेक टीलों के बारे में सुनने को मिलती हैं। जानकारी की कमी और अंधविश्वास के कारण लोग कुछ भी सच मान बैठते हैं। ज्यों-ज्यों टीले की खुदाई आगे बढ़ी, वे सच्चाई को समझने लगे।

          सुघर की पहली बस्ती करीब छब्बीस सौ वर्ष पहले आबाद हुई थी। यह नगर का प्रथम काल था। पता नहीं यहां किला था भी या नहीं। और अधिक खोदते तो पता चलता। खोदी गई जगह में मकानों के खंडहर भी कम ही मिले हैं। हां, इन स्तरों में कच्ची ईंटों के टुकड़े और राख जरूर मिलती है। लगता है लोग कच्चे मकान बनाते थे। उनकी छतें घास-फूस की होती थी। वे तांबे, शीशे और मिट्टी के मनकों की माला भी बनाते थे। मिट्टी के मनकों की मालाएं तो गरीब लोग ही पहनते होंगे। इस काल में कई प्रकार के मिट्टी के सुदर बर्तन भी बनाए जाते थे। चमकीले काले रंग के और पतले स्लेटी बर्तन साधनवास लोग ही ले पाते होंगे। आम जनता तो लाल रंग के या मोटे स्लेटी रंग के बर्तनों से ही काम चलाती थी। सुघ का यह पहला नगर करीब सौ साल रहा।

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          दूसरे काल में नगर का खूब विस्तार हुआ। यह खुशहाली का युग था। मकान पक्की ईंटों के भी बनाए जाने लगे थे। नगर के चारों तरफ मिट्टी का मजबूत किला बनाया गया था। मकानों की छतों से पानी उतारने के लिए मिट्टी की पाईप का इस्तेमालल होने लगा था। शहर का गंदा पानी छेद वाले मटकों और चक्कों से बने कुआं की मदद से जमीन में उतार दिया जाता था। सफाई का इंतजाम अच्छा था।

          अब तांबे और लोहे की वस्तुएं अधिक बनने लगी थी। सोने और चांदी के गहने भी बनने लगे थे। व्यापार बढ़ रहा था। चांदी और तांबे के सिक्कों का इस्तेमाल होने लगा था। पुराने सिक्के धातु के कटे हुए टुकड़े ही होते थे। उनके वजन को प्रमाणित करने के लिए उन पर मोहर लगा दी जाती थी। कुछ सिक्के तांबे को ढाल कर भी बनाए जाते थे। उन पर लिपि भी होती थी। परन्तु बिना लिपि के सिक्के भी इस्तेमाल होते थे। व्यापार और उद्योग के फलने-फूलने पर निर्भर थी सुघ की खुशहाली।

          नगरों के उभार के साथ-साथ कला भी पनपती है। सुघ में भी कला का प्रचलन बढ़ा। इस कालल में मिट्टी की मूर्तियां बनने लगीं। इनमें देवी की मूर्तियां गहनों से लदी हैं। परन्तु हैं पूरी तरह वस्त्राहीन।

          यहीं पर मिली एक बालक की मूर्ति तो बड़ी रोचक है। वह हाथ में तख्ती पकड़े सरल ढंग से बैठा है। दूसरे हाथ की उंगली की मदद से अक्षर पढ़ रहा है। तख्ती पर लिखी लिपी बहुत पुरानी है।

          2200 साल पहले अशोक के शिलालेख प्राय: इसी लिपि में लिखे मिलते हैं। लोग इस लिखाई को ब्राह्मी की देन मानते हैं। इसीलिए इसका नाम ब्राह्मी लिपि (किसी भी शब्द के लिखने की आकृतिमूलक पद्धति) पड़ गया। लिखना-पढऩा पहले शहरों में ही शुरू हुआ। व्यापार और राजकाज में इसकी खास जरूरत होती थी। समय बीतने पर इस लिपि का प्रचलन भारत के सभी नगरों में फैल गया। पर इसका स्वरूप एक सा नहीं रहा। अलग-अलग इलाकों में लिपियों ने भिन्न-भिन्न रूप धारण कर लिया। आज भारत की सभी लिपियां ब्राह्मी से ही निकली हैं। वे चाहे दक्षिण भारत की हैं, चाहे बंगाल और पंजाब की।

          सुघ से मिली पशुओं की मूर्तियां बहुत सुंदर लगती हैं। इनमें हाथी, घोड़े, बैल और बकरे खास हैं। चौड़ा मस्तक, लंबी सूंड और सुडौल शरीर के लिए हाथी की मूर्तियां अनोखी हैं। बच्चों के लिए ढेर सारे खिलौने भी मिले हैं। इनमें झुनझुने और पक्षीनुमा खिलौने शामिल हैं।

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          यहां मिली मूर्तियों में सुंदर सजे-धजे रथ भी हैं। शंख, हाथी दांत और तांबे  के गहने अच्छे बने हैं। इनसे बनी चूडिय़ां व नाक-कान के आभूषण धनी परिवारों के लिए थे। साधारण लोग तो मिट्टी की चूडिय़ां और मालाएं ही पहनते थे। मालाओं के मनके कीमती पत्थरों और कांच के भी बनते थे। कुछ लोग हड्डी और मिट्टी के मनकों की मालाएं इस्तेमाल करते थे। आंख में काजल डालने की सलाई तांबे की बनी थी। पत्थर की डिब्बी और तांबे की बोतल के डाटे पर बने बैल बड़े मनोहारी लगते हैं। वे तांबे और हड्डी के तीर भी बनाते थे। आटा पीसने के लिए सिलबट्टे का ही इस्तेमाल होता था। टीले में पाई गई हड्डियों की जांच से पता चला है कि वे बैल, घोड़ा, भेड़, बकरी और सुअर पालते थे।

          सुघ के पास ही चनेटी नाम का गांव है। इसके खेतों में एक पुराना स्तूप खड़ा है। यह पक्की ईंटों की बनी एक ठोस समाधि है। इसके आसपास मूर्तियां नहीं मिली। क्या आप जानते हैं कि बुद्ध धर्म में शुरू में मूर्ति पूजा नहीं होती थी। यह तो भारत में दो हजार वर्ष पहले ही शुरू हुई है और आई भी विदेशों से है। दूसरी सदी ईस्वी पूर्व में मौर्य राज के पतन के साथ-साथ भारत पर विदेशी हमले शुरू हो गए। ईरान के साम्राज्य को जीत लेने के बाद भारत के पश्चिम में यूनानियों का कब्जा हो गया था। सिकंदर का सारा साम्राज्य उसके सेनापतियों ने बांट लिया था। उन्हीं के वंशज यूनानी राजा करीब दो हजार साल पहले भारत आए। सुघ में कई यूनानी राजाओं के चांदी के सिक्के मिले हैं। लगता है कि इस नगर पर ईसा से पहले ही यूनानियों का कब्जा हो गया था।

          इस दौर में कई विदेशी कबीले भारत आए। उन्होंने यहां अपना राज जमा लिया। इनमें शक और कुषाण खास महत्व रखते थे। कुषाण बड़े शक्तिशाली थे। उनका राज अफगानिस्तान से परे मध्य ऐशिया से लेकर बिहार तक फैल गया। उनकी राजधानी पेशावर थी।

          तीसरे काल में सुघ नगर पर कुषाणों का दबदबा हो  गया था। देश-विदेशों में व्यापार के फैलने से सुघ भी खूब फला-फूला। अब यह नगर योजना के मुताबिक बसाया गया था। मकान प्राय:  पक्की ईंटों के बनाए जाते थे। लोहे का उद्योग तरक्की पर था। खेती के औजार, कुल्हाड़ी, तीर और कीलें लोहे की बनती थी। काजल डालने की सलाई और पिन इस युग में भी तांबे की बनती थी। खुदाई में धातु का काम करने वालों की भट्ठियां मिली हैं। लोहा और तांबा पिंघलाने की कुठालियां मिली हैं। मंडूर भी पाए गए हैं। मंडूर धातू के मैल के खंगर का नाम है। इन चीजों का पाया जाना धातु उद्योग के फलने-फूलने का सूचक है। जगाधरी के  बर्तन बनाने के कारखाने इस उद्योग की परम्परा को आज भी जीवित रखे हैं।

          मिट्टी की मूर्ति बनाने की कला अब अपनी जवानी पर थी। मानव की मूर्तियां प्राय: सांचों में बनाई जाती थीं। इनमें ज्यादातर देवी की मूर्तियां हैं। अब इन्हें गहने थोड़े पहने दिखा जाता था। कपड़े महीन थे। बाल अच्छी तरह सजाए गए थे। पशुओं की मूर्तियां पहले जैसी बनी हैं। पर हाथी की मूर्तियां बनाने का रिवाज कम हो गया था। रथ भी नहीं मिलते। नए शासक आने के कारण इस युग की संस्कृति कुछ बदल रही थी। कीमती पत्थरों के मनकों की मालाओं का इस काल में भी खूब शौक था। गहनों में चूडिय़ां, अंगूठियां और नाक-कान के आभूषण सुंदर बनते थे। आभूषणों में भी यह साफ दिखाई पड़ता है कि ये किस वर्ग के लिए हैं। गरीब लोगों के आभूषण मिट्टी आदि के ही बने होते थे। इस युग की खास खोज थी आटा पीसने की चक्की। यह भारत में करीब दो हजार साल पहले ही आई। पहले लोग सिलबट्टों से ही आटा पीस लेते थे। नगर से गाय, भेड़, बकरी की हड्डियां भी मिली हैं। इसका मतलब हुआ कि उस समय वहां ये पशु पाले जाते थे।

          इस काल में नगर के बाहर भी कुछ भवन बनाए गए थे। सुघ के दक्षिण-पश्चिम में पक्की ईंटों की चारदिवारी मिली है। इनकी दीवारें बड़ी ऊंची थी। अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये कम से कम छह मीटर ऊंची तो थीं ही। इसकी बड़ी-बड़ी ईंटें कुषाणा काल की याद दिलाती हैं। लगता है यह कोई बौद्ध विहार था।

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          लगभग 1700 साल पहले नगर का चौथा काल शुरू हुआ। सुघ का नगर अपने पतन की तरफ बढ़ रहा था। कुषाण राज टूट गया था। अराजकता के दौर में भला व्यापार कैसे चल पाता। नगर की समृद्धि खत्म होने लगी। कुछ हिस्से गैर आबाद हो गए। परन्तु बदहाली के बावजूद सुघ की बस्ती उजड़ी नहीं थी।

          पांचवीं-छटी सदी में इस नगर पर विग्रहराज नाम के सामंत का अधिकार था। सुघ से इसकी मोहर मिली है। यह सामंती युग था। जागीरदार जमीन के मालिक थे। किसान बंटाई पर खेती करते थे। बेगार भी देनी पड़ती थी। गुप्त वंश के साम्राज्य के हूणों ने तबाह कर डाला। ये विदेशी से आए थे। ये बड़े जालिम थे। सुघ नगर भी उनके प्रभाव से बच न सका। हूणों के राजा तोरमाण के सिक्के इस टिल्ले से मिले हैं।

          सातवीं सदी में यहां एक सामंत का राज पैदा हो गया था। चीनी यात्री ने सुघ के इसी राज की तरफ इशारा किया ह। 11वीं-12वीं सदी में सुघ नगर दिल्ली के तोमर और चौहान वंशों के राजाओं के अधीन आ गया। टीले से इनके सिक्के मिले हैं। इस काल की मिट्टी की एक मुद्रा भी पाई गई है। मुद्रा पर देवनागरी लिपि में सुघ लिखा है। यह इस नगर की ही मुहर थी।

          पुराने जमाने में इस नगर का नाम सु्रघ्न था। 2400 साल पुराने संस्कृत के ‘अष्टाध्यायी’ नामक ग्रंथ में इस नगर को सु्रघ्न ही कहा जाता है। यह ग्रंथ व्याकरण के बड़े विद्वान पाणिति ने लिखा था। उस समय सु्रघ्न दूर-दूर तक मशहूर था। कन्नौज नगर का एक दरववाजा और सड़क सु्रघ्न नाम से जाने जाते थे। बाद के संस्कृत साहित्य में भी इस नगर का नाम स्रुघ्न ही मिलता है। हुएनसांग ने सु्रघ्न का ही चीनी भाषा में रूपांतर किया था। आज से लगभग एक हजार साल पहले इस नगर का नाम सु्रघ्न से बिगड़कर सुघ हो गया मालूम होता है।

          12वीं  सदी के बाद सुघ का कस्बा सिंकुड़ कर गांव बन गया। पिछले  800 साल से इसका यही भविष्य रहा  है। 16वीं सदी में चुघ के पास एक दूसरा कस्बा बसा दिया गया। इसे बुडिया कहते हैं। आज भी यह अपने खंडहरों के साथ सुघ के उत्तर में मौजूद हैं। कहते हैं कि इसे मुगल बादशाह हुमांयू ने बसाया था। अकबर के एक नवरत्न बीरबल का जन्म बुडिया में ही हुआ माना जाता है। शाहजहां  ने यहां एक रंगमहल बनवाया था। यह आज भी खड़ा है, पर गिरने की हालत में। लोग इसे भी बीरबल का महल ही मानते हैं।

          मुगल साम्राज्य के बिखरने के बाद चारों तरफ अराजकता फैल गई थी। 18वीं सदी में अहमदशाह अब्दाली ने आक्रमण किया। कुछ सालों तक इस इलाके पर उसने अपना कब्जा बनाए रखा। उसके  वापिस लौट जाने के बाद सिक्ख सरदारों ने यहां अपना राज जमा लिया। सुघ के पास ही दयालगढ़ का किला इसकी निशानी है।

          सन् 1805 में सुघ के इलाके को अंग्रेजों ने जीत लिया, परन्तु 1857 के प्रथम संग्राम की ज्वाला अम्बाला, रोपड़ व जालंधर के साथ इस इलाके में भी फैल गई। जगाधरी इस संघर्ष का केंद्र था। अंग्रेजी राज ने जींद, नाभा, पटियाला आदि देसी रियासतों की फौजी मदद के बलबूते पर इस जन-विद्रोह को क्रूरतापूर्वक कुचल दिया। लोग राज्य के आतंक के साए में फिर जैसे-तैसे जीने का रास्ता बनाने में लग गए। आज यह छोटा सा गांव गरीबी की हालत में अपनी विरासत को पूरी तरह भुला चुका है। 

लेखक ख्याति प्राप्त पुरातत्त्वविद थे. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं  पुरातत्त्व विभाग में प्रोफेसर रहे।  डा. सूरजभान ने इसकी खुदाई करवाई थी। हरियाणा राज्य संसाधन केंद्र, रोहतक ने ‘सुघः एक पुराने नगर की कहानी ‘ नामक पुस्तिका प्रकाशित की है।

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