बाजे भगत

बाजे भगत

बाजे भगत

जिला सोनीपत के गांव सिसाणा में 16 जुलाई 1898 को जन्म। हरदेवा के शिष्य। 15 के करीब सांगों की रचना।सत्यवादी हरिश्चन्द्र, गोपीचन्द, पूर्णमल, अजीत राजबाला, नल दमयन्ती, शकुन्तला-दुष्यन्त, कृष्ण जन्म, सरवर नीर, जानी चोर, पद्मावत, हीरामल जमाल, रघुबीर धर्मकौरआदि। 26 फरवरी,1936 को देहान्त। 

1

या लगै भाणजी तेरी, इसनै मतना मारै

कहूं जोड़ कै हाथ तूं इस पै दया करै नै

 

और किसे का दोष नहीं तकदीर मेरी हेट्ठी सै

नौ महीने तक बोझ मरी या मेरे उदर लेटी सै

या एक बेटी सै मेरी, मत जुलम गुजारै

क्यों करता आत्मघात, तूं इस पै दया करै नै

 

मेरी बातों पै कंस भाइ, तू कती ध्यान न धरता

कानां पर कै टाळै सै, मेरा बोल तेरै ना जरता

क्यों करता डुब्बा-ढेरी, मैं रहूं क्यां कै सहारै

बाळक मारे सात, तू इस पै दया करै नै

 

मेरे बाळक मारण का तनै बुरा ले लिया चसका

कै दिन खातिर जुलम करै भाई जीना सै दिन दस का

बता या किसका सै के लेहरी मत सिर नै तारै

आखिर कन्या की जात, तू इस पै दया करै नै

 

ऋषि मुनी और योगी मात तनैं ध्यावैं सै बह्म ज्ञानी

सन्त छज्जू दीप चन्द उन कवियों नै मानी

वरदान भवानी, देहरी जाण म्हारी होगी सारै

ये हरदेवा की करामात तू इस पै दया करै नै

 

2

लाड करण लगी मात, पूत की कौळी भरकै

 

हुई आजाद शोक और भय से, गात म्हं खुशी हो गई ऐसे

जैसे, धन निधरन के लग्या हाथ, खुश हुए न्यौळी भरकै

 

आज वे परसन्न होगे हरि, आत्मा ठण्डी हुई मेरी

कद तेरी, चढ़ती देखूंगी बारात, बहू आवै रोळी भरकै

 

तेरे बिन अधम बीच लटकूं थी, नाग जैसे मणि बिन सिर पटकूं थी

पूत बिन भटकूं थी, दिन रात, आया सुख झोळी भरकै

 

बाजे राम चरण सिर डारै, भवानी सबके कारज सारै

मारै, नुगर्यां कै गात, ज्ञान की गोळी भरकै

 

3

साची बात कहण म्हं सखी होया करै तकरार

दगाबाज बेरहम बहन ना मरदां का इतबार

 

रंगी थी सती प्रेम के रंग म्हं, साथ री बिपत रूप के जंग म्हं

दमयन्ती के संग म्हं किसा नळ नै कर्या ब्यौहार

आधी रात छोडग्या बण मैं ल्हाज शरम दी तार

 

सखी सुण कै क्रोध जागता तन म्हं, मरद जळे करैं अन्धेरा दिन म्हं

चौदहा साल दुख भोगे बण म्हं, ना तज्या पिया का प्यार,

फेर भी राम नै काढी घर तै, वा सीता सतवन्ती नार

 

बात हमनै मरदां की पाग्यी, घमण्ड गरूर करै मद भागी,

बिना खोट अन्जना त्यागी, कर्या पवन नै अत्याचार,

काग उड़ाणी बणा दई, हुया इसा पवन पै भूत सवार

 

खोट सारा मरदां मैं पाया, शकुन्तला संग जुल्म कमाया,

गन्धर्व ब्याह करवाया दुष्यन्त नै, कर लिए कौल करार,

शकुन्तला ना घर मैं राखी, बण्या कौमी गद्दार

 

4

धन माया के बारे म्हं किसे बिरले तै दिल डाट्या जा सै

जो तने दे दिया राज दान म्हं, मेरे तै के नाट्या जा सै

 

सधग्या वक्त सन्त आवण का यो मौका दिल समझावण का

मेरे बालम मनुष्य शरीर पावण का के सबतै सांटा सांट्या जा सै

 

हुया करै जब धरम म्हं हरजा, उसने बिसरावै सब परजा

जो कोए कहे वचन तै फिरज्या आप थूक कै चाट्या जा सै

 

तेरे तै कहूं साचा वचन टेर कै, पिया जी ना करूं बात फेर कै

तेरा धरम का कुंआ रेत गेर कै, ब्याही तै के आंट्या जा सै

 

पार होंगे बिपता झेल्ले तै, म्हं ढकूं पे्रम सेले तै

कह बाजे राम सुगरे चेले तै, के नाम छाप का काट्या जा सै

 

5

बिपता के म्हं फिरूं झाड़ती घर-घर के जाळे

सैर कर्या करैं दुनियां के म्हं धन माया आळे

 

घर तै बाहर फिरण की कोन्या आदत मेरी सै

तेरी टहल म्हं हरदम रहणा दुखिया दासी तेरी सै

मनै इतनी सैल भतेरी सै मेरे जां बेटे पाळे

 

म्हारे गळ म्हं घल रही सै दुख: विपता की डोरी

सैर कर्या करै साहुकार और सेठां की गोरी

रोटी खाणी मुश्किल होरी म्हारे वक्त टळंै टाळे

 

जिनके घर नगरी छुट्टे वे सब तरियां बिप्त सहैं

पेट गुजारा करणा न्यूं बणकै तेरे दास रहैं

जो सैर करैं तौ लोग कहैं के ये कररे सैं चाळे

 

बाजे भगत भक्ति करकै भव सागर पार तर ले

इस मृत लोक नै छोड़ कै अपणा सुर पुर धाम कर ले

जिनपै ईश्वर राजी के कर लें, जड़ काटणियां साळे

 

6

मैं निर्धन कंगाल आदमी तूं राजा की जाइ

मेरै रहण न घर नहीं तूं महल छोड़ कै आइ

 

थारे महल बंगले कोठी न्यारे-न्यारे मरदाने और जनाने

मेरे अन्न, वस्त्र का टोटा सै, थारै तरह-तरह के खाणे

थारे धन माया के भरे खजाने, मेरे धोरै ना एक पाई

 

थारे धन माया के कोष भरे, और नौकर रहैं रुखाळे

कर्जा खस्म मर्द का हो मेरे वक्त टळैं सैं टाळे

तेरे पिता नै कर दिए चाळे, तूं निरधन गेल्यां ब्याही

 

मेरै ठौड़ ठिकाणा कोन्या तूं कित दर-दर फिर्या करैगी

बण म्हं शेर बघेरे बोलैं तू उनतै डर्या करैगी

मेरे साथ म्हं भर्या करैगी राजबाला खूब तवाई

 

बड़े आदमी कह्या करैं ना टोटा किसे का मीत

कहै बाजे भगत धर्म शास्त्र सारे राखै जीत

अपने कैसे तैं कर्या करैं प्रीत बैर और अस्नाइ

 

7

बेरा ना कद दर्शन होंगे पिया मिलन की लागर्ही आस

बिना कंत कामनी न्यूंए, भटके जा सै बारह मास

 

लग्या चैत चित ना चोले म्हं चतर सज्जन लगे चित चोर

आया बैशाख मुझ बिरहण कै बालम के ना की उठे लोहर

जेठ जिगर पर जुल्म करै नित जालम देर्या अपणा जोर

इस गरमी के मांह धूप पड़े पिया किसी ना ठण्डक और

गंगा दशहरा छूट्या जेठ की पिया बिन गइ निरजला ग्यास

 

आया साढ़ अंगूर अनार पौधों म्हं छाई हरियाली

सामण म्हं साजन साथ नहीं सारी साथण झूलण चाली

भादों से भंवर भटकता घनघोर घटा छाइ काळी

वर्षा रुत की बहार मेरी बालम बिन विरथा जा ली

भादवै की अंधेरी म्हं डर लागे, दिलदार नहीं है दिल के पास

 

आया आसोज छुट्टी अरसत अष्टमी दशहरे का त्यौहार

कार्तिक म्हं हो कंत बिना करवा चौथ दीवाळी बेकार

मंगसर म्हं मौसम बदल गई मन मेली ना घर मरहम कार

या रितु शरद हो रंग जरद बिना मरद की जो हो नार

साजन बिन सुन्नी सेज पड़ी मेरा देख-देख दिल रहै निराश

 

पोह का पाळा पल-पल पड़ता पिया बिन कांपै मेरा शरीर

माह म्हं सब मधमाती नारी जर बसन्ती ओढै़ं चीर

फागण म्हं फगवा फूल खिलैं बालम संग फागण खेलैं बीर

या रितु बसन्त नहीं पास कंथ, बालम बणग्ये सन्त फकीर

मन मार बैठग्यी थी रानी बाजे भगत की बणकै दास

 

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, हरियाणवी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन पंचकुला, पृ. 57 से 62

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