प्रो. सूरजभान

परिचय

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सूरजभान

जाने-माने इतिहासकार, पुरातत्ववेता और समाज सुधारक प्रोफेसर सूरजभान 14 जुलाई 2010 को हमारे बीच से चले गए। प्रोफेसर सूरजभान का जन्म 1 मार्च 1931 को मिंटगुमरी (एकीकृत पंजाब)जिला के देहात 51 चक में हुआ। उनके पिताजी सेना में नौकरी करते थे।

        प्रोफेसर सूरजभान ने अपनी प्राईमरी परीक्षा अरफ ( मिंटगुमरी) से पास की, मैट्रिक तक की शिक्षा और बी.ए. किरोड़ीमल कालिज (दिल्ली) से प्राप्त की। उन्होंने दिल्ली विशविद्यालय से एम.ए. संस्कृत और बड़ोदा(गुजरात)से एम.ए.(इतिहास एवम् पुरातत्व) व पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। वे कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास एवम् पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने शिमला एडवांस स्टडीज सैंटर में 3 वर्ष तक सीनियर फैलो के तौर पर कार्य किया। प्रोफेसर सूरजभान प्रख्यात पुरातत्व विज्ञानी थे। उन्होंने हड़प्पन संस्कृति के विकास  सम्बंधी जानकारी जुटाने के लिए हरियाणा व पंजाब के अनेक पुरास्थलों का सघन भ्रमण किया। हरियाणा में मिताथल (भिवानी), शीशवाल (हिसार), शुघ (यमुनानगर), दौलतपुर (कुरूक्षेत्र), बालू (कैथल), कर्ण का किला ( करनाल) में अनेक पुरास्थलों का महत्वपूर्ण उत्खनन कार्य किया। देश-विदेश में उन्होंने व्याख्यान दिए। कई जर्नल्स में उनके शोध पत्र प्रकाशित हुए। एक पुरातत्व विज्ञानी के रूप में प्रोफेसर सूरजभान ने देश व प्रदेश में प्रतिष्ठित मुकाम हासिल किया। देश के कुछ गिने-चुने इतिहासकारों में प्रोफेसर सूरजभान का नाम शुमार था। एक धर्मनिरपेक्ष इतिहासकार के उच्च मानदडों को प्रोफेसर सूरजभान ने गहराई के साथ आत्मसात किया। बाबरी मस्जिद केस में प्रोफेसर सूरजभान ने एक प्रबुद्ध धर्मनिरपेक्ष पुरातत्व विज्ञानी की छाप छोड़ी। भारतीय इतिहास कांग्रेस में प्रोफेसर सूरजभान का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

       कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से रिटायर होने के बाद वे ज्ञान-विज्ञान आंदोलन में पूरी ऊर्जा के साथ जुट गए। समाज सुधार आंदोलन को हरियाणा में विस्तार देने के लिए उन्होंने अनथक योद्धा की तरह कार्य किया। मजदूरों, किसानों, महिलाओं और वचितों के संघर्षों के साथ उनकी गहरी पक्षधरता थी। प्रदेश में ज्ञान-विज्ञान आंदोलन के समाज सुधार के एजेंडे को फोक्स में लाने में उन्होंने अनेक पहलकदमियां की। प्रोफेसर सूरजभान कहते थे कि वर्ग विभाजित समाज में शोषण और दमन के खिलाफ मेहनतकश जनता की एकता बहुत जरूरी है। सामाजिक कार्यों में उनकी गहरी आस्था थी। अपने आस-पड़ोस के छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर लोगों को इकट्ठा कर उनका निदान कराने में भी उनकी अग्रणी भूमिका रहती थी। सामुदायिक सहयोग, बच्चों व युवाओं को रचनात्मक कार्यों से जोडऩे और लोगों को अपनी समस्याओं पर मिलकर संगठित प्रयास करने पर उनका मुख्य जोर रहता था। उनका गहरा विश्वास था कि सामाजिक कार्यों से जुडक़र ही समाज बदलने के कार्य को गति दी जा सकती हैं। वे अन्तर्जातीय विवाह के पक्के समर्थक थे। प्रोफेसर सूरजभान सादगी, सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता, तर्कपूर्ण संवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मिलनसार, हंसमुख स्वभाव और गहरे सामाजिक सरोकारों के धनी थे। उनके सम्पर्क में आने वाला हर आयु का नागरिक उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता था। वे प्रवासी व कूड़ा बीनने वाले बच्चों  को पढ़ाने की जरूरत को बार-बार रेखांकित करते थे। बच्चों के साथ वे सहजता के साथ घुलमिल जाते और कालोनी के पार्कों की सफाई में उन्हें अपने साथ जोड़ लेते थे।

       उनके परिवार में मौजूद आर्य समाज का प्रभाव प्रोफेसर सूरजभान पर भी रहा। कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में रहते हुए वे जाने-माने चिंतक आलोचक प्रोफेसर ओ.पी. ग्रेवाल के सम्र्पक में आए। डा. ग्रेवाल के साथ मिलकर हरियाणा में समाज सुधार, साक्षरता, और ज्ञान-विज्ञान अभियानों में प्रोफेसर सूरजभान ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वे हरियाणा में न्याय, समानता, सादगी, समाज सुधार और जनतांत्रिक मूल्यों की उपस्थिति को विस्तार देने के जरूरत को बार-बार रेखांकित करते थे। वचितों और जरूरतमंदों के प्रति प्रोफेसर सूरजभान का हाथ हमेशा आगे रहता था। एक बार प्रोफेसर सूरजभान की बेटी लैक्चरर के पद के लिए चंडीगढ़ साक्षातकार देने पंहुची। यहां पर एक ही सीट थी और साक्षात्कार कमेटी के ज्यादातर सदस्य डा. सूरजभान के परिचित थे उन्होंने अपनी बेटी की बजाय एक बहुत ही जरूरतमंद युवक का चयन करने का अनुरोध किया। कमेटी के सदस्यों ने उनके अनुरोध को मान लिया।

हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने में मौजूद जातिवादी, प्रतिक्रियावादी मानसिकता को परास्त करने के लिए वे समाज सुधार की जरूरत पर मुख्य जोर देते थे। प्रोफेसर सूरजभान का शिक्षकों, छात्र, युवाओं, महिलाओं के संगठनों के साथ गहरा लगाव रहा। जनसंगठनों में निरन्तर प्रोफेसर सूरजभान के जनपक्षीय वैचारिक परिप्रेक्ष्य को सुनने की उत्सुकता बनी रहती थी। सबको गुणवत्ता आधारित सस्ती व वैचारिक शिक्षा मिले, इसके लिए वे हमेशा प्रयासरत रहे। शिक्षक संगठनों के साथ प्रोफेसर सूरजभान का बहुत निकट का रिश्ता रहा। इतने उच्चे कद के व्यक्तित्व का सबसे खूबसूरत पहलू उनका सहजता के साथ उपलब्ध हो जाना था। वे अपनी उम्र व अन्य महत्वपूर्ण व्यस्तताओं के बावजूद जनसरोकरों से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सेदारी  का निमंत्रण अस्वीकार नही करते थे। छोटी से छोटी विचार-गोष्ठी में भी अपनी साईकल उठाकर पंहुच जाते थे। अपने परिचितों और आंदोलन से जुड़े परिवारों का अकसर हाल-चाल पूछने चले आते थे। सामूहिक कार्यों के लिए लोगों के बीच रहने में वे आनन्दित महसूस करते थे। अपनी 80 साल की उम्र के इस पड़ाव में ज्ञान-विज्ञान व समाज सुधार अभियानों में प्रोफेसर सूरजभान युवा से भी बढक़र पूरी उर्जा के साथ सक्रिय रहते थे।

       प्रोफेसर सूरजभान के हमारे बीच न रहने से पूरे प्रगतिशील  आंदोलन को भारी क्षति पंहुची है। हरियाणा में एक सभ्य नागरिक समाज के निर्माण की प्रक्रियाओं में प्रोफेसर सूरजभान  हमेशा रोशनी देते रहेगें।

साभार – नरेश कुमार

 

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