पं. मांगे राम

पं. मांगेराम

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 जिला सोनीपत के गांव सुसाणा में सन् 1906 में जन्म। नाना के गोद लेने पर पाणची गांव में पालन-पोषण। पं. लख्मीचन्द के शिष्य। लगभग 40 सांगों की रचना। अजीत राजबाला, छैल-बाला, हीर-रांझा, जादू की रात,अमरसिंह राठौर, चापसिंह, जयमल फत्ता, वीर हकीकत राय, भगतसिंह, महात्मा गांधी, रूप-बसंत, सती-शीला, पिंगला-भरथरी, खाण्डे राव परी, गोपीचन्द भरथरी शकुन्तला-दुष्यन्त, ध्रुव भगत, कृष्ण-सुदामा, नल-दमयन्ती, राजा अम्ब, चन्द्रहास, शिवजी का ब्याह आदि। 16 नवम्बर 1967 को देहावसान।

1

सारी उमर गई टोट्टे म्हं

सारी उमर गई टोट्टे म्हं ना खाया टूक गुजारे तै

कोणसा खोट बण्या साजन गई रूस लक्ष्मी म्हारे तै

राजवाड्यां के राजा शाही ठाठ बिगड्ज्यां टोट्टे म्हं

दर-दर भीख मांगते हांडै लाट बिगड़ज्यां टोट्टे म्हं

यारे प्यारे सगे सम्बन्धी तीन सौ साठ बिगड़ज्यां टाट्टे म्हं

दान पुन सब व्यर्थ तीर्थ घाट बिगड़ज्यां टोट्टे म्हं

तनै धोरै बैठण देता ना कोये ताह्या जा पिया सारे तै

टोट्टे आळे माणस का पिया नहीं किसे संग प्यार रहै

मां का जाया दुश्मन बणज्या हरदम खाए खार रहै

बोल में बोल मिलै ना किसे का न्यू घर म्हं तकरार रहै

काम म्हं बरकत कती नहीं जब धुर तै पाटी सार रहै

इस तै आच्छा मौत भली के चालै काम कसारे तै

लुच्चा गुंडा बेईमान ये नाम धरे जां टोट्टे म्हं

तेरे याणे बाळक भूखे घर में रूदन करें जां टोट्टे म्हं

उस कृष्ण नै जा कै कहदे हम कती मरे जां टोट्टे म्हं

भीड़ पड़ी म्हं सहारा लादे के दगा करेगा प्यारे तै

कोण से जन्म का श्राप सेदग्या हम बणे खड़े कंगाल पिया

टोट्टे नै म्हारी कमर तोड़ दी आती कोन्या चाल पिया

मांगेराम गुरु लख्मीचन्द ये करे टोट्टे नै कैल पिया

भीड़ पड़ी म्हं मदद करेगा खुद कृष्ण गोपाल पिया

कोण सा बदला लेवै लक्ष्मी इस भृगु वंश बेचारे तै

 2

तूं बालक बच्चेदार मरै टोट्टे म्हं

तूं बालक बच्चेदार मरै टोट्टे म्हं

तेरे फेर्यां की गुनागार फिरै टोट्टे म्हं

मिल्या ना टूक, रोवणा होग्याकोन्या मिटती भूख,

मनैं चौबीस घण्टे जंग झोवणा होग्या

तनैं कुछ भी नहीं तमीज, फिकर का बीज बोवणा होग्या

दुख दरदां का बोझ ढोवणा होग्या

तेरी ब्याही बारा मास, सबर के सांस, भरै टोट्टे म्हं

घर में नहीं अनाज, भूख म्हं आज मरेंगे सारे

होरे सौ-सौ कोस पेमी म्हारे

तेरे टोट्टे आळे ख्याल बदलज्यां काल्ह, सजन न्यूं थारे

भीड़ पड़ी म्हं मदद कर्या करैं प्यारे

मेरी फूट गई तकदीर, सजन तेरी बीर, जरै टोट्टे म्हं

तेरी सुबह की नहाण, रोज की बैण, नहर का पाणी

तू होज्यागा बेमार डरै मिसराणी

तेरे बालक सैं नादान, लिए तू मान, शर्म की बाणी

तू मान्या ना भरतार रोज की कहाणी

घरां कपड़ा कोन्या एक, लखा कै देख ठिरैं टोट्टे म्हं

जब बरसेंगे भगवान, या टपकै छान, टूटज्या सारी

जब चलै जोर की हवा उठज्या सारी

काच्ची तेरी दीवाल, देख लिए काल्ह, फूटज्या सारी

तेरी भजन करण की बाण छुटज्या सारी

मांगेराम की रजा, धर्म की धजा, गिरै टोट्टे म्हं

3

लाख बरस तक माणस

लाख बरस तक माणस जीया टोटे के मांह मरें गया

के जीणें में जीया साजन धक्के खाता फिरें गया

टोटे के मांह आदम देह कै ओर उचाटी होज्या सै

टोटे के मांह माणस का जी सौ-सौ घाटी होज्या सै

टोटे के मांह सगे प्यार की तबियत खाटी होज्या सै

टोटे के मांह सब कुणबे की रे रे माटी होज्या सै

इस तै आच्छा डूब कै मरज्या दिन भर मेहनत करें गया

आदम देह नै जन्म लिया मेरै कमरे बैठक नौहरे हों

लोटण खातर पलंग निवारी रहण नै कमरे दोहरे हों

हीरे लाल कणी मणी मेरै धन माया के बोरे हों

रूपवान बलवान सजन मेरै पांच सात दस छोरे हों

इस तै आच्छा कान पड़ाले ता जिन्दगी दुख भरें गया

टोटे आळे माणस की कोय आबरो करता ना

जित बैठै ऊड़ै गाळ बकैं यू साळा किते मरता ना

टोटे के मांह माणस तै दखे कोय आदमी डरता ना

धन का टोटा भरज्या सै माणस का टोटा भरता ना

इस तै आच्छा डूब कै मरज्या नीच जात तै डरें गया

मांगेराम कड़े तक रोऊं, इस टोटे का ओड़ नहीं

हीरे पन्ने मोहर अशर्फी किस माणस नै लोड़ नहीं

मींह बरसै जब घर टपकै फेर चीज धरण नै ठोड़ नहीं

कातक लगते सोच खड़ी हो ओढ़ण खातर सौड़ नहीं

शी शी शी शी करै बिचारा जाड़े के मांह ठिरें गया

4

रोवण आळी मनैं

रोवण आळी मनैं बतादे के बिप्ता पडग़ी तेरे म्हं

गैरां के दुख दूर करणियां या ताकत सै मेरे म्हं

बैठ एकली रोवै सै क्यूं चेहरा हुया उदास तेरा

के सासू नै बोली मारी के बालम बदमाश तेरा

के नणद जिठाणी करैं लड़ाई घर में बाजै बांस तेरा

के देवर सै तेरा हठीला बन्द कर राख्या सांस तेरा

के चोरां नै माल लूट लिया आंधी और अंधेरे म्हं

के घणी कसूती चिठ्ठी आग्यी गोती नाती प्यारे की

के तेरे संग में हुई लड़ाई साबत भाई-चारे की

कोय आवै कोय जाण लागर्या जगत सरां भटियारे की

लिकड़ी होठ्यां चढगी कोठ्यां दुनियां चोब नकारे की

तनै गादड़ आळी रात बणा दी मैं सहम धिका दिया झेरे म्हं

बैठ कै एकली रोवै सै के सिर पै खसम गुसांई ना

कई रोज का भूखा सूं मनैं रोटी तक भी खाई ना

डेढ पहर आए नै हो लिया तोसक दरी बिछाई ना

मैं आया था ठहरण खातर तूं भी सुखिया पाई ना

हुई कन्हार पसीना सुख्या सर्छी बड़ै बछेरे म्हं

ले गोदी में रोवै सै के बाप मर्या इस याणे का

सारा भेद खोल कै कहदे काम नहीं शरमाणे का

उसा किसा मनै मतन्या जाणै मैं माणस ठ्योड़ ठिकाने का

पांणची म्हं रहण लागग्या मांगेराम सुसाणे का

पहले मोटर चलाई फेर सांग सीख लिया लखमीचन्द के डेरे म्हं

5

सासू नणद जेठाणी कोन्या मैं बेटे पै दिन तोडूं सूं

मेरे बेटे की ज्यान बचादे भूप खड़ी कर जोडूं सूं

आए गए मुसाफिर के कदे दो आने भी लूट्टे ना

साधु सन्त महात्मा तै मनैं दिए वचन कदे झूठ्ठे ना

काच्चे गेहूं खेत म्हं सूखै रॉस हुई और उठ्ठे ना

मेरा बेटा के मरण जोग सै दांत दूध के टूट्टे ना

आंसू पड़-पड़ घूंघट भीझै मैं पल्ला पकड़ निचोडूं सूं

18 साल की रांड हुई मैं डळे स्वर्ग म्हं डोह्ऊं सूं

तन-मन की कोय बूझणियां ना बैठ एकली रोऊं सूं

काफी दिन हुए रांड हुई नै सांस घाल कै सोऊं सूं

कई रोज की भूखी सूं मैं डेढ टिकड़ा पोऊं सूं

और देश नै मोती चुग लिए मैं ठाली रेत पिछोडू सूं

त्रिलोकी के पनमेसर मत एक किसे कै लाल दिए

एक लाल भी दे दे तो फेर मोहर असर्फी माल दिए

बारां साल होए रांड होई न काट भतेरे साल दिए

मेरे बेटे के बदले म्हं आज और किसे नै घाल दिए

तूं जाणैं कै ���ैं जाणूं के बात शहर म्हं फोडूं सूं

मांगेराम बुरे कामां तै टळता-टळता टळ्या रहै

ऊंच का पाणी सदा नीच म्हं ढळता-ढळता ढळ्या रहै

दुश्मन माणस के करले वो अपणे मन म्हं जळ्या रहै

मेरे बेटे की ज्यान बचादे मेरा भी दीवा बळ्या रहै

तेगा लेकै नाड़ काटले के तेरे हाथ नै मोडूं सूं

6

वा राजा की राजकुमारी मैं सिर्फ लंगोटे आळा सूं

वा राजा की राजकुमारी मैं सिर्फ लंगोटे आळा सूं

भांग रगड़ कै पीवणियां मैं कुण्डी सोट्टे आळा सूं

उसकी सौ सौ टहल करैं आड़ै एक भी दासी दास नहीं

वा शाल दुशाले ओढण आळी कम्बल तक मेरे पास नहीं

क्यां के सहारे जी लावेगी आड़ै शतरंज चौपड़ ताश नहीं

वा बागां की हरियल कोयल आड़ै बर्फ पड़ै हरी घास नहीं

मेरा एक कमण्डल एक कटोरा मैं फूटे लोट्टे आळा सूं

वा पालकियां में सैर करै मैं बिना सवारी रह्या करूं

वा सौ सौ माल उडावण आळी मैं पेट पुजारी रह्या करूं

उसनै घर बर जर चाहिए मैं सदा फरारी रह्या करूं

लगा समाधि तुरिया पद की मैं अटल अटारी रह्या करूं

उनै जुल्फां आळा बनड़ा चाहिए मैं लाम्बे चोट्टे आळा सूं

मैं अवधूत दर्शनी बाबा मेरा रंग राग देख कै डरज्यागी

मैं राख घोळ कै पिया करूं मेरा भाग देख कै डरज्यागी

पंच धूणा के बीच तपूं वा आग देख कै डरज्यागी

मेरे सौ सौ सर्प पड़े रहैं गळ म्हं नाग देख कै डरज्यागी

वा साहूकार की बेटी सै मैं खस्सी टोट्टे आळा सूं

किसे राजा के संग शादी कर दो इसा मेल मिलाणा ठीक नहीं

जुणसा खेल रचाया चाहो इसा खेल खिलाणा ठीक नहीं

जिसकी दोनूं धार घणी पैनी इसा सेल चलाणा ठीक नहीं

मैं फीम धतूरा भांग पिवणियां तेल पिलाणा ठीक नहीं

मांगे राम बोझ मरज्यांगी मैं जबर भरोट्टे आळा सूं

7

पकड़ कालजा रोवण लाग्गी

पकड़ कालजा रोवण लाग्गी बेटे की कौली भर कै

आज कंवर तनैं जाणा होगा धर्मराज पनमेशर कै

मां के हाथां मळ-मळ नहाले हट कै फेर नहीं नहाणा

मां के हाथां भोजन खाले हट कै फेर नहीं खाणा

जो कोय गया किले के भीतर हट कै फेर नहीं आणा

जिस जगहां तेरा बाप गया सै उसे जगहां तनैं जाणा

हिचकी बंधगी ना जीभ उथलती प्राण लिकडग़े डर-डर कै

जमना जी म्हं डूब मरूं तै गोते आळी होज्यां हैं

गणका बण कै सूवा पढ़ाल्यूं तै तोते आळी होज्यां हैं

भाई चारे तै पे्रम करूं तै न्योते आळी होज्यां हैं

ब्याह शादी तेरे हो जाते तो मैं पोते आळी होज्यां हैं

जळुआं पूजण बहु चलै तेरी बंटा टोकणी सिर धर कै

बारां साल रह्या मां धोरै मां तै हाथ छुटा चाल्या

मोहर, असर्फी, कणी, मणी सब अपणे हाथ लुटा चाल्या

धर्म का पेड्डा ला राख्या था अपणे हाथ कटा चाल्या

इन्द्रमण मेरे कंवर लाडले बाप का वंश मिटा चाल्या

बिन सांकळ कुण्डे ताळी ताळा भेह्ड़ दिया घर कै

मांगेराम दर्द छाती के फटे जख्म नै सीऊंगी

लखमीचन्द्र गुरु अपणे के उठ चरण नित नीऊंगी

तेरे मरने के बाद कंवर ना ठण्डा पाणी पीऊंगी

जब जा लेगा किले के भीतर एक घड़ी ना जीऊंगी

तेरी गेल्यां-गेल्यां आ ल्यूंगी मनैं कफन बांध लिया सिर कै

 

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, हरियाणवी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन पंचकुला, पृ. 75-82

 

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