दयाचन्द मायना

दयाचन्द मायना

   Dayachand-mayana

रोहतक जिले के मायना गांव में 10 मार्च, 1915 को जन्म। सन् 1941 से 47 तक में फौज में रहे। सन् 1952 में सी ओ डी दिल्ली कैंट में नौकरी। 16 किस्सों और 100 से अधिक रागनियों की रचना। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का किस्सा विशेषतौर पर लोकप्रिय। रागनी विधा को सामाजिक विषयों से जोड़ा। रागनियों में फिल्मी तर्जों का प्रयोग किया। 20 जनवरी, 1993 को देहावसान।

 

1

बोस इसी साड़ी ल्यादे दु:ख दूर उमर भर का हो

ना मोटा ना पतला लत्ता खद्दर सुथरी शान का हो

ठापा और चतेरा छापा फैशन नए डिजान का हो

साड़ी कै म्हां खिंचा होया नक्सा हिन्दुस्तान का हो

रामचन्द्र और लक्ष्मण फोटू वीर हनुमान का हो

चारों पल्यां ऊपर चित्र सावित्री सतवान का हो

पीळा, हरा, सफेद रंग आजादी की दुकान का हो

बीच महात्मा का फोटू पास धरा चरखा हो

पीळा, हरा, सफेद तिरंगा चढऱा खूब कमाल का हो

साड़ी के म्हां कढ़ा कसीदा आज और काल का हो

कांग्रेसी टोपी का फोटू बिल्कुल नई चाल का हो

राधे और कृष्ण का फोटू ईश्वर दीन-दयाल का हो

मौलाना, पटेल का फोटू माहे राजगोपाल का हो

विजय लक्ष्मी देवी फोटू पं. जवाहर लाल का हो

जब साड़ी नै ओढूंगी स्वराज म्हारे घर का हो

मथुरा बिन्द्रावन का फोटू अयोध्या और कांशी का हो

चन्द्रमासा खिला हुआ चौदस पूर्णमासी का हो

आगरे दिल्ली का फोटू माहे नक्सा झांसी का हो

जलियांवाळा बाग का फोटू पापी डायर की बदमासी का हो

हिलता दे दिखाई तख्ता भगत सिंह की फाँसी का हो

इस साड़ी का ल्याणा देवर काम नहीं है हांसी का हो

आजाद हिंद फौज का फोटू बोस उतर्या सिंगापुर का हो

जै तूं साड़ी ना लाया तै माणस ना कुछ काम का हो

साड़ी कै मै लग्या हुआ खून मनुष जाम का हो

लड़ती दिखै सेना नक्शा बर्मा और आसाम का हो

जगह-जगह पै नाम लिखा सतगुरु मुन्शी राम का हो

दयाचन्द का घर साड़ी मैं नक्शा माने गाम का हो

छोटे-बड़े कवि सभी ताज मेरे सिर का हो

2

पहले आळी बात पुराणे ख्याल बदलणे होंगे

ऊंच-नीच के शब्द पिता, फिलहाल बदलणे होंगे

ये सोचणा पड़ैगा पिता, भूल मैं ना रह्या करते

नीच में बहैगा पाणी, ऊंच मैं ना बह्या करते

ये भी तो इन्सान हैं तम थोड़ी सी भी ना दया करते

छाती से लगालो जिनको दूर-दूर किया करते

मास्टर जी कह्या करते, बुरे सवाल बदलणे होंगे

कलकत्ते और बम्बई, दिल्ली आगरे में फून करा दो

नीच कह ना कोई सारै, ये लागू कानून करा दो

कानून के तोड़णिया का, पीस कै नै चून करा दो

लुच्चे, गुण्डे, बदमासां की, मिट्टी पलीत बिरून करा दो

लेकै डण्डा जूत ऊत चिण्डाल बदलणे होंगे

मजदूरों की दहाड़ी खा-खा, भारी-भारी सेठ होगे

खून गरीबां का पी-पी कै, मोटे-मोटे पेट होगे

घर-घर के म्हां चौधरी सारे ऑफिसर और मेठ होगे

धन माया के लोभी लाला, दया-धर्म तै लेट होगे

धन आळां की जगह अब, कंगाल बदलणे होंगे

जो माणस तै नफरत करते, उन स्याणा की जरूरत कोन्या

मुंह मैं राम बगल मै छुरा, बुग वाणां की जरूरत कोन्या

शुद्धि के प्रचार सुणो, गन्दे गाणां की जरूरत कोन्या

छोड़ दो ख्याल पह्लड़े, पुराणां की जरूरत कोन्या

‘दयाचन्द’ छन्द नए-नए, हर साल बदलणे होंगे

3

पाणी आली पाणी प्यादे, क्यूं अणबोल खड़ी होगी

के कूएं का नीर सपड़ग्या, ठाकै डोल खड़ी होगी

नींबू और संतरे के मैं, गहरी छां जामण की

परवा, पछवा, पवन चालरी, घटा ऊठरी सामण की

तेरे बावन गज के दामण की, क्यूं मारकै झोल खड़ी होगी

पंद्रा सोळा बीस बरस की, तेरी उमर हुई रंग छांटण की

के ल्याई के ले ज्यागी, बाण छोड़दे नाटण की

एक चीज दिल डाटण की, क्यूं लाकै मोल खड़ी होगी

मीठी-मीठी बोलै प्यारी, कोए परदेशी मार्या जा

रूप गजब का लेरी बैरण, फोटू के मैं तार्या जा

यो दिल तेरे पै वार्या जा, क्यूं घूंघट खोल खड़ी होगी

इतणा सोचै थी तै राणी, पाणी नै ना आणा था

ठा कै दोघड़ चाल पड़ी, तनै पाणी जरूर पिलाणा था

‘दयाचन्द’ का गाणा था, क्यूं डामांडोल खड़ी होगी

4

हाय-हाय रै जमींदारा, मेरा गात चीर दिया सारा

ईख तेरे पात्तां नै,

तुमसे ज्यादा हम चिरगे, गोरी देख म्हारे हाथां नै

कदे धूप कदे छां आज्या, हाय जान मरण के म्हां आज्या

कदे झाड़ा मैं पां आज्या, दे फोड़ कती लातां नै

जूड़ा हलाकै जहरी छिडग़े, मुंह पै कई तत्तैये लडग़े

बीर मर्द भीतर नै बडग़े, बचा-बचा गातां नै

किस्मत आळा हर्फ  दीखग्या, खतरा चारों तरफ दीखग्या

एक लटकता का सर्प दीखग्या, बचा लिया दाता नै

सुर गैल सरस्वती वर दे सै, अकल तै मेहनत कर दे सै

‘दयाचन्द’ छन्द धर दे सै, चौपड़-चौपड़ बातां नै

5

करकै घाय्ल तड़पती छोड़ी, जान क्यूं ना काढ़ लेग्या

हो परदेसी गैल मेरे, बांध क्यूं ना हाड़ लेग्या

सक्कर पारे, गिरी, छवारे, लाड्डू और सवाळी घी की

घर-घर के म्हां, चालू होगी, लाड कोथळी बेटी-धी की

हे ईश्वर कद प्यास बुझावै, रटना लगी चौरासी जी की

आधा सामण उतर चाल्या, सब कोए बाट देखर्या मींह की

मैं सूखी तीज मनाऊं क्यूंकर, मीह का मौका साढ़ लेग्या

ससुर मेरे पै छोह में आवै, सासू देवै गाळ मेरी

ओ परदेसी तनै आणकै, कोन्या लई संभाळ मेरी

ओढ़ण, पहरण, न्हाण, खाण की, कती छूट ली ढाळ मेरी

सिंगरल्यूं तै ताने मारै, इक छोटी नणद छिनाळ मेरी

रंग और चाव पति की गैल्या, तू घाल गोज मै लाड लेग्या

बड़ी मुश्किल तै पता चला, तेरी चिट्ठीमिली खोज की थी

तेरे आवण की छुट्टी खत मैं, लिखी बीस रोज की थी,

सारा कुणबा राजी होग्या, मेरी उस दिन रात मौज की थी

चौदस, पूर्णमासी, पड़वा, पक्की बात दोज की थी

चंदा बणकै दिख्या कोन्या कितै, बादलां की आड़ लेग्या

भर्ती होंगा, भर्ती होंगा या बेदन तेरे तन मैं थी

घर तै बाहर जाण की भर्ती, 41 के सन मैं थी

कुछ तै जोर दिया अन्न जल नै, कुछ तेरे भी मन मैं थी

मैं के करूं पति तेरी किस्मत गोरमेंट के अन्न मैं थी

घर कुणबे तै दूर ‘दयाचन्द’, तनै ठा भर्ती का चाढ़ लेग्या

6

तेरै नहीं लगैगी छींट, भींट का तै सब झगड़ा झूठा सै

उसनै ब्राह्मण मत समझो, जो भीतरले में पाप राखै

अछूत और चण्डाल कहै, ऊपर तै मन साफ राखै

दुनियां नै भकावै पापी, झूठे हर के जाप राखै

अन्धे माणस, मूर्खां कै, बन्ध आँखों कै पट्टी जा सै

हर के घर से एक आवैं, याडै़ जात बाँटी जा सै

जैसा काम वैसा नाम, गत कर्मा की छाँटी जा सै

सै एक जात, एक बात, एक बेल-बूटा सै

उनकी मुक्ति ना होती, जो झूठी बात घड़्या करैं

पाप के कमाणे आळे, नरक बीच मैं पड्य़ा करैं

ब्राह्मण नै ऊँचा बतलावै, जब मूर्ख माणस चड्य़ा करैं

जो पापियाँ की संगत करै, वोहे पाप के बीच हो सैं

यम के दूत पकड़ कै खींचै, जहां नरक की कीच हो सै

कर्म ही सै ऊंचा होज्या, कर्म ही से नीच हो सै

उस परमेश्वर के घर पै, सबका एक ठाण खूंटा सै

सच्चा कहणा, सच्चा सुणना, यो माणस का धर्म हो सै

अछूत और चण्डाल जाण, जीव आत्मा ब्रह्म हो सै

मूर्खां नै बेरा कोन्या, ऊंचा अपणा कर्म हो सै

जो ईश्वर के भजन करै ना, उसनै सत्संगी कहै कौण

लिए-दिए तै काम चालज्या घर मैं तंगी कहै कौण

जो सच्चा भगत प्रेमी हर का, उसनै भंगी कहै कौण

कहकै इस दुनियाँ का प्यार-यार, मित्र खाऊ-लूटा सै

सतगुरु मुन्शी कृपा करकै, चेले नै बताओ ज्ञान

धर्म की कमाई करै, वोहे हो सै बुद्धिमान

ऊंच-नीच का ना बेरा जिसनै, उसनै समझो मूढ़ नादान

साची बात घड्य़ा करै सै, जो सतगुरु का मुण्डा हो सै

हर के घर पै, दर पै जाकै, सबका एक कुण्डा हो सै

देसां की बदमास ऊत बता, माणस का के भूण्डा हो सै

दयानन्द साच्चे करै सै विचार, धार रस अमृत का घूंटा सै

7

बादळ ऊठ्या हे री सखी, प्यारे सासरे की ओड़

पाणी बरसैगा सिर तोड़ ….   बादल

जिसनै दुनियां कह कत्ल की, पहली-पहली रात थी

ऊं चे से चौबारे पै हुई, साजन तै मुलाकात थी

इन्द्र नै भी चाह बरसण का, धरती नै भी चाहत थी

योए था महिना सखी, उस दिन भी बरसात थी

इसा पुळ टूट्या री सखी, बहगे नदी-नाळे जोहड़

मोटी-मोटी बूंद भटाभट, फूटण लागे ओळे से

पानी के बहा के आगै, बहगे नाके डोले से

जंगळां के कवाड़ खुलै-मून्दै, ओळे सोळे से

पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण हवा के झकोळे से

इसा रंग लूटा री सखी, दो दिल कट्ठेथे एक ठोड़

वो दिन भी तै वोए था जो आज तलक भी याद सै

जोड़े बिना जीव का जीणा, जिन्दगी बरबाद सै

याद-याद मैं जी ल्यूंगी, इस दुख की के म्याद सै

बदलग्या जमाना ईब तै, दुनिया ही आजाद सै

अमृत घूंट्या री सखी, होग्या बातां का निचोड़

‘दयाचन्द’ दे ताने बात नै, माप टेक कै, फीत्या जा सै

मरती बरियां देख आदमी, दोनूं हाथां रीत्या जा सै

एक दिन सबनै मरणा होगा, काळ तै के जीत्या जा सै

कल करणा सो आज करले, पल-पल मौका बीत्या जा सै

झगड़ा झूठा री सखी, एक दिन खोई जागी खोड़

8

धुर तै धोखा करते आए, आज के नई रीत हो सै

गरज-गरज के प्यारे बहना, लोग किसके मीत हो सै

द्रोपदी जुए के मैं हारी, युधिष्ठिर पासे डारै था हे

शादी करके पार्वती ने भोळा भी दुदकारै था हे

सत की सीता घर तै ताह दी रामचन्द्र हद तारै था हे

हरिश्चन्द्र भी डाण बता के मदनावत ने मारै था हे

ब्याही का भी तरस करै ना इनकै के प्रीत हो सै

अंगूठी देकै शकुन्तला ने दुष्यन्त बख्त पै नाट गया हे

पवन कुमार भी अंजना गैल्या के करणी कर घाट गया हे

नळ राजा भी दमयन्ती की बण मैं साड़ी काट गया हे

ईसी-ईसी बातां नैं सुणके मेरा मन मरदां तै पाट गया हे

ये वक्त पड़े पै आंख बदलज्या इनकी खोटी नीत हो सै

रूपाणी भी जोधानाथ नै बण के बीच खन्दाई थी हे

बण मैं धक्के खा कै  मरगी मुड़कै घर ना आई थी हे

चाप सिंह ने सोमवती पतिव्रता जार बताई थी हे

मदन सेन नै भी सूती दई काट नागदे बाई थी हे

बीर बिचारी कुछ ना बोलै कोए पीटले भीत हो सै

कद लग खोट गिणुं मरदां का बीर बिचारी साफ  सै हे

बीर भतेरी दयावान नर करते डोलें पाप सै हे

चोरी, ठगी, बेईमानी की मरदां कै छाप सै हे

बीर मर्द के झगड़े ऊपर गुरु मुन्शी की छाप सै हे

ये ऊपरा तळी के भजन और गाणे, दयाचन्द के गीत हो सै

9

माड़ी कार बुरी करणी, आंख्यां केस्याहमी आ ज्यागी

गरीब सताए जांगे तै, फेर गुलामी आ ज्यागी

तम उन दिनां नै भूल गए, जब गोरे दाब दिया करते

थारे मुंह मैं टूक टांट पै जूता, इंगलिश सा’ब दिया करते

डैम ब्लडीफूल की गाली, घणी खराब दिया करते

ये गरीब लगै सैं भुण्डे, तमनै वो के लाभ दिया करते

बड़ी मुस्किल तै काढ़ी सै, वा कोम हरामी आ ज्यागी

मैं खोलंू कान थारे, अफसर होद्देदारां के

कुछ पैदल का भी राह सोचो, बैठणियां टम-टम कारां के

तुम हां-हां करते रहते हो, झूठी बातां का सहारा के

गरीब तरसते टुकड़े नै, तम पहरो सूट हजारां के

थारे पायां मैं तै लिकड़ तळै, पतलून पजामी आ ज्यागी

तू सब सेठां मैं सेठ बड़ा, भगवान गिण राख्या सै

दूर-दूर के मुलकों मैं तेरा, दान-मान गिण राख्या सै

सब दानां मैं बड़ा दान, एक दया दान गिण राख्या सै

नौ लख तारां बीच चन्द्रमा, उदयभान गिण राख्या सै

तेरी बांस ऊठज्या सारे कै, घणी बदनामी आ ज्यागी

सतगुरु मुन्शी ज्ञान का साबण, दाग जिगर के धो देगा

तनै समझावण आए ‘दयाचन्द’, मुंह का थूक बिलो देगा

इन गरीबां नै मतना सतावै, यो गरीब बिचारा रो देगा

गरीबां का पड़ै सांस-नास, तनै जड़ मूल तै खो देगा

रोजगार, व्यवहार, बणज मैं टोटा, धन मैं खामी आ ज्यागी

10

उस ईश्वर का नाम छोड़कै जित सेवादार धुका राखे

हद होगी डेरूबाजी नै, मूर्ख लोग भका राखे

रैपा मांगै भेंट सूर की, बच्ची छोड़ मदानण की

होगे बिघन, कुणटगी माता, लिए बिना ना मानण की

शनिवार, बुधवार, चैत धुकती, शक्ति देख चुगानण की

पंडिताणी, ब्राह्मणी धुकै, अक्कल बिगडग़ी जनानण की

जेठे बेटे पप्पू की गुद्दी मैं बाळ रखा राखे

गुडग़ामा और धुकै पाथरी, सारी जात कुबूल रहे

गठ जोड़े की गांठ बांधकै, बूढ़ा-बुढिय़ा टूल रहे

आगै बूढ़ा पाछै बुढिय़ा, टोटे-नफे नै भूल रहे

ऊतां की पिलज्या दुनिया मैं, जात-पात मैं फूल रहे

डोळी खेलै उन लोगां की, जिनके घर-घर भूत ढुका राखे

होक्का भरकै खबर पाड़ले, रेडियो, वायरलस साळे का

बावरी बणकै मीढा मांगै, बकरा बागड़ आळे का

पूरी भेंट बसन्ती मांगै, गहणा नारियल नाळे का

पक्के पुळां पै सैयद धुकता, नामी पीर मुंढाळे का

सैयद पीर कड़ै रहगे, जो पाकिस्तान पहँुचा राखे

एक मुर्गा एक मींढा लेकै, मारै धोक मुकरबेे पै

बुद्धिहीन पाँच दस जुड़ज्यां, किसकी रोक मुकरबे पै

पीकै घूंट भगत नै सूझै, तीन लोक मुकरबे पै

दूर बीमारी होज्या सारी, जब आवै रोग मुकरबे पै

केसरमल के सोल्हे मांगै, जो लाकै ज्योत बुला राखे

संगत हो उसी सौभा लागै, रण मैं जूत मूरखां कै

दूर बीमारी शुद्ध हो सारी, जब आवै सूत मूरखां कै

अमीर आदमी सुख नै भोगै, चिपटै भूत मूरखां कै

दारू पी कै करै लड़ाई, बाजै जूत मूरखां कै

कह दयाचन्द हाम माड़े होगे, इस रंज फिकर नै खा राखे

11

तेरा खेत लामणी आर्या सै औ छोरे जमींदार के

काट ले नै धान अपने ढूंगे-2 क्यार के

खूब लगा ले जोर मनै तेरे तै आगै जाणा सै

जवानी का सारा हांगा फेर के म्हं लाणा सै

हमनै मेहनत करकै खाणा सै, बता और म्हारा रोजगार के

खेती कह धणी के सेती कोठी बंगले महल हमारे

उठण, बैठण, लेटण खातर डळे बहान के पहल हमारे

गऊ के जाए बैल हमारे कमाऊ संसार के

ओहे नर कुमावेंगे जो नींद आळकश त्याग जांगै

खरे दाम, खोटे टोटे पड़ोसियां के भाग जांगै

थारै अन्न के ठेके लाग जांगे कोठे भरज्यां न्यार के

तरां-तरां के फूल सज्जनियां दुनियां खिलरी गुलदस्ता

माने आळे ‘दयाचन्द’ तेरा सुन्दर कहण करारा खसता

कदे मंहगा, कदे सस्ता, ये भाव सैं बजार के

12

धर्या सिर पाप घड़ा, क्यूं तळै खड़ा, ईब नहीं बसावै पार

या गाड्ड़ी टूट लई मेरे यार

जत का जूआ ज्योत टूटगे, सत की सिळम रही कोन्या

ल्याज, शर्म का डिग्या लाळवा, नाके नाड़ सही कोन्या

ऊतपणा मैं फिरै ऊंटड़ा, डामांडोल ढही कोन्या

लग्या आरा मैं, घुण सारा मैं, आमण पूठी बेकार

या गाड्ड़ी टूट लई मेरे यार

बल्ली, बर्री सारी खुलगी, आकै पड़ी धरण के मां

पाप बोझ का डिग्या पाटड़ा, कोन्या रहा परण के मां

मूंग मोतिया सिर मैं लाग्या, आगी जान मरण के मां

रंग बिगड़ा, सब ढंग बिगड़ा, सट सिर मैं सेहरा मार

या गाड़ी टूट लई मेरे यार

गाड्ड़ी के दो पहिए घिसगे, भार सहण की फड़ टूटी

धुरा पाप का कती पाट्ग्या, ज्यूं मोती की लड़ टूटी

ठट्ठा मैं गई टूट ठिकाणी, केळे कैसी धड़ टूटी

ठीक नहीं, सही लीख नहीं, चलै बारा पत्थर बाहर

या गाड्ड़ी टूट लई मेरे यार

पुन की पाती नै जर खाग्या, रही करम की कील नहीं

सब गाड्ड़ी का ईंधन होग्या, इब फूकण की ढील नहीं

कह दयाचन्द गडवाले की, लागै राम अपील नहीं

जाणा हो, दुख ठाणा हो, होले पैदल असवार

या गाड्ड़ी टूट लई मेरे यार

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, हरियाणवी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन पंचकुला, पृ. 96 से 107

 

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