ज्ञानी राम शास्त्री

ज्ञानी राम शास्त्री

Mhaara-Haryana_gyani-ram-shastri

जीन्द जिले के गांव अळेवा में सन् 1923 में जन्म। भिवानी और अमृतसर से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। ओरियण्टल कालेज, लाहौर से शास्त्री की परीक्षा पास करके लायलपुर चले गए। 1946 में साम्प्रदायिक दंगों के कारण गाव अळेवा में आ गए। 1949 में लुधियाना में जयहिन्द कालेज के स्थापना की। चालीस वर्षों तक अध्यापन किया।

पाकिस्तान की पोल, नया जमाना, बखत के बोल, ज्ञान के हीरे मोती, वक्त की आवाज, किसान और मजदूर, आजादी का राज नामक हरियाणवी रचनाएं प्रकाशित हैं। रचनाओं को वाशिष्ट प्रकाशन, ज्ञान भवन, अलेवा, जीन्द ने प्रकाशित किया है।

1

कात्तक बदी अमावस आई, दिन था खास दिवाळी का

आंख्यां के म्हां आंसू आग्ये, घर देख्या जब हाळी का

सभी पड़ौसी बाळकां खातर, खील-खेलणे ल्यावैं थे

दो बाळक देहळियां म्हं बैठे, उनकी तरफ लखावैं थे

जळी रात की बची खीचड़ी, घोळ सीत म्हं खावैं थे

आंख मूंद दो कुत्ते बैठे, भूखे कान हिलावैं थे

एक बखोरा, एक कटोरा, काम नहीं था थाळी का

किते बणै थी खीर किते, हलवे की खुशबू ऊठ रही

हाळी की बहू एक कूण म्हं, खड़ी बाजरा कूट रही

हाळी नै एक खाट बिछाई, पैंद थी जिसकी टूट रही

होक्का भरकै बैठ गया वा, चिलम तळै तै फूट रही

चक्की धोरै डन्डूक पड़्या था, जर लाग्या फाळी का

दोनों बाळक आशा करकै, अपणी मां कै पास गए

मां धोरै बिल पेश कर्या, फेर पूरी ला कै आस गए

थारे बाप के जी नै रोल्यो, सो जिसके थाम नास गए

माता की सुण बात बाळक फेर, फट बाब्बू कै पास गए

इतणी सुणकै बाहर लिकड़ग्या, वो पति कमाणे आळी का

तावळ करकै गया सेठ कै, कुछ भी सौदा ना थ्याया

भूखा प्यासा गरीब बेचारा, बहोत घणा दुख पाया

के आई करड़ाई सिर पै, मन म्हं न्यूं घबराया

हाळी घर नै छोड़ डिगरग्या, फेर बोहड़ कै ना आया

ज्ञानीराम कहै चमन उजड़ग्या, पता चाल्या ना माळी का

2

उथल पुथल मचगी दुनियां म्हं, निर्धन लोग तबाह होग्ये

कोए चीज ना सस्ती मिलती, सबके ऊंचे भा होग्ये

असली चीज मिलै ना टोही, सब म्हं नकलीपण होग्या

बिना मिलावट चैन पड़ै, सब का पापी मन होग्या

दिन धोळी ले तार आबरू जिसकै धोरै धन होग्या

निर्धन मरजै तडफ़ तडफ़ कै, इतना घोर बिघन होग्या

इज्जतदार मरैं भूखें, बदमाश लफगें शाह होग्ये

ठाड़े धरती के मालिक, नक्शे इंतकाल भरे रहज्यां

पकड़े ज्यां निर्दोष पुरुष, पापी बदकार परे रहज्यां

घर बैठें लें देख फैसला, गवाह वकील करे रहज्यां

जिसकी चालै कलम पकड़ लें, सब कानून धरे रहज्यां

क्यूंकर मुलजिम पकड़े जां जब अफसर लोग ग्वाह होग्ये

बेरोजगारी की हद होगी, पढ़े-लिखे बेकार फिरैं

घटी आमदनी बधगे खर्चे, किस-किस कै सिर मार मरैं

बड़े-बड़े दो पिस्यां खातर, अपणी इज्जत तार धरैं

धर्म के ठेकेदार बी, भूंडी तै भूंडी कार करैं

भोळे लोगां नै लूटण के, बीस ढाळ के राह होग्ये

कई जणां कै कोठी बंगले, लाईन लागरी कारां की

पड़े सड़क पै कई जणे, लाठी बरसैं चौंकीदारां की

बिस्कुट दूध-मलाई खावैं, बिल्ली साहूकारां की

खाली जून टळै भूख्यां की, निर्धन लोग बेचारां की

ज्ञानीराम न्यूं देख-देख कै, घणे कसूते घा होग्ये

3

मात पिता के मरें बाद आंसू टपकाकै के होगा

जिन्दें जी जूते मारे फेर फूल चढ़ाकै के होगा

कहणा मान्या नहीं कदे फेर तिलक लगाणा ठीक नहीं

छुए कोन्या पैर कदे फेर शीश झुकाणा ठीक नहीं

राखे सदा अन्धेरे म्हं फेर दीप जळाणा ठीक नहीं

नाक चढ़ाकै रोटी दी फेर पिंड भराणा ठीक नहीं

बोले कड़वे बोल सदा फेर श्राद्ध कराकै के होगा

बिछुड़े बाद बड़ाई करते बेटे पोते देख लिये

कर कर याद लाड़ बचपन के पाछै रोते देख लिये

पितरां खातिर गंगा जी म्हं लाते गोते देख लिये

लगी हुई कमरां में फोटू मल मल धोते देख लिये

रहे तड़पते वस्त्र बिन फेर शाल उढ़ाकै के होगा

काढ़े दोष सदा जिनके फेर पाछे तै गुण गावैं सैं

दुखी करे जिन्दगी भर फेर मन्दिर में पत्थर लावैं सैं

घूर घूर देखणियें फेर फोटू पै ध्यान जमावैं सैं

सदा उछाळी पगड़ी फेर पगड़ी की रस्म निभावैं सैं

दुख म्हं करी नहीं सेवा फेर पेहवे जाकै के होगा

कर ल्यो जिन्दे जी सेवा या आच्छी किसमत थारी सै

आर्शीवाद मिले दिल तै जो बेटा आज्ञाकारी सै

खुद अपनी सन्तान भला ना लागै किस नै प्यारी सै

कोए अमर ना रहा जगत म्हं आखिर सब की बारी सै

ज्ञानी राम दो हरफी कह दी ढोल बजाकै के होगा

4

इस भारत म्हं दुनिया तै एक ढंग देख लिया न्यारा

खाज्या घणा कबज होज्या एक भूखा मरै बेचारा

एक जणे की चढ़ी किराये कई कई बिल्डिंग कोठी

एक जणे नै मिलै रहण नै कोन्या एक तमोटी

एक जणे की खा खा मेवे हुई दूंदड़ी मोटी

एक जणे नै पेट भराई कोन्या मिलती रोटी

एक जणा बैठा गद्दी पर दे रहा एक सहारा

एक जणे कै दस दस नौकर सब पर हुकम चलाता

एक जणे नै नौकर भी कोय घर मैं नहीं लगाता

एक जणा न्हा धोके सिर म्हं इतर फलेल लगाता

एक जणे नै न्हाणे नै भी नीर मिलै ना ताता

एक फिरै कारां म्हं दूजा भटकै मारा मारा

एक जणा दे खर्च लाख पर करता नहीं पढ़ाई

एक जणा पढ़णा चाहवै पर फीस किते ना थ्याई

एक जणे कै बीस वर्ष में दो दो तीन लुगाई

एक जणे की उमर बीत गई कोन्या हुई सगाई

दस पोशाक एक पै दूजा नांगा करै गुजारा

एक जणे के घर म्हं आवै अन्धा धुन्ध कमाई

एक जणे के घर म्हं कोन्या जहर खाण नै पाई

एक जणे कै बीस आदमी करते मन की चाही

एक जणे के घर म्हं कोन्या बतळावण नै भाई

ज्ञानी राम पता ना कद यू फर्क मिटैगा म्हारा

5

दुनियां म्हं महंगा होग्या सब जिन्दगी का सामान

सब तै सस्ता मिलै आज यू बद किसमत इन्सान

मरा पड़्या हो पास पड़ौसी कतई नहीं अफसोस

समो समो के रंग निराले नहीं किसे का दोष

कार लिकड़ज्या ऊपर तै कर दूजे नै बेहोश

खा माणस नै माणस कै फिर भी कोन्या संतोष

खून चूसते नौकर का यें मालिक बेईमान

माणस की ना कदर करैं ये साहूकार अमीर

दूजे की मेहनत पै अपनी बणा रहे तकदीर

हालत देख लुगाई की भरज्या नैनां में नीर

भूखी मरैं आबरू बेचैं गहणै धरैं शरीर

लाल बेच दें गोदी का सै भूख बड़ी बलवान

पढ़े लिख्यां की पूछ रही ना फिरैं घणे बेकार

आत्महत्या करैं कई छोड्ड़ें फिरते घर बार

माणस खींच रह्या माणस नै आज सरे बाजार

आज मनु का पूत लाड़ला रौवे किलकी मार

अपने पैरें आप कुहाड़ी मार रह्या नादान

खून, जिगर बिकते माणस के बिकते हाड्डी चाम

जिन्दगी लग भी बिकज्या सै जै मिलज्यां चोखे दाम

सब तै बड़ा बताया था बेदां म्हं माणस जाम

ज्ञानीराम इस कळियुग म्हं हो ग्या सबतै बदनाम

पता नहीं कित पड़ सोग्या पैदा करके भगवान

6

गऊ कहाया करते थे भारत के लोग लुगाई

जोंक, भेडिय़े, मगरमच्छ अब देते नाग दिखाई

बण कै जोंक लहू चूसैं यें साहूकार देश के

भूखे नंगे फिरैं बेचारे ताबेदार देश के

कोठी बंगलां म्हं रहते असली गद्दार देश के

आंख मीच के सोग्ये सारे पहरेदार देश के

भरैं तजूरी ठोक ठोक करैं अन्धां धुन्ध कमाई

बणे भेडिय़े भारत के यें परमट कोट्यां वाळे

नाम करा कै डिपू रूट दिन धौळी पाड़ै चाळे

मीठी मीठी बात करैं यें पर भीतर तै काळे

अफसर और वजीरां के झट बणैं भतीजे साळे

बकरी भेड़ समझ निर्धन नै करज्यां तुरन्त सफाई

रिश्वतखोर मगरमच्छ बणगे खावैं ऊठ ऊठ कै

जै मिल ज्या मजबूर दुखी कोय पड़ते टूट टूट कै

लाखां के मालिक बणग्ये, लोगां नै लूट लूट कै

बिन रिश्वत ना काम करैं चाहे रोल्यो फूट फूट कै

आठों पहर रहैं मुंह बायें पापी नीच कसाई

काळे नाग बणे जहरी यें बड़े बड़े व्यापारी

चीनी तेल नाज घी लोहा कर लें क_ा भारी

फण ताणे बैठे रहैं भूखी मरज्या दुनिया दारी

चढ़ज्यां रेट शिखर म्हं जब यें जिनस काढ़ दें सारी

ज्ञानी राम इन चार जणां नै कर दी घोर तबाही

7

खड़ी लुगाइयां के मांह सुथरी श्यान की बहू

पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू

गळ में सोने का पैंडल या हार चाहिए था

बिन्दी सहार बोरळा सब शिंगार चाहिए था

सूट रेशमी चीर किनारीदार चाहिए था

इसी इसी नै तो ठाडा घर बार चाहिए था

रुक्का पड़ता जो होती धनवान की बहू

चारों तरफ लुगाइयां की पंचात कर रही थी

सब की गेलां मीठी मीठी बात कर रही थी

बात करण म्हं पढ़ी लिखी नै मात कर रही थी

दीखै थी जणु सोलह पास जमात कर रही थी

बैठी पुजती जो होती विद्वान की बहू

मस्तानी आंख्यां म्हं मीठा प्यार दीखै था

गोरे रंग रूप म्हं हुआ त्योहार दीखै था

हट्टा कट्टा गात कसा एक सार दीखै था

नखरा रोब गजब का बेशुमार दीखै था

दबते माणस जो होती कप्तान की बहू

इज्जत आगै दौलत नै ठुकरावण वाळी थी

टोटे म्हं भी अपनी लाज बचावण वाळी थी

पतिव्रता नारी का फर्ज पुगावण वाळी थी

पीहर और सासरे नै चमकावण वाळी थी

ज्ञानी राम जणु लिछमी थी भगवान की बहू

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, हरियाणावी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन पंचकुला, पृ. 136 से 143

 

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