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बिरादरी को गोली मारो – रोहतास

Post Views: 268                   सेठ त्रिलोकचंद बंसल टूथपेस्ट के झाग कम, थूक ज्यादा उगल रहा है।                 अंधेरा आकाश से समाप्त हो चुका है। सूर्य लाल हो रहा है,…

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आधुनिकता – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 47 कविता जिन माओं ने नहीं उठाये ये किताबों से भरे बैग कभी। आज सौभाग्यवश उन्हीें माओं को। मिला है मौका बैग उठाने का। गांव में इसी वर्ष…

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नए रास्ते – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 171 कविता मैंने चुने हैं कुछ ऐसे रास्ते जिनमें रीसते हैं रिश्ते परम्परा से अलग नई परम्परा के कुछ से भिन्न कुछ से खिन्न और ज्यादा इन्सानियत के!…

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पीड़ा का सन्तोष – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 180 कविता पीड़ाओं में जो पैदा हुए पीड़ाओं में जिनका बचपन गुजरा पीड़ाओं में ही रखे जिसने जवानी की दहलीज पर कदम पीड़ाओं में ही रहकर समझा पीड़ाओं…

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न रह जाए सीमित – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 189 कविता लिखना केवल लिखने तक न रह जाये सीमित सोच, सकपकाता है ये मन कहना सिर्फ कहने तक न रह जाए निमित सोच, कचकचाता है ये मन…

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शायद हां – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 191 कविता हां और शायद भी मुश्किल है। किसी चीज को बनाना उसे संवारना व निखारना और फिर उससे भी ज्यादा मुश्किल है। उसे संजो कर रखना। हम…

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स्टैण्ड – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 168 कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम…

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सच कहूं – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 177 कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के…

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खतरनाक – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 172 कविता खतरनाक होता है सिर्फ अपने लिए जीना और सब तरह की बेपरवाही उससे भी खतरनाक है आधार से कट जाना सिर्फ अपनी ही बात करना पर…

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मां रही है दर्शा तेरी ये दशा – सुशीला बहबलपुर

Post Views: 178 कविता कर दिये गए थे हाथ तेरे पीले होते-होते किशोर बिना जाने तेरी मंशा शायद नहीं था पता तुझे अर्थ इस गृह बन्धन का वो बिखरी-बिखरी खुशियां…