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बिरादरी को गोली मारो – रोहतास

                  सेठ त्रिलोकचंद बंसल टूथपेस्ट के झाग कम, थूक ज्यादा उगल रहा है।                 अंधेरा आकाश से समाप्त हो चुका है। सूर्य लाल हो रहा है, शहर के गगन…

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आधुनिकता – सुशीला बहबलपुर

कविता जिन माओं ने नहीं उठाये ये किताबों से भरे बैग कभी। आज सौभाग्यवश उन्हीें माओं को। मिला है मौका बैग उठाने का। गांव में इसी वर्ष जो इंग्लिस मीडियम…

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नए रास्ते – सुशीला बहबलपुर

कविता मैंने चुने हैं कुछ ऐसे रास्ते जिनमें रीसते हैं रिश्ते परम्परा से अलग नई परम्परा के कुछ से भिन्न कुछ से खिन्न और ज्यादा इन्सानियत के! स्रोतः सं. सुभाष…

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पीड़ा का सन्तोष – सुशीला बहबलपुर

कविता पीड़ाओं में जो पैदा हुए पीड़ाओं में जिनका बचपन गुजरा पीड़ाओं में ही रखे जिसने जवानी की दहलीज पर कदम पीड़ाओं में ही रहकर समझा पीड़ाओं के कारण को…

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न रह जाए सीमित – सुशीला बहबलपुर

कविता लिखना केवल लिखने तक न रह जाये सीमित सोच, सकपकाता है ये मन कहना सिर्फ कहने तक न रह जाए निमित सोच, कचकचाता है ये मन सोचना सिर्फ सोचने…

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शायद हां – सुशीला बहबलपुर

कविता हां और शायद भी मुश्किल है। किसी चीज को बनाना उसे संवारना व निखारना और फिर उससे भी ज्यादा मुश्किल है। उसे संजो कर रखना। हम ये जानते हैं।…

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स्टैण्ड – सुशीला बहबलपुर

कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते…

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सच कहूं – सुशीला बहबलपुर

कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के इन्सान में भी…

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खतरनाक – सुशीला बहबलपुर

कविता खतरनाक होता है सिर्फ अपने लिए जीना और सब तरह की बेपरवाही उससे भी खतरनाक है आधार से कट जाना सिर्फ अपनी ही बात करना पर सबसे खतरनाक होता…

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मां रही है दर्शा तेरी ये दशा – सुशीला बहबलपुर

कविता कर दिये गए थे हाथ तेरे पीले होते-होते किशोर बिना जाने तेरी मंशा शायद नहीं था पता तुझे अर्थ इस गृह बन्धन का वो बिखरी-बिखरी खुशियां वो रिश्ते की…