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सामाजिक सुरक्षा के नाम पर – रीतिका खेड़ा

अफसोस की बात यह है कि हमारे यहां अभिजात वर्ग के बीच सामाजिक सुरक्षा पर सहमति और समर्थन कमजोर है। हम यह भूल जाते हैं कि खुद की सफलता में सौभाग्य या लॉटरी का उतना ही हाथ है, जितना खुद के जतन या मेहनत का है।

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जाति प्रथा से भीषण है लैंगिक विषमता – तस्लीमा नसरीन

धार्मिक कट्टरवाद तो पहले से ही दुनिया के अनेक देशों में है। अब भारत में भी धर्म को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। जब कि इतिहास गवाह है कि जहां-जहां धार्मिक कट्टरवाद को बढ़ावा मिलता है, वहां वहां समाज के कमजोर वर्गों, जैसे निचली जातियों और महिलाओं, का शोषण और बढ़ जाता है।

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कैसे मिटे गांव की प्यास – भारत डोगरा

ग्रामीण पेयजल की समस्या बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़े चाहे उपलब्धियों का कुछ भी दावा करें, पर वास्तविक स्थिति बहुत चिंताजनक है। इस कारण स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, महिला कल्याण आदि विभिन्न क्षेत्रों की क्षति हो रही है।

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20 लाख से ज्यादा आदिवासियों को अपने जंगल की जमीन से होना पड़ेगा विस्थापित – अर्शदीप

Post Views: 686 केंद्र सरकार ने नहीं किया वन अधिकार कानून 2006 का बचाव सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी 2019 को 17 राज्यों को निर्देश दिया है कि उन आदिवासियों…

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सनक में तब्दील होती सेल्फी और वीडियो बनाने की भेड़चाल – अनिल कुमार पाण्डेय

Post Views: 226 अनिल पाण्डेय (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से प्रसारण पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हैं। लेखक पूर्व में प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवम् संचार विश्वविद्यालय…

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भाईचारे की अवधारणा और खाप पंचायतें -सहीराम

Post Views: 368 टूटते सामाजिक मूल्यों और संबंधों के इस दौर में भाईचारा एक बहुत ही पवित्र सी अवधारणा के रूप में सामने आता है। भाईचारे की यह अवधारणा वैसे…

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आने वाले सालों में क्या – सुरेन्द्र पाल सिंह

Post Views: 253  गणतंत्र दिवस पर दिखाई जाने वाली झांकियों और लोक सम्पर्क विभाग द्वारा प्रस्तुत हरियाणा की स्टीरियो टाईप छवि से हटकर दैनंदिन जीवन की सकारात्मक या नकारात्मक बारीकियों…

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कुछ मुंबइया फिल्में और हरियाणवी जनजीवन का यथार्थ – सहीराम

Post Views: 384                 सिनेमा अभी तक यही माना जाता रहा है कि हरियाणवी जन जीवन खेती किसानी का बड़ा ही सादा और…

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गांधी स्कूल एक उम्मीद –  नरेश शर्मा

Post Views: 186 पढ़ेंगे पढ़ाएंगे, जीवन सफल बनाएंगे, जहाज भी उड़ाएंगे, हम भी मास्टर बन जाएंगे, लड़का-लड़की एक समान, हम सब एक हैं, जैसे सलोगन प्रवासी मजदूरों के बच्चों के…

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सिनेमा में हरियाणा – सहीराम

   यह पहली हरियाणवी फिल्म ‘‘चंद्रावल’’ के आने से पहले की बात है जब हिंदी की एक बड़ी हिट फिल्म आयी थी। नाम था ‘नमक हलाल’। यह हिंदी फिल्मों में अमिताभ बच्चन का जमाना था और अमिताभ बच्चन की उन दिनों थोड़ा आगे-पीछे मिलते-जुलते नामोंवालो दो फिल्में आयी थी – एक ‘नमक हलाल’ और दूसरी ‘नमक हराम’। ‘नमक हलाल’ में मालिक के नमक का हक अदा करने वाले जहां खुद अमिताभ बच्चन थे, वहीं ‘नमक हराम’ में फैक्टरी मालिक बने अमिताभ बच्चन अपने जिगरी दोस्त को इसलिए ‘नमक हराम’ मान लेते हैं क्योंकि खुद उन्होंने ही अपने इस जिगरी दोस्त को मजदूरों के बीच मजदूर बनाकर भेजा तो हड़ताल वगैरह तोड़ने के लिए था, लेकिन मजदूरों के दुख-तकलीफों को देखकर वह उनका हमदर्द बन जाता है। अच्छी बात यह है कि नमक हलाली हरियाणवियों के हिस्से आयी थी।