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मानवीय संवेदना व जिजीविषा हमेशा ज़िंदा रहती है – सुभाष चंद्र

पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय।विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

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ऐसे में बालमुकुंद गुप्त को याद करना अच्छा लगता है – सुभाष चंद्र

Post Views: 664 टोरी जावें लिबरल आवें। भारतवासी खैर मनावेंनहिं कोई लिबरल नहिं कोई टोरी। जो परनाला सो ही मोरी। ये शब्द हैं  – पत्रकार, संपादक, कवि, बाल-साहित्यकार, भाषाविद्, निबंधकार के रूप…

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जनपक्षीय राजनीति का मार्ग प्रशस्त करें

Post Views: 383 सेवा देश दी जिंदड़िए बड़ी ओखी,गल्लां करणियां ढेर सुखल्लियां ने।जिन्नां देश सेवा विच पैर पाइयाउन्नां लख मुसीबतां झल्लियां ने।        – करतार सिंह सराभा यह साल…

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वैचारिक बहस को जन्म दे रही है देस हरियाणा’

Post Views: 354 विकास होग्या बहुत खुसी, गामां की तस्वीर बदलगीभाईचारा भी टूट्या सै, इब माणस की तासीर बदलगी -रामेश्वर गुप्ता पिछले दस-बारह सालों से ‘हरियाणा नं. 1’ की छवि…

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लिंग-संवेदी भाषा की ओर एक कदम – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 296 अपने अल्फ़ाज पर नज़र रक्खो,इतनी बेबाक ग़ुफ्तगू न करो,जिनकी क़ायम है झूठ पर अज़मत,सच कभी उनके रूबरू न करो। – बलबीर सिंह राठी आजकल संवेदनशील स्वतंत्रचेता नागरिक ये महसूस…

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हरियाणा की पहचान का सवाल – सुभाष चंद्र

Post Views: 289 हरियाणा के गठन से ही जब-तब बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ हरियाणा की पहचान ढूंढने की कवायद करते रहे हैं। लेकिन वे सर्वमान्य पहचान को चिह्नित करने में असफल…

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 छवि का कुहासा और केंचुली उतारता हरियाणा- डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 200 हरियाणा की छवि और वास्तविकता में दूरी बढ़ते बढ़ते इतनी हो गई है कि अब वास्तविकता और उसकी छवि का संबंध टूट गया है। वास्तविकता अपनी जगह…

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हरियाणा के पचास सालः क्या खोया, क्या पाया – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 439 इनआमे-हरियाना हमें जिस रोज से हासिल हुआ इनआमे-हरियाना।बनारस की सुबह से खुशनुमा है शामे-हरियाना। न क्यों शादाब हो हर फ़र्दे-खासो आमे हरियाना।तयूरे-बाग़ भी लेते हैं जबकि नामे-हरियाना।…

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नफरत की राजनीतिक बहस और सांप्रदायिक सद्भाव व दोस्ती की दास्तान – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 909 ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहरवो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं– फ़ैज अहमद फ़ैज लंबे संघर्ष के बाद भारत को औपनिवेशिक शासन…

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कर्ज माफी से कर्ज मुक्ति  न्यूनतम समर्थन मूल्य से निश्चित आय – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 776 हाय-हाय रै जमींदारा,मेरा गात चीर दिया सारा। ( दयाचंद मायना) पिछले बीस-पच्चीस सालों से खेती-किसानी का संकट निरंतर गहराता जा रहा है। हताश किसान-आत्महत्याओं का सिलसलिा थम नहीं…