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कात्यक की रुत आ गई – डा. राजेंद्र गौतम

वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक राजेंद्र गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। इनके दोहे छंद-निर्वाह की कारीगरी नहीं, बल्कि आधुनिक कविता के तमाम गुण लिए हैं। कात्यक की…

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सोंद्या कै तो काटड़े ही जामें

हरियाणवी लोककथा एक गाम म्हं दो पाळी आपणे डांगर चराया करदे। एक रात नै दोनों की म्हैस ब्याण का सूत बेठग्या। उनमैं जो आलसी था वो बोल्या भाई मैं नींद…

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कछुआ और खरगोश – इब्ने इंशा

लोक कथा एक था कछुआ, एक था खरगोश। दोनों ने आपस में दौड़ की शर्त लगाई। कोई कछुए से पूछे कि तूने शर्त क्यों लगाई? क्या सोचकर लगाई? बहरहाल…तय यह…

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भीतरला हो साफ मणस का चाहे रंग बेशक तै काला हो – विक्रम राही

भीतरला हो साफ मणस का चाहे रंग बेशक तै काला हो हो रंग भी काला दिल भी काला उसका के उपराला हो भूरा हो जै देखण मैं नर जाणू चांद…

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बेटी गैल्यां धोखा होग्या इब के कह दयूं सरकार तनै- विक्रम राही

बेटी गैल्यां धोखा होग्या इब के कह दयूं सरकार तनै जै गर्भ बीच तै बचा लई तो आग्गे फेर दई मार तनै लिंगानुपात सुधर गया इसका कारण हम तम जाणै…

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गहराई तक जावण म्हं बखत तो लागै सै -रिसाल जांगड़ा

हरियाणवी ग़ज़ल रिसाल जांगड़ा   गहराई तक जावण म्हं बखत तो लागै सै। सच्चाई उप्पर ल्यावण म्हं बखत तो लागै से।   करैग जादां तावल जे उलझ घणी ज्यागी, गुत्थी…

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साथ चांदडे माणस का दिया होया तंग करज्यागा- विक्रम राही

विक्रम राही साथ चांदडे माणस का दिया होया तंग करज्यागा जीण जोग भी खामैखा तो बिन आई मैं मरज्यागा चतुर चलाक बेशर्म आदमी सदा मीट्ठे चोपे लावैगा कई तरियां के…

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छब्बीस जनवरी आले पर ना बात होवै सविंधान की- विक्रम राही

विक्रम राही छब्बीस जनवरी आले पर ना बात होवै सविंधान की टैंक तोप झांकी भाषण तै खुश जनता हिन्दूस्तान की । सविंधान सभा नै लिखया म्हारा संविधान तीन साल मैं…

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अम्मा का संसार – डा. राजेंद्र गौतम

(वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक राजेंद्र गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। इनके दोहे छंद-निर्वाह की कारीगरी नहीं, बल्कि आधुनिक कविता के तमाम गुण लिए हैं। कात्यक की…