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अज्ञेय की कविता में विभाजन की त्रासदी डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र

अज्ञेय बार बार आगाह करते हैं साम्प्रदायिकता के सांप से बचने की। वे जनता से आह्वान करते हैं, बार बार चेताते हैं कि जिसे हम अपना कहते हैं वह ही हमें डस लेगा। साम्प्रदायिकता चाहे हिन्दू हो या फिर मुस्लिम दोनों का चरित्र एक ही होता है और दोनों परस्पर दुश्मन नहीं बल्कि पूरक होती हैं और एक-दूसरे को फूलने फलने के लिए खुराक उपलब्ध करवाती हैं। साम्प्रदायिकता मनुष्य की इंसानियत को ढंक लेती है। अज्ञेय बार बार मनुष्य की इंसानियत को जगाने की बात करते हैं।

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सिद्दिक अहमद ‘मेव’ की कविताएं

Post Views: 8 धर्म धर्म नाम पर कदी लड़ा ना, ना कदी कीनी हमने राड़, धर्म नाम पे लड़े जो पापी, वापे हाँ सौ-सौ धिक्कार । धर्म सिखावे प्यार-मुहब्बत, धर्म…

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बाबा नानक – संतोख सिंह धीर

गुरु नानक का जन्म 1469 में, पंजाब प्रान्त के ननकाना साहब नामक स्थान पर हुआ, जो आज कल पाकिस्तान में है। वे महान विचारक और समाज सुधारक थे। उनका व्यक्तित्व साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है। उन्होंने इनसान की समानता का संदेश दिया।

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निराशावादी – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

Post Views: 281 पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी, बाकी न सितारे बचे…

भैंस का स्वर्ग – बालमुकुंद गुप्त

सन् 1905 में ‘स्फुट कविताएं’ नाम से बालमुकुंद गुप्त की कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसमें उनकी समस्त कविताएं संकलित हैं। ‘भैंस का स्वर्ग’ गुप्त जी की पहली कविता है।

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बिखरे हुए ख्वाबों को – राजकुमार जांगड़ा ‘राज’

Post Views: 150 बिखरे हुए ख्वाबों को, एक साथ संजोना है गिरते भी रहना है चलते भी जाना है खुशियों सा कोलाहल  तो सिर्फ दिखावा है गायेगा सिर्फ वही आता…

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एक दिन के अखबार का सच – डा. श्रेणिक बिम्बिसार

Post Views: 161 जवान ने खाई गोली सम्मान नहीं आई ए एस की मौज शहीद भगत सिंह की जन्म तिथि पर संशय बर्थ-डे गिफ्ट से वंचित पी.एम. एटमी करार लटका…

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कात्यक की रुत आ गई – डा. राजेंद्र गौतम

Post Views: 202 वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक राजेंद्र गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। इनके दोहे छंद-निर्वाह की कारीगरी नहीं, बल्कि आधुनिक कविता के तमाम गुण लिए…

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कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है – बेन ओकरी

कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है। कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें।

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खाली हाथ – जयपाल

Post Views: 111 वे दिन भर शहर की सूरत संवारते हैंऔर अपनी सूरत बिगाड़ते हैंदिन ढलने परसिर नीचा करमुंह लटकाएचल पड़ते हैं वापिसअपने घरों की तरफहताश-निराशजैसे शमशान से लौटते हैं…