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बिखरे हुए ख्वाबों को – राजकुमार जांगड़ा ‘राज’

Post Views: 19 बिखरे हुए ख्वाबों को, एक साथ संजोना है गिरते भी रहना है चलते भी जाना है खुशियों सा कोलाहल  तो सिर्फ दिखावा है गायेगा सिर्फ वही आता…

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एक दिन के अखबार का सच – डा. श्रेणिक बिम्बिसार

Post Views: 36 जवान ने खाई गोली सम्मान नहीं आई ए एस की मौज शहीद भगत सिंह की जन्म तिथि पर संशय बर्थ-डे गिफ्ट से वंचित पी.एम. एटमी करार लटका…

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कात्यक की रुत आ गई – डा. राजेंद्र गौतम

Post Views: 31 वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक राजेंद्र गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। इनके दोहे छंद-निर्वाह की कारीगरी नहीं, बल्कि आधुनिक कविता के तमाम गुण लिए…

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कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है – बेन ओकरी

कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है। कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें।

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खाली हाथ – जयपाल

Post Views: 9 वे दिन भर शहर की सूरत संवारते हैंऔर अपनी सूरत बिगाड़ते हैंदिन ढलने परसिर नीचा करमुंह लटकाएचल पड़ते हैं वापिसअपने घरों की तरफहताश-निराशजैसे शमशान से लौटते हैं…

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जाले – जयपाल

Post Views: 12 जाले हर युग के होते हैंहर युग बुन लेता है अपने जालेहर युग चुन लेता है अपने जालेधूल मिट्टी से सने प्राचीन जालेमोती से चमकते नवीन जालेसमय…

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बच्चा – जयपाल

Post Views: 8 तमाशा दिखाता है बच्चान सांप से डरता है न नेवले सेन बंदर से न भालू सेन शेर से न हाथी सेरस्सी पर चलता है बच्चागिरने से नहीं…

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एक चुप्पी -जयपाल

Post Views: 26 सवेरे-सवेरेएक हाथ में टोकरीदूसरे में झाडूवह निकल पड़ती है घर सेजाती है एक घर से दूसरे घरएक मोहल्ले से दूसरे मोहल्लेकुछ दौड़ती हैकुछ भागती हैकुछ हंसती हैकुछ…

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उनका सवाल – जयपाल

Post Views: 72 वे पूछते हैं –आज भी उनके सिर पर गंदगी का टोकरा क्यों रखा हैउनकी बस्ती शहर या गांवों से बाहर ही क्यों होती हैउनके मंदिरों-गुरुद्वारों में दूसरे…

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बगुला और मछली – जयपाल

Post Views: 47 बगुला केवल मछली को ही नहीं देखतापानी को भी देखता हैकितने पानी में है मछली बगुला केवल मछली को ही नहीं देखतासाथ घूम रही दूसरी मछलियों को…