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‘तीज रंगीली री सासड़ पींग रंगीली’ – प्रो. राजेंद्र गौतम

Post Views: 419 हरियाणवी कवि लखमीचन्द की कविता की कला को जितनी-जितनी बार निरखा जाता है, उसकी सुंदरता की उतनी-उतनी नई परतें खुलती चली जाती हैं। वह साधारण में असाधारणता…

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पाक है मोहब्बत म्हारी ना हे बदमाशी – धनपत सिंह

Post Views: 301 पाक है मोहब्बत म्हारी ना हे बदमाशीहीरामल तैं पहल्यां मनैं टुटणा है फांसी पाक मोहब्बत दुनियां के म्हं सबतैं बड़ी करारी हो सैफेर जी के लेणा हो…

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मेरा जोबन, तन, मन बिघन करै, कुछ जतन बणा मेरी सास – धनपत सिंह

Post Views: 300 मेरा जोबन, तन, मन बिघन करै, कुछ जतन बणा मेरी सासदिन रैन चैन नहीं पिया बिना, छ: ऋत बारहा मास चैत चाहता चित चोर को चले गए…

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तुम जाओ सुसरा सास – धनपत सिंह

Post Views: 204 तुम जाओ सुसरा सास,समझा ल्यूंगी जब आज्यागा मेरे पास मेरे बुझे ताझे बिना कित भरतार जावैगामेरा वो गुनाहगार क्यूकर तजकै नार जावैगाधमका द्यूंगी करड़ी हो कै क्यूकर…

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जाण द्यो बस रहाण द्यो हे दबी दबाई बात – पं. लख्मी चंद

Post Views: 269 पं. लख्मीचंद के पदमावत सांग से एक रागनी. मर्दवाद पर स्त्री की प्रतिक्रिया. ये सृजनात्मक दृष्टि का ही प्रतिफल है कि जब कोई लेखक चाहे वह खुद…

सामण का स्वागत – मंगतराम शास्त्री

Post Views: 186 शीळी शीळी बाळ जिब पहाड़ां म्ह तै आण लगै होवैं रूंगटे खड़े गात के भीतरला करणाण लगै राम राचज्या रूई के फोयां ज्यूं बादळ उडण लगैं समझो…

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देखे मर्द नकारे हों सैं गरज-गरज के प्यारे हों सैं – पं. लख्मीचंद

बात सही है कि लोक कवि लोक बुद्धिमता, प्रवृतियों और बौद्धिक-नैतिक रुझानों का अतिक्रमण नहीं कर पाते। लेकिन लोक प्रचलित मत की सीमाओं का अतिक्रमण करना भी अपवाद नहीं है।इसका उदाहरण है पं. लख्मीचंद  की ये  रागनी जिसमें पौराणिक किस्सों में पुरुषों ने स्त्रियों के प्रति जो अन्याय किया उसे एक जगह रख दिया है और वो भी स्त्री की नजर से.

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सात जणी का हे माँ मेरी झूमका – धनपत सिंह

Post Views: 157 सात जणी का हे माँ मेरी झूमका, हेरी कोए रळ मिल झूलण जा,झूल घली सै हे मां बाग म्हं कोए-कोए किसे की बाट म्हं ठहर रही रीकोए…

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कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी – पं. लख्मीचंद

महाभारत में द्रोपदी का एक ऐतिहासिक सवाल किया जो अभी तक अनुत्तरित है।बहुत ही खूब रागनी में पं. लख्मीचंद ने भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक बनावट का स्पष्ट संकेत भी है।

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हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

जब भी मर्द पर संकट आता है तो स्त्री की गोद ही संबल होती है। कितने ही साहित्यकारों ने इस तरह के भाव प्रकट किए हैं। आमतौर पर लख्मीचंद की रागनियों में स्त्री की छवि पुरुष की सफलता में बाधक की ही है, लेकिन यहां एक स्त्री-स्वर में पं. लख्मीचंद की आत्मा की पुकार उठी है और ऐसा वे इसलिए कर सके कि यहां शास्त्र समर्थित रुढियों के बोझ को उतार फेंका जिसे वे अकसर ढोते रहे थे.