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प्रेमचंद के अद्वितीय व्याख्याता : कमल किशोर गोयनका – अमरनाथ

बुलंदशहर (उ.प्र.) के एक व्यवसायी परिवार में जन्मे और जाकिर हुसेन कॉलेज (साँध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे कमल किशोर गोयनका ( 11.10.1938 ) ने अपने जीवन का तीन चौथाई हिस्सा प्रेमचंद के अध्ययन और अनुसंधान में खपा दिया. उन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर अपनी पी-एच.डी. और डी.लिट्. तो किया ही, उसके बाद भी प्रेमचंद साहित्य का अनुशीलन और संपादन करते हुए उनपर 30 से अधिक पुस्तकें रच डालीं.

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मार्क्सवादी ऋषि:आचार्य रामविलास शर्मा – डॉ.अमरनाथ

रामविलास शर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के गोल्डमेडलिस्ट थे, डॉक्टरेट थे और बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे किन्तु उन्होंने अपना सारा महत्वपूर्ण लेखन अपनी जातीय भाषा हिन्दी में किया। उन्होंने भाषाविज्ञान की किताबें हिन्दी में लिखकर यहां के बुद्धिजीवी वर्ग की औपनिवेशिक जड़ मानसिकता पर प्रहार तो किया ही, अपनी जाति के प्रति त्याग की एक अद्भुत मिशाल कायम की।

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जन्मदिन पर विशेष- हिन्दी आलोचना के आधार स्तंभ : आचार्य रामचंद्र शुक्ल

बस्ती (उ.प्र.) जिले के ‘अगोना’ नामक गांव में जन्म लेने वाले, मात्र हाई स्कूल तक की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाले और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर विराजमान रहे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( 4.10.1884-2.2.1941) हिन्दी के सबसे महान आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित हैं. उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य समीक्षा सिद्धान्तों को आत्मसात करके हिन्दी समीक्षा को एक सर्वमान्य और पुष्ट आधार प्रदान किया है. उनके बाद विकसित हिन्दी समीक्षा की सभी प्रवृत्तियां किसी न किसी रूप में उनसे प्रभावित हैं.

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रामकथा के प्रथम अन्वेषक फादर कामिल बुल्के – अमरनाथ

फादर बुल्के का विश्वास था कि ज्ञान- विज्ञान के किसी भी विषय की संपूर्ण अभिव्यक्ति हिन्दी में संभव है और अंग्रेजी पर आश्रित बने रहने की धारणा निरर्थक है. उनका दृढ़ विश्वास था कि हिन्दी निकट भविष्य में ही समस्त भारत की सर्वप्रमुख भाषा बन जाएगी.

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मानवीय संवेदना व जिजीविषा हमेशा ज़िंदा रहती है – सुभाष चंद्र

पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय।विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

मार्क्सवादी आलोचक अजय तिवारी- डॉ. अमरनाथ

अजय तिवारी, जन्म: 6 मई, 1955, शिक्षा: इलाहाबाद से हाईस्कूल करने के बाद पी-एच.डी. तक दिल्ली विश्वविद्यालय से अध्ययन। पुस्तकें: प्रगतिशील कविता के सौंदर्यमूल्य, कुलीनतावाद और समकालीन कविता, साहित्य का वर्तमान, पश्चिम का काव्य-विचार। संपादन: केदारनाथ अग्रवाल, कवि-मित्रों से दूर (केदारनाथ अग्रवाल के साक्षात्कार), आज के सवाल और मार्क्सवाद (रामविलास शर्मा से संवाद), तुलसीदास: एक पुनर्मूल्यांकन। सम्मान: केशव-स्मृति सम्मान, भिलाई (1996); देवीशंकर अवस्थी सम्मान, नयी दिल्ली (2002)। संप्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर।

हिन्दी के प्रथम आचार्य : महावीर प्रसाद द्विवेदी

आचार्य द्विवेदी को हिन्दी नवजागरण का केन्द्रीय पुरुष कहा जा सकता है. वे अपने समय और परिवेश के अत्यंत सजग आलोचक हैं. (लेख से)

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रहीम – राहुल सांकृत्यायन

रहीम असाधारण सुन्दर तरुण था। चित्रकार उसकी तस्वीरें उतारते थे, जिन्हें अमीर लोग अपनी बैठकों को सजाने के लिए लगाते थे। होश संभालते ही, रहीम का शायरों और कवियों, संगीतज्ञों और कलाकारों से संपर्क हुआ। लेकिन अकबर रहीम को कलाकार नहीं, सैनिक बनाना चाहता था। रहीम के जीवन का अधिकांश भाग सिपाही के तौर पर ही बीता।

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आलोचिन्तक रमेश कुन्तल मेघ

मेघ जी अपने को ‘आलोचिन्तक’ कहते हैं. यानी, आलोचक और चिन्तक का सुंयुक्त रूप. इतना ही नहीं, वे अपने आप को कार्ल मार्क्स का ‘ध्यान शिष्य’ और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का ‘अकिंचन शिष्य’ मानते हैं.

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अज्ञेय की कविता में विभाजन की त्रासदी डा. सुभाष चन्द्र, एसोशिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र

अज्ञेय बार बार आगाह करते हैं साम्प्रदायिकता के सांप से बचने की। वे जनता से आह्वान करते हैं, बार बार चेताते हैं कि जिसे हम अपना कहते हैं वह ही हमें डस लेगा। साम्प्रदायिकता चाहे हिन्दू हो या फिर मुस्लिम दोनों का चरित्र एक ही होता है और दोनों परस्पर दुश्मन नहीं बल्कि पूरक होती हैं और एक-दूसरे को फूलने फलने के लिए खुराक उपलब्ध करवाती हैं। साम्प्रदायिकता मनुष्य की इंसानियत को ढंक लेती है। अज्ञेय बार बार मनुष्य की इंसानियत को जगाने की बात करते हैं।