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बाबा फरीद और हमारा समाज- सुमेल सिंह सिद्धू

सत्यशोधक फाउंडेशन व देस हरियाणा पत्रिका द्वारा आयोजित हरियाणा सृजन यात्रा के दौरान हांसी स्थित चार कुतुब में आयोजित सेमिनार में पंजाबी व सूफी साहित्य के जाने-माने विद्वान डॉ. सुमेल सिंह सिद्धू ने बाबा फरीद और हमारा समाज विषय पर व्याख्यान दिया। सेमिनार का संचालन करते हुए देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि आज जान लेने वाले सड़क पर हैं, लेकिन देने वाले नहीं हैं। संतों-भक्तों व मध्यकाल के महापुरूषों के विचारों को खंगालने की जरूरत है, जोकि हमारी विरासत है। इस व्याख्यान की प्रस्तुति देस हरियाणा के सह-संपादक अरुण कुमार कैहरबा ने की है

छुआछूत और सिक्ख पंथ: सौ साल पहले की कहानी- सुरेन्द्र पाल सिंह

जन्म – 12 नवंबर 1960 शिक्षा – स्नातक – कृषि विज्ञान स्नातकोतर – समाजशास्त्र सेवा, व्यावहारिक मनौवि‌ज्ञान, बुद्धिस्ट स्ट्डीज – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन – सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर – देस हरियाणा कार्यक्षेत्र – विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

हिन्दी के लिए लड़ने वाला सबसे बड़ा योद्धा : महात्मा गाँधी – अमरनाथ

गाँधी जी ने हिन्दी के आन्दोलन को आजादी के आन्दोलन से जोड़ दिया था. उनका ख्याल था कि देश जब आजाद होगा तो उसकी एक राष्ट्रभाषा होगी और वह राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी होगी क्योंकि वह इस देश की सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा है. वह अत्यंत सरल है और उसमें भारतीय विरासत को वहन करने की क्षमता है. उसके पास देवनागरी जैसी वैज्ञानिक लिपि भी है. जो फारसी लिपि जानते हैं वे इस भाषा को फारसी लिपि में लिखते हैं. इसे हिन्दी कहें या हिन्दुस्तानी.

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मानवीय संवेदना व जिजीविषा हमेशा ज़िंदा रहती है – सुभाष चंद्र

पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय।विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

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रहीम – राहुल सांकृत्यायन

रहीम असाधारण सुन्दर तरुण था। चित्रकार उसकी तस्वीरें उतारते थे, जिन्हें अमीर लोग अपनी बैठकों को सजाने के लिए लगाते थे। होश संभालते ही, रहीम का शायरों और कवियों, संगीतज्ञों और कलाकारों से संपर्क हुआ। लेकिन अकबर रहीम को कलाकार नहीं, सैनिक बनाना चाहता था। रहीम के जीवन का अधिकांश भाग सिपाही के तौर पर ही बीता।

गदर पार्टी के पहले प्रधान सोहन सिंह भकना – बूटा सिंह सिरसा 

देश के आजादी आंदोलन में गदर पार्टी की भूमिका को इतिहास में वह स्थान नहीं दिया गया जो मिलना चाहिए था। पंजाब व पंजाबी भाषायी क्षेत्र के बाहर बहुत कम लोग गदर पार्टी के बलिदानों से परिचित हैं। 1 जनवरी 2020 गदर पार्टी के पहले प्रधान सोहन सिंह भकना का 150 वां जन्म दिन है।

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कायमखानीःसाझी संस्कृति की मिसाल – सुरेंद्र पाल सिंह

आज हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जब इतिहास को एकपक्षीय और दुर्भावनापूर्ण तरीके से हमें परोसा जा रहा है। ऐसे में इतिहास के वे अध्याय जो साझी संस्कृति के उदाहरण हैं और तमाम तरह की साम्प्रदायिक संकीर्णता से ऊपर उठे हुए हैं उनका अध्ययन आवश्यक हो जाता है। सामाजिक- राजनीतिक आयाम को भी ऐतिहासिक तौर पर बेहतर तरीके से समझने के लिए इस प्रकार के वृतांत महत्वपूर्ण है।

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क्रांतिकारी शहीद भगवतीचरण बोहरा व दुर्गादेवी – डा. सुभाष चंद्र

भगवतीचरण बोहरा व दुर्गादेवी (क्रांतिकारी इन्हें दुर्गा भाभी कहकर पुकारते थे) का क्रांतिकारी इतिहास में उल्लेखनीय योगदान है। संगठन की रणनीति बनाने का काम हो, परचे-पेम्फलेट लिखने का काम हो, धन जुटाने को काम हो, सूचनाएं एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम हो या फिर बम बनाने का क्रांतिकारियों के हर काम में इस दंपति ने अग्रणी भूमिका निभाई।

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‘हम भारत के लोग‘ और आप बाबा साहब? – कनक तिवारी

बाबा साहब! ताजा इतिहास में गांधी सुकरात की तरह सत्य के उपासक, नेहरू प्लेटो की तरह गणतंत्र के रचयिता और आप पूरा ज्ञानशास्त्र विवेक, जेहन और कर्म में बिखेरते महान अरस्तू की भूमिका में रहे। तीनों हमारी आत्मा के रचयिता नहीं होते, तो ‘हम भारत के लोग‘ गोरों की गुलामी से कहां छूटते। गांधी और नेहरू ने इतिहास की खुर्दबीन से तुम्हें ढूंढ़कर नायाब हीरा निकाला।

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भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले – सुभाष चंद्र

भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने भारतीय समाज में मौजूद धर्मभेद, वर्णभेद, जातिभेद, लिंगभेद के खिलाफ कार्य किया। वे जैविक बुद्धिजीवी थी, जिन्होंने अपने अनुभवों से ही अपने जीवन-दर्शन का निर्माण किया। सावित्रीबाई फुले ने समाज में सत्य, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानव भाईचारे की स्थापना के लिए अनेक क्रांतिकारी कदम उठाए।