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हरियाणा में रागनी की परम्परा और जनवादी रागनी की शुरुआत – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

रागनी की असली जान, ठेठ लोकभाषा के मुहावरों में सीधी-सादी लय अपनाने में और ऐसे मर्म-स्पर्शी कथा प्रसंगों के चुनाव में होती हैं ” जो लोगों के मन में रच-बस गये हों। इन सबके सहारे ही रागनी लोगों की भावनाओं को, उनकी पीड़ाओं तथा दबी हुई अभिलाषाओं को सुगम और सरल ढंग से प्रस्तुत करने में सफल होती हैं।

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आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है – डा. नवमीत नव

लेकिन अब एमबीबीएस के बाद ढाई साल के अध्यापन और फिर एमडी के तीन साल और अब एक साल से फिर अध्यापन के अनुभव से मुझे एक चीज पता चली कि आप किसी को पढ़ाना/ समझाना चाहें या किसी से पढ़ना/समझना चाहें तो यह काम सबसे बेहतर आपकी अपनी मातृभाषा में ही हो सकता है।

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नई रागनी के शिखर पुरुष पं. जगन्नाथ से संवाद – रोशन वर्मा 

नई रागनी के शिखर पुरुष पं. जगन्नाथ हमारे बीच नहीं रहे। देस हरियाणा की ओर से कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि। रचनाकार के स्वयं के बारे में जानना भी एक अनूठा अनुभव होता है। पं. जगन्नाथ जी के अवदान को याद करते हुए प्रस्तुत है  2013 में  रोशन वर्मा की पंडित जगन्नाथ से हुआ संवाद –

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1857, किस्सा सदरूद्दीन मेवाती का – सहीराम 

नौटंकी पात्र : नट तथा नटी। दो देहाती (बार-बार उन्हीं को दोहराया जा सकता है),एक ढिढ़ोरची (दो देहातियों में एक हो सकता है या नट भी हो सकता है) और…

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कुछ मुंबइया फिल्में और हरियाणवी जनजीवन का यथार्थ – सहीराम

                सिनेमा अभी तक यही माना जाता रहा है कि हरियाणवी जन जीवन खेती किसानी का बड़ा ही सादा और सरल सा जन…

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हरियाणा में पंजाबी भाषा -डा. हरविन्द्र सिंह

भाषा विमर्श ‘पंजाबी’ शब्द से तात्पर्य पंजाब का निवासी होने से भी है और यह पंजाब-वासियों की भाषा भी है। पंजाब की यह उत्तम भाषा ‘गुरमुखी’ लिपि में लिखी जाती…

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मेवाती लोक जीवन की मिठास – डा. माजिद

मेवात का भौगोलिक फैलाव दिल्ली से लेकर फतेहपुर सीकरी के बीच बताया गया है, जिसमें गुड़गांव, फरीदाबाद, भरतपुर, दौसा, अलवर, मथुरा, आगरा, रेवाड़ी जिलों के बीच का भाग शामिल है। इस पूरे क्षेत्र को मेवात के नाम से जाना जाता रहा है, लेकिन आजादी के बाद पुनर्गठन हुआ और मेवात सिमट कर अलवर से लेकर सोहना तक और हथीन से लेकर तिजारा, भिवाडी तक रह गया है

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हरियाणा में भाषायी विविधता – सुधीर शर्मा

समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदली और ‘बांगरू’ भाषा के लोक नाटक (सांग), रागनी, कथाएं, गाथाएं, किस्से, कहानियां, लोक गीत, फिल्में, हास्य-व्यंग्य इतने प्रचारित-प्रसारित हुए कि एक सीमित क्षेत्र की भाषा ही हरियाणवी मानी जाने लगी।