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भारत की कोरोना नीति के चंद नुक्सानदेह पहलू: राजेन्द्र चौधरी

कोरोना से हमारा वास्ता अभी लम्बे समय तक चलने वाला है. काफिला पर छपे पिछले आलेखों में में हम ने इस के सही और गलत, दोनों तरह के सबकों की चर्चा की थी पर भारत की करोना नीति की समीक्षा नहीं की थी. आपदा और युद्ध काल में एक कहा-अनकहा दबाव रहता है कि सरकार को पूरा समर्थन दिया जाए और उस की आलोचना न की जाय पर कोरोना के मुकाबले के लिए भारत में अपनाई गई रणनीति की समीक्षा ज़रूरी है; यह समीक्षा लम्बे समय तक चलने वाली इस आपदा में रणनीति में सुधार का मौका दे सकती है. कोरोना से कैसे निपटना चाहिए इस में निश्चित तौर पर सब से बड़ी भूमिका तो कोरोना वायरस की प्रकृति की है- ये गर्मी में मरेगा या सर्दी में या नहीं ही मरेगा; बूढों को ज्यादा मारेगा या बच्चों को, इन तथ्यों का इस से निपटने की रणनीति तय करने में सब से बड़ी भूमिका है. इस लिए भारत में कोरोना की लड़ाई के मूल्यांकन से पहले हमें वायरस की प्रकृति के बारे में उपलब्ध जानकारी को रेखांकित करना होगा.

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बाज़ारवाद का नीतिगत विरोध नाकाफी, निजी जीवन में भी ज़रूरी-राजेन्द्र चौधरी

लेखक महर्षि दयानंद विश्विद्यालय, रोहतक के पूर्व प्रोफेसर तथा कुदरती खेती अभियान, हरियाणा के सलाहकार हैं.

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मनीमाजरा: कहानी एक रियासत की- सुरेन्द्र पाल सिंह

सुरेन्द्र पाल सिंह-
जन्म: 12 नवंबर 1960 शिक्षा: स्नातक– कृषि विज्ञान स्नातकोतर– समाजशास्त्र सेवा, व्यावहारिक मनौवि‌ज्ञान, बुद्धिस्ट स्ट्डीज– स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन– सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर– देस हरियाणा कार्यक्षेत्र – विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय.. .. भारत की सांझी-संस्कृति के अग्रणी कवि रहीम- अरुण कुमार कैहरबा

लेखक हिंदी विषय के अध्यापक तथा देसहरियाणा पत्रिका के सह-सम्पादक हैं

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कॉर्पोरेट कृषि में पूँजी निवेश और अपराधीकरण- विकास नारायण राय

नब्बे के दशक में आये उदारीकरण के दौर ने हरियाणा के ऐसे तमाम गावों में ‘बुग्गी ब्रिगेड’ के रूप में खेती से विमुख बेरोजगारों के आवारा झुण्ड पैदा कर दिए थे। पंजाब के गावों में भी इस दौरान उत्तरोत्तर नशे का चलन बढ़ता गया है। लेकिन मंडी और एमएसपी व्यवस्था ने कृषि और किसानी के जुड़ाव को जिंदा रखा हुआ था। कॉर्पोरेट कृषि व्यवस्था इसे जड़ों से अस्थिर करने वाली प्रणाली है। (लेख से)

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किसानों के तूफान के आगे नहीं टिकेगा कोई गुमान सरकार किसानों से बात करे और निकाले समाधान- अरुण कुमार कैहरबा

(लेखक हिंदी विषय के अध्यापक तथा देसहरियाणा पत्रिका के सह-सम्पादक हैं .)