लिंग-संवेदी भाषा की ओर एक कदम – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 156 डा. सुभाष चंद्र अपने अल्फ़ाज पर नज़र रक्खो, इतनी बेबाक ग़ुफ्तगू न करो, जिनकी क़ायम है झूठ पर अज़मत, सच कभी उनके रूबरू न करो। – बलबीर सिंह राठी…

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जीना इसी का नाम है -गीता पाल

Post Views: 147 गीता पाल           जैसे ही मैंने क्लास में कदम रखा और पूछा, मॉनीटर कौन है? लड़कों की तरफ से आवाज आई – जी चन्दा।…

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एक गांव दो चेहरे – सहीराम

Post Views: 104 कोई दो महीने पहले यह गांव पहली बार तब चर्चा में आया था,जब बीजिंग ओलंपिक में इस गांव के बेटे विजेंद्र ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीत…

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खाप पंचायत – वर्तमान स्वरूप – डी.आर. चौधरी

Post Views: 341 एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर साल सम्मान के नाम पर लगभग एक हतार हत्याएं होती हैं । इसमें 900 हत्याएं पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, देहात और…

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हम तालिबान बनना चाहते हैं – सहीराम

Post Views: 87 सहीराम  खाप पंचायती वैसे तो तालिबान बन ही चुके थे, सब उन्हें मान भी चुके थे। लेकिन पक्के और पूरे तालिबान बनने की उनकी इच्छा ने इतना…

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मीडिया, छवियां और गोत्र विवाद – डॉ. देवव्रत सिंह

Post Views: 198 हरियाणा के लोगों को एक बात का अहसास तो हो चुका है कि मीडिया द्वारा दिखाये जाने के बाद उनकी छवि को बट्टा लग चुका है। अधिकांश…

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मीडिया में हरियाणवी महिला की छवि – सहीराम

Post Views: 374 सहीराम  मीडिया में हरियाणवी महिला की छवि क्या है? जैसे हरियाणवी पुरुष जिसे आमतौर पर हाळी-पाळी कहा जाता है, की छवि खेतों में खटनेवाले एक मेहनतकश किसान…

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स्त्री-चिंतन मार्फत ‘गूंगे इतिहासों की सरहदों पर -अंकित नरवाल

दुनिया की आधी आबादी होने के बावजूद स्त्रियों की अपनी स्वतंत्रता, समानता और सत्ता के लिए तथाकथित लैंगिक नियमों, संस्कृतियों और पितृसत्तावादी मानदण्डों से जद्दोजहद जारी है। शताब्दियों से विवाह, विज्ञापन, सौंदर्य-प्रसाधन और सामंती सारणियों के तमाम प्रयोजन उसे माल में तब्दील कर उसकी खरीद-फरोत पर आमादा हैं। स्त्री-जीवन की इसी जद्दोजहद के भावबोध से भरी सुबोध शुक्ल की अनूदित पुस्तक ‘गूंगे इतिहासों की सरहदों तक’ नारी-जीवन के पाश्चात्यी दृष्टिकोण को सामने लाती है, जिससे मुख्यतः अमेरिका और यूरोप का बीसवीं शताब्दी का स्त्रीवादी-चिंतन हमारे सामने आता है। बेट्टी फ्रीडन, केट मिलेट, शुलामिथ फायरस्टोन, एंड्रिया डुआर्किन, नवल अल सादवी, ग्लोरिया जां वॉटकिंस ‘बेल हुक्स’, नाओमी वुल्फ और फ्रिस्टीना हॉफ सॉमर्स नामक आठ स्त्री-चिंतकों की प्रमुख पुस्तकों से कुछ चुने हुए लेख इस पुस्तक में शामिल किए गए हैं, जो स्त्री-जीवन के संघर्षों की ओर हमारा ध्यान ले जाते हैं। 

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कृषि और महिलाएं -अंजू

Post Views: 432 आलेख हमारा प्रदेश कृषि प्रधान है। प्रदेश की जनसंख्या का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा कृषि के कार्य में संलग्न है। यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य…

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महिला की पूर्व निर्धारित भूमिका में बदलाव -सुमित सौरभ 

Post Views: 446 सामाजिक न्याय अपने निर्माण के पचास वर्षों के दौरान हरियाणा राज्य का तीव्र आर्थिक विकास हुआ है। विकास के माप हेतु निर्मित सूचकांक के विभिन्न सूचकों को…