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सदानंद साही मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

Post Views: 400 आलेख सदानंद साही समय आ गया है कि हम भाषा के सवाल को गंभीरता से लें। भाषा मनुष्य होने की शर्त है। इसे सिर्फ अभिव्यक्ति, संपन्न और…

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भाषा हमारे अस्तित्व का मूल – नोम चोम्स्की

Post Views: 921 संवाद विश्वविख्यात भाषा वैज्ञानिक, दार्शनिक, वामपंथी लेखक नोम चोम्स्की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रांतिकारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के विकास को लेकर उनका यह…

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भारत में भाषा बंटवारे की राजनीति – जोगा सिंह

Post Views: 505 आलेख भारत के राजनीतिक गठन में सैद्धांतिक स्तर पर भाषा को मुख्य आधार माना गया है, परन्तु वास्तविक रूप में ऐसा हो नहीं रहा। भाषा का शिक्षा…

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किताबें ज्ञान का प्रवेश द्वार हैं – परमानंद शास्त्री

Post Views: 363 परिचर्चा किसी व्यक्ति व समाज की बेहतरी में पुस्तकोंं की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन पुस्तक पठन-अध्ययन-मनन की संस्कृति पर मंडराते खतरे की चिंता निरंतर यत्र-तत्र सुनने में…

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साहित्य का स्व-भाव और राजसत्ता – बजरंग बिहारी तिवारी

Post Views: 358 भारतीय मानस धर्मप्राण है इसलिए भारतीय साहित्य अपने स्वभाव में अध्यात्मवादी, रहस्यवादी है; यह धारणा औपनिवेशिक दौर में बनी। राजनीति में साहित्य की दिलचस्पी आधुनिक काल में…

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हरियाणवी लोक सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक है पगड़ी – महासिंह पूनिया

किसी समाज की संस्कृति, रहन-सहन, भोजन व वेशभूषा को वहां के जीवनयापन के साधन व वहां की जलवायु सर्वाधिक प्रभावित करती है। अस्तित्व के संघर्ष में उत्पन्न आवश्यक वस्तुएं कालांतर में सांस्कृतिक प्रतीकों व चिह्नों में तब्दील हो जाया करती हैं। मानव समाज इन्हें अपनी पहचान से जोड़ लेता है। समाज विशेष की वेशभूषा ने इस सांस्कृतिक सफर को तय किया है। गर्मी-सर्दी से बचने के लिए तथा काम करते वक्त सिर ढकने वाला कपड़ा कब पुरुषों की इज्जत व स्त्रिायों की लाज का प्रतीक बन जाएगा। कब यह सामन्ती ठसक का रूप लेकर उत्पीड़न का प्रतीक बन जाएगी। महासिंह पूनिया का ‘पगड़ी’ पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित कर रहे हैं।

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ज़ोहरा बाई अम्बाला वाली (अम्बाला) – महेन्द्र प्रताप चांद

ज़ोहराबाई बहुत ही शिष्ट, सुशील और स्वाभिमानी महिला थीं। फिल्मी दुनिया में वे अपने हर गीत के लिए दो हजार रुपए पारिश्रमिक लेती थीं, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी। बसंत देसाई के संगीत में बनी एक फिल्म ‘मतवाला शायर राम जोशी’ में उन्होंने बीस गाने गाये थे और चालीस हजार रुपए पारिश्रमिक लिया था। सन् 1950 के बाद कुछ नई गायिकाएं आ गईं और इन्हें कम पारिश्रमिक पर गाने के लिए कहा गया तो इन्होंने इसे स्वीकार करने की अपेक्षा फिल्मों में गाना ही छोड़ दिया। जबकि अधिकतर कलाकार प्राय: दौलत और शोहरत के पीछे भागते हैं, लेकिन ज़ोहराबाई पब्लिसिटी से बहुत दूर रहती थीं और प्रेस वालों से भी बहुत बिदकती थीं।

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हरियाणा में पंजाबी भाषा व साहित्य की वस्तुस्थिति – कुलदीप सिंह

                अक्सर हरियाणा में पंजाबी संस्था या विभाग को छोड़ कर और जितनी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा जितनी भी भाषण व लेखन प्रतियोगिताएं होती हैं, उसमें अभिव्यक्ति का माध्यम सिर्फ हिन्दी या अंग्रेजी भाषा ही होता है, परन्तु पंजाबी भाषा के प्रति यह रवैया नकारात्मक होता है। जिसके कारण पंजाबी भाषी विद्यार्थी इस तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से वंचित रह जाते हैं।