अलीगढ़ : समलैंगिकता पर विमर्श -विकास साल्याण

समलैंगिकता को अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है कुछ समलैंगिकता को मानसिक बीमारी मानते हैं। कुछ इसे परिस्थितियों के कारण उत्पन्न आदत मानते हैं तो कुछ एक सामान्य प्राकृतिक कृत्य…

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विपिन सुनेजा – खेतों में लहलहाता संगीत

संगीत हमारे देश की मिट्टी में बसा है। इस मिट्टी में अन्न उगाने वाले कि सान के जीवन में अनेक ऐसे क्षण आते हैं, जब वह भाव-विभोर होकर गाने लगता…

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आंगण बीच कूई राजा (लोकगीत)

आंगण बीच कूई राजा डूब क: मरूंगी तू मत डरिए मैं तो औरां न: डराऊंगी जेठ लड़ैगा पाछा फेर क: लडूंगी आजा री जिठानी तेरे धान से छडूंगी धान से…

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पचास साल का सफर हरियाणवी सिनेमा -सत्यवीर नाहडिया

सिनेमा हरियाणा प्रदेश के स्वर्ण जयंती वर्ष के पड़ाव पर यदि हरियाणवी सिनेमा की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करें तो निराशा ही हाथ लगती है। सन् 1984 मेंं प्रदर्शित हुई…

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हरियाणा में पंजाबी भाषा -डा. हरविन्द्र सिंह

भाषा विमर्श ‘पंजाबी’ शब्द से तात्पर्य पंजाब का निवासी होने से भी है और यह पंजाब-वासियों की भाषा भी है। पंजाब की यह उत्तम भाषा ‘गुरमुखी’ लिपि में लिखी जाती…

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गुरनाम कैहरबा – हरियाणा में उभरता रंगमंच

रंगमंच आर्थिक रूप से समृद्ध माने जाने वाले हरियाणा प्रदेश में नाटक-रंगमंच व कला का क्षेत्र लगातार उपेक्षित रहा है। जिस वजह से यहां पर कलात्मक पिछड़ापन देखा जा सकता…

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पहाड़ में कायांतरित होता आदमी -कमलानंद झा                                                 

सिनेमा                 पहाड़ पुरुष दशरथ मांझी के व्यक्तित्व ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि ज्ञान, बुद्धिमत्ता और गहन संवेदनशीलता सिर्फ औपचरिक शिक्षा की मोहताज नहीं। अक्षर की…

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उस्ताद धुलिया खान

रोशन वर्मा  हम बहुत से बड़े-बड़े नाम और काम से ख्यातिनाम लोगों को याद रखते हैं। मगर इन बड़े नामों को नायक बनाने और ख्याति के मुकाम पर ला खड़ा…

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हिन्दी सिनेमा में किसान-जीवन -सुनील दत्त

सिनेमा माध्यम भारत में अपने सौ साल पूरे कर चुका है। सिनेमा ने भारतीय समाज को गहरे से प्रभावित किया है। बदलते हुए समाज को भी सिनेमा में देखा जा…

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सदानंद साही मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

आलेख सदानंद साही समय आ गया है कि हम भाषा के सवाल को गंभीरता से लें। भाषा मनुष्य होने की शर्त है। इसे सिर्फ अभिव्यक्ति, संपन्न और दरिद्र जैसे पैमाने…