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दामिनी यादव की कविताएं माहवारी और बिकी हुई कलम

हरियाणा सृजन उत्सव में 23 फरवरी को राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में दामिनी यादव ने अपनी माहवारी कविता सुनाई। इस तरह की कविताओं को आमतौर पर सुनाने का रिवाज नहीं है, लेकिन दामिनी ने आधी आबादी के अनुभव को जिन संवेदनशील शब्दों में प्रस्तुत किया और जिस गंभीरता से सुनाया था 500 के करीब मौजूद श्रोता अपने साथ इस कविता को लेकर गए. कविता का टेक्सट और दामिनी की ही आवाज में कविता आपके लिएः

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पं. मांगे राम की धमाकेदार रागनी

पं. मांगे राम की धमाकेदार रागनी
सारी उम्र गयी टोट्टे म्हं ना खाया टूट गुजारे तै
कोणसा खोट बण्या साजन गई रूस लक्ष्मी म्हारे तै
देखिये-सुनिए-पढ़िए
desharyana.in

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हरियाणा की मशहूर रागनियां

रागनियां रागनियां        प्रिय, पाठको, हम आपके लिये लेकर आ रहे हैं, डा. सुभाष चंद्र द्वारा संपादित पुस्तक – हरियाणवी लोकधारा प्रतिनिधि रागनियां – चुन कर कुछ मशहूर रागनियां। इन…

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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस

हरियाणा सृजन उत्सव में  24 फरवरी 2018 को ‘थिएटर ऑफ रेलेवंस’  के जनक मंजुल भारद्वाज से रंगकर्मी दुष्यंत के बीच परिचर्चा हुई और मौजूद श्रोताओं ने इसमें  शिरकत की। प्रस्तुत है इस संवाद की रिपोर्ट। सं.

हरियाणा के दर्शकों की अभिरूचियां

हरियाणा सृजन उत्सव में  24 फरवरी 2018 को ‘हरियाणा के दर्शकों की अभिरूचियाँ’ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें फ़िल्म अभिनेता व रंगकर्मी यशपाल शर्मा, सीनियर आईएएस वीएस कुंडू, और गौरव आश्री ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इस परिचर्चा का संचालन  किया संस्कृतिकर्मी प्रो. रमणीक मोहन ने। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के मुख्य अंश – सं.

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हरभगवान चावला की कविताएं

ये किया हमने
हमने स्त्रियों की पूजा की 
और लहूलुहान कर दिया
हमने नदियों की पूजा की 
और ज़हर घोल दिया 
हमने गायों की पूजा की 
और पेट में कचरा उड़ेल दिया
हमने ईश्वर की पूजा की 
उसके क़त्ल के लिए हमने 
नायाब तरीका चुना
हमने एक ईश्वर के 
कई ईश्वर बनाए 
और सब को आपस में लड़ा दिया ।

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दिनेश दधीचि की रचनाएं

बात करती हैं नज़र, होंठ हमारे चुप हैं.
यानि तूफ़ान तो भीतर हैं, किनारे चुप हैं.
उनकी चुप्पी का तो कारण था प्रलोभन कोई
और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं.
बोलना भी है ज़रूरी साँस लेने की तरह
उनको मालूम तो है, फिर भी वो सारे चुप हैं.
भोर की वेला में जंगल में परिंदे लाखों
है कोई खास वजह, सारे के सारे चुप हैं.
जो हुआ, औरों ने औरों से किया, हमको क्या?
इक यही सबको भरम जिसके सहारे चुप हैं.

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ठेठ भारतीय आधुनिकता के सृजन की चुनौती – योगेंद्र यादव

हम लोग जो अपने आप को प्रगतिशील कहते हैं, सेकुलर कहते हैं, उदारवादी कहते हैं या वामपंथी कहते हैं, हम जिस भाषा में बात करते हैं, जिस मुहावरे में बात करते हैं, उसमें कहीं ना कहीं गड़बड़ है। हमारी भाषा हमें जन मानस से जोड़ने का काम नहीं कर पा रही है। और सोचने पर महसूस हुआ कि मामला सिर्फ भाषा और मुहावरे का नहीं है, हमारी बुनियादी सोच में खोट है। हमारी सोच, हमारी अवधारणाएं और हमारे सिद्धांत सब एक यूरोपीय अनुभव की पैदाइश हैं और कहीं न कहीं उसी खांचे में कैद हैं। समतामूलक राजनीति को एक देशज विचार की जरूरत है।

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धर्म की आड़

इस समय, देश में धर्म की धूम है। उत्पात किए जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और जिद्द की जाती है तो धर्म और ईमान के नाम पर। रमुआ पासी और बुद्धू मियां धर्म और ईमान को जानें या न जानें, परंतु उसके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। उबल पड़ने वाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह कुछ भी नहीं समझता-बूझता और दूसरे लोग उसे जिधर जाने देते हैं, उधर जुत जाता है। यथार्थ दोष है, कुछ चलते-पुरजे, पढ़े-लिखे लोगों का, जो मूर्ख लोगों की शक्तियों और उत्साह का दुरुपयोग कर रहे हैं कि इस प्रकार, जाहिलों के बल के आधार पर उनका नेतृत्व और बड़प्पन कायम रहे। इसके लिए धर्म और ईमान की बुराइयों से काम लेना उन्हें सबसे सुगम मालूम पड़ता है। सुगम है भी।