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अनुसंधानपरक आलोचना के आदर्श पं. चंद्रबली पाण्डेय – डा. अमरनाथ

हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले आजीवन ब्रह्मचारी रहे पं.चंद्रबली पाण्डेय ( जन्म 25.4.1904 ) अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के वे सर्वाधिक प्रिय शिष्यों में से थे। अभावों से दोस्ती और महत्वाकांक्षाओं से दुश्मनी करने वाला संत स्वभाव का यह आलोचक किसी विश्वविद्यालय का शिक्षक नहीं बना

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हिन्दी में शोध का धंधा – डॉ. अमरनाथ

वैश्वीकरण के बाद अनुसंधान के क्षेत्र में और भी तेजी से गिरावट आई है. अब तो हमारे देश की पहली श्रेणी की प्रतिभाएं मोटी रकम कमाने के चक्कर में मैनेजर, डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहती हैं और जल्दी से जल्दी विदेश उड़ जाना चाहती हैं. किसी ट्रेडिशनल विषय में पोस्टग्रेजुएट करके शोध करना उन्हें नहीं भाता. जो डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाते वे ही अब मजबूरी में शोध का क्षेत्र चुन रहे हैं. वैश्वीकरण और बाजारवाद ने नयी प्रतिभाओं का चरित्र ही बदल दिया है.

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हिन्दी आलोचना में विसंगतियाँ – डॉ. अमरनाथ

हिन्दी आलोचना का इतिहास विसंगतियों से भरा हुआ है और हमारा हिन्दी समाज अब उसके दुष्परिणाम भी झेल रहा है किन्तु हमारे वरिष्ठ आलोचकों की नजर भी उन विसंगतियों की ओर नहीं पड़ रही है. हम उनमें से कुछ विसंगतियों की ओर पाठको का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करेंगे.

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गाँधी की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी कहाँ गई ? – अमरनाथ

आजादी के बहत्तर साल बीत गए. आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति. दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकरे प्रशासनिक व्यवस्था तक सबकुछ पराई भाषा में होता है फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह विश्व गुरु बन जाएगा.

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बेहतर समाज: अब नहीं तो कब? – राजेंद्र चौधरी

इस अवसर पर परिवर्तन के प्रति आशावान होने के कुछ विशेष कारण भी हैं. वर्तमान व्यवस्था कि कई कमज़ोरियाँ जो दबी ढकी थी, वो उघड कर सामने आ गई हैं, सब से बड़ी बात तो यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर देश की जनता के पास कोई आर्थिक सुरक्षा और बचत नहीं है, उन की कमाई बमुश्किल इतनी है कि रोज़ कमाते हैं और खाते हैं. और जिन के पास चंद दिनों की तालाबंदी सहन करने की ताकत नहीं है, बुढ़ापा और बीमारी तो उन को भी आती होगी, तब क्या होता होगा इनका, यह सोच कर भी डर लगता है.

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‘हम भारत के लोग‘ और आप बाबा साहब? – कनक तिवारी

बाबा साहब! ताजा इतिहास में गांधी सुकरात की तरह सत्य के उपासक, नेहरू प्लेटो की तरह गणतंत्र के रचयिता और आप पूरा ज्ञानशास्त्र विवेक, जेहन और कर्म में बिखेरते महान अरस्तू की भूमिका में रहे। तीनों हमारी आत्मा के रचयिता नहीं होते, तो ‘हम भारत के लोग‘ गोरों की गुलामी से कहां छूटते। गांधी और नेहरू ने इतिहास की खुर्दबीन से तुम्हें ढूंढ़कर नायाब हीरा निकाला।

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शाहीन बाग़ के प्रकाशपुंज – स्वराजबीर – अनु. – जगजीत विर्क

गुरु गोबिन्द सिंह की अगुवाई में सिखों ने चमकौर की गढ़ी और नारनौल के सतनामियों ने नारनौल इलाके की कच्ची गढ़ियों में से हाकिमों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। उन गढ़ियों में से उठे संघर्ष कामयाब हुए और लाल किले में बैठे हाकिमों को हार का मुंह देखना पड़ा। ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाना अपने आप में मानवता की जीत है। जम्हूरियत के लिए हो रहे संघर्षों की खुशबू बसी हुई है और खुशबू को कत्ल नहीं किया जा सकता।

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जीवन के विविध रंगों जीवन-दृष्टि देता रंगमंच – अरुण कुमार कैहरबा

थियेटर या रंगमंच जीवन के विविध रंगों को मंच पर प्रस्तुत करने की जीवंत विधा है। रंगमंच सही गलत के भेद को बारीकी से चित्रित करता है। रंगमंच सवाल खड़े करता है। रंगमंच समाज का आईना ही नहीं है, बल्कि परिवर्तन का सशक्त औजार भी है।