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किसान की मुसीबत नैं जाणै सै किसान – धनपत सिंह

किसान की मुसीबत नैं जाणै सै किसानलूट-खसोट मचावणियां तूं के जाणै बेईमान माह, पोह के पाळे म्हं भी लाणा पाणी होदिन रात रहे जा बंध पै कस्सी बजाणी होगिरड़ी फेरां,…

मुक्तिबोध के जन्म शताब्दी अवसर पर एक काव्य-गोष्ठी

                22 अगस्त को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की आर्टस फैक्लटी में टीम देस हरियाणा ने गजानन माधव मुक्तिबोध के जन्म शताब्दी अवसर पर एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें गणमान्य…

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दिन – संगीता बैनीवाल

 बाजरे की सीट्टियां पै खेत की मचाण पै चिड्ड़ियां की लुक-मिच्चणी संग खेल्या अर छुपग्या दिन। गोबर तैं लीपे आंगण म्ह हौळे हौळे आया दिन। टाबर ज्यूं खेल्या,हांस्या-रोया, खाया-पिया अर…

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जागरूकता से ही रोकी जा सकती है एड्स की महामारी – अरुण कुमार कैहरबा

दुनिया में एचआईवी/एड्स एक महामारी का रूप लेता जा रहा है। इस जानलेवा विषाणु के बारे में जागरूकता की कमी भारत सहित विकासशील देशों की सबसे बड़ी विडंबना है। आज…

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लूकाच का वास्तविकतावाद – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

मार्क्सवाद के बारे में बहुत से पर्वाग्रह लोगों के मन में घर कर गये हैं। उनमें से एक मुख्य धारणाा यह है कि इस दृष्टिकोण से प्रतिबद्धता गंभीर साहित्यिक विवेचन…

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उर्दू शायरी की विधाएं – शशिकांत श्रीवास्तव

( अंग्रेजी के विद्वान शशिकांत श्रीवास्तव साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। कई दशकों तक कालेज में अध्यापन किया और हरियाणा के  सरकारी कालेजों में प्रिंसीपल रहे। हिंदुस्तानी साहित्य की सांझी…

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एक दिन के अखबार का सच – डा. श्रेणिक बिम्बिसार

जवान ने खाई गोली सम्मान नहीं आई ए एस की मौज शहीद भगत सिंह की जन्म तिथि पर संशय बर्थ-डे गिफ्ट से वंचित पी.एम. एटमी करार लटका सेना ने ठुकराया…

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कात्यक की रुत आ गई – डा. राजेंद्र गौतम

वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक राजेंद्र गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। इनके दोहे छंद-निर्वाह की कारीगरी नहीं, बल्कि आधुनिक कविता के तमाम गुण लिए हैं। कात्यक की…