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पहाड़ के पितामह चंडीप्रसाद भट्ट – अमर नाथ

नदियाँ हिन्दुस्तान की धमनियाँ हैं। इनमें जल रूपी रक्त का संचार पहाड़ों से होता है। इन धमनियों की अविरलता बनाए रखने के लिए पहाडों और उनके जंगलों को बचाए रखना अनिवार्य है। चंडीप्रसाद भट्ट ने पर्यावरण के संबंध में अपना ज्ञान अपने अनुभव से अर्जित किया। वे पहाड़ पर जन्मे, पहाड़ पर पले -बढे और उन्होंने पहाड़ को कर्मस्थली बनाकर उसे जिया।

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मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र – अमर नाथ

शिवकुमार मिश्र प्रतिबद्ध मार्क्सवादी आलोचक हैं. ‘जनवादी लेखक संघ’ के राष्ट्रीय महासचिव और बाद में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने लम्बे समय तक लेखक संगठन का नेतृत्व किया. उनकी समीक्षा साफ सुथरी और निर्णयात्मक है. मिश्र जी की आलोचनाएं सैद्धांतिक भी हैं और व्यावहारिक भी.

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गाँधीवादी आलोचक विश्वनाथप्रसाद तिवारी – अमर नाथ

“ महान साहित्य घृणा नहीं, करुणा पैदा करता है. घृणित चरित्र के प्रति भी एक गहरी करुणा. यदि साहित्य घृणा, हिंसा और असहिष्णुता पैदा करने लगे तो दुनिया बदरंग हो जाएगी. रचना हृदय परिवर्तन की एक अहिंसक प्रक्रिया है. वह हिंसा का विकल्प नहीं है.”

समाज की धड़कनों को पढ़ लेता है रचनाकार – टी. आर. कुण्डू

समाज व्यक्तियों का घर नहीं है, समूह नहीं, ये एक संवेदनशील सामूहिकता है। जिसका एक मिजाज है, जिसकी एक अंतरात्मा है, जो हमें बुरे-भले की समझ का बोध कराते हैं। मूलत: यह एक नैतिकता में ही बसी हुई है। इसी के बलबूते हम आगे बढ़े हैं। कोई भी संरचना अंतिम नहीं है। उसके बाह्य व भीतरी समीकरण है जो बदलते रहते हैं। हर बदलाव के कुछ दबाव होते हैं। कुछ तनाव होते हैं। कुछ पीड़ाएं होती हैं। सबसे पहले इसकी आहट आप रचनाकारों को मिलती है।

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हिन्दुस्तान की जातीय भाषा के अन्वेषक जॉन गिलक्रिस्ट – अमर नाथ

जॉन बोर्थविक गिलक्रिस्ट ( जन्म- 19.6.1759 ) ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान की जातीय भाषा की सबसे पहले पहचान की, उसके महत्व को रेखांकित किया, भारत में उसके अध्ययन की नींव रखी, उसका व्याकरण बनाया और इंग्लिश- हिन्दुस्तानी डिक्शनरी बनाकर अध्ययन करने वालों के लिए रास्ता आसान कर दिया. एडिनबरा में जन्म लेने वाले जॉन गिलक्रिस्ट वास्तव में एक डॉक्टर थे और ईस्ट इंडिया कम्पनी में सर्जन बनकर 1783 ई. में भारत आए.

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वरिष्ठ नागरिकों के प्रति वारिसों के कर्तव्य – राजविंदर सिंह चंदी

सरकार द्वारा 2007 में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 बनाया, ताकि माता-पिता वरिष्ठ व नागरिकों का भरण-पोषण व सुरक्षा दी जा सके।

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कोरोना के समय में ऑनलाइन स्कूली शिक्षा – राजेंद्र चौधरी

कोरोना महामारी ने जीवन के ऑनलाइन पक्ष को बढ़ावा दिया है और ऑनलाइन शिक्षा इसका एक प्रमुख घटक है। स्कूल और कॉलेज सबसे पहले बंद हुए थे और शायद सब से अंत में ही खुलें। इस लिए ऑनलाइन की समीक्षा ज़रूरी है।

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अमीर खुसरो: हिंदुस्तान की साझी संस्कृति, साझी विरासत – सोफिया खातून

अमीर खुसरो किसी विशेष धर्म-संस्कृति संबंधित न होकर हिंदुस्तान की साझी-संस्कृति, साझी विरासत के प्रतीक हैं। वर्तमान समय में जबकि धार्मिक वैमनस्य चरम पर है तथा अपनी-अपनी धर्म-संस्कृति को लेकर छोटे-छोटे प्रसंगों में तनाव एवं अराजकता की स्थिति बन जाती है, वहाँ उनके जीवन-चरित्र एवं साहित्य से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। गंगा-जमुनी तहजीब हिन्दुस्तान की परंपरा एवं पहचान है और अमीर खुसरो इस गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक हैं।

लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है – डॉ. अमरनाथ

लोक साहित्य में लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है.

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हैपी बर्थडे टू यू – – गंगा राम राजी

मुझे जानकर यह बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ कि सात सैक्टर में अधिकांश बड़ी बड़ी कोठियों में केवल बुजुर्ग जोड़े ही रहते हैं सबके बच्चे बाहर हैं। अपनी देख भाल वे स्वयं ही करते हैं जैसे सरकारी बस पर सामने लिखा होता है ‘यात्री अपने सामान के खुद जिम्मेदार हैं ’ बच्चे अपने-अपने परिवार के साथ घर से बाहर देश विदेश में व्यस्त और मस्त। – प्रस्तुत है कहानी गंगाराम राजी की