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आवाज़ें और चुप्पी

Post Views: 135 प्रस्तुति – मानव प्रदीप वशिष्ठ 27 नवम्बर, 2018 को कुरुक्षेत्र के  सावित्री बाई-जोतिबा फुले पुस्तकालय तथा शोध संस्थान में इंडियन फाउन्डेशन फॉर आर्ट  तथा देस हरियाणा ने…

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हरियाणा की संस्कृति के विविध रंग

Post Views: 615 हरियाणा सृजन उत्सव में  24 फरवरी 2018 को ‘हरियाणा की संस्कृति के विविध रंग’ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें मेवात इतिहास एवं संस्कृति विशेषज्ञ सिद्दीक अहमद मेव…

शब्द और अर्थ के भेद को पाटना होगाः उर्मिलेश

Post Views: 718 रिपोर्ट – अरुण कुमार कैहरबा कुरुक्षेत्र हरियाणा से मैं वाकिफ हूं। चंडीगढ़ में दो साल तक एक अखबार के ब्यूरो में मैंने काम किया है। कुरुक्षेत्र में…

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स्त्री सृजनः अनुभव व उपलब्धियां

Post Views: 871 प्रस्तुति – अनुराधा हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान 25 फरवरी 2018 को ‘स्त्री सृजन संकल्पः उपलब्धियाँ और अनुभव’ विषय पर परिचर्चा हुई। युवा कवियत्री विपिन चौधरी, नाटक…

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दलित जब लिखता है

सुनो ब्राह्मण – और सफेद हाथी
मलखान सिंह की कविताएं
हरियाणा सृजन उत्सव में 24 फरवरी 2018 को ‘दलित जब लिखता है’ विषय पर परिचर्चा हुई। प्रख्यात दलित कवि मलखान सिंह ने अपने अनुभवों के माध्यम से भारतीय समाज व दलित साहित्य से जुड़े ज्वलंत और विवादस्पद सवालों पर अपने विचार प्रस्तुत किए और दो कविताएं सुनाई

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दलित जब लिखता है!

Post Views: 1,065 प्रस्तुति – डॉ. विजय विद्यार्थी हरियाणा सृजन उत्सव में  24 फरवरी 2018 को ‘दलित जब लिखता है’ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें प्रख्यात दलित कवि मलखान सिंह…

हरियाणा के दर्शकों की अभिरूचियां

हरियाणा सृजन उत्सव में  24 फरवरी 2018 को ‘हरियाणा के दर्शकों की अभिरूचियाँ’ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें फ़िल्म अभिनेता व रंगकर्मी यशपाल शर्मा, सीनियर आईएएस वीएस कुंडू, और गौरव आश्री ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इस परिचर्चा का संचालन  किया संस्कृतिकर्मी प्रो. रमणीक मोहन ने। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के मुख्य अंश – सं.

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ठेठ भारतीय आधुनिकता के सृजन की चुनौती – योगेंद्र यादव

हम लोग जो अपने आप को प्रगतिशील कहते हैं, सेकुलर कहते हैं, उदारवादी कहते हैं या वामपंथी कहते हैं, हम जिस भाषा में बात करते हैं, जिस मुहावरे में बात करते हैं, उसमें कहीं ना कहीं गड़बड़ है। हमारी भाषा हमें जन मानस से जोड़ने का काम नहीं कर पा रही है। और सोचने पर महसूस हुआ कि मामला सिर्फ भाषा और मुहावरे का नहीं है, हमारी बुनियादी सोच में खोट है। हमारी सोच, हमारी अवधारणाएं और हमारे सिद्धांत सब एक यूरोपीय अनुभव की पैदाइश हैं और कहीं न कहीं उसी खांचे में कैद हैं। समतामूलक राजनीति को एक देशज विचार की जरूरत है।

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शब्द हमें बेसहारा नहीं होने देते: सुरजीत पातर

“होंदा सी इत्थे शख्स़ इक सच्चा जाणे किदर गया
जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई-
जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई,
साजिंदे पुछदे साज नूं नग़मा किदर गया,
सब नीर होए गंदले, शीशे होए धुंधले इस तरह
हर शख्स़ पुछदा हे, मेरा चेहरा किदर गया
सिक्खां, मुसलमाना ते हिंदुआं दी पीड़ विच
रब ढूंढदा फिरदा, मेरा बंदा किदर गया
दुःख दी ज़मीं नू पुछदा अल्लाह किदर गया
पातर नू जाण-जाण के पुछदी है आज हवा
रेतां ते तेरा नाम लिख्या सी, जाणे किदर गया