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हरभगवान चावला की कविताएं

ये किया हमने
हमने स्त्रियों की पूजा की 
और लहूलुहान कर दिया
हमने नदियों की पूजा की 
और ज़हर घोल दिया 
हमने गायों की पूजा की 
और पेट में कचरा उड़ेल दिया
हमने ईश्वर की पूजा की 
उसके क़त्ल के लिए हमने 
नायाब तरीका चुना
हमने एक ईश्वर के 
कई ईश्वर बनाए 
और सब को आपस में लड़ा दिया ।

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दिनेश दधीचि की रचनाएं

बात करती हैं नज़र, होंठ हमारे चुप हैं.
यानि तूफ़ान तो भीतर हैं, किनारे चुप हैं.
उनकी चुप्पी का तो कारण था प्रलोभन कोई
और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं.
बोलना भी है ज़रूरी साँस लेने की तरह
उनको मालूम तो है, फिर भी वो सारे चुप हैं.
भोर की वेला में जंगल में परिंदे लाखों
है कोई खास वजह, सारे के सारे चुप हैं.
जो हुआ, औरों ने औरों से किया, हमको क्या?
इक यही सबको भरम जिसके सहारे चुप हैं.