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कड़वा सच, नेक सुबह व कुण्डलियां – दयालचंद जास्ट

सिर पर ईंटें पीठ पर नवजात शिशु शिखर दुपहरी दो जून रोटी के लिए पसीने से तर-बतर यह मजदूरनी नहीं जानती कि किसे वोट करना है मालिक जहां बटन दबाएगा वोट हो जाएगा हमारे लोकतंत्र का यही है कड़वा सच स्रोत ः देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज- 55

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ये कविताएं – जयपाल

Post Views: 5   ये कविताएं उन हाथों के लिएजो जंजीरों में जकड़े हैंलेकिन प्रतिरोध में उठते हैंउन पैरों के लिएजो महाजन के पास गिरवी हैंलेकिन जुलूस में शामिल हैंउन…

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धर्मेन्द्र कंवारी

धर्मेन्द्र कंवारी की हरियाणवी कविता
मोल की लुगाई
रामफळ गेल या कै मुसीबत आई
किल्ले तीन अर घरां चार भाई
मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै
मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै

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सुरे��ा की कविताएं

बागी लड़कियां
मैं जानती हूं
बहुत सारी बागी लड़कियों की पहचान
यहां तक कि उनके
नाम व पते भी
परन्तु आपको नहीं बताउंगी,
वरना हो सकता है
आप उन्हें ढूंढ निकाले
अपने घर के उस अन्दर वाले कमरे में
जिसकी कोई खिड़की बाहर नहीं खुलती।

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दामिनी यादव की कविताएं माहवारी और बिकी हुई कलम

हरियाणा सृजन उत्सव में 23 फरवरी को राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में दामिनी यादव ने अपनी माहवारी कविता सुनाई। इस तरह की कविताओं को आमतौर पर सुनाने का रिवाज नहीं है, लेकिन दामिनी ने आधी आबादी के अनुभव को जिन संवेदनशील शब्दों में प्रस्तुत किया और जिस गंभीरता से सुनाया था 500 के करीब मौजूद श्रोता अपने साथ इस कविता को लेकर गए. कविता का टेक्सट और दामिनी की ही आवाज में कविता आपके लिएः

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हरभगवान चावला की कविताएं

ये किया हमने
हमने स्त्रियों की पूजा की 
और लहूलुहान कर दिया
हमने नदियों की पूजा की 
और ज़हर घोल दिया 
हमने गायों की पूजा की 
और पेट में कचरा उड़ेल दिया
हमने ईश्वर की पूजा की 
उसके क़त्ल के लिए हमने 
नायाब तरीका चुना
हमने एक ईश्वर के 
कई ईश्वर बनाए 
और सब को आपस में लड़ा दिया ।

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दिनेश दधीचि की रचनाएं

बात करती हैं नज़र, होंठ हमारे चुप हैं.
यानि तूफ़ान तो भीतर हैं, किनारे चुप हैं.
उनकी चुप्पी का तो कारण था प्रलोभन कोई
और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं.
बोलना भी है ज़रूरी साँस लेने की तरह
उनको मालूम तो है, फिर भी वो सारे चुप हैं.
भोर की वेला में जंगल में परिंदे लाखों
है कोई खास वजह, सारे के सारे चुप हैं.
जो हुआ, औरों ने औरों से किया, हमको क्या?
इक यही सबको भरम जिसके सहारे चुप हैं.