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जाण द्यो बस रहाण द्यो हे दबी दबाई बात – पं. लख्मी चंद

पं. लख्मीचंद के पदमावत सांग से एक रागनी. मर्दवाद पर स्त्री की प्रतिक्रिया. ये सृजनात्मक दृष्टि का ही प्रतिफल है कि जब कोई लेखक चाहे वह खुद किसी विचार को…

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देखे मर्द नकारे हों सैं गरज-गरज के प्यारे हों सैं – पं. लख्मीचंद

बात सही है कि लोक कवि लोक बुद्धिमता, प्रवृतियों और बौद्धिक-नैतिक रुझानों का अतिक्रमण नहीं कर पाते। लेकिन लोक प्रचलित मत की सीमाओं का अतिक्रमण करना भी अपवाद नहीं है।इसका उदाहरण है पं. लख्मीचंद  की ये  रागनी जिसमें पौराणिक किस्सों में पुरुषों ने स्त्रियों के प्रति जो अन्याय किया उसे एक जगह रख दिया है और वो भी स्त्री की नजर से.

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कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी – पं. लख्मीचंद

महाभारत में द्रोपदी का एक ऐतिहासिक सवाल किया जो अभी तक अनुत्तरित है।बहुत ही खूब रागनी में पं. लख्मीचंद ने भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक बनावट का स्पष्ट संकेत भी है।

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हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

जब भी मर्द पर संकट आता है तो स्त्री की गोद ही संबल होती है। कितने ही साहित्यकारों ने इस तरह के भाव प्रकट किए हैं। आमतौर पर लख्मीचंद की रागनियों में स्त्री की छवि पुरुष की सफलता में बाधक की ही है, लेकिन यहां एक स्त्री-स्वर में पं. लख्मीचंद की आत्मा की पुकार उठी है और ऐसा वे इसलिए कर सके कि यहां शास्त्र समर्थित रुढियों के बोझ को उतार फेंका जिसे वे अकसर ढोते रहे थे.