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न घर में चैन है उसको न ही गली में है – आबिद आलमी

न घर में चैन है उसको न ही गली में है, मेरे ख़याल से वो शख्स ज़िन्दगी में है। खटक रहा है निगाहों में आसमां कब से इसे उठाके पटक…

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न घर में चैन है उसको न ही गली में है-आबिद आलमी

न घर में चैन है उसको न ही गली में है, मेरे ख़याल से वो शख्स ज़िन्दगी में है। खटक रहा है निगाहों में आसमां कब से इसे उठाके पटक…

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घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक -आबिद आलमी

घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक बनाओगे इन्हें अख़बार की यों सुर्खियाँ कब तक यूँ ही तरसेंगी बाशिंदों की खूनी बस्तियाँ कब तक यूँ ही देखेंगी उनकी राह गूंगी…

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घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक – आबिद आलमी

घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक बनाओगे इन्हें अख़बार की यों सुर्खियाँ कब तक यूँ ही तरसेंगी बाशिंदों की खूनी बस्तियाँ कब तक यूँ ही देखेंगी उनकी राह गूंगी…

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रात का वक़्त है संभल के चलो- आबिद आलमी

ग़ज़ल रात का वक़्त है संभल के चलो ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो रास्ते पर जमी हुई है बर्फ़ अपने पैरों पै आग मल के चलो राह मकतल…

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रात का वक़्त है संभल के चलो-आबिद आलमी

ग़ज़ल रात का वक़्त है संभल के चलो ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो रास्ते पर जमी हुई है बर्फ़ अपने पैरों पै आग मल के चलो राह मकतल…

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जब कहा मैंने कुछ हिसाब तो दे -आबिद आलमी

ग़ज़ल जब कहा मैंने कुछ हिसाब तो दे। क्यों फ़रिश्तों की झुक गई आँखें।। इतने ख़ामोश क्यों हैं शहर के लोग। कुछ तो पूछें, कोई तो बात करें॥ अजनबी शहर…

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जब कहा मैंने कुछ हिसाब तो दे – आबिद आलमी  

ग़ज़ल जब कहा मैंने कुछ हिसाब तो दे। क्यों फ़रिश्तों की झुक गई आँखें।। इतने ख़ामोश क्यों हैं शहर के लोग। कुछ तो पूछें, कोई तो बात करें॥ अजनबी शहर…

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जब तलातुम से हमें मौजें पुकारें आगे – आबिद आलमी

जब तलातुम से हमें मौजें पुकारें आगे। क्यों न हम ख़ुद को ज़रा उबारें आगे।। शहरे हस्ती में तो हम औरों से पीछे थे ही, क़त्लगाहों में भी थीं लम्बी…

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जब तलातुम से हमें मौजें पुकारें आगे -आबिद आलमी

जब तलातुम से हमें मौजें पुकारें आगे। क्यों न हम ख़ुद को ज़रा उबारें आगे।। शहरे हस्ती में तो हम औरों से पीछे थे ही, क़त्लगाहों में भी थीं लम्बी…