गांधी क्या बला है! – चौधरी छोटू राम

अनुवाद-हरि सिंह

बटलर ने अन्य विषयों के अलावा भारतीय राजनीति पर छाई गांधी नामक परिघटना को भी अपने इस किसान-मित्र के माध्यम से जानना चाहा। जवाब में चौधरी छोटू राम ने गांधी के राजनैतिक कद को इन शब्दों में रेखांकित किया: महात्मा गांधी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भारत की मूक जनता की आत्मा की आवाज बन चुके हैं। पर साथ ही वे गांधी के रास्ते के समानान्तर दोहराना नहीं भूले कि किसान-देहाती प्रोग्राम पर आधारित ‘मेरा अपना रास्ता है’।

महात्मा गांधी और उनके कार्य को समझना सरल काम नहीं है। इस पत्र में उनके चरित्र या पूर्ण कार्य का विवरण नहीं समा सकता। समुद्र को कूजे में बंद करने का मैं साहस नहीं जुटा पा सका हूं। मैं केवल उन्हीं बिंदुओं को स्पष्ट करूंगा जो आपने अपने पत्र में उठाए हैं। कई बातों में मेरा महात्मा गांधी से घोर विरोध है। पन्तु उनका व्यक्तित्व मेरे लिए पवित्र है। इसलिए मैं पूरी विनम्रता और आदर के साथ आपके पत्र का उत्तर यहां देता हूं।

आपका दूसरा प्रश्न महात्मा गांधी का व्यापक प्रभाव क्यों? कैसे है? का रहस्य क्या है? आपने इस रहस्य का ठीक अनुमान किया है, यद्यपि आपका अनुमान अधूरा ही है। आप सोचते हैं कि चूंकि आमतौर पर भारतवासी ब्रिटिश सरकार को साधारणतः पसंद नहीं करते, इसलिए महात्मा गांधी ने अपना फार्मूला घड़ा है जिससे यह नापसंदी प्रकट हो सके। परन्तु महात्मा गांधी की लोकप्रियता और प्रभाव के मुख्य कारण हैं उनका संतपना, उनका तीव्र देशप्रेम और उनका ऊंचा उद्देश्य जो उन्होंने अपनाया है यानी अंग्रेज राज को अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते से खत्म करना, न कि घृणा और हिंसा के रास्तों से।

आपने लिखा है कि महात्मा गांधी के आंदोलन का आखिरी नतीजा क्या होगा, यदि यह इसी प्रकार फैलता रहा? मैं आपसे सहमत हूं कि वर्तमान हालात, परिस्थतियों और विरोधाभासों, जटिलताओं और उलझनों के रहते यह रहस्यमय आंदोलन अराजकता तक भारत को पहुंचा देगा। कहीं भी, किसी भी कारण या छोटी-बड़ी अनायास घटना या दुर्घटना से उत्तेजना भड़क सकती है जैसे चैरा-चैरी के कांड में हुआ था और खुद महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन बंद करना पड़ा था। कांग्रेस के नेताओं ने और कार्यकर्ताओं ने इसे गलत समझा था, क्योंकि आम जनता अंग्रेजी राज के खिलाफ उठती जा रही थी। परन्तु महात्मा गांधी ने अपनी अहिंसा को हिंसा में बदलते भांपा। वे हिंसक क्रांति के सिद्धांत विरोधी थे। महात्मा गांधी की तरह मैं भी सियासी गुलामी के खिलाफ हूं। मुझे असहायोग का प्रचार करने और खुद अपनाने में कोई हिंसक हिचक नहीं है यदि भारत की आजादी के लिए वह ठीक जंचे। दिमागी और सिद्धांती रूप में मैं मानता हूं कि प्रत्येक गुलाम कौम का विशेष हालात में विद्रोह (क्रांति) करने का अधिकार है।

ये विशेष हालात हैं। (1) विदेशी सरकार से न्याय मिलने की आशा खत्म हो चुकी हो। (2) राजसत्ता से टक्कर लेने में सफलता नजर आती हो। (3) आजाद होने के बाद हम अंदरूनी अमन और बाहरी आक्रमण से अपनी रक्षा करने की स्थिति में हों। इन तीन हालात को ध्यान में रखकर विदेशी सरकार के खिलाफ विद्रोह करना जनता का मूल अधिकार है। मैंने महात्मा गांधी का गास्पल स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मुझे स्पष्ट दिखाई दिया कि ये तीनों शर्तें मौजूद नहीं थीं। आप कहते हो कि प्रत्येक भारतवासी असहयोगी है। मैं भी असहयोगी हो जाता, यदि मुझे विश्वास हो जाता कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से आजादी मिल सकती थी, परन्तु मैंने महसूस किया और खूब समझा कि केवल संवैधानिक तरीके से हम आजादी की ओर ठीक-ठाक बढ़ सकते हैं, अन्यथा अंग्रेजी राज से असहयोग के नाम पर पंगा लेना अराजकता को न्यौता देना है। घृणा की बाढ़ अंग्रेजी राज को नहीं बहा सकती। अंग्रेज यूं ही अपना राज छोड़कर न लौट जावेंगे। वे व्यापारी हैं, सयाने हैं, अनुभवी हैं, पक्के साम्राज्यवादी हैं। मैं असहयोग आंदोलन की बाढ़ में आंख बंद करके नहीं कूदा। मैंने इसे अराजकता का रास्ता समझा, इसलिए मैंने इसका विरोध किया और कांग्रेस से त्याग पत्र देकर राष्ट्रीय यूनियनिस्ट पार्टी का मियां सर फजले हुसैन से मिलकर गठन किया ताकि हम संवैधानिक तरीके से फिरकापरस्ती, सूदखोरी और गुलामी के खिलाफ सबसे पहले किसानों को लामबंद कर सकें-धंधे के आधार पर हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई एकता गठित कर सकें और फिर किसान के साथ भूमिहीन वर्ग तथा आम जनता को जोड़ सकें। मुझे अंग्रेजों का टोडी घोषित किया गया, लालची बताया, जातिवादी (जाटवादी) कहकर बांस से बांधा गया, परन्तु मैंने अपना किसान रास्ता सोच-समझ कर चुना था। कानी डंडी, भ्रष्टाचार और फिरकापरस्ती के खिलाफ इन्कलाब का नारा दिया था। यह संवैधानिक क्रांति होगी जो सफल होगी। एक न एक दिन हालात पकने पर अंग्रेज को भारत छोड़ना पड़ेगा। भारतवासी अंदरूनी और बाहरी खतरों से रक्षा कर सकेगा। हमारी सेना अराजकता नहीं आने देगी। आजादी के बाद भारत गरीबी की लानत से निकलेगा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांगे्रेस अपने ढंग से आजादी के लिए लड़े, मैं अपने संवैधानिक ढंग से लड़ रहा हूं। पहले मैं पंजाब में और फिर भारत में किसान वर्ग युद्ध करूंगा। फिरकापरस्ती को किसान ही रोक सकता है। महात्मा गांधी सब भारतवासियों को लेकर चलते हैं। सारी दुनिया में अपना अहिंसा और सत्याग्रह का प्रचार करते हैं, परन्तु हालात की मांग है कि भारत में अंग्रेजों के खिलाफ धीरे-धीरे जनमत बनाओ। जो भारत में किसानों से शुरू हो, फिर मजदूर जुड़ें, फिर गरीब जनता। अन्यथा सत्ताधारी, धनतंत्रवादी, जागीरदार, फिरकापरस्त और अन्य भड़काऊ गैर जिम्मेदार तत्व महात्मा गांधी की दाल न गलने देंगे। काश कि महात्मा गांधी किसान को ही लेकर चलें। बाकी अपने-आप जुड़ते चले आवेंगे। अन्यथा खतरे ही खतरे हैं। जनता महात्मा गांधी नहीं बन सकती। अंग्रेज यूं ही नहीं जा सकते। फिरकापरस्त युं ही चुप नहीं बैठ सकते। स्थापित स्वार्थों की जड़ें गहरी हैं। मुंह में राम-राम, बगल में छुरी है। मुझे अपने पर, अपने संवैधानिक रास्ते पर, अपने किसान-देहाती-प्रोग्राम पर पूरा विश्वास है। महात्मा गांधी का अपना रास्ता है, ‘राज’ का अपना स्टैण्ड है। मेरा अपना रास्ता है। क्या इसको आप अजूबा मानेंगे?

शक्तिशाली सरकार सशस्त्र विद्रोह से आसानी से सुलट सकती है। परन्तु असहयोग आंदोलन से सुलटना बहुत कठिन है। यहां गोलियां नहीं बरसाई जा सकतीं। जनरल डायर जलियांवाला बाग में निहत्थी जनता पर अंधाधुंध गोलियां बरसा सकता था, परन्तु निहत्थी करोड़ों जनता पर सेना गोलियां नहीं बरसा सकती। ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ जुलूस के नेता लाला लाजपतराय की छाती पर एस.पी. सांडर्स बंदूक का बट मार सकता था, परन्तु करोड़ों छातियों पर नहीं। कचहरियों में जनता के खिलाफ केस नहीं चल सकता। दुनिया की सहानुभूति सच्चे असहयोगियों के साथ होगी। इसलिए महात्मा गांधी ने यह असहयोग का विशेष हथियार चुना, उनकी एकमात्र भूल मानव स्वभाव को न समझने की रही। विचार शब्द और व्यवहार में अहिंसा का विचार महात्मा गांधी का धर्म है, परन्तु इसे प्राप्त करना अति कठिन है। निस्संदेह यह ऊंचा सिद्धांत है। परन्तु आम जनता फरिश्ता नहीं है। उनको अहिंसा के मार्ग पर अंग्रेजी राज के खिलाफ ले जाना मुझे तो असंभव लगता है।

आपके अनुसार कुछ अंग्रेज महात्मा गांधी को धोखेबाज, कच्चा और चतुर समझते हैं। मुझे यह पढ़कर दुख हुआ। महात्मा गांधी यदि सच्चे ईमानदार नहीं हैं, तो वे फिर कुछ भी नहीं हैं। यहां भारत में ही अंग्रेज उन्हें पूर्ण, सच्चा ईमानदार व्यक्ति मानते हैं। उन पर संदेह करने वाले वही अंगे्रेज हैं, जो महात्मा गांधी के बेदाग चरित्र को नहीं जानते और मानते हैं कि इस भौतिक संसार में महात्मा कोई नहीं बन सकता। उनका यह संदेह निराधार है। भले ही महात्मा गांधी अकेले ही रहें, परन्तु हैं वे पूरे अहिंसक और सच्चे। उनके चरित्र में कच्चापन बिल्कुल नहीं है।।

अली भाइयो-शौकम अली और मोहम्मद अली के साथ महात्मा गांधी का तालमेल आप ठीक नहीं मानते। इस्लाम के सिद्धांत गांधीवाद से मेल नहीं खाते। आपके अनुसार इस्लाम तो विशेष हालात में हिंसा की इजाजत नहीं देता, परन्तु उसे लागू करने की हिमायत भी करता है। अली भाई कट्टर मुसलमान हैं और पक्के पैन-इस्लामिक हैं। पूरी दुनिया में इस्लाम छा जाए, परंतु आप भूलते हैं कि यह तालमेल इस समझ पर आधारित है कि अली भाई महात्मा गांधी की अहिंसा को वक्ती तौर पर स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि समस्त संसार में इस्लाम पूर्ण आध्यात्मिक (रूहानी) बंधन है। ज्यों ही अली भाई महात्मा गांधी के नेतृत्व को ठुकराते हैं, यह तालमेल अपने आप ही खत्म हो जाएगा।

आप सोचते प्रतीत होते हों कि महात्मा गांधी नाम का भूखा है। यह आपका झूठा भ्रम है। उन्होंने चाैरा-चाैरी दुर्घटना की निंदा की और असहयोग आंदोलन की जंजीर एकदम खींच ली। बारदौली में सक्रिय उग्र असहयोग को स्थगित किया। 1919 में अमृतसर में सुधार माने, और जैतू के लिए जत्थे भेजने बंद करने को कहा। महात्मा गांधी तो सत्य, न्याय और अहिंसा के साथ किसी कीमत पर नाम के लालच में, कोई समझौता नहीं कर सकते। वे सच्चे महात्मा हैं। कोई राजनीतिज्ञ नहीं हैं, न कोई पाखंड है, न कोई दम्भ, न कोई आकांक्षा, न कोई चाल।

आपने महात्मा गांधी की सेना की वफादारी के बारे में टिप्पणी की कि इसमे महात्मा गांधी की अहिंसा कहां गई? जहां तक मुझे याद है महात्मा गांधी ने केवल यही कहा कि यदि निहत्थी जनता पर गोली चलाने का हुक्म हो तो इन्कार कर दें, त्याग पत्र दे दें और एशिया को गुलाम बनाने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य की मदद न करें। यह पैसिव (निष्क्रिय) असहयोग है, यद्यपि यह भी सक्रिय विद्रोह जैसा ही भयानक है, यह फौजी अनुशासन के खिलाफ जाता है, भले ही यह पैसिव असहयोग है। महात्मा गांधी ने सैनिक हिंसा को ठीक नहीं समझा।

जनरल डायर ने गोरे सैनिकों से गोलियां दगवाई थीं। भारतीय सैनिक इन्कार कर सकते थे। जैसे गोरखा सिपाहियों ने निहत्थे खुदाई खिदमतगारों-सरहदी गांधी के स्वयंसेवकों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था। उस समय महात्मा गांधी को गिरफ्तार किया जाना ठीक जंचता था। मगर जब उन्होंने चाैरा-चाैरी हिंसक कांड के बाद खुद असहयोग आंदोलन बंद कर दिया था, अमन फैल गया था, तब उनको गिरफ्तार करना ब्रिटिश नौकरशाही की नाक बचाने जैसा क्रूर व्यवहार था। महात्मा गांधी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भारत की मूक जनता की आत्मा की आवाज बन चुके हैं। वे हिंसक विद्रोही नहीं हैं, अहिंसक नेता हैं। अंग्रेजी सरकार का नैतिक पतन है। उनको गिरफ्तार करना कायरता है।

महात्मा गांधी शासन व प्रशासन की मशीनरी की निंदा करते हैं। वे कला और विज्ञान की कीमत पर रिस्क लेते हैं। गुजरात के संत की इस शासन भत्र्सना को जनता ठीक नहीं मानती है। अराजकता को बुलावा देना महात्मा गांधी को शोभा नहीं देता। चर्खे को स्वराज का चक्र बताना किसी की समझ में नहीं आता। चर्खा एक संवेदनशील नारा है। स्वदेशी आर्थिक हथियार है, मगर इसे आजादी लाने का शस्त्र बताना उचित नहीं जंचता। प्रत्येक भारतवासी चरखा चलाए, ताकि मांचेस्ट्रर लिवरपूल हिल जाएं और करोड़ों बेरोजगार भाइयों को रोजगार मिले। मेरी समझ में यह चर्खा जादू नहीं आता है। गांव में महिलाएं सदियों से चर्खा चलाती आईं-सुरैतिया धूपिया (रात भर-दिन भर), परन्तु कते सूत से अपनी लंगोटी, चद्दर, अंगोछा, बनवाते हैं-यह स्पष्ट उदाहरण है। जब करोड़ों चर्खे चलेंगे तो आर्थिक सहायता मिलेगी, परन्तु इस मशीन के जमाने में चर्खा मुकाबला नहीं कर सकता। गरीब जनता के लिए लाभदायक धंधा नहीं बन सकता। सच पूछो तो यह आर्थिक मजाक है।

सर छोटू राम

सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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