सांप – रत्न कुमार सांभरिया

  • वरिष्ठ साहित्यकार रत्न कुमार सांभरिया कहानी के नामचीन हस्ताक्षर हैं। कहानी सृजन के क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। उनकी कहानियों में ठेठ देसीपन व जमीनी गंध है। इन दिनों सांभरिया ‘सांप’ नामक उपन्यास का लेखन कर रहे हैं, जो घुमंतू जाति सपेरा-कालबेलिया के जीवन लोक, सामाजिक स्तर, शिक्षा, रीति-रिवाज और दुर्दशा पर आधारित है। रत्न कुमार सांभरिया ने उन दलित-वंचित-शोषित लोगों के कष्टमय जीवन को उकेरा है, जो आज भी धरती बिछाते हैं। आकाश ओढ़ते हैं, अपने पसीने से नहा लेते हैं और भूख खाकर सो जाते हैं। ‘सांप’ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 से पूर्व प्रारंभ होता है। यहां पर प्रस्तुत है उपन्यास का एक अंश-सम्पादक

सांप पकड़वाने की धड़क, अवचेतन में गाड़ी चलाते लाये थे, सेठजी। गाड़ी ने प्लाट के सामने एक गड्ढे में धचका खाया। वे खुद में लौटे और सावचेत हो गये थे।
भाई सरूपानाथ की दर्दनाक मौत की व्यथा, गाड़ी में बैठे चले आये लखीनाथ को चेत हुआ। वह संभला। जांघ पर धरी टोकरी संभाली।
दोनों का मुकाम एक था और वे मुकाम पर पहुँच गये थे। दोनों की आंखें एक साथ उधर गईं। नींव के बिल में घुसे नाग को देखने वालों का बड़ा भीड़-भड़ाका था। नींव के गिर्द ठ_ जुड़ा था।
सेठजी गाड़ी से उतरे, आंखों पर चश्मा चढ़ाये, धोती के छोर अंगुलियों की चिकौटी से उठाये।
लखीनाथ गाड़ी से उतरा, अपनी टोकरी लिये, बांहें संगवाये।
चिहुंकें हुईं-”आ गया। सपेरा आ गया। सांप पकड़ेगा। सांप पकड़ेगा। टोकरी साथ है, ले जाएगा बंद करके।’’
चिहुंकें लखीनाथ सपेरा के कानों में पड़ीं। चिहुंकें सेठ मुकुंददास के कर्णपटों से टकराईं।
चिहुंकें फिर गूंजी-”सपेरा आ गया। सांप पकड़ेगा।’’
”कैसे पकड़ेगा? गहरी खुदी है, नींव। नींव की बिल में है, सांप। पूंछड़ी कटी है, सांप की। फण काढ़े मधुमक्खी के छत्ते सा। छोह भरी दोहरी जीभ लपलपाती है, मौत सी। सांप डरावना है। खूंखार हुआ है। दिल दहलता है।’’ आवाजें थीं।
फिक्रज़दा मिलनदेवी सांस भूली थी। उसने कपड़ा बंधी टोकरी बगल में दबाये आता सपेरा देखा। उसकी सांसें संबल पाने लगी थीं। रुमाल से आंसू पोंछ लिये थे, सुबकियां सहज होने लगीं थी,सुबकन पर प्रसन्नता उभर आई थी।
सेठजी और लखीनाथ तमाशबीनों को छितराते-बितराते नींव के निकट पहुंचे। सेठजी का तो देखा भाला था, सब। चिंता सबब थी बस।
ठेकेदार सरिया थामे खड़ा था। हलवाई के हाथों में झर था। सपेरे को देख, दोनों के फिक्र का ग्राफ गिरा।
पंडितजी भी वहीं उपस्थित थे। उनके हाथ में नाग-नागिन का जोड़ा था। वह जोड़े को वैसे ही पकड़े थे, जैसे पहले पकड़े थे। उनके हाथों अब भी कंपकपाहट थी, जैसे पहले थी। उनके दिल में अब भी धड़क थी, जैसे पहले थी। विश्वास और अविश्वास की ऊहा के बीच कहीं थीं, उनकी सांसें।
लखीनाथ नींव के किनारे बैठ गया था। आंखें केन्द्र बिन्दु पर थीं, जहां सांप का फण था। उसकी निगाह छिटकी और सांप की कटी पूंछड़ी पर ठिठक गई थी। पूंछड़ी पर चींटी दल टूटा था घिरे घन सा।
वह कनपटी पर उंगली रखे उस जुगत को साधता रहा, सांप पकड़ आये। उस सकत (सूफ) को बूझता रहा, सांप काबू आये। कानिपानाथ को याद कर दोनों के कुण्डल छूकर झोपड़ी के बाहर चौतरी पर रूपे नाग देवताओं का स्मरण करता रहा, फूल, बताशे प्रसाद की मनौतियां मन-मन मानता रहा। सांप पकड़ा जाये।
‘आज आया ऊंट पहाड़ के नीचे’ वाली कहावत उसे रह-रह कर याद आई। उसने छान-छप्पर की आती-बाती, घरों के ओने-कोने, फैक्ट्रियों के पाइपों में भड़े (घुसे), बिल-बांबी में सुस्ताते सांप पकड़े थे। आज का खौ$फ उसे दिन में तारे दिखाई देने लगे थे। यहां वह चुनौती नहीं थी, जिसे वह खेल समझता आया था, अपितु जान पर खेलने जैसा शहीदाना कदम था। अभिनेता के द्वारा पर्दे पर रबड़ का सांप पकड़ कर विजयोल्लास की दर्शक-तृप्ति भी यहां नहीं थी, नींव में घुसे बैठे पूंछ कटे विकराल रूप नाग को पकड़ कर टोकरी में बंद करने जैसा साहसिक दमखम दिखाना है।
नींव के बाहर फैली मिट्टी पर चिंतातुर बैठा लखीनाथ हथेली पर चबुक टिकाये था।
पंडितजी ने सेठजी की ओर इस नजऱ निहारा, सपेरा निरा है। बेजा लाये। खामखाह वक्त बीता। मुहूर्त टलवा दो, दस पांच दिन। कीड़ा-कांटा एक जगह नहीं टिकता, सांप सरक जायेगा कहीं।
पंडित जी की तंज करती आंखें देख कर उन्होंने लखीनाथ की ओर अनुरोध और आदेश मिश्रित निहा भरी।
लखीनाथ की सूझ, असूझ रही। कई दफा ऐसे अवसर सामने होते हैं, तब समझदार की समझ भी भोथा हो जाया करती है। मेधा पर ज़ोर दे कर हल खोजा जाता है।
उसकी आंखें उधर घूमीं और गर्दन ने झटका खाया। मानो करंट दौड़ा हो शरीर की शिराओं में। करंट! रोम-रोम चुनौती की स्वीकरोक्ति का संचार था।
वह सपेरा है। पटेबाज है। आसपास की सपेरा कालबेलिया, घुमक्कड़, खानाबदोश बस्तियों में उसका काम-धाम है। नाम है। अग्रज सरूपानाथ की तरह। सपेरा ने सांप से घबरा कर मुंह मोड़ लिया, वह सपेरा नहीं, कुजात हुआ। उसने सांस खींच कर सांस छोड़ी-”मां को दुनिया में सबसे असल माना गया है। मां सपेरन का जाया-जना है, लखीनाथ।’’
उसने हथेली पर हथेली थपकी। उठा। अंगड़ाई ली। लखी! करो या मरो।
टैण्ट वाले के पड़े पाइपों पर उसकी नजऱ थी। आठ-आठ फीट लंबे लोहे के दो पाइपों को उसने उठा लिया था। पाइप, संबल-सहारा। नींव में उतर सांप को पकड़कर बाहर आने का एक सेतु। उसने दोनों पाइप नींव के साथ खड़े किये और नीचे उतर गया था।
लखीनाथ नींव में खड़ा था। नाग बिल में अड़ा था। दोनों के तोर-गौर एक हुए। सांप का सिमटा फण लहराया। उसके भीतर क्रोध और कराह जाग उठे थे। लखीनाथ ने आंखें गड़ायीं। सिफ्त सूझी।
सरिया हाथ में लिए खड़ा ठेकेदार पैनी निगाह उधर ही देखे जाता था। लखीनाथ ने उसकी ओर हाथ बढ़ाये-”सरिया दो।’’
धर्म-दीन के धनी सेठजी ने उसे टोका-”नहीं, लखीनाथ नहीं, सांप मारना नहीं है। पकडऩा है, जिंदा। मेहनताना ड्योढ़ा लो, भले।’’
लखीनाथ ने सहजता से कहा-”सेठजी नाग म्हारो देवता होवै। इको दियो हम खावां। ना मैं मारूं। ना मैं छेडूं। माटी हटा-हटा, खुरच-खुरच जगहा बनाऊंगो। हाथ खोंस फण पकड़ सकूं।’’
ठेकेदार से सरिया लेकर लखीनाथ ने कानों के कुण्डल छुए। आराध्य कानिपानाथ को सुमरा। उसने नाग के फण के थोड़ी दूर अंदर की ओर से मिट्टी झाडऩी ली, सरिया से।
स्पंदन हुआ। सांप में अदावत अरड़ाई। फण काढ़ा और दोहरी जीभ लपलपाई। वह बिल में फंसा था। खूब कसमसा कर भी असहाय था। अगर निकल पाता…..।
लखीनाथ बिल के साथ-साथ इस तरकीब मिट्टी झाड़ता खुरचता, छीलता गया, सांप स्वयं ना निकल पाये। वह सांप को फण से पकड़ कर पाइपों पर पैर रखता ऊपर जाये, सांप खिंचा आये। रति-मासा चूक हुई, भाई सरूपा की भांति काल के मुंह में जाएगा। रमती फिर रांड हो जाएगी। सपरानाथ सरीखे मंडराएंगे।
उसकी आंखों ने कूत की। ज़ेहन सधा। यक़ीन पगा। बिल के साथ-साथ सांप के पास-पास मिट्टी खुरच गई है और सांप का फंसापन कम हुआ है। उसकी देह हिले मिट्टी हिलती है। नेक (तनिक) बेर हुई, सांप बिल से बाहर हुआ।
लखीनाथ ने सरिया ऊपर फेंक दिया था, नाग के लहराते फण के निकट उसकी अनुभवी अंगुलियां मिट्टी में खुंसती गईं। उसने सांप के फण को तर्जनी तथा अंगूठे की दाब से दबाया अनामिका तथा कानी अंगुली से भींचते दबाव बनाया। मौत का टेंटुआ पकड़ा हो। उसने कितने ही सांप पकड़े थे। उन सांपों जैसा सहमापन, दुबक और कातर यहां नहीं थी। अकड़ थी, प्रतिशोध भरी।
वह पाइपों पर पैर जमाता ऊपर आने लगा। सांप अटके रस्से की भांति खिंचता आया था, उसके हाथों। एकाएक एक पाइप डिगा और लखीनाथ का पैर फिसल गया। वह फिर नींव में था।
सांप का फण उसकी मु_ी में था। नाग और बाघ बड़े घाघ हुआ करते हैं। सहज काबू नहीं आते। छटपटाहट के साथ सांप ने बलें खाईं। क्रोध से उन्मत नाग लखीनाथ के बदन से लिपट गया था। इधर नाग लखीनाथ के तन को कसता जाता था, उधर लखीनाथ के पास प्राण-पण का एकमात्र उपाय सांप को जकड़े रखना था।
मौत और जिंदगी! सैनिक शत्रु को धराशायी कर स्वयं को सुरक्षित पाता है। कौन धराशायी होगा, कौन सुरक्षित रहेगा!
करतबबाज मौत के कुआं में आइटम दिखाया करता है। वह उसके दैनंदिन शो की पार्ट अदायगी होती है। सीना सवानी नींव में खड़ा सर्पलिपटा लखीनाथ, शिवजी की मूर्ति सा लखीनाथ कोई खेल-तमाशा या जादुई इल्म नहीं दिखा रहा था। अपनी जुबान और सपेरा कर्म के धर्म अपनी जान सांसत में डाले था।
वहां खड़े लोगों का ठट्ठ का ठट्ठ हक्का-बक्का था। किसी का मुंह खुला था। किसी के होंठों तले अंगुली दबी थी। कितने हाथ जुड़े थे। कितने ओष्ठ अपने इष्ट के मंत्र बुदबुदा रहे थे। कोई अपना जंतर (ताबीज) पकड़े था। सेठजी, पंडितजी, ठेकेदार सकते में थे। मुहूर्त टल जाता। सांप इधर-उधर हो जाता। सपेरा मरा। हम बंधे।
अपने पति सेठ मुकुंद दास की मना करती निगाह को नजऱअंदाज कर मिलन देवी नींव के किनारे आ खड़ी हुई थी। उसने नाग लिपटे महादेव के चित्र देखे थे। मूर्तियां देखी थीं। सपेरे के बदन पर एक ज़हरीले नाग को लिपटा देख वह सदमा गई थी। गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगे उसके ललवई होंठ ना खुल पा रहे थे, ना बंद हो पा रहे थे। अद्र्ध खुले थे। आंखें फटीं-फटीं थीं, प्रतिमा हो। जंगल की झाडिय़ों में फंसी वीरान हिरणी की भांति दुश्ंिचताओं से घिरी, चौकड़ी भूली थी।
एकाएक लखीनाथ ने किसी कलाबाज की भांति दोनों पाइपों पर एक पैर जमाया और पछाड़ सी खाता बाहर आ गिरा था। उसने नाग को वैसे ही जकड़ा था, जैसे नाग ने उसका गात कसा था। ताकतें तुली थीं, दो थोक। वह उठ खड़ा हुआ था। संकट की घड़ी कमजोर टूट जाता है। कठोर मजबूती पाता है।
औसान भूले तमाशबीन दूर-दूर जा छिटके थेे। भय देख भेड़ें भाग खड़ी होती हैं।
लखीनाथ ने सांप को अब दोनों हाथों से जकड़ लिया था। जितना जोर लखीनाथ में था, उसकी मुट्ठियों में समाया था। इतना दम तो कालिया नाग को काबू करते श्रीकृश्ण ने भी नहीं लगाया होगा। जितना जोर नाग में था, लखीनाथ को कसने में लगाया था। इतना दमखम तो कालिया नाग ने कृष्ण जी को भींचते नहीं लगाया होगा।
सपेरे लखीनाथ के सामने सांप उन्नीस निकला। हिम्मत जवाब दे गई थी, उसकी। सपेरा के मतबूत हाथों भिंचता नाग कसाव छोड़ता निश्तेज हुआ, लटक गया था। सहेजने की सूखी फली लटकी हो, डाल से। कलांत।
आवाज़ें गूंजीं-”वाह! वाह! शाबाश! शाबाश! खूब। बहुत खूब।’’ तालियां पिटीं। जयकारे उठे।
अंबर ने सराहा। अवनि ने पीठ थपथपाई। साहसिक करिश्मा। अतुल्य।
टोकरी रखी थी, कपड़ा बंधी। उसने सेठजी की ओर गर्दन मार कर इशारा किया-”सेठजी टोकरी धरी है, कपड़ा बध्ंाी। जल्दी खोलो। ढक्कन हटाओ ऊंको। नाग बंद करूंगो।
सेठजी ने ठेकेदार की ओर हुक्मराना आंखों से देखा।
ठेकेदार ने उसी तोर उस मजदूर को तका, जिसे वह लंबू कहता है।
मजदूर ने तत्परता दिखाई। कपड़े की गांठ खोली। टोकरी अलग की। टोकरी का ढक्कन दूर रखा। पूंछड़ी कटे क्रोध भरे नहूष का गुस्सा ठण्डा हो गया था। विवश मन अपना फण समेटता, टोकरी के घेर कुण्डली मारता गया था। लखीनाथ ने टोकरी का ढक्कन बंद किया। उसे कपड़े पर रखा। लपेटा। ऊपर तले दो गांठें मार दी थीं, गोल।
पसीना-पसीना और रेतमरेत लखीनाथ ने अपने माथे का श्रम-स्वेद अंगुलियों से सूता और नीचे छींट दिया था।
उनका मन हुआ था इस अकल्पनीय साहस के लिये सपेरे की कमर थपक दूं। बड़ी जात हाथ छोटी जात कमर की ओर नहीं बढ़ पाये। सेठजी लखीनाथ को पचास रुपये में तय करके लाये थे। सौ रुपये का एक नोट उसकी ओर बढ़ाया-”लखीनाथ यह मेहनताना भी है और इनाम भी है, तुम्हारा।’’
आकुल-व्याकुल हुई मिलन देवी तो मानो अपना संसार पा गई थी। सावन-भादों की झड़ी में खुशी के मारे जैसे मोर नाचता है, हर्षोल्लास की इस घड़ी उसका मन मयूर नाच उठा था। उसने अपने बटुए में खनखनाते चांदी के सिक्कों में से एक सिक्का खींच लिया था। वह सिक्का उसने लखीनाथ की ओर बढ़ाया और गद्गद् कंठ बोली-”सपेरा तेरा इनाम।’’
अहमभरी की इस कठोरता में आत्मीयता मुलायम थी, बादाम में गिरी सी।
लखीनाथ ने मिलन देवी की ओर एक जऱ निहारा। ललाट पर लटकी स्वर्ण-बिंदिया से लेकर पैरों की अंगुलियों में पहने स्वर्ण बिछुए तक सोने से लकदक थी, वह। सोने की गोट-किनारी कढ़ी साड़ी से सजी-धजी थी। मानो किसी देवी की मूर्ति को प्राण-प्रतिष्ठा से पूर्व सजाया-धजाया हो। या हो सोने की खान, जहां से निकल कर आई हो, अभी।
ऐसी खूबसूरत स्त्री लखीनाथ अपनी चौबीस बरस की उम्र में पहली दफा देख रहा था। कुदरत के हाथों फुरसत में गढ़ी नपी-तुली-सुती काया। सारस सी गर्दन। गदराया जोबन। यह सब लखीनाथ के लिये दिवास्वप्न था। वह अपने बचपन में दादी-नानी-मां से परियों और रानियों की सुंदरता के बखान सुना करता था। यह महिला कहीं वही तो नहीं।
मिलन देवी से रू-ब-रू लखीनाथ की आंखों में उसकी छोटी जात का मान था। मिलन के नयनों में उसकी बड़ी जात का कायदा था।
मिलन देवी सिक्के को अंगुलियों की चिकौटी में पकड़े लखीनाथ की ओर हाथ बढ़ाये थी।
लखीनाथ ने गर्दन हिलाकर कहा-”नांह-नांह, सेठानी जी मेहनतानो पा लियो सेठजी से। बात कम की थी, खूब घणो दे दियो उनने। गरीब की तो मिनत बरकत करे।’’
मिलन देवी ने अपनी सुरमई आंखें गोल कीं। एक आंख में अनुनय था, दूसरी में आग्रह। ऐसे द्विभाषी नेत्रों के सम्मुख भला कौन पुरुष नतमस्तक नहीं होता।
लखीनाथ ने मिलन देवी के सिक्के को कुरते की अपनी उस जेब में नहीं रखा, जिसमें सेठजी का नोट रखा था।
वह चांदी के पांच सिक्के लाई थी, पंडितजी के लिये। एक लखीनाथ सपेरे को दे दिया था। सबके सब अवाक देखते रहे थे। सेठजी ने एक बार मिलन देवी की ओर कड़ा देखा, लेकिन आंखें झुका ली थीं। नि:संतान पत्नी पर पति का ज्यादा वश नहीं रहता है।
लखीनाथ का गेरुआ रंग का कुरता रेत और सांप की लपेट से गंदा-संदा हो रहा था। सिर की लटें बिखरी थीं। मिलन देवी ने एक बारगी विचारा, यह सपेरा कोई भाण्ड़-भगतिया नहीं, जोगी-जति है। अपनी साड़ी के पल्लू से इसका रेत झाड़ दूं। अंगुलियों की कंघी से इसकी बिखरी लटें संवार दूं। संकोच से उसकी आंखें नीची हो गई थीं। उसने अपनी पलकों से उसकी रेत छड़क दी थी। मन की अंगुलियों से लटें उसकी संवार दी थीं।वह चुपचाप पंडितजी के आसन के निकट आ बैठी थी, मुहूर्त होगा।
हलवाई भट्टी की ओर बढ़ गया था। पंडितजी अपने आसन आ विराजे थे। ठेकेदार नींव के पत्थर रखवाने को उद्यत था। तमाशबीनों की भीड़ छंट गई थी।
मुहूर्त घड़ी सवाये होती है। आधा घण्टा शेष रहा। लखीनाथ को उसकी झोपड़ी छोडऩा है, सेठजी अपनी गाड़ी के पास आ गये थे। लखीनाथ टोकरी संभाले उनके साथ था। उसने गाड़ी का गेट खोला और आगे की सीट पर बैठ गया था, जैसे बैठा आया था।
वह मजदूर अभी गाड़ी में ही बैठा हुआ था, डरा। सुध-बुध खोया। सेठजी ने उससे कहा-”अरे जिस सांप से तू डरा हुआ है ना और मरा जाता है, बिल्कुल, उसे लखीनाथ ने पकड़ कर अपनी टोकरी में बंद कर लिया है। टोकरी उसकी जांघों पर रखी है। वह गाड़ी में बैठा है, सांप को दूर कहीं जंगल में छोड़ेंगे। अब निश्ंिचत हो कर काम कर जा।’’
मजदूर गाड़ी से नीचे उतर गया था। उसने लखीनाथ को देखा। उसकी जांघों पर रखी टोकरी देखी। ठण्डी आह ली और उधर मुड़ गया था, जहां ठेकेदार खड़ा था।
लखीनाथ को अपनी पास वाली सीट पर सांप की टोकरी जांघों पर रखे बैठा देख, सेठजी के अंतस में हठात धक हुई। यह धक वह नहीं थी, जो नींव की बिल में घुसे नाग को लेकर थी। यह धक सांप के भय की धक भी नहीं थी। सांप टोकरी में बन्द था। टोकरी कपड़े बंधी थी। लखीनाथ अपनी दोनों कुहनियां टोकरी पर रखे बैठा था। यहां हिकारत थी और बड़ी जात का हिंस्र अहम पगुराया था।
गाड़ी की डिक्की खोलते हुए उन्होंने लखीनाथ से कहा-”सपेरा डिक्की खोल दी है, मैंने। टोकरी रख दे उसमें। और पीछे की सीट पर बैठ जा, जहां मजदूर बैठा था।’’
लखीनाथ को सेठजी का व्यवहार खुदगर्ज लगा। सूल सी चुभी।
उसकी मुटिठ्यां कस गई थीं, जैसे सांप का फण पकड़े कसी थीं। उसकी आंखें लाल हो गई थीं, जैसे सांप को पकड़ते हुई थीं। उसने आक्रोश भरे कंठ कहा-”सेठजी आप गाड़ी-वाड़ी रहने दो अपनी। मैं खुद चलो जाऊंगो, अपने पैरों। कोहनी मारे गुड़ ना फूटे।’’
वह गाड़ी से नीचे उतरा। टोकरी बगल में दबा ली और मुट्ठी भींचे बढ़ गया था, जंगल की राह।
वह आंकी-बांकी पगडंडियों से होता हुआ खेतों की ओर आ गया था। कंटीली झाडिय़ों के पास बाम्बी सी दिखने वाली एक जगह,जिसके इर्द-गिर्द बिलें थीं, उसने टोकरी रख दी थी।
लखीनाथ सपेरा की भिंची मुट्ठियां तब खुलीं, जब वह भुजंग को छोडऩे के लिए टोकरी बंधे कपड़े की गांठ खोलने लगा।
सम्पर्क-भाड़ावास हाउस, सी 137, महेश नगर, जयपुर-302015,
मो.: 94604-74465

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