भैत्तर हजार की भोड़िया – नवरत्न पांडे

                भैत्तर हजार की भोड़िया के साथ गांव की साधारण भोड़िया की कहा सुनी हो गयी। बात कहासुनी से शुरू होकर पिलमा पछाड़ी तक पहुँच गयी। एक बुजुर्ग ने दोनों को अलग-अलग कर दिया। फिर दोनों लगी एक दूसरी को कोसने, गालियां देने …. लेकिन गालियां भैत्तर हजार की भोड़िया को भी आती हैं, वह बराबर गालियां दे रही थी। उसकी आवाज पैनी, तीर जैसी …. वह मोटी, कम बोलने वाली साधारण भोड़िया को दबा रही थी। अब साधारण भोड़िया अपना आपा खो रही थी। वह किसी ऐसी बात की तलाश में थी, जो उसकी यानि भैत्तर हजार की भोड़िया की बोलती बंद कर दे। साधारण भोड़िया ने अपनी वृद्धा सास की ओर देखा, जो उसे लड़ाई न करने, ऊंचा न बोलने की औपचारिक सीख दे रही थी। हालांकि, भीतर वे वह भी लड़ाई का मजा ले रही थी। फिर उसने हारती बहु की ओर देखा। वृद्धा के ओंठ बुदबुदाये ….. उस वाक्य में न जाने क्या था कि साधारण भोड़िया की आंखे चमक गई, उसने ढांठा खोल दिया तथा चरचराती, अग्नि शिखा सी भैत्तर हजार की भोड़िया की और हाथ का ठोस्सा दिखाते हुए कहा ”अ रांड तूं बी के बोल्लै, तेरे बाप नै तेरे भैत्तर हजार रपिये लिए थे। तेरे खसम तैं आज तक भी ना उतरे सैं।’‘ साधारण भोड़िया का यह ब्रह्मास्त्र साबित हुआ। अग्नि शिखा जैसे एकदम पानी के सम्पर्क में आ गई हो। उसका विश्वास जैसे डगमगा गया था। उसकी आवाज जैसे हलक में फंस गई थी, हालांकि उसने उसी चरचराटे के साथ बात का उत्तर देने की कोशिश की थी …. उसने कहा था ऐ ….. तेरी जैसी रंडी क्या जाने इन बातन को, मैं तेरी तरह ना हूं, जो मुफ्त में मिल जाऊं, माल के तो पैसे लागैं, हीरे की परख तो …… तभी दर्शकों से कोई बोल पड़ी या पड़ा, ओए-होए ….. माल, सुनकर सैकड़ों आंखे मुस्कराई। भैत्तर हजार की भोड़िया की सास स्थिति की नाजुकी समझ गयी, वह दरवाजे से बाहर निकली, अपनी बहु का हाथ पकड़कर भीतर ले गयी। दर्शकों को बहुत बुरा लगा की ऐसा क्यों हुआ, उन्हें ब्रह्म सहोदर से क्यों वंचित किया गया। वे बतियाते, बतियाती, कुछ देर में अपने-अपने घरों को चले गये। साधारण भोड़िया ने विजयी आंखों से अपनी सास की ओर देखा, वह कृतज्ञ थी अपनी सास के तजुर्बे की, क्योंकि उसकी सास यदि तीर का सिरा उसे न पकड़ाती तो वह भैत्तर हजार की भोड़िया को कभी न हरा पाती।

                बात कुछ भी न थी, मामूली कहासुनी, नाली के पानी को लेकर, कि साधारण भोड़िया ने आपत्ति की कि नाली में मछली के मीट के टुकड़े, छिली हुई मछली के पंख और धोयी गयी मछली का लाल पानी सब आकर गली में एक जगह एकत्रित हो गया है। इस मोहल्ले में ओर कोई घर मीट मछली को हाथ भी नहीं लगाता। पिछले साल बज्जे का छोहरा सत्तल बहतर हजार देकर दिशावर से लुगाई ले आया। कोई चार पांच महीने तो ठीक रहा लेकिन तीन चार महीने से यहां रोज मछली पकती हैं। जली हुई मछली की गंध पूरे मोहल्ले में फैल जाती है। साथ ही औरतें पंडित मातादीन को भी खूब कोसती है। क्योंकि इस बहतर हजार वाली शादी में वही बिचौलिया था। हालांकि मातादीन के भाव आजकल गांव में काफी उफान पर हैं। क्योंकि गांव के अनेक नौजवान पंडित जी से गुपचुप मिलते हैं। पंडित जी सबको एक ही बात कहते हैं, भइया रुपयों का बंदोबस्त हो जाए तो बात करना …. भोड़िया, पेड़ पर नहीं लगती कि तोड़ कर दे दूँ।’‘ और बकायदा कई लड़कों ने काम धंधा शुरू कर भी दिया कि साल दो साल में पैसे इकट्ठे हो गये तो शायद कहीं सूत बैठ जाए। वैसे बाज्जे को बहु कैसे मिली, उसे बिल्कुल नहीं पता। वह तो बेचारा भगत आदमी है। चौमासे में डांगर चरा लेता है, एकाध काटड़ी पालकर बेच देता है। वह तो क्या बेच देता है? यह सब उसकी पत्नी चंभोचाल़ी करती है। चंभोचाल़ी, हां इसी नाम से उसकी ख्याति है। जब वह आई तो बाज्जे बक जवान था, खेत में पानी देता था, सर्दियों में गाजर, मूली बो लेता था, मां-बाप बिचारे के जीवित थे, काम ठीक था। चंभोचाळी को जैसे इसी बात की दिक्कत हुई कि सब खाते हैं बाज्जे अकेला खेत कमाता है। वह बाज्जे को लेकर अलग हो गयी। अब आधे किल्ले से भी कम जमीन बांटे आयी तो उसमें होणी जाणी तो कुछ थी नहीं, क्योंकि कुल जमीन के हिस्से बने ग्यारह, यानि पांच भाई बाज्जे समेत और चार बहन, एक मां, एक बाप ….. अब आधा एकड़ से भी कम जमीन में होणा क्या था सूत्थन? वैसे बाज्जे का ताऊ बाज्जे के बारे में सही कहता था …. बेटा, बाज्जे ब्याह मत  करवाइए, नहीं तो तेरी घरआळी तेरा चतिया खींचैगी। तेरा अर मेरा तो मुँह ए कोनी ब्याह करवाण का।’‘ बूढ़ा शायद ठीक कहता था…..। बाज्जे ….. को सिर्फ खेत में काम करना आता था और कुछ भी नहीं आता था उसे। शायद यही कारण था कि चंभोचाल़ी अलग होना चाहती थी। हालांकि बाज्जे को ताऊ ने आश्वासन दिया था कि कोई बात नहीं वह बाज्जे को अपनी आधी प्यलसण भी दे देगा। लेकिन ताऊ को चंभोचाळी का चाल चलन ठीक नहीं लगा। बाज्जे को यह बात तब पता चली जब वह सर्दियों की एक रात खेत से लौटा था। जब वह लालटेन के चांदणे से दरवाजा पार कर रहा था तो एक माणस की परछाई उसके पास से निकल गयी। उसे पहली बार ताऊ की बात याद आयी। उस दिन वह ताऊ की छतरी (समाधि) पर जाकर खूब रोया था। फिर बाज्जे कभी घर नहीं आया। गतवाड़ में उसकी चारपाई चली गई, डांगर ढोर पालना, चराना और सर्दियों में वह चेजां देख लेता कोई। उसे दो सौ रुपये, बीड़ी का बंडल और दो चाय मिलती। चंभोचाल़ी ने तीन लड़के जाम्मे ….. यह आज तक नहीं पता तीनों में से कौन किसका है ….. कोई कहता है एक माड़ू का है, दूसरा प्रताब का तीसरा सूधन का आदि – मतलब जब तक छोहरे स्याणे नहीं होये, उसने किसी को मना नहीं किया। बताने वाले तो यहां तक बताते हैं कि चंभोचाल़ी को पता चल जाता है कि उसके पेट में लड़की है, तो फौरन दादी पतौरी गाजर का बीज लेकर हाजिर हो जाती है ….. और दो तीन दिन में संगवा देती है …. फिर चंभोचाळी ने दादा मातादीन को न जाने कैसे? पटा लिया ….. इस गांव में बहत्तर हजार रुपये तो बहोत लोगों के पास हैं मगर दादा मातादीन बिचौलिया न हो तो भोड़िया कहां से आए?

                वैसे आज तक किसी को नहीं पता कि दादा मातादीन आखिर कहां सैटिंग करता है? भैत्तर हजार का हिसाब बकौल मातादीन, साठ हजार लड़की का बाप, इक्यावन सौ रुपये अगला बिचौलिया, इक्यावन सौ रुपये मातादीन के और अठारह सौ रुपये किराया भाड़ा कुल मिलाकर बहत्तर हजार ….. ये रेट इसी साल के हैं, हो सकता है अगले साल ….. सौ राजा की प्रजा!

                भैत्तर हजार की भोड़िया के साथ जब देखो तब कोई न कोई पंगा हो ही जाता है। अभी उन बातों को तीन महीने भी नहीं हुए हैं जब उसने यह कह दिया था कि उसे रोटी, सब्जी, चूरमा, घी, दही, काचरी की चटणी बिल्कुल पसंद नहीं है खाने में। उनके घर में तो सूखी मछली का अचार और सेल्हा चावल चाव से खाया जाता है। तब सत्तल का भाई जस्सल गांव के जोहड़ से या नहर से या धानों के पानी में से एकाध बड़ी मछली लको (छिपा) लाता है। वह खुश हो जाती है। हफ्ते में दो बार भी मछली आ जाने से उसकी हूँस मिट जाती है। अभी पिछले महीने तिलकुटी का बरत था, तो औरतों ने नलके पर साफ कह दिया कि भैत्तर हजार की भोड़िया का बासण नहीं भरा जा सकता। क्योंकि वह तौरी खाती है और उसके कपड़ों में तौरी जैसी आती है। तो भैत्तर हजार की भोड़िया को बहुत बुरा लगा ….. वह गाल धूप्पड़ हुई लेकिन जस्सल ने उसी दिन एक काली पाईप नलके से लेकर घर तक दबा दी और मोटर भी लगा दी। अब भैत्तर हजार की भोड़िया को पानी लाने के लिए तथा बासण ठुआणे के लिए किसी के मुँह की तरफ नहीं देखना पड़ता।

                लेकिन परसों एक और नयी कहाणी हो गयी। भैत्तर हजार की भोड़िया अन्दर कोठे में थी ….. और जस्सल अंदर कोठे में से निकल रहा था। तभी अचानक सत्तल और सबसे छोटा फत्तल आ गये। उस वक्त तो सत्तल कुछ नहीं बोला – लेकिन श्याम को सुत्तेगाम तीनों भाईयों में झगड़ा हुआ। तीनों ने दारु पी रखी थी। सत्तल ने पहले तो भोड़िया की खाल तारी। फिर चला जस्सल की ओर …..। जस्सल भी जवान खून था, साफ-साफ कह दिया ….. सोचकर हाथ उठाना। और बहत्तर हजार तेरे अकेले के नहीं थे – तीनों ने मजदूरी करके जमा किये….. थे। सत्तल ने भी आवेश में कह दिया कि मजदूरी तो बाबू नै बी….. ? फिर वह चुप खींच गया। चंभोचाल़ी अब बूढ़ी हो गयी है। उसकी कोई नहीं सुनता…..। असल में पंडित मातादीन ने जब आश्वासन दिया था तो तीनों भाई जमींदार का ट्रैक्टर भरने का काम करने लगे थे। वे सुबह जाते, सारा दिन माटी के साथ माटी होकर लगे रहते ….. शाम को हजार का एक नोट लेकर घर आते …… लेकिन चंभोचाळी समझाती …. ”काम करना बुरी बात नहीं है ….. लेकिन खाने में कंजूसी करना शरीर के लिए ठीक नहीं। वह तीनों को तीन पाव पक्का घी खिला देती। तीनों सौ रहते। फिर भी पांच सौ बच जाते। दवाई, पानी, हारी, बिमारी के बाद, करीब छ: महीने बाद एक दिन पंडित जी को बुलाया गया….. बातचीत के बाद पंडित जी बाहर आये तो आंखों में चमक थी। चंभोचाळी की आंखें, मातादीन की आंखे, सत्तल की आंखें, जस्सल की आंखे, फत्तल की आंखे …… चंभोचाळी की आंखों में शायद सबसे ज्यादा चमक, क्योंकि उसके सगे जेठ यानी बाज्जे के बड़े भाई ने अपना अनपढ़ लड़का किसी तरह ब्याह लिया था और उन्हें यहां तक कि बाज्जे को भी याद नहीं किया था। और यही नहीं ठीक नौ महीने बाद जब सामने जेठ के घर थाली बजी तो चंभोचाळी की छाती पर सांप लौट गया। उसे दादी पतौरी  की एक-एक बात याद आती जब वह गाजर के बीज का काढ़ा बना रही होती तो दादी कहती – ”एकाध छोहरी राख बी ले, देख छोहरी आंगण की शोभा हो सै। आर छोहरी कै बदले, कोए छोहरी दे बी देगा।’‘ लेकिन वह देखते देखते पूरा लौटा काढ़ा पी जाती और लेट जाती। यह सही है कि आज गांव में सगाई कोई मजाक नहीं है। पता नहीं सगाई आले कहां चले गये, कहां मर गयी, सारे देश की छोहरी, के राम लेग्या उन्नै। चंभोचाळी को भी इस बात का पता है कि उसके जेठ ने भी बदला किया है यानी जिसने जेठ के बेटे को बेटी दी है, उसी बेटी वाले की रिश्तेदारी में जेठ ने अपनी बेटी दी है। तभी तो उस रिश्तेदार ने अपनी बेटी उनको दी है, जिन्होंने अपनी बेटी जेठ के बेटे को दी है….. मतलब …..? मामला थोड़ा पेचीदा है…..। लेकिन ‘वायस-वरसा’ से शायद समझ में आ जाए। चंभोचाळी की जेठानी ने तो यहां तक कहा बताया कि ये भी कोई भोड़िया हुई …. ”ना खानपान मिलता, ना बोल्ली मिलती, ना पहरान मिलता, ना शक्ल सूरत ….., के सिर म्ह मारै इसी भोड़िया।’‘ उस दिन चंभोचाळी भीतर तक जैसे अंगार खा गयी थी।

                सत्तल ने बहु पर हाथ उठाया तो वह दौड़कर भीतर गयी थी, उसे बहु के चलने, उठने बैठने से शायद कुछ अंदेशा हुआ था फिर उसका बहम हो सकता है। भोड़िया की चाल देखकर उसने बाबा का रोट बोल दिया था। दोनों हाथ पच्छम दिशा की ओर उठाकर उसने कहा था ‘हे बाबा! तू सुणता है सबकी, पोता का मुँह दिखादे ….. फिर उसने अपने ही कहे शब्द वापस ले लिए थे। उसने वाक्य में तरमीम कर दी थी। … चहे बाबा पोती ए क्यूं ना हो, नामनां चाल ज्यागी।’‘

                वैसे रोट उसने उस दिन भी बोल दिया था, जब पंडित मातादीन ने पैसे ले लिए थे और सत्तल को साथ लेकर उसने आश्वासन दिया था कि एक सप्ताह के भीतर-भीतर भोड़िया ल्या द्यूंगा। उसका मन पकड़ा गया था उस दिन। उसने ऐतिहात के तौर पर प्रताब को भेजा था। क्योंकि बाज्जे भगत तो चंभोचाळी के लिए ना बराबर ही था। लेकिन आठ दिन बाद भी पं मातादीन, सत्तल व प्रताब का कोए बेरा बाड़ी नहीं आया था। वह परेशान हो गयी थी। आखिर ग्यारहवें दिन गली में ‘झरण-झरण’ हुई। लोग सुनकर अवाक रह गये थे। लुगाई-पताई बज्जे के घर की ओर दौड़ पड़ी थी …..। बोहडिय़ा देखने के लिए। पंडित मातादीन के चंभोचाल़ी ने पांव धोये। पंडित जी बड़े गर्व के साथ बता रहे थे कि लड़की के मामा ने बीच म्हैं पंगा डाल दिया था। कहै था कि छोहरा का काम धंधा देखूंगा। ज्यातैं तीन दिन लेट होग्या मामला। नहीं तो आठवें दिन आ लेते। ज्यब लोगों ने पूच्छया पंडित जी भोड़िया कित की (कहां की) सै, तो पंडित जी ने बात टाल दी थी। ठिकाणा की ए सै। न्यूं कहया करैं – गाय न्याणा की, अर बहु ठिकाणा की’‘। लेकिन चंभोचाल़ी को इससे क्या कि भोड़िया कहां की है? उसका तो घर खुल्ला रह ज्यागा। वह अब चैन से मर सकेगी।

                बड़े बूढ़े ठीक कहते हैं – ”बिन घरणी घर भूत का डेरा’‘, चंभोचाळी बीमार, खटिया में पड़ी रहती तो घर-घर जैसा लगता नहीं था। टूटी खाट, पाटे गूदड़, गाभे, कोई चीज अपणी जगह पर नहीं ……. न्यू समझो घर का टिब्बा उठर्या था। भैत्तर हजार की भोड़िया ने आते ही एक गाडी कूड़ा करकट निकाला। वह चौका बर्तन सफाई करती। अपनी सास को नहला देती। उसके ढेरे काढ़ती। बाज्जे की चांदी हो गयी थी। वह ज्यब प्यार से उसे बाबू जी कहती तो बाज्जे की आंख भर आती। वह आसमान की और मुंह उठाकर मन ही मन कहता ”तू सबकी सुणता है।’‘ बाज्जे को धुले हुए लत्ते मिलते, खाना समय पर मिलता। सत्तल, जस्सल और फत्तल में भी काफी बदलाव था। भोड़िया उन्हें दोनों समय नहाने के लिए कहती। वे टालते….., वह रसोई में खाना बंद कर कहती ”इसनान करो, नहीं तो खाना ना देऊं।’‘ और वे फटाफट नहा लेते। दारु भी वे अब खुलेआम नहीं पीते थे, एकाध दफा, वार-त्यौहार, लुक-छिपकर घूंट मार लेते। कहने का मतलब एक औरत ने घर की काया ही पलट दी थी। चंभोचाळी बीच में ठीक ठाक हो गयी थी। ऐबण औरत का शरीर बुढ़ापा म्है दुख पावै।’‘ फिर भी चंभोचाळी हांड फिर लेती थी। लेकिन दो दिन पहले उसे जब पता चला तो वह हार गयी। पहले से ज्यादा हार गयी। उसने दादी पतौरी को बुलाया था कि भोड़िया को देख, कोई आस…. दादी ने साफ कह दिया था – तौरी खा खा पाच्छा फूल रहा सै। इसकै कोए भूंड बी कर दे तो गाम छोड़ द्यूंगी। चंभोचाळी को पूरा भरोसा था कि उसका भरोसा टूट गया। वह मरती पड़ती भोड़िया को शहर ले गयी, बड़ी डाक्टरणी के पास। डाक्टरणी ने कहा भोड़िया मां  नहीं बण सकती। इसको तो पहले ही एक ऑप्रेशन में गड़बड़ हुई थी। वह गड़बड़ क्या थी वह आज तक किसी को पता नहीं चल सका। पता सिर्फ इतना तो चला है कि चंभोचाळी सुरग सिधारगी। बाज्जे भगत के दोनों छोटे लड़के जस्सल और फत्तल दिन रात ट्रैक्टर भरने का काम करते हैं। जस्सल काम पर से आता है, खाना खाकर दादा मातादीन को ढूंढ़ता है। वे आपस में क्या बात करते हैं, इसका पूरे गांव को पता है।

सम्पर्क-9896224471

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