जागरूकता से ही रोकी जा सकती है एड्स की महामारी – अरुण कुमार कैहरबा

दुनिया में एचआईवी/एड्स एक महामारी का रूप लेता जा रहा है। इस जानलेवा विषाणु के बारे में जागरूकता की कमी भारत सहित विकासशील देशों की सबसे बड़ी विडंबना है। आज भी एचआईवी संक्रमित या एड्स पीडि़त व्यक्तियों के साथ भयानक भेदभाव होता है। यह भेदभाव अनपढ़ लोगों द्वारा ही नहीं होता, बल्कि चिकित्सा के पेशेधारी लोगों के द्वारा भी इस प्रकार का भेदभाव देखने को मिलता है।
एचआईवी और एड्स दोनों शब्द एक साथ बोले जाते हैं। बहुत से लोगों को इसमें अंतर समझ में नहीं आता है। इनके बारे में भ्रम बहुत ज्यादा हैं। एचआईवी मतलब ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस एक ऐसा विषाणु है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है। इस वायरस की चपेट में आने के बाद यदि समय पर इसकी पहचान हो जाए तो चिकित्सकों के मार्गदर्शन और उपचार से बेहतर जीवन जिया जा सकता है। लेकिन यदि एचआईवी की समय पर पहचान ना हो तो यह एड्स मतलब एक्वायरड इम्यूनो डेफिसियेंसी सिंड्रोम में रूपांतरित हो सकता है। एड्स का कोई उपचार नहीं है। एड्स होने के बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह से क्षीण हो जाती है और कोई भी बिमारी होने पर वही मृत्यु का कारण बन सकती है। इस तरह एक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति जरूरी नहीं वह एड्स से भी पीडि़त हो।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज तक सात करोड़ से अधिक लोग एचआईवी से संक्रमित हो चुके हैं। करीब तीन करोड़ पचास लाख लोग एड्स के कारण मौत के मुंह में चले गए हैं। करीब चार करोड़ लोग पूरे विश्व में एचआईवी से पीडि़त हैं। भारत पूरे विश्व में एचआईवी पीडि़तों की आबादी के मामले तीसरे स्थान पर है।
ह्यूमन इम्यूनोडेफिसिएंसी वायरस की खोज के लिए चिकित्सा वैज्ञानिकों ने काफी संघर्ष किया है। 1983 में फ्रांस के लुक मॉन्टेगनियर और फ्रांसोआ सिनूसी ने एलएवी वायरस की खोज की। इसके एक साल बाद अमेरिका के रॉबर्ट गैलो ने एचटीएलवी 3 वायरस की पहचान की। 1985 में पता चला कि ये दोनों एक ही वायरस हैं। 1985 में मॉन्टेगनियर और सिनूसी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1986 में पहली बार इस वायरस को एचआईवी यानी ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस का नाम मिला। लोगों को एड्स के प्रति जागरूक करने के मकसद से 1988 से हर वर्ष एक दिसम्बर को विश्व एड्स मनाया जाता है। 1991 में पहली बार लाल रिबन को एड्स का निशान बनाया गया। इस निशान को एड्स पीडि़त लोगों के खिलाफ दशकों से चले आ रहे भेदभाव को खत्म करने की एक कोशिश के रूप में देखा जाता है। भारत में एचआईवी का पहला मामला 1996 में दर्ज किया गया था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज तक सात करोड़ से अधिक लोग एचआईवी से संक्रमित हो चुके हैं। करीब तीन करोड़ पचास लाख लोग एड्स के कारण मौत के मुंह में चले गए हैं। करीब चार करोड़ लोग पूरे विश्व में एचआईवी से पीडि़त हैं। भारत पूरे विश्व में एचआईवी पीडि़तों की आबादी के मामले तीसरे स्थान पर है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा जारी एड्स आकलन रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत में एचआईवी/एड्स पीडि़त लोगों की संख्या लगभग 21.40 लाख थी, इनमें वयस्क पीडि़त की संख्या 0.22 फीसदी थी। वर्ष 2017 में एचआईवी संक्रमण के लगभग 87,580 नए मामले सामने आए और 69,110 लोगों की एड्स से संबंधित बीमारियों से मौत हुई। 2005 में एड्स के कारण हुई मौतों की अधिकता की तुलना में 71 फीसदी की कमी आई है। सबसे अच्छी बात यह है कि भारत में 10 सितंबर, 2018 से एचआईवी/एड्स अधिनियम लागू हो गया है, जिसके अनुसार एचआईवी संक्रमित व एड्स पीडि़त व्यक्ति से भेदभाव करना अपराध घोषित किया गया है। अधिनियम के तहत मरीज को एंटी-रेट्रोवाइरल थेरेपी का न्यायिक अधिकार है और प्रत्येक एचआईवी मरीज को एचआईवी प्रिवेंशन, टेस्टिंग, ट्रीटमेंट और काउंसलिंग सर्विसेज का अधिकार मिलेगा।
जन जागरूकता से ही लोगों में एचआईवी संक्रमण के मूल कारणों के बारे में चेताया जा सकता है। असुरक्षित यौन संबंध, एक ही टीके से कईं लोगों द्वारा मादक पदार्थों का सेवन, संक्रमित सुई से टीका, एक ही ब्लेड से शेव, संक्रमित रक्त का दूसरे व्यक्तियों को दिया जाना और संक्रमित मां द्वारा बच्चे को जन्म दिए जाने आदि कारणों के प्रति सजगता की जरूरत है। इन सभी से बचा जा सकता है।
विश्व एड्स दिवस को मनाते हुए 30वां साल शुरू हो रहा है। 2030 तक एड्स को समाप्त करने का लक्ष्य स्वास्थ्य संगठन ने निर्धारित कर रखा है। लेकिन करीब 11 लाख लोग प्रतिवर्ष एचआईवी से संक्रमित हो रहे हैं। आज तक एचआईवी संक्रमित सभी लोगों की पहचान नहीं हो पाई है। ऐसे में एड्स को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित समय तक पूरा होना संदिग्ध ही लगता है। लेकिन जहां चाह होती है, वहीं राह होती है। मजबूत इरादों से बड़े से बड़ा लक्ष्य पूरा हो सकता है। अच्छी बात यह है कि आज एचआईवी संक्रमित 75प्रतिशत लोगों का परीक्षण हो चुका है, जोकि 2005 में 10प्रतिशत ही था। आज 60प्रतिशत उपचार की सुविधा भी ले रहे हैं। भारत में भी एचआईवी टेस्टिंग और उपचार की सुविधाओं का निरंतर फैलाव हो रहा है।
सभी लोगों के एचआईवी टेस्ट को लक्षित करते हुए 2018 में ‘अपनी स्थिति जानो’ को मुख्य विषय रखा गया है। यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि चार में से एक व्यक्ति आज भी अपनी एचआईवी संक्रमण की स्थिति से अनभिज्ञ है। जन जागरूकता से ही लोगों में एचआईवी संक्रमण के मूल कारणों के बारे में चेताया जा सकता है। असुरक्षित यौन संबंध, एक ही टीके से कईं लोगों द्वारा मादक पदार्थों का सेवन, संक्रमित सुई से टीका, एक ही ब्लेड से शेव, संक्रमित रक्त का दूसरे व्यक्तियों को दिया जाना और संक्रमित मां द्वारा बच्चे को जन्म दिए जाने आदि कारणों के प्रति सजगता की जरूरत है। इन सभी से बचा जा सकता है। एचआईवी एड्स के बारे में जानकारी ही बचाव है। एचआईवी की रोकथाम के लिए जानकारी व सुविधाएं उपलब्ध करवानी होंगी। एचआईवी के लिए संवेदनशील तबकों की जीवन-परिस्थितियों को सुधारने के लिए सरकार को उपाय करने चाहिएं।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किसी कारण से एचआईवी से संक्रमित हो गए लोगों के प्रति भेदभाव को समाप्त करना। जनजागरूकता की कमी के कारण ही बहुत बड़ी आबादी को एचआईवी पॉजिटिव होने पर भी यह बात छुपानी पड़ती है। आज भी बहुत से लोगों को यह लगता है कि एचआईवी पॅाजिटिव व्यक्ति को देखने से ही उन्हें संक्रमण हो जाएगा, तो यह अंधेरी सोच की इंतहा ही है। इसलिए एचआईवी एड्स ने एक सामाजिक संकट का रूप ले लिया है। दूसरी कोई बीमारी होने पर बीमार को इस तरह के संकट से दो-चार नहीं होना पड़ता, लेकिन एचआईवी/एड्स के मामले में लोगों सारी करुणा और दया की भावना धराशायी क्यों हो जाती है। आपदा की चपेट में आए लोगों की तो मदद करते हैं, लेकिन एचआईवी/एड्स से पीडि़त व्यक्ति को लोगों का भेदभाव क्यों झेलना पड़ता है।
भवदीय,
अरुण कुमार कैहरबा,
प्राध्यापक,
वार्ड नं.-4, रामलीला मैदान, इन्द्री,
जि़ला-करनाल, हरियाणा
मो.नं-09466220145

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