हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

जब भी मर्द पर संकट आता है तो स्त्री की गोद ही संबल होती है। कितने ही साहित्यकारों ने इस तरह के भाव प्रकट किए हैं। आमतौर पर लख्मीचंद की रागनियों में स्त्री की छवि पुरुष की सफलता में बाधक की ही है, लेकिन यहां एक स्त्री-स्वर में पं. लख्मीचंद की आत्मा की पुकार उठी है और ऐसा वे इसलिए कर सके कि यहां शास्त्र समर्थित रुढियों के बोझ को उतार फेंका जिसे वे अकसर ढोते रहे थे.

हो पिया भीड़ पड़ी म्हं नार मर्द की खास दवाई हो
मेल मैं टोटा के हो सै

टोटे नफे आंवते जाते, सदा नहीं एकसार कर्मफल पाते
उननै ना चाहते सिंगार जिनके, गात समाई हो,
मर्द का खोटा के हो सै

परण पै धड़ चाहिए ना सिर चाहिए, ऊत नै तै घर चाहिए ना जर चाहिए
बीर नै तै बर चाहिए होशियार, मेरी नणदी के भाई हो
अकलमंद छोटा के हो सै

पतिव्रता बीच स्वर्ग झुलादे, दुख बिपता की फांस खुलादे
भुलादे दरी दुत्तई पिलंग निवार, तकिया सोड़ रजाई हो
किनारी घोटा के हो सै

लखमीचन्द कहै मेरे रुख की, सजन वैं हों सैं लुगाई टुक की
जो दुख सुख की दो च्यार, पति नै ना हंस बतलाई हों
तै महरम लोटा के हो सै

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