डॉ नवमीत – डेंगू के बारे में

डेंगू के बारे में चंद बातें
डॉ नवमीत

आजकल देश में डेंगू फैला हुआ है और हजारों लोग इसकी चपेट में हैं। कई लोगों की मृत्यु हो चुकी है और जनता में दहशत का माहौल है। तरह तरह की अफवाहें भी फैली हुई हैं। ऐसे में जरूरी है कि इस बीमारी के बारे में सही जानकारी जनता तक पहुंचे।
सबसे पहले हम बात करेंगे कि डेंगू आखिर है क्या और यह कैसे होता है?
डेंगू एक संक्रामक रोग है जिसका संक्रमण एक मच्छर के काटने से होता है। इस मच्छर को एडीस एजिप्टी या टाइगर मस्किटो के नाम से जाना जाता है। टाइगर मच्छर इसलिए क्योंकि इस मच्छर के काले शरीर पर सफेद धारियां होती हैं। यह मच्छर दिन में काटता है। यह मच्छर अक्सर मानव आबादी के आसपास पानी के कृत्रिम स्रोतों और अन्य जगहों जैसे टिन, टूटी बोतलों, गमलों, नारियल के खोपों, मिट्टी के टूटे बर्तनों, पेड़ों के खोखले तनों, कूलरों, पानी की टँकी, पक्षियों के लिए रखे पानी के बर्तन आदि में इकट्ठे हुए साफ पानी में पनपता है। यह मच्छर लम्बी दूरी की उड़ान भी नहीं भरता। अपने स्रोत से अधिक से अधिक 100 मीटर से ज्यादा नहीं जाता है। अगर हम अपने आसपास के 300-400 मीटर के क्षेत्र से मच्छरों के पनपने के स्थान हटा दें तो यह मच्छर हमें हानि नहीं पहुंचा सकता।
जब यह मच्छर किसी डेंगू पीड़ित इंसान को काटता है तो इसके अंदर डेंगू का वायरस चला जाता है और यह वायरस से संक्रमित हो जाता है। फिर यही मच्छर किसी स्वस्थ इंसान को काटता है तो यह वायरस उस स्वस्थ इंसान के अंदर जाकर उसे बीमार कर देता है। एक बार मच्छर वायरस से संक्रमित हो गया तो यह जब तक जीवित रहता है तब तक संक्रमित रहता है और डेंगू फैलाता रहता है। यह मच्छर 16 से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सबसे अधिक फलता फूलता है। यानी साल के इन्हीं दिनों में जब तापमान मध्यम रहता है।
डेंगू के तीन रूप होते हैं। डेंगू बुखार, डेंगू हेमरेजिक बुखार और डेंगू शॉक सिंड्रोम। इसके अलावा वायरस से संक्रमित लोगों की सबसे बड़ी संख्या किसी भी तरह के लक्षण से मुक्त होती है। अधिकतर लोगों में यह संक्रमण बहुत हल्का होता है। फिर उससे कम लोगों में डेंगू बुखार होता है और उससे कम लोगों में डेंगू हेमरेजिक बुखार और सबसे कम लोगों में डेंगू शॉक सिंड्रोम। इन सबमें सबसे खतरनाक होता है डेंगू शॉक सिंड्रोम जो 2 से 4 प्रतिशत संक्रमित लोगों में ही होता है। इस बीमारी से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं मोटे लोग, वृद्ध, नवजात शिशु, गर्भवती महिलाएं, पेट में अल्सर वाले रोगी, मासिक धर्म के दौरान महिलाएं, जिनको खून बहने सम्बन्धी कोई बीमारी हो, जन्मजात हृदय रोग हो, डायबिटीज, हाइपर टेंशन, दमा, हृदय रोग, किडनी की लम्बी बीमारी, लिवर सिरोसिस हो या फिर व्यक्ति स्टेरॉयड या दर्द निवारक दवाएं ले रहा हो।
इस बीमारी के लक्षण क्या होते हैं? सबसे पहले तो किसी भी अन्य वायरस के संक्रमण जैसा वायरल बुखार होगा। साथ में शरीर पर लाल निशान भी हो सकते हैं। नाक बहना, गले में और पेट में परेशानी हो सकती है। क्लासिकीय डेंगू बुखार सभी उम्र के स्त्री पुरुषों में हो सकता है। बच्चों में इसकी गंभीरता कुछ कम होती है। एकदम से कंपकंपी के साथ तेज बुखार होगा, तेज सर दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में इतना तीखा दर्द होता है कि शरीर को हिलाना मुश्किल हो जाता है। 24 घण्टे के अंदर आंखों के पीछे दर्द शुरू हो जाता है और तेज रोशनी से परेशानी होने लगती है। बहुत अधिक कमजोरी, कब्ज, जीभ के स्वाद का बदल जाना, पेट में दर्द, उल्टियां होना, जी मितलाना, गला खराब हो जाना इसके अन्य लक्षण हैं। 80 फीसदी मरीजों में त्वचा पर लाल निशान नजर आने लगते हैं। बुखार प्रायः 5 से 7 दिन तक रहता है। कुछ मरीजों में 7 दिन से ज्यादा भी रह सकता है। इसके बाद अधिकतर मरीज ठीक हो जाते हैं।
इसका दूसरा और गम्भीर रूप है डेंगू हेमरेजिक बुखार। यह तीन फेजों में होता है। पहला फेज है बुखार वाला। यह 4 से 6 दिन तक रहता है। इसमें डेंगू बुखार के सभी लक्षण होते हैं। डेंगू हेमरेजिक बुखार डेंगू बुखार से अलग इस रूप में होता है कि हेमरेजिक बुखार में खून का रिसाव शुरू होने लगता है। दूसरा फेज होता है क्रिटिकल फेज। इसमें शरीर का तापमान कम हो जाता है। लेकिन प्लेटलेट्स कम होने से खून का रिसाव बढ़ता रहता है। ख़ून का रिसाव चमड़ी के नीचे या शरीर के किसी और हिस्से जैसे नाक, मुंह, मसूड़ों और आँत से भी हो सकता है। ज्यादा खून का रिसाव होने पर ब्लड प्रेशर कम होता जाता है, नब्ज़ तेज चलने लगती है। इसके अलावा फेफड़ों तथा पेट में पानी भरने लगता है, लिवर का आकार बढ़ जाता है। इसके बाद अगर मरीज बच जाता है तो फिर वह रिकवरी फेज में जाकर ठीक होने लगता है। डेंगू गंभीर रूप धारण तब कर लेता है जब या तो बहुत ज्यादा खून का रिसाव होने से ब्लड प्रेशर इतना कम हो जाए कि मरीज शॉक में चला जाए या फिर शरीर के अंदरूनी अंग काम करना बन्द करने लग जाएं। ऐसे में मरीज का बचना बहुत मुश्किल हो जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि डेंगू में प्लाज्मा और खून का रिसाव क्यों होता है।
इसका कारण है कि डेंगू के दौरान शरीर में खून का थक्का बनाने वाले बिम्बाणुओं यानी प्लेटलेट्स की मात्रा कम होने लगती है। प्लेटलेट्स का नाम आने पर अब यहां एक समस्या उत्पन्न हो जाती है। इससे सम्बंधित अफवाहें बहुत उड़ती हैं, जिनमें कुछ डॉक्टर भी लोगों को गलत जानकारी देते हैं कि प्लेटलेट्स कम हो गए हैं तो खतरा है। लेकिन असल में होता क्या है? होता यह है की प्लेटलेट्स किसी जगह चोट लगने पर खून का बहना रोकते हैं। अगर इनकी संख्या कम हो जाए तो खून का बहना रुकेगा नहीं या फिर देर से रुकेगा। ज्यादा खून बहने या फिर प्लाज्मा निकल जाने से ब्लड प्रेशर कम हो जाता है और मरीज शॉक में चला जाता है, फिर बेहोशी आ जाती है और इलाज नहीं मिला तो मरीज की मौत भी हो सकती है।
अब सवाल यह है कि कितने प्लेटलेट्स कम होने पर हम खतरा मानेंगे?
आमतौर पर किसी व्यक्ति में प्लेटलेट्स की संख्या डेढ़ लाख से साढ़े चार लाख प्रति माइक्रो लीटर होती है। लेकिन अगर यह डेढ़ लाख से कम हो कर 50000 तक भी आ जाए तो भी घबराने की बात नहीं होती। अगर 50000 से कम होकर 25000 तक भी कम हो जाए तब भी मरीज को कुछ दिन निगरानी में रखने से ठीक हो जाता है। अगर प्लेटलेट्स 25000 से कम हो जाए हैं तब हम कहते हैं कि अब बहुत खतरा है और मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत है ताकि इसे बाहर से प्लेटलेट्स चढ़ाए जा सकें। तो समस्या यहां प्लेटलेट्स की कमी नहीं है बल्कि इसकी बहुत अधिक कमी की वजह से खून का रिसाव होना है जिससे ब्लड प्रेशर इतना कम हो जाता है कि मरीज की जान को खतरा हो जाता है। यहां एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि प्लेटलेट्स सिर्फ डेंगू में कम नहीं होते हैं। कुछ अन्य बीमारियों जैसे चिकनगुनिया, खसरा, छोटी माता, वायरल बुखार और टाइफाइड बुखार में भी कम हो जाते हैं। इसलिए सिर्फ प्लेटलेट्स कम होने को हम डेंगू नहीं कहेंगे और न ही प्लेटलेट्स कम होने पर हर मरीज को हॉस्पिटल में भर्ती होने की जरूरत होती है। कोई बुखार डेंगू है या नहीं यह फैसला डॉक्टर अपने अनुभव, मरीज के लक्षणों और डेंगू की जांच के द्वारा करता है। बशर्ते कि डॉक्टर ईमानदार हो और उसका मकसद सिर्फ पैसे कमाना न हो।
इसका इलाज क्या होना चाहिए?
अगर मरीज को साधारण बुखार है, सर्दी जुकाम है या शरीर में व सर में दर्द है तो सिर्फ बुखार उतारने की पेरासिटामोल दवा देनी चाहिए। अगर हेमरेजिक बुखार या शॉक सिंड्रोम के लक्षणों के बिना डेंगू बुखार है तब भी सिर्फ पेरासिटामोल काफी है। इसके अलावा और कोई दर्द निवारक दवा नहीं लेनी चाहिए क्योंकि उन दवाओं से खून का रिसाव ज्यादा हो सकता है। पेरासिटामोल सहित कोई भी दवा खुद नहीं लेनी चाहिए बल्कि पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। साथ में संतुलित भोजन, आराम और काफी मात्रा में पेय पदार्थ लेने चाहिए, खासतौर पर निम्बू पानी। लेकिन अगर बुखार बिल्कुल भी नहीं उतर रहा है तो तुरन्त डॉक्टर के पास जाना चाहिए। अगर प्लेटलेट्स 50000 से कम हो जाएं तो डॉक्टर मरीज को निगरानी में रखेगा। और अगर ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है, प्लेटलेट्स 25000 से भी कम हो जाते हैं, खून का रिसाव शुरू हो जाता है तो डॉक्टर मरीज को अस्पताल में भर्ती कर लेता है और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। प्लेलेट्स की जरूरत होने पर मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाता है। जरूरत पड़ने पर ग्लूकोज भी चढाता है। लेकिन एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि हर मरीज को ग्लूकोज की बोतल चढ़ाने की जरूरत नहीं होती। अगर मरीज मुंह से कुछ नहीं ले पा रहा है, ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा कम हो गया है, मरीज बेहोशी की हालत में है तो ग्लूकोज चढ़ाया जाता है।
डेंगू की रोकथाम में लिए हमें क्या करना चाहिए?
सबसे जरूरी है कि अपने आसपास एडीस मच्छरों के पनपने के स्थान नष्ट किये जाएं। जितनी भी जगहें हैं जहाँ पानी इकट्ठा हो सकता है, उनको खत्म किया जाए। जहां पानी इकट्ठा है उसे वहां से साफ किया जाए। गड्ढों को भर दिया जाए। कूलरों का पानी जल्दी जल्दी बदल दिया जाए। गमलों में, पेड़ों के खोखले तनों में पानी इकट्ठा न होने दिया जाए। पानी की टँकीयों को ढंक कर रखा जाए। यह मच्छर दिन में काटता है, इसलिए इस दौरान पूरे शरीर को ढंकने वाले कपड़े पहनने चाहिए। पैरों में मौजे और जूते पहनें। मच्छरों को खत्म करने की दवाई का छिड़काव किया जाना चाहिए। बुखार होने पर खुद इलाज करने की बजाए तुरन्त डॉक्टर को दिखाएं।
सरकार और प्रशासन का क्या रोल है?
सरकार को चाहिए कि डेंगू के बारे में लोगों को सही जानकारी दे। फैलने से पहले ही इसकी रोकथाम के उपाय करे। लेकिन ऐसा होता नहीं है या फिर कम स्तर पर होता है। कहने के लिए फर्जी रिकॉर्ड भरे जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं होता। न तो मच्छरों को मारने के लिए दवा का छिड़काव किया जाता है, न ही फॉगिंग की जाती है। डेंगू जब फैल चुका होता है और कुछ लोग मर चुके होते हैं तब सरकार जागती है और फिर से फर्जी रिकॉर्ड भर दिए जाते हैं। सरकार को चाहिए कि बीमारी को फैलने से रोकने के पुख्ता इंतज़ाम करे और अगर फैल भी जाए तो प्रभावित क्षेत्रों में मरीजों के इलाज के लिए सब सेंटर स्तर पर अस्थाई क्लिनिक खोले, डेंगू के लिए लैब टेस्टों की निशुल्क सुविधाएं मुहैया करवाए। लेकिन ऐसा हो जाए तो मुनाफाखोर प्राइवेट अस्पतालों, कुछ मुनाफाखोर डॉक्टरों, लैब वालों और केमिस्टों सहित दवा कम्पनियों की कमाई बंद हो जाए। इसलिए ऐसा नहीं होता है। बीमारी फैलती रहती है, लोग बीमार होते हैं, मरते हैं और चंद मुनाफाखोर लोग कमाई करते हैं। यह इस मुनाफे पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था की सच्चाई है। यह एक बीमार व्यवस्था है। इसका इलाज सम्भव नहीं है। बल्कि जैसे बीमारी ठीक न होने पर जिस तरह दवा बदलनी पड़ती है उसी तरह इस व्यवस्था को बदल कर एक नई मानव केंद्रित समाजवादी व्यवस्था बनाने की जरूरत है ताकि बीमारियों के साथ साथ मानव द्वारा मानव का शोषण भी खत्म हो सके।images (1)

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