आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है – डा. नवमीत नव

लेकिन अब एमबीबीएस के बाद ढाई साल के अध्यापन और फिर एमडी के तीन साल और अब एक साल से फिर अध्यापन के अनुभव से मुझे एक चीज पता चली कि आप किसी को पढ़ाना/ समझाना चाहें या किसी से पढ़ना/समझना चाहें तो यह काम सबसे बेहतर आपकी अपनी मातृभाषा में ही हो सकता है।

मेरी मातृभाषा हरियाणवी है। हालांकि अधिकतर लोग हरियाणवी को भाषा नहीं बल्कि बोली मानते हैं। इस हिसाब से मेरी मातृभाषा हिंदी हुई। लेकिन यह हिंदी नहीं थी जिससे मेरा पहली बार पाला पड़ा था। यह हरियाणवी थी। गांव में कोई बच्चा शहर से आता था और वह हिंदी में बोलता था तो हम गांव वाले बच्चे कहते थे कि “ओ तरी क, यू तो अंग्रेजी बोलै है।”
हालांकि हिंदी समझ में आती थी लेकिन बोलने में हमेशा दिक्कत रही। स्कूल में हिंदी के मास्टर भी हरियाणवी में ही हिंदी पढ़ाते थे। स्कूल में पढ़ते हुए हिंदी की व्याकरण, शब्दावली और वर्तनी का ज्ञान भी हो चला था लेकिन जीभ पर हरियाणवी ही रहती थी। फिर बड़े होकर शहर के स्कूल में दाखिला लिया तो वहां अंग्रेजी का दबाव। अब हरियाणवी लहजे में हिंदी तो बोलने लगे थे लेकिन अंग्रेजी अभी भी दूर की कौड़ी थी। व्याकरण और वर्तनी अंग्रेजी की भी आती थी लेकिन बोलने में वही हरियाणवी मिश्रित हिंदी। जाहिर है दोस्त भी हरियाणवी बोलने वाले ही बने। फिर स्कूल के बाद मेडिकल की कोचिंग के लिए चंडीगढ़ चला गया। अब यहां और ज्यादा समस्या। हरियाणवी बोलते हुए शर्म आने लगी थी। हिंदी का लहजा सुधारने की पूरी कोशिश की लेकिन बात बन नहीं पाई। हाँ इन कोशिशों के चलते अब जबान पर हिंदी भी चढ़ने लगी थी। लेकिन लहजा वही हरियाणवी वाला था।

मेरे कुछ साथी डॉक्टर रहे हैं जो रूस से पढ़कर आये हैं। वे बताते हैं कि वहां मेडिकल की पढ़ाई रूसी भाषा में होती है। और बहुत अच्छी होती है। या फिर चीन में, फ्रांस में या जर्मनी में। सब अच्छे से होता है। सिर्फ हमारे यहां ही एलियन भाषा को थोपा जाता है। हमें डॉक्टर बनाने हैं, अंग्रेजी के एक्सपर्ट थोड़े ही बनाने हैं। या फिर किसी भी क्षेत्र में। पता नहीं क्यों हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर अंग्रेजी को थोपा जाता है। बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं पर हिंदी को भी थोपने की कोशिश की जाती है। हरियाणवी जैसी भाषाओं की तो पहचान ही खो चुकी है। इसे भाषा ही नहीं माना जाता। पूरी आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है। हमारे देश में तो यह जुल्म बहुत ज्यादा है। इसे रोका जाना चाहिए।

फिर जब कॉलेज में एडमिशन हुआ तो यहां समस्या और गंभीर। मेडिकल की पढ़ाई तो बिल्कुल ही अंग्रेजी में। पढ़ लिख तो लेता था लेकिन बोलने में पसीने छूटते थे। दोस्ती यहां भी हरियाणवी भाषियों से ही हुई। लेकिन एक दो को छोड़कर अधिकतर को अच्छी अंग्रेजी आती थी। फर्स्ट ईयर में था तो एक दिन पता चला कि फिजियोलॉजी विभाग वाले सेमिनार लेंगे। सभी को अलग अलग विषय दे दिए गए। हर छात्र को अपने विषय के लिए सेमिनार तैयार करना था और पूरी क्लास के सामने बोलना था। वो भी अंग्रेजी में। यहां वैसे ही “स्टेज फोबिया” और ऊपर से अंग्रेजी। मतलब एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा। खैर मैंने सेमिनार तैयार किया। तब डिजिटल का इतना जोर नहीं था, ट्रांसपेरेंसी पर ही अपने हाथ से लिखकर लेक्चर या सेमिनार तैयार करते थे। सो 2 दिन लगे तैयार करने में। सेमिनार देने के लिए क्लास में घुसा तो सारी क्लास ने पहले ही तालियां बजा दी। बस हिम्मत जवाब दे गई। अपन भाग लिए बिना सेमिनार दिए ही। समस्या अंग्रेजी में ही थी। बाकी तो कर लेता। फिर जैसे तैसे करके, पास फेल होकर, एमबीबीएस पूरी हुई। इंटर्नशिप में एक बार फिर सेमिनार देना पड़ा। इस बार मैंने हिंदी में सेमिनार दिया जोकि ठीकठाक रहा। कुछ कॉन्फिडेंस बना।

फिर मैं एक मेडिकल कॉलेज में ट्यूटर के तौर पर पढ़ाने लगा। यहां मैं हिंदी में ही पढ़ाता था। बच्चों की समझ में भी आ ही जाता था। फिर पोस्ट ग्रेजुएट में पता चला कि यहां भी सेमिनार देने हैं। अंग्रेजी में। “यो कट गया क्लेश”, मैंने सोचा। लेकिन हिम्मत करके इस बार अंग्रेजी में सेमिनार दे ही दिया। इससे काफी हिम्मत मिली। इसके बाद काफी प्रस्तुतियां दी, अंग्रेजी में भी और हिंदी में भी। लेकिन सहज मैं हिंदी में ही रहता था। हालांकि यह भी मजबूरी ही थी, हरियाणवी तो कोई समझता नहीं था।

एमबीबीएस के बाद ढाई साल के अध्यापन और फिर एमडी के तीन साल और अब एक साल से फिर अध्यापन के अनुभव से मुझे एक चीज पता चली कि आप किसी को पढ़ाना/ समझाना चाहें या किसी से पढ़ना/समझना चाहें तो यह काम सबसे बेहतर आपकी अपनी मातृभाषा में ही हो सकता है।

 बहरहाल पिछले एक साल से मैं पढ़ा रहा हूँ। लेकिन अब एमबीबीएस के बाद ढाई साल के अध्यापन और फिर एमडी के तीन साल और अब एक साल से फिर अध्यापन के अनुभव से मुझे एक चीज पता चली कि आप किसी को पढ़ाना/ समझाना चाहें या किसी से पढ़ना/समझना चाहें तो यह काम सबसे बेहतर आपकी अपनी मातृभाषा में ही हो सकता है। आज मैं मेडिकल के लेक्चर हिंदी में देता हूँ तो मुझे बहुत सहज लगता है। छात्रों को भी सहज लगता है। हालांकि बीच बीच में अंग्रेजी भी इस्तेमाल करता हूँ जोकि सही भी है लेकिन लेक्चर का अधिकतर हिस्सा हिंदी में होता है।
मेरे कुछ साथी डॉक्टर रहे हैं जो रूस से पढ़कर आये हैं। वे बताते हैं कि वहां मेडिकल की पढ़ाई रूसी भाषा में होती है। और बहुत अच्छी होती है। या फिर चीन में, फ्रांस में या जर्मनी में। सब अच्छे से होता है। सिर्फ हमारे यहां ही एलियन भाषा को थोपा जाता है। हमें डॉक्टर बनाने हैं, अंग्रेजी के एक्सपर्ट थोड़े ही बनाने हैं। या फिर किसी भी क्षेत्र में। पता नहीं क्यों हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर अंग्रेजी को थोपा जाता है। बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं पर हिंदी को भी थोपने की कोशिश की जाती है। हरियाणवी जैसी भाषाओं की तो पहचान ही खो चुकी है। इसे भाषा ही नहीं माना जाता। पूरी आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है। हमारे देश में तो यह जुल्म बहुत ज्यादा है। इसे रोका जाना चाहिए।
हिंदी दिवस पर इतना ही।

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