मंहगाई डायन खाए जात है -डा. सुभाष चंद्र

मंहगाई की प्राकृतिक आपदा या संकट नहीं है, बल्कि इसके पीछे निहित स्वार्थ हैं। वे स्वार्थ हैं अधिक से अधिक लाभ कमाने के। पूंजीवादी व्यवस्था लाभ पर टिकी होती है। लाभ कमाने के दो ही तरीके अभी तक पूंजीवाद कर पाया है। एक तो श्रम का कम हिस्सा देकर तथा दूसरा अपने उत्पाद के बदले में अधिक लेकर। जब बाजार में जरूरत की वस्तुओं की कीमत व्यक्ति की कमाई के मुकाबले अधिक हो जाए और वह अपनी कमाई से अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी न कर सके तो वही मंहगाई की स्थिति है। इतनी मंहगाई तो घोर अकाल व बाढ़ के दौरान भी नहीं हुई होगी।

आज मंहगाई की बड़ी चर्चा है। लेकिन सड़कों पर एक-से-एक मंहगी कारें, बाजारों में मंहगे सामान खरीदने वालों की भीड़, शहरों में मंहगी जमीन खरीदकर आलीशान बंगलों की कतारें भी नजर आती हैं, पचास रुपए देकर काफी का कप देने वाले होटलों की मेजें भी ठसाठस भरी रहती हैं। बाजार से लौटते लोगों के हाथों में लटकते ब्रांड छपे पोलीथीन के बड़े-बड़े बैग मंहगाई के राग को झूठा सिद्ध कर रही हैं। लेकिन साथ ही मीडिया में सर्दी से मरने वालों की खबर भी आ जाती है, स्वाभाविक है कि वे सर्दी से नहीं, बल्कि सर्दी से बचने के लिए कपड़ों, मकान, इंधन व खाने के अभाव में ही मरे होंगे। भरमाने वाली बात यह है कि अरबपतियों की संख्या भी बढ़ रही है और गरीबों की संख्या भी बढ़ रही है। दोनों पर ही ऊपरवाला मेहरबान हो रहा है।

मंहगाई की प्राकृतिक आपदा या संकट नहीं है, बल्कि इसके पीछे निहित स्वार्थ हैं। वे स्वार्थ हैं अधिक से अधिक लाभ कमाने के। पूंजीवादी व्यवस्था लाभ पर टिकी होती है। लाभ कमाने के दो ही तरीके अभी तक पूंजीवाद कर पाया है। एक तो श्रम का कम हिस्सा देकर तथा दूसरा अपने उत्पाद के बदले में अधिक लेकर। जब बाजार में जरूरत की वस्तुओं की कीमत व्यक्ति की कमाई के मुकाबले अधिक हो जाए और वह अपनी कमाई से अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी न कर सके तो वही मंहगाई की स्थिति है। इतनी मंहगाई तो घोर अकाल व बाढ़ के दौरान भी नहीं हुई होगी। आज सब्जी मंडी में या खाद्य पदार्थों की दुकान पर जाइए तो आपको आटे दाल का भाव मालूम हो जाएगा।  स्वस्थ आदमी को एक दिन में जितनी कैलोरी चाहिए उसे प्राप्त करने के लिए आम आदमी की सप्ताह भर की कमाई निकल जाएगी। मंहगाई के जरिये शोषण ने समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के समस्त सिद्धांत व अनुमान फेल कर दिए हैं कि एक मनुष्य दस आदमियों का पेट पालने की क्षमता रखता है।

मंहगाई एक सापेक्ष स्थिति है।  ठन ठन गोपाल के लिए मंहगा और जिसके पास खरीदने के लिए है उसके लिए क्या मंहगा।  आर्थिक तौर पर भारत में तीन वर्ग हैं। एक वर्ग है जिसमें नीति-निर्माता, राजनेता, बड़े कार्पोरेट, पूँजीपति आते हैं, जिनके समक्ष आर्थिक समस्या के तौर पर सेंसक्स, सकल घेरलू उत्पाद, विदेशी मुद्रा भंडार, विकास दर ही आर्थिक समस्याएं हैं। दूसरा वर्ग ब्यूरोक्रेट, उच्च अधिकारियों, मोटी तनख्वाह पाने वाले, बड़े जमींदारों, जमीन आदि बेचकर बने नव-धनाढ्यों, बड़े प्रापर्टी डीलरों तथा मध्यम किस्म के उद्योगपतियों व टटपूँजिओं का है, जिनके समक्ष आर्थिक समस्या के तौर पर पसंदीदा उपभोग वस्तुओं का अभाव, फारेन ट्रिप की लालसा, समुद्र किनारे अथवा पहाड़ों पर किराये की युवतियों के साथ रंगरलियों की जुगत ही इनकी सबसे बड़ी आर्थिक समस्या है। (यद्यपि इन्द्र के इन नव-अवतारों का मंदिरों को आस्था की बजाए सैर सपाटे का स्थान बनाने में उल्लेखनीय योगदान है) तीसरा वर्ग है जिसकी संख्या कुल आबादी का अस्सी फीसदी से भी ज्यादा है, जिसमें बहुत सी परतें हैं।  इस वर्ग के अनेक स्तरों के लिए मंहगाई, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि समस्या बन गई हैं। यही वर्ग है जिसको राज्य सभा सांसद ने बीस रुपए से कम में गुजारा करने वाला कहा है।

पहले और दूसरे वर्ग के पास अकूत धन है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियां उनके लिए स्वर्ग लेकर आई हैं। अपने देश में ही वे सब वस्तुएं घर के द्वार पर पहुँचा दी हैं यानी होम डिलीवरी, जिसके लिए वह तरसता था। विदेशी वस्तुओं को हासिल करने और अपने घर व शरीर पर सजाने के लिए वह जो पापड़ बेलता था। उससे छुटकारा मिलने पर खासा अघाया हुआ है। पहले वह दुनिया की सर्वाधिक आरामदायक गाडिय़ां और उनके अनुकूल सड़कें तथा एक्सप्रेस वे आदि का पूरा इन्तजाम हो रहा है। अपने देश में विदेश ही नहीं आया, बल्कि जिसने अपने बगल का गांव भी नहीं देखा वह भी गोरी चमड़ी के ठाठ को झांक आया है। (रामदेव बाबा जैसे भी तर गए)

तीसरा वर्ग बुरी तरह से पिट गया है।  वह दाल-रोटी का रोना रोये जा रहा है। मंहगाई भत्ते की किस्त मांग रहा है, ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून से आस लगा बैठा है, उसके बच्चे मिड-डे-मील को तरस रहे हैं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुनसान डिपो की ओर बरबस ही ताक रहा है। जात-गोत-नस्ल की मानसिकता में फंसा अपनी वास्तविक शक्ति (वोट) को जात-गोत केनाम पर गिरवी रख रहा है। जिदंगी के झमेले से तंग आकर ईश्वर को दो-चार सुना लेता है और अपने जात-गोत के राजनेताओं से गुहार कर लेता है। और ज्यादा ही तंग हो जाए तो कभी-कभी कीड़ेमार दवाई भी पीकर चैन की नींद सोने का साहस कर लेता है। तीसरे वर्ग की ये पब्लिक सब जानती है, चँू भी नहीं करती।

यूँ गौर करने की बात है कि इसी के काम की जो चीजें ही सर्वाधिक मंहगी हो रही हैं। पहले दाल-रोटी खाकर गुजारा करता था, लेकिन जब से दाल आसमान पर चढ़ बैठी, तो चटनी-रोटी अथवा गंठा-रोटी पर सब्र कर लिया। परन्तु अब उसका गंठा भी छिन गया। पर अपने ईमानदार साफ सुथरी छवि के ‘मुख्य सेवक’और ‘प्रधान सेवक’ पर उसे पूरा भरोसा है।

पर  ‘मुख्य सेवक’और ‘प्रधान सेवक की सरकार के कारिन्दों व लग्गे-भग्गों का काम सिर्फ आश्वासन देना है कि फसल आने वाली है मंहगाई कम हो जाएगी अथवा विदेशों से आयात कर लिया है। लेकिन जिन्होंने उसे अपनी कैद में किया हुआ है उनका इलाज करने का जिक्र ही नहीं। तजरबे से यह तो सबको पता है कि जब गंठा या उस जैसे अन्य उत्पाद पैदा करने वाले के पास होते हैं तो वह इतना सस्ता होता है कि उसे मण्डी तक लाने की मेहनत भी पूरी नहीं होती।  ज्यों ही वह उसके पास नहीं रहता तो वह इतना मंहगा हो जाता है कि आँख के सुरमे की तरह अथवा कान में डालने वाले तेल की तरह प्रयोग करने जितना ही खरीद पाता है। जब वस्तुओं का न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया जा सकता है तो समझ में नहीं आता कि अधिकतम मूल्य क्यों नहीं निर्धारित किया जा सकता।

डा. सुभाष चन्द्र, प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

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