डॉ. गुरमीत सिंह – मीडिया और खाप पंचायते

जहां तक ऑनर किलिंग की घटनाओं की रिपोर्टिंग का प्रश्न है तो सभी समाचार पत्रों, चैनलो व बाकी माध्यमों ने इस नृशंस अपराध को पर्याप्त संवेदना के साथ रिपोर्ट किया है। हालांकि मीडिया द्वारा बार बार प्रयुक्त किए जा रहे ऑनर किलिंग शब्द के प्रयोग से कहीं न कहीं अपराधियों के महिमामंडन का संदेश भी जाता है। हत्या के साथ सम्मान शब्द को जोड़ने का क्या मतलब? शायद इसीलिए अब कुछ जगहों में इसके लिए डिस-ऑनर किलिंग का प्रयोग भी शुरू किया गया है भले ही ज्यादा प्रचलन में ऑनर किलिंग ही है।

आज के युग में इस बात को लेकर ज्यादातर लोग सहमत हैं कि मीडिया ही समाज में किसी बहस का एजेंडा निर्धारित करता है। यह अलग बात है कि मीडिया में किसी बहस का जीवन इतना कम होता है कि उसके कोई सार्थक परिणाम कम ही मामलों में निकल पाते हैं। इसके बावजूद किसी भी सामाजिक मुद्दे पर मीडिया का भूमिका को नजरअंदाज करना न तो मुमकिन है और न ही समझदारी है। पिछले दो दशकों में मीडिया का विस्तार बहुत ही द्रुत गति से हुआ है और इसके कारण उसकी ताकत खासकर हमारे सामाजिक जीवन पर उसका प्रभाव भी कई गुना बढ़ा है। इंटरनेट के माध्यम से विकसित हुआ न्यू मीडिया भी इस दिशा में नए आयाम जोड़ रहा है। यही वजह है कि जब भी किसी अहम मुद्दे पर कोई गंभीर बात की जानी हो तो उसमें मीडिया की भूमिका की पड़ताल अब जरूरी मानी जाती है।

पिछले काफी समय से हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों से ‘ऑनर किलिंग’( मीडिया में प्रचलित शब्द जिसके प्रयोग पर बहुत लोगों को एतराज भी है) के नाम पर होने वाली हत्याओं के समाचार स्थानीय मीडिया में आते रहे हैं और उसी के कारण इन प्रदेशों में असर रखने वाली खाप पंचायतें भी चर्चा में आई हैं। कई बार एक के बाद इस तरह की वारदातों का सिलसिला न थमने से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर भी  मीडिया में प्रमुखता प्राप्त करता रहा है और मीडिया के माध्य़म से सारे देश में इसकी चर्चा हुई है। वैसे भी हमारे मीडिया को तीन सी (क्राइम,सिनेमा व क्रिकेट) या दूसरे शब्दों में मसाला समाचार विशेष प्रिय रहे हैं और इस लिहाज से भी अपराध से जुड़े होने के कारण ऑनर किलिंग को प्रमुखता मिलनी ही थी। यही वजह है कि ऑनर किलिंग से जोड़कर ही मीडिया में खाप पंचायतों की चर्चा हुई है वरना शहरी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने वाले मीडिया ने कभी खाप पंचायतों को विषय बनाया ही न होता। उन पर चर्चा तो दूर ज्यादातर मीडिया कर्मियों ने तो पहले उनका नाम भी शायद नहीं सुना होगा। लेकिन अब विशेषकर हरियाणा में पिछले कुछ समय में ऑनर किलिंग की कई घटनाएं हो जाने और कुछ खाप पंचायतों के भी खुलकर सामने आने से मीडिया के हर वर्ग यानी प्रिंट मीडिय ,इलेक्ट्रोनिक मीडिया ,फिल्म और न्यू मीडिया(ब्लाग, सोशल नेटवर्किंग साइट व वेबसाइट्स) आदि ने इन विषयों को हाथों हाथ लिया है। हरियाणा के वैसे भी दिल्ली के नजदीक होने से मीडिया में इस तरह के समाचारों को कवर करना आसान रहता है।

जहां तक ऑनर किलिंग की घटनाओं की रिपोर्टिंग का प्रश्न है तो सभी समाचार पत्रों, चैनलो व बाकी माध्यमों ने इस नृशंस अपराध को पर्याप्त संवेदना के साथ रिपोर्ट किया है। हालांकि मीडिया द्वारा बार बार प्रयुक्त किए जा रहे ऑनर किलिंग शब्द के प्रयोग से कहीं न कहीं अपराधियों के महिमामंडन का संदेश भी जाता है। हत्या के साथ सम्मान शब्द को जोड़ने का क्या मतलब? शायद इसीलिए अब कुछ जगहों में इसके लिए डिस-ऑनर किलिंग का प्रयोग भी शुरू किया गया है भले ही ज्यादा प्रचलन में ऑनर किलिंग ही है। फिर भी यह मीडिया के दबाव का ही नतीजा है कि एक बाद एक इन घटनाओं का सिलसिला न थमने के बाद अब केंद्र की यूपीए सरकार ने भी ऑनर किलिंग को रोकने के लिए कानून बनाने की बात कही है और इसके लिए मंत्रियों का एक समूह भी गठित किया है। मीडिया ने ऑनर किलिंग के अभिशाप के कारण भारत व अन्य देशों में होने वाली हत्याओं की भयावह स्थिति को भी सामने रखा है। जैसे कि लंदन में हुए एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में रखी गई एक रिपोर्ट को प्रमुखता से प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया जिसके मुताबिक भारत में हर साल ऑनर किलिंग के नाम पर एक हजार हत्याएं होती है और इनमें से 900 का संबंध केवल तीन राज्यों हरियाणा,पंजाब व उत्तर प्रदेश से होता है।1 इसी तरह एमनेस्टी इंटनेशनल की रिपोर्ट को भी प्रमुखता से दिया गया जिससे यह तथ्य उद्घाटित हुआ कि भारत के अलावा पाकिस्तान,बंग्लादेश, तुर्की,जार्डन जैसे देशों में भी ऑनर किलिंग का अभिशाप मौजूद है।2

 लेकिन असली समस्या ऑनर किलिंग के नाम पर होने वाली हत्याओं की रिपोर्टिंग को लेकर नहीं बल्कि उसके साथ जुड़ी खाप पंचायतों की भूमिका के मीडिया में चित्रण को लेकर है। ऑनर किलिंग के मामले सामने आने के बाद से मीडिया के हर वर्ग द्वारा खाप पंचायतों पर भी बहुत कुछ लिखा व दिखाया गया है। समाचार पत्रों व पत्रिकाओं ने विशेष परिशिष्टों के अलावा खापों पर संपादकीय लेख तक लिखे हैं। लगभग हर चैनल ने खाप पंचायतों समेत विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को बुलाकर विशेष शो किए हैं। हरियाणा के ही मामलों को लेकर बॉलीवुड में आनन फानन में एक फिल्म ‘खाप-ए लव स्टोरी’ तक बना दी गई है। ब्लागों में तो अभिव्यक्ति की छूट और ज्यादा होने से खापों के पक्ष व विपक्ष दोनों अतिवादी प्रतिक्रियाओं की जैसे भरमार हो गई है।

 बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि मीडिया ने अपनी कवरेज में खाप पंचायतों विशेषकर उन ग्रामीणों के साथ अन्याय किया है जो इन पंचायतों के साथ पीढ़ियों से जुड़े रहे हैं। यह ठीक है कि हरियाणा में ऑनर किलिंग के एक मामले में अदालत ने भी खाप पंचायत के कुछ सदस्यों को भी सज़ा सुनाई है। यह भी ठीक है कि कुछ खाप पंचायतों ने दोषियों के बचाव में कुछ बयान देने या हिंदू विवाद कानून में संशोधन करके गोत्र विवाहों पर प्रतिबंध लगाने के मांग उठाई है लेकिन उसके कारण यदि उनकी तुलना तालिबान( जैसा मीडिया में खूब हुआ है) से की जाय या सारे ग्राम जीवन की रवायतों को खारिज करने या ग्रामीणों की भर्त्सना करने जैसा संदेश जाय तो यह कहां तक उचित है? यह  सवाल भी बार बार खड़ा हुआ है। हरियाणा के इतिहास की जानकारी रखने वाले प्रोफेसर केसी यादव ने इसी सवाल को उठाते हुए लिखा-

Our cosmopolitan elite and the media, in particular the electronic media, who should have, ordinarily, helped us in understanding both the matters, are, unfortunately, doing the opposite. Whenever I watch their ‘public debates’ on such issues on the electronic media the famous lines of Charles Churchill (not Wiston) invariably come to my mind : ‘So loud each tongue/so empty was each head/So much they talked/so very little said’. Worse, they not only go rhetoric, but also mislead. The question is ‘honour killing’. They outfocus it. An egg is rotten, kill the hen – this is what they are saying. They condemn villages, their people, their institutions and culture. They hurl choicest abuses on them. For what ? The villages do not preach ‘honour killings’ 3

अपने ब्लाग मेरी बात में पत्रकार आदित्य चौधरी ने भी राष्ट्रीय मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चित रहे हरियाणा के मनोज-बबली हत्याकांड के संबंध में लिखा कि ‘इस मामले को सामने रख कर हरियाणा, हरियाणवी संस्कृति, पंचायतों, खापो और जाटों को खूब बेईजज्त किया गया और ऐसे बहुत से विशेषणों से सम्मानित किया गया जो मीडिया ने ख़ास तौर पर ऐसे मामलों के लिए गढ़े हैं। हालाँकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की ना तो सारा हरियाणा ऐसा है ना सारा जाट समुदाय।’

यह बात किसी हद तक ठीक भी है। बहुत से मामलों में अपराध पीड़ितो के परिजनों द्वारा ही किए गए और उस अपराध में सारे गांव या किसी जाति को अपराधी बनाकर पेश किया जाना शायद उलटे प्रतिक्रिया को जन्म देने वाला ही है। दूसरी तरफ यह भी सही है कि इस तरह के हिंसक मामलों में स्थानीय समाज के एक वर्ग से मौन स्वीकृति भी मिलती रही है। कई बार ऐसे हत्याकांडो की कवरेज के लिए जाने वाले मीडिया कर्मियों को भी स्थानीय लोगों का कड़ा विरोध व दुर्व्यवहार भी झेलना पड़ता है जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। भले ही  स्थानीय लोगों की मीडिया से यह शिकायत रहती हो कि वह उनकी छवि खराब करने का काम कर रहा है। मनोज –बबली के मामले में कुरुक्षेत्र में हुई खाप महापंचायत में मीडिया को जमकर कोसा गया। खाप नेताओं को इस बात पर आपत्ति थी कि मीडिया स्थानीय परंपराओं को नहीं समझता और नई पीढी को परंपराओं के ख़िलाफ़ भड़काने के लिए ज़िम्मदार है। इन नेताओं को इस बात पर भी भारी आपत्ति थी कि आख़िर मीडिया उनके फ़ैसलों को तालिबानी फरमान कैसे कह सकता है। कुल मिलाकर ऐसे मामलों में  एक ऐसा कुचक्र चल पड़ा है कि न तो मीडिया को गोत्र व्यवस्था या खाप पंचायतों की पूरी जानकारी मिल पाती है या उसकी ओर से इसकी कोशिश होती है और न ही उसकी सहानुभूति संबंधित स्थानीय वर्गों के साथ बन पाती है। नतीजे में मीडिया में आने वाली कवरेज संतुलित न होकर अकसर अतिवादी होती है और उसके कारण स्थानीय लोगों में मीडिया के प्रति अविश्वास भी बढ़ जाता है। मुद्दों की सही समझ के लिए इस कुचक्र को तोड़ना बहुत जरूरी है। क्योंकि आखिर में मीडिया के माध्यम से ही दूसरे पक्षों को आवाज मिल सकती है। खाप पंचायतों के मामले में मीडिया कवरेज की आलोतना करने वाले लेखों को भी खुद मीडिया ने ही जगह दी है। केसी यादव द्वारा द ट्रिब्यून में लिखे गए ऐसे ही एक लेख का हवाला ऊपर दिया जा चुका है। इसी मुद्दे पर प्रसिद्ध चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर की भी एक तल्ख टिप्पणी इंटरनेट पर देखने को मिली जिसमें उन्होंने लिखा-

‘सच तो यह है कि सतहीपन के शिकार पत्रकार लोग शादी-ब्याह के मामलों की नजाकत समझने में असमर्थ हैं और सबको एक ही लाठी से हांकना चाहते हैं। सगोत्र विवाह कानूनसंगत है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। मैं ठीक-ठीक यह भी नहीं कह सकता कि सगोत्र कहते किसे हैं और देश के किस इलाके में सगोत्र विवाह की छूट है और किस इलाके में इसकी छूट नहीं है। मैं यह सब जानना भी नहीं चाहता। लेकिन मैं यह जरूर मानता हूं कि अगर किसी समुदाय विशेष में किसी खास आधार पर विवाह की मुमानियत है, तो सभी को इस रीति का ध्यान रखना होगा। यह कह कर हम नहीं बच सकते कि उस समुदाय की यह मान्यता गलत, पुरातनपंथी, अवैज्ञानिक और गैर-आधुनिक है। इस मामले में निर्णय उस समुदाय के लोग ही करेंगे। अन्य समुदायों के लोग हस्तक्षेप नहीं कर सकते। बल्कि अपनी क्रुद्ध टिप्पणियों के द्वारा वे उस समुदाय के लोगों को अपनी मान्यताओं से और ज्यादा चिपकने की ऊर्जा प्रदान करेंगे।इसका मतलब यह नहीं है कि खाप पंचायतों की मान्यताएं अमर हैं या उनमें कभी कोई परिवर्तन होगा ही नहीं। परिवर्तन होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। मुझे तो इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि इन खाप पंचायतों की उम्र जल्द ही पूरी होने जा रही है। लेकिन सामाजिक परिवर्तन की गति, खासकर गैर-औद्योगिक समाजों में और कृषि-आधारित व्यवस्थाओं में, चंद्रमा की जोत की तरह धीरे-धीरे ही बढ़ती है। कल अमावस थी और आज पूर्णमासी हो जाए, ऐसा नहीं होता।4

असल में इस सामाजिक परिवर्तन को मीडिया ने लक्षित किया भी है और इस संबंध में कई रिपोर्टे भी प्रकाशित हुई हैं। द ट्रिब्यून में गीतांजलि गायत्री  की ऐसी ही एक रिपोर्ट को नीचे उद्धृत किया गया है।

And, there are indicators of change all around. That the khaps, today, are a divided house is no secret. The cracks have been amply and ably displayed at their meetings every now and then. Then, there are villagers, especially women folk, who are beginning to leave their homes to watch plays with “their” issues at heart. Like those staged by members of the Jann Natya Manch. “The village women no longer want to be mute spectators. After our performances, the most recent being a play titled ‘Yeh Duniya Karwat Badlegi’, they voice their concerns on sensitive subjects like khaps verdicts and honour killings which are extensively portrayed. We have been threatened against staging our plays but we take it in our stride and go right ahead,” explains Naresh Prerna of the Manch.5

शायद मीडिया को इस तरह की प्रवृतियों पर अधिक नजर रखने और उन्हें अधिक प्रमुखता देने की जरूरत भी है बजाय केवल सनसनीखेज रिपोर्टिंग के। असल में मीडिया समूहों को लगता है कि उनका पाठक या दर्शक वर्ग ज्यादातर शहरों में केंद्रित है और इसी कारण शायद गांव-देहात की समस्या को शहरी नजरिए से देखने की कोशिश होती है और यहीं से समस्या की शुरूआत होती है। सामान्य रिपोर्टों को छोड़ भी दे तो भी संपादकीय लेखों तक में जिस तरह खाप पंचायतों के खिलाफ एकतरफा स्टैंड लिया गया वो शायद इसी का नतीजा है।जनसत्ता ने अपने रविवारी में लिखा-‘खाप पंचायते सामाजिक संस्थाएं हैं। वे चाहे कितनी ही अहम क्यों न हो लेकिन वे अदालतों का स्थान नहीं ले सकती। ऐसा करना राज्य व्यवस्था को चुनौती देने के समान है।इसलिए इस तरह की सज़ा सुनाने और उसे लागू करने वाले लोग अपराधी हैं और उनके साथ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। कई बार विशेष किस्म के अपराधों पर असरदार नियंत्रण के लिए विशेष कानून बनाने की जरूरत पड़ती है।खाप पंचायतों द्वारा किया जा रहा अपराध समाज के लिए बड़ी खतरा बनता जा रहा है।खाप पंचायतों द्वारा दिए जाने वाले  पिछले कुछ फैसलों को ध्यान में रखते हुए इस समस्या से निपटने के लिए अलग और कठोर कानून बनाने की जरूरत है।’6

खाप पंचायतों के प्रकरण पर ब्लाग जगत में भी खूब लिखा गया है जो मीडिया का नया उभरता और सशक्त माध्यम है। वहां अभिव्यक्ति ज्यादा खुली व बेलाग है जिससे वहां कई अतिवादी प्रतिक्रियाएं भी देखी जा सकती है।उदाहरण के लिए जाटवर्ल्ड नाम के एक ब्लाग में हवा सिंह सांगवान की इस टिप्पणी को देखें-

‘सबसे पहले हमे यह मानना होगा की गौत्र प्रणाली स्पष्ट रूप से विज्ञान पर आधारित हैं जो हमारे जाट जीन्स को सक्रिय रखने के लिए अनिवार्य हैं | जिस धर्म या समाज में इस प्रथा का अभाव हैं उनमे प्रजनन शक्ति में भारी गिरावट आई हैं | वैज्ञानिक परीक्षणों से यह प्रमाणित हो चूका हैं की एक ही समूह में रहने वाले जंगली जानवरों में भी प्रजनन की भारी गिरावट आई हैं | उदहारण के लिए अफ्रीका के जंगलों में एक समूह में रहने वाले शेरो के झुंड समाप्ति के कगार पर पहुच रहे हैं | संक्षेप में यही कहना हैं की जाटों की गौत्र प्रथा विज्ञान पर आधारित हैं जिस पर जाट कौम को नाज होना चाहिए और जाटों को अपने अस्तित्व की रक्षा जी जान से करनी चाहिए |अब प्रश्न यह हैं की इस व्यवस्था में अवरोध क्या हैं ? इसका एक मात्र बड़ा अवरोध सन् 1956 में बनाया गया ‘ हिन्दू – कोड ‘ हैं जिसमे विवाह के लिए गौत्र का कोई भी प्रावधान नहीं हैं | इसके अनुसार सगे भाई बहन के रिश्ते को भी ‘ हिन्दू कोड ‘ वैध मानता हैं | इसी कारण दिल्ली हाई कोर्ट में 21 जून 2008 को एक संगौत्र विवाह को वैध ठहरा दिया गया | इसलिए हमारे समाज में जो इस प्रकार का गैरकानूनी और हमारे अनुसार गैरधार्मिक कृत्य करता हैं उसके साथ कानून और प्रशासन हैं | हमारी पंचायते अलग – थलग पड़ जाती हैं और उन पर पुलिस प्रशासन जुल्म ढाता हैं | न्यायालय हमारी पंचायतो के विरोध में फैसले देता हैं और जाट समाज मारा – मारा फिरता हैं जबकि मुख्य दोषी केवल हिन्दू कोड हैं | यही जाट कौम का आज सबसे बड़ा दुश्मन हैं।’7

दूसरी तरफ ब्लाग जगत में इस मामले में संतुलित टिप्पणियों की भी कमी नहीं है। उदाहरण के लिए बालमुकुंद की इस टिप्पणी को देखें-

‘जब हम खाप पंचायतों के योगदान और गौरवपूर्ण अतीत की बात करते हैं तो यह भुला देते हैं कि उस समय संविधान और आईपीसी की धाराएं नहीं थीं। एक स्वतंत्र गणतांत्रिक देश के रूप में हमने वह संविधान स्वीकार कर लिया है। इसलिए बात इस पर हो कि हमें संविधान चाहिए या खाप पंचायतों का फैसला? हम इनमें से कोई एक ही चुन सकते हैं। कुछ लोग बीच की राह निकालते हैं। उनका तर्क है कि संविधान और कानून यहां के लोगों और समाज के लिए ही बने हैं। यदि लोग नहीं चाहते तो नियम-कानून में बदलाव किए जाने चाहिए। यह तर्क ठीक है, लेकिन जिस मौके पर और जिस उद्देश्य से ये तर्क दिए जा रहे हैं, उनके खतरों पर भी विचार कर लेना चाहिए। यह विश्वास करना कठिन है कि सती और देवदासी प्रथा पर रोक लगाने वाले कानून इसलिए बने क्योंकि बहुमत जनता ने ऐसा चाहा था।’8

टीवी चैनलों की बात करे तो उन्होंने भी नई दिल्ली के अपने स्टूडियों में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधिय़ों को बुलाकर बहस तो जरूर करवाई लेकिन प्रिंट मीडिया की तुलना में स्पॉट पर जाकर इन मामलों को समझने का वक्त चैनलो ने कम ही निकाला। वैसे भी ग्रामीणों के रोष में उन्हें अपनी ओबी वैन क्षतिग्रस्त होने का खतरा भी रहा होगा। हां, इस मामले में  खामोश रहने वाले या खाप पंचायतो का अप्रत्यक्ष समर्थन करने वाले राजनेताओं की लाइव खिंचाई करने में टीवी चैनलों की भूमिका जरूर रही। कुरूक्षेत्र से सांसद नवीन जिंदल को खाप पंचायतों के समर्थन में एक बयान देने के बाद उस पर सफाई देने के लिए लगभग हर चैनल पर जाना पडा। एनडीटीवी इंडिया के ‘विनोद दुआ लाइव प्रोग्राम’ में विनोद दुआ और नवीन जिंदल में बहस हो गयी। मुद्दा था समान गोत्र की शादी को लेकर खाप पंचायत के स्टेंड के समर्थन करने का। इस बारें में पूरी स्टोरी को देखने के बाद नवीन जिंदल भड़क गए।  उनका कहना था की वे समान गोत्र में शादी को लेकर हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं लेकिन उन्होंने कहा की हमारी परंपरा रही है कि समान गोत्र में शादी करने से दूर रहा जाय। बीबीसी जैसे अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी हरियाणा में इस समस्या का जायज़ा लेने का प्रयास किया है और साथ ही ये जानने की कोशिश की है कि ऐसी कौन सी सामाजिक परंपराएँ, दबाव और कारण है जिनसे ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों को शह मिलती है। इस संबंध में कई लेख बीबीसी की वेबसाइट पर देखे जा सकते हैं।

प्रिंट,इलेक्ट्रोनिक व न्यू मीडिया के साथ साथ खाप पंचायतों से जुड़े इन प्रकरणों की धमक बॉलीवुड तक भी सुनी जा सकती है। इसी विषय पर अपनी फिल्म खाप –ए लव स्टोरी पूरी कर चुके निर्देशक अजय सिनहा मानते हैं कि मनोज-बबली हत्याकांड की रिपोर्ट समाचार पत्रों में पढ़ने के बाद ही उन्हें यह फिल्म बनाने का ख्याल आया। अपने मकसद के बारे में कहते हैं-

“The movie is being made with the sole aim to criticize honour killings. No excuse can justify a murder. We aren’t passing a judgment on the same gotra marriage or decisions of Khap Panchayats in the film, we are just raising a voice against injustice done to youngsters’.9

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि खाप पंचायतों से जुड़े सभी प्रकरणों को मीडिया में काफी उठाया गया है। लेकिन मीडिया कवरेज के मामले में सही या संतुलित दृष्टिकोण क्या होना चाहिए इस पर मंथन किए जाने की जरूरत है। यह मंथन बुद्धिजीवियों,नेताओं,मीडिया,खाप पंचायतों,खाप पंचायतों सभी के स्तर पर होना चाहिए और इसके लिए प्लेटफार्म मीडिया को ही मुहैया कराना पड़ेगा। इसकी शुरआत किसी न किसी रूप में हुई भी है लेकिन इसे और गति दी जानी चाहिए क्योंकि आखिर में उसी से तय होना है कि समाज किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

संदर्भ

  1. द ट्रिब्यून 5 जुलाई 2010,पेज 1
  2. द ट्रिब्यून 15 जुलाई 2010, पेज 1
  3. द ट्रिब्यून,19 जुलाई 2010 ,पेज 11
  4. samachar4media
  5. द ट्रिब्यून,19 जुलाई 2010 ,पेज 11
  6. कानूनी खोल की तलाश में खाप सरदार,जनसत्ता रविवारी,26 जुलाई 2010
  7. ब्लाग जाटवर्ल्ड
  8. नवभारतटाइम्स ब्लाग्स
  9. द ट्रिब्यून लाइफ स्टाइल ,14 जून 2010 ,पेज 1

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व पंजाब विवि,चंडीगढ़ में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं)

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