भाईचारे की अवधारणा और खाप पंचायतें -सहीराम

टूटते सामाजिक मूल्यों और संबंधों के इस दौर में भाईचारा एक बहुत ही पवित्र सी अवधारणा के रूप में सामने आता है। भाईचारे की यह अवधारणा वैसे तो पारिवारिक संबंधों को व्याख्यायित करने वाली अवधारणा ही है क्योंकि स्थूल रूप में भाईचारे का अर्थ होता है-जहां भाइयों जैसा आचार-व्यवहार हो। पर इसका दायरा रक्त संबंधों से बाहर तक जाता है। अपने व्यापक अर्थ में यह लोगों के रहन-सहन के समान स्तर और साझा सुख-दुख को भी समेटती है। इसकी शास्त्रीय परिभाषा में न जाकर इसके व्यापक अर्थ को हम यूं समझ सकते हैं कि एक ही स्तर का जीवन जीनेवाले और अपने सुख-दुख को साझा करनेवाले भाईचारे के इस संबंध के दायरे में आ जाते हैं जिसमें उदार नजरिए से धर्म या जाति की सीमाएं आड़े नहीं आती।

वैसुधैव कुटुंबम की हमारी प्राचीन अवधारणा, जो वास्तव में इंसानी भाईचारे की अवधारणा है, इसे अंतर्राष्टीय फलक प्रदान करती है, जहां राष्ट्र का भाईचारा सामने आता है। पर इसमें भी वही समान स्थितियां और साझा सुख-दुख मुख्य भूमिका निभाते हैं, जिनका जिक्र हमने ऊपर किया है। मसलन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब दुनिया एक नया आकार ग्रहण करने लगी तो सामराज की गुलामी का जुआ ढ़ो रहे राष्ट्र का भाईचारा सामने आया और खुद हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और उसके नेताओं ने आगे बढक़र इस भाईचारे का प्रदर्शन किया। इसके बाद गुटनिरपेक्ष देशों का भाईचारा सामने आया, जिनमें अधिकतर वे देश शामिल थे, जो सामराजी शोषण का शिकार रहे थे। फिर दक्षिण अफ्रीका के संदर्भ में विश्व मंच पर रंगभेदविरोधी भाईचारा सामने आया। ऐसा ही भाईचारा फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता के रूप में भी सामने आया।

यहां यह उल्लेखनीय है कि भाईचारे की ये तमाम अभिव्यक्तियां उन्हीं राष्ट्रों तथा जनगणों के बीच सामने आयी जिनके संघर्षों का, समस्याओं का और उनके सुख-दुख स्तर काफी हद तक एक जैसा था। ये वे राष्ट्र और जनगण थे जो कभी सामराज के गुलाम रहे थे, शोषण का शिकार रहे थे और जिन्होंने इस गुलामी से, इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए एक जैसा संघर्ष किया था, कुर्बानियां दी थी और उन्हीं के आधार पर स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद अपने-अपने राष्ट्रों का निर्माण शुरू किया था। गौर करनेवाली एक बात यहां यह भी है कि सामराजी ताकतों के बीच इस तरह का भाईचारा कभी सामने नहीं आया, बल्कि हमेशा उनके स्वार्थों का टकराव ही सामने आता रहा, जिसके चलते दुनिया को दो विश्वयुद्ध और दूसरे अनेकानेक युद्ध झेलने पड़े।

विश्वीकरण के इस दौर में एक तरफ जहां समाजवादी शिविर खत्म हुआ, जिसका विश्व के शोषित-पीडि़त राष्ट्रों और जनगणों की एकजुटता को नैतिक समर्थन हासिल था और जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भाईचारे में दरारें आयीं, गुटनिरपेक्ष आंदोलन कमजोर हुआ, शोषित-पीडि़त राष्ट्रों और जनगणों की एकजुटता में कमी आयी और फिलिस्तीन जैसा मुद्दा निस्तेज हुआ।

वहीं दूसरी तरफ महाद्वीपीय-उप-महाद्वीपीय या उससे भी छोटे स्तर के संगठन अस्तित्व में आए, जो मुख्यत: आर्थिक हितों की रक्षा के लिए बनाए गए। इसी दौर में कट्टïरतावादी और खासतौर से धार्मिक कट्टïरतावादी आंदोलनों ने जोर पकड़ा। जिसे आज तथाकथित इस्लामिक आतंकवाद या जिहाद कहा जाता है, वह इसी दौर की पैदाइश है। पश्चिम ने इसे सभ्यताओं के टकराव का नाम दिया।

फिर अगर हम राष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो भाईचारे का एक रूप वर्गीय भाईचारा के रूप में देखने में आता है, जहां शोषित-पीडि़त जन एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। इस तरह के भाईचारे में एक जैसी समस्याओं और पीड़ाओं से जुझते हुए वे साथ आते हैं और मिलकर उनसे पार पाने, उनसे निजात पाने का रास्ता तलाशते हैं। लेकिन हमारे यहां वर्गीय भाईचारे का यह रूप काफी कमजोर रहा है। फिर भी यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यहां भी शोषित का भाईचारा ही दिखाई देता है, शोषकों का नहीं। उनके बीच तो हमेशा स्वार्थों का टकराव ही दिखाई देता है जो अंतत: शोषितों के भाईचारे को भी प्रभावित करता है और फिर विकृत करता है।

फिर भाईचारे का एक और रूप हमारे जैसे बहुभाषायी, बहुधार्मिक, बहुजातीय देश में सांप्रदायिक सद्भाव के रूप में दिखाई देता है और जब इसको निहित स्वार्थों की नजर लगती है तो देश की टूटन सामने आती है और उसकी चीखें तथा कराहें सुनाई देने लगती हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो हमारे देश में इस सांप्रदायिक भाईचारे को सबसे पहले नजर लगी ब्रिटिश सामराजियों की जिन्होंने 1857 के हमारे स्वतंत्रता संग्राम के बाद बांटो और राज करो की अपनी कुटिल नीति का खुलकर इस्तेमाल किया और जिसकी भयावह परिणति 1947 में देश के बंटवारे के रूप में सामने आयी। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से मिले इस नुस्खे का बाद में खुद हमारे शासक वर्गों और निहित स्वार्थों ने जमकर इस्तेमाल किया जिसका नतीजा देश को खालिस्तान जैसे तरह-तरह के पृथकतावादी आंदोलनों से लेकर अयोध्या जैसे धार्मिक कट्टïरतावादी आंदोलनों के रूप में और अनगिनत दंगों के रूप में भुगतना पड़ा।

मेहनतकशों के इस भाईचारे और उनकी एकजुटता को तोडऩे का काम एक तरफ धर्म और राजनीति के घालमेल ने किया, वहीं दूसरी तरफ यह काम पहचान की राजनीति ने किया। धर्म और राजनीति के घालमेल ने जहां सांप्रदायिक राजनीति को पोषा, वहीं पहचान की राजनीति ने जातिवादी ताकतों को मजबूती प्रदान की। वामपंथ के कमजोर रहने के कारण इन ताकतों को खुलकर खेलने का मौका ही मिल गया। इस तरह एक आदर्श राष्टï्र और आदर्श समाज के लिए भाईचारे-वर्गीय और सांप्रदायिक दोनों ही तरह के भाईचारे के जिस दायरे को उत्तरोत्तर व्यापक होते जाना चाहिए था, इस दौर में आकर उल्टे वह सिकुडऩे लगा। वर्गीय भाईचारा जहां जाति की राजनीति की भेंट चढ़ गया, वही सांप्रदायिक भाईचारा धर्म की राजनीति का शिकार हो गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि धर्म की राजनीति करनेवाले बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही इसे राजनीति के साथ गड्डïमड्डï करके चलते हैं और अंतत: पृथकतावादी रास्ता ही अख्तियार करते हैं।

लेकिन जैसे धर्म की राजनीति किसी एकता का आधार नहीं हो सकती, वैसे ही जाति की राजनीति भी कोई एकता कायम नहीं सकती। यही वजह है कि मंडल आंदोलन के समय पिछड़ों की जो एकता दिखाई दे रही थी, वह अब विभाजित होकर अतिपिछड़ों के एक नए समूह के रूप में सामने आयी है, जैसा कि बिहार के हाल के चुनाव में देखने में आया है।

पहचान की राजनीति के इस दौर में अपनी अलग पहचान की ललक कितनी बढ़ गयी इसका अंदाजा इसी लगाया जा सकता है कि इधर लगभग हर जाति के महासम्मेलन होने लगे हैं। जातियों की महासभाएं नए सिरे से सवंरने लगी हैं और चुनावों के समय खुलेआम अपनी जाति के नुमाइंदों का नागरिक अभिनंदन किया जाता है, भले ही वे अलग-अलग पार्टियों से चुनाव जीत कर आए हों। आरक्षण की मांग को लेकर जिन जातियों के इधर नए आंदोलन उठे हैं, वे भी जायज हक की लड़ाई से ज्यादा इसी ललक की उपज दिखाई देते हैं जैसे जाटों और मराठों जैसे प्रभुत्वशाली जातिगत समूहों द्वारा उठायी गयी आरक्षण की मांग। इन जातिगत लामबंदियों में भाईचारे का एक और रूप सामने आता है जो गुर्जरों के आरक्षण आंदोलन में देखने में आया जब राजस्थान के गुर्जरों के आंदोलन के समर्थन में हरियाणा, दिल्ली और उत्तरप्रदेश के गुर्जर मैदान में उतर पड़े जबकि उन्हें उस आरक्षण का लाभ नहीं मिलना। लेकिन यह पहचान की राजनीति का हिस्सा है। जबकि व्यापक जनता के भाईचारे की टूट इस रूप में सामने आयी कि गुर्जर और मीणा एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए।

इस माने में यह ऐसा दौर है जब निहित स्वार्थ जनता के आपसी भाईचारे में दरारें पैदा कर अपनी स्वार्थसिद्घि में लगे हैं। विश्व स्तर पर यह काम साम्राज्यवाद करता है जब वह शोषित-पीडि़त जनगणों के भाईचारे को तोडक़र अपने हितों और स्वार्थों को आगे बढ़ाता है, वहीं राष्टï्रीय स्तर पर यही काम शासक वर्ग की पार्टियां करती हैं। और आर्थिक संकट और उससे पैदा होनेवाला सामाजिक संकट ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों जनता के भाईचारे की यह टूटन ज्यादा विकराल रूप में सामने आने लगती है, जब एक तरफ धर्म के नाम पर जनता के व्यापक तबकों को सांप्रदायिक विद्वेष की आग में झौंक दिया जाता है और दूसरी तरफ जाति के नाम पर इन्हीं तबकों को एक-दूजे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है।

आज हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के क्षेत्रों में खाप पंचायतों के सिलसिले में जिस भाईचारे की दुहाई सामने आती है, यह वह भाईचारा नहीं है जो समाज के बड़े हिस्सों के बीच सुख-दुख के समान स्तरों और उन्हें साझा करने से पैदा होता है, जो आपस में जोड़ता है, तोड़ता नहीं और जिसमें उदारता होती है, स्वार्थहीनता होती है, रचनात्मकता और सकारात्मकता होती है। दूसरे के काम आने में सुख का अहसास होता है। भाईचारे की यह दुहाई बड़े सरोकारों के पीछे छूटने, सिकुडऩे और स्वार्थों की होड़ में टूटते सामाजिक संबंधों तथा मूल्यों से निकली है जिसमें सोच का पिछड़ापन और कट्टïरता है, नकारात्मकता है और बहुत ही छोटे स्तर पर अपने स्वार्थों को आगे बढ़ाने की अंधी होड़ है।

इस समय से अगर थोड़ा ही पीछे लौटकर देखें, जब सरोकार थोड़े बड़े थे तो इन्हीं क्षेत्रों में कोई तीनेक दशक पहले व्यापक किसान आंदोलन उठे थे। उससे जरा सा और पहले जातिगत पंचायतें भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए समाज सुधार के झूठे-सच्चे प्रयास कर रही थी जिनमें दहेजविरोध और खर्चीली शादी-ब्याह का विरोध आदि शामिल था।

तब खाप पंचायतें भी कुछ सक्रिय थी और यह मान लेने में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि वे सक्रिय रही होंगी। क्योंकि वास्तव में तो यह कहा जा रहा है उनका इतिहास बड़ा प्राचीन है और उन्होंने विदेशी आक्रांताओं तक से लौहा लिया है। मध्यकाल में हो सकता है उनकी कोई भूमिका रही हो क्योंकि उस समय जनलामबंदी का और कोई दूसरा रूप था ही नहीं। पर आज जब उनके इस इतिहास की याद दिलायी जाती है तो इसके पीछे एक कोशिश तो उनके लिए वैधता और मान्यता हासिल करने की ही होती है, जो इन्हें हासिल नहीं है। और दूसरी कोशिश उन्हें प्राचीनता के ग्लैमर में पेश करने की होती है, ताकि एक आकर्षण पैदा हो जैसे कि इथनिक चीजों के प्रति होता है और मीडिया इसे ग्लैमरस बनाने में जाने-अनजाने मदद भी करता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि खाप पंचायतों ने अतीत में अगर कोई रचनात्मक तथा सकारात्मक भूमिका अदा की है, तो आज भी उनका वही रूप कायम होगा। बहरहाल, दो-तीन दशक पहले के जिस वक्त की हम बात कर रहे हैं अगर उस समय खाप पंचायतें सक्रिय थी तो कमोबेश वे भी समाज सुधार की वैसी ही भूमिका अदा कर रही थी,जैसी कि अन्य जातिगत पंचायतें कर रही थी।

लेकिन जिस तरह विश्वीकरण के इस दौर में एक तरफ उदारीकरण की सरकारी नीतियों के चलते और दूसरी तरफ धार्मिक कट्टïरता बढऩे से पैदा हुयी सांप्रदायिकता तथा पहचान की आकुलता से पैदा हुयी जातिगत राजनीति के चलते वह किसान आंदोलन बिखर गया और उसके सरोकार बिसर गए, वैसे ही इन जातिगत तथा खाप पंचायतों के समाज सुधार के सरोकार भी बिसर गए और उनकी जगह धीरे-धीरे कट्टरता ने ली। हालांकि वे पहले भी बहुत उदार नहीं थी। पर आज खाप पंचायतों को इससे कोई सरोकार नहीं है कि उनके समाज में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। कन्या भ्रूण हत्या हो रही है। आज दहेज हत्यारों और बलात्कारियों को सजा देने के लिए कोई खाप पंचायत नहीं बैठती। आज खाप पंचायतें चोरी-चकारी, लूटपाट या डकैती करनेवालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। रिश्वतखोरों या भ्रष्टाचारियों से उनका कोई विरोध नहीं है। बल्कि ज्यादातर तो वे सम्मान ही पाते हैं।

खाप पंचायतों का सरोकार अब धीरे-धीरे सिकुडक़र अपनी मर्जी से शादी करनेवाले युवक-युवतियों के खिलाफ फतवे जारी करना या उन्हें सजा दिलाना भर रह गया है। इसके लिए सबसे ज्यादा दुहाई आपसी भाईचारे और नैतिकता की दी जाती है। जहां तक नैतिकता का सवाल है तो यह वह समाज है जहां देवर-भाभी या जीजा-साली के दैहिक संबंधों को सामान्य मानकर चला जाता है। जिनकी गवाही इस सिलसिले में चलनेवाली गालियों या मजाकों से मिलती है।

यह वही समाज है जहां आदर्श तो हैं भाभी के रूप में सीता और देवर के रूप में लक्ष्मण, लेकिन वास्तव में जहां बड़े भाई की मौत के बाद उसकी पत्नी को छोटे भाई की चादर ओढ़ा दी जाती है और किसी को कोई नैतिक कष्टï नहीं होता। यह वही समाज है जहां शादियां न होने पर औरतें खरीद कर लायी जाती हैं और किसी को कोई एतराज नहीं होता।

यह हर कोई जानता है कि किसी भी गांव का माहौल आदर्श और पवित्र नहीं होता। वहां प्रेम संबंध भी बनते हैं। विवाहित स्त्री-पुरूषों में बनते हैं तो कुंवारे लडक़े-लड़कियों में भी बनते हैं। अवैध भी बनते हैं, छल के भी बनते हैं और निश्छल भी। पहले भी बनते थे और आज भी बनते हैं। लेकिन एक फर्क है। पहले इन संबंधों को तरह-तरह के आवरणों में छुपाया जाता था, जो अनैतिक था। बल्कि प्रभुत्वशाली विचार के दबाव में वे खुद भी इन संबंधों को अनैतिक ही मानते थे। आज शिक्षा के प्रसार, साथ-साथ लिखने-पढऩे, साथ आने-जाने, मिलने-जुलने, दुनिया देखने और चेतना का स्तर बढऩे के बाद ये लडक़े-लड़कियां अपने प्रेम संबंधों को छुपाते नहीं। बल्कि उसी रूप में स्वीकार करते हैं, जिस रूप में वे बने हैं और आपस में शादी करके उन्हें समाज से भी उसी रूप में मनवाना चाहते हैं। इस माने में वे बेहद सच्चे और नैतिक हैं और साहसी भी।

नैतिकता के बाद बात आती है भाईचारे की। आमतौर पर दलील यह दी जाती है कि गांव का आपस में भाईचारा होता है। लेकिन यह भाईचारा इस रूप में नहीं कि एक-दूसरे का सुख-दुख बांटें। मुसीबत में एक-दूसरे के काम आएं। अगर कोई सरकार की ज्यादती का शिकार हो रहा है तो उसके पक्ष में खड़े हो जाएं और कोई साहूकार किसी को लूट रहा है तो मिलकर उसका विरोध करें। अगर किसी की बेटी देहज के लिए उत्पीडि़त है तो उसका साथ दें। आर्थिक तंगी के चलते किसी का बच्चा पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहा है तो उसकी मदद करें। यह सुखियों का दुखियों के साथ भाईचारा नहीं है और सुखियों के बीच भाईचारा कभी हो नहीं सकता। दुखद स्थिति यह है कि दुखिया के बीच का भाईचारा भी विकृत हो रहा है। और सच तो यह है कि भाईचारे की इस भावना को इतना घुन लग चुका है जिस क्षेत्र की हम बात कर रहे हैं और जहां खाप पंचायतें सक्रिय हैं वहां भाई-भाई ही नहीं, पिता-पुत्र खून के प्यासे हैं। क्योंकि यहां जमीनें इतनी महंगी हो चुकी हैं कि उनके बिकने पर करोड़ों का मुआवजा मिल रहा है और उसके लिए सचमुच खून बह रहा है।

लेकिन किसी जवान लडक़े-लडक़ी के शादी कर लेने पर यह घुन लगा भाईचारा अचानक नवीकृत हो उठता है और फौरन पंचायतें बैठ जाती हैं और फतवे जारी होने लगते हैं। जाने-अनजाने मीडिया भी इसमें योगदान देता है। मसलन उसने ऐसा शादियों के लिए एक शब्द गढ़ लिया है-‘‘सगोत्रीय विवाह’’,जो इन खाप पंचायतों के लिए भारी मददगार साबित हो रहा है।

क्योंकि वास्तव में ऐसी सैकड़ों शादियों में सगोत्रीय विवाह की एक-आध मिसाल ही बमुश्किल मिलेगी। सच्चाई यह है कि न तो इस तरह की शादियां एक ही गांव के लडक़े-लड़कियों में हो रही हैं और न ही एक ही गौत्र में ये शादियां हो रही है।

इनमें ज्यादातर मामले इस तरह के हैं जैसे कि किसी गांव में एक ही जाति के दो-तीन गौत्र के लोग रह रहे हैं। आमतौर पर वहां एक प्रमुख गौत्र होता है और अक्सर गांव उसी गौत्र का कहलाता है। समस्या तब आती है कि जब कम संख्यावाले गौत्र के किसी घर में गांव के उस प्रमुख गौत्र की कोई लडक़ी बहु बनकर आ जाती है। मीडिया में इसे भी सगौत्रीय शादी कह दिया जाता है जबकि वास्तव में यह होती नहीं है। यह पूरी तरह विधिवत शादी होती है, जितने गौत्र छोडक़र शादी करने की परंपरा है, वे भी छोड़े जाते हैं और दोनों पक्षों के परिवारों की सहमति भी होती है।

विरोध होता है तो गांव में रहनेवाले प्रमुख गौत्र के लोगों का, जो अपने गौत्र की बेटी को अपने गांव की बहू के रूप में नहीं देख सकते या इस तर्क से अपने गांव के किसी लडक़े को अपने जंवाई या बहनोई के रूप में नहीं देख सकते। जबकि वास्तव में वह होता नहीं है।

फिर पड़ोस का गांव भी भाईचारे में आ जाता है। आस-पड़ोस के दो गांव के किसी युवक-युवती में प्रेम संबंध बनते हैं और वे आपस में शादी कर लेते हैं तो उसे भी भाईचारे पर कलंक मानकर ही मान्यता नहीं दी जाएगी।
फिर आता है खाप का आपसी भाईचारा। जैसे एक खाप में तीन-चार गौत्र के गांव और लोग शामिल हैं। वे आपस में अपने को भाई मानते हैं इसलिए उनकी शादियां इन गौत्रों में नहीं होंगी। अब आमतौर पर इस क्षेत्र में होता यह है कि तीन गौत्र तो पहले ही छोड़े जाते हैं, उनमें शादी नहीं हो सकती-खुद अपना, मां का और दादी का। पहले नानी का गौत्र भी छोड़ा जाता था, पर अब उसे नहीं छोड़ा जाता। नानी-कानी होने लगी है। बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेशवाले क्षेत्र में तो अब दादी का गौत्र भी नहीं छोड़ा जाता।

लेकिन हरियाणा के बड़े हिस्से में अभी तीन गौत्र छोडक़र शादी करने की ही परंपरा चल रही है। इन तीन गौत्रों को छोडऩे के बाद अगर कोई ऐसे गांव में रह रहा है जहां कोई और गौत्र प्रमुख है तो उसे भी छोड़ा जाएगा। इसके अलावा जिस खाप विशेष में उसका गौत्र आता है उस खाप में शामिल दूसरे गौत्रों में भी शादी नहीं हो सकती। इस तरह जोड़ लीजिए कि कितने गौत्र हो गए।

इतने गौत्रों को छोडक़र तय सामाजिक नियम-कायदों से शादी करना भी व्यवहारिक रूप से भी कितना मुश्किल है इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसे में इन गौत्रों के किसी लडक़े-लडक़ी के अपनी मर्जी से शादी करना तो बहुत दूर की बात है, अगर माता-पिता की मर्जी से विधिवत शादी हो जाए तो भी पंचायत बैठ जाएगी। और ऐसा सचमुच होता रहा है।

एक जमाने में इस क्षेत्र के एक बड़े किसान नेता छोटूराम ने किसान जातियों का भाईचारा और एका कायम करने के लिए ‘‘अजगर’’ का नारा दिया था। अर्थात अ से अहीर, ज-जाट, ग से गूजर और र से राजपूत। इस भाईचारे का आधार यही माना गया था कि इनके सामाजिक हालात, रहन-सहन और दुख-दर्द एक जैसे हैं।
लेकिन खाप पंचायतों के भाईचारे के लिहाज से देखें तो राजपूतों में शादी के लिए एक खुद अपना गौत्र ही छोड़ा जाता है। बल्कि उनमें तो पहले एक परंपरा यह भी थी कि जिस गांव में लडक़ी ब्याही जा रही है, उस गांव में माता-पिता की सहमति से एक घर ऐसा चुन लिया जाता था, जिस घर की वह बेटी मान ली जाती थी और यह रिश्ता बाकायदा निभाया जाता था।

अहीरों में दो या तीन गौत्र छोडऩे की यह परंपरा है तो जरूर। लेकिन उनकी किसी खाप पंचायत के बारे में कभी न सुनने को मिला और न ही पढऩे को। वास्तव में दो या तीन गौत्र छोडक़र शादी करने की यह पंरपरा इस क्षेत्र की तकरीबन सभी जातियों में है चाहे वे सवर्ण हों, पिछड़ी हों या दलित। लेकिन जाट-गूजरों को छोडक़र बाकी किसी जाति में इस तरह के विवाद सामने नहीं आते, न पंचायतें बैठती हैं, न फतवे सुनाए जाते हैं और न अपने ही बच्चों की हत्या की जाती है। जाटों-गूजरों में इस तरह के जो विवाद सामने आते हैं इसकी वजह मुख्यत: राजनीतिक है। क्योंकि ये दोनों ही इस क्षेत्र की प्रभावशाली जातियां हैं, उनके पास पहले हरित क्रांति की उपलब्धियों मार्फत पैसा आया और अब रीयल एस्टेट के बूम से पैसा आ रहा है। इसलिए राजनीतिक आकांक्षाएं बढ़ रही हैं, जो एक तरफ इस पैसे के बल से पोषित हो रही हैं तो दूसरी तरफ सामुदायिक लामबंदियों से और बलवती हो रही हैं। जिनका बूता बड़े राजनीतिक खेल करने का है वे आरक्षण के आंदोलन चलाते हैं और जो छुटभैये हैं वे इस तरह की पंचायतों के जरिए अपनी आंकाक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं। बहरहाल, यह हमारा विषय नहीं है।

हम खाप पंचायतों के भाईचारे की ही बात करें तो यह दावा किया जाता है कि खापों में उन गांवों तथा क्षेत्र की सभी जातियां शामिल होती हैं और इन्हें सर्वजातीय खाप पंचायतें ही कहा जाता है। पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है। इनमें आधी आबादी यानि महिलाओं की तो वैसे ही कोई भूमिका नहीं होती और वे इन पंचायतों से पूरी तरह बाहर होती है। फिर इनमें न दलित शामिल होते हैं, न कारीगरी पेशे से जुड़ी पिछड़ी जातियां और न ही ब्राह्मïणों और बनियों जैसी सर्वण जातियां। यहां तक कि अजगर अवधारणा की किसान जातियां भी इनमें शामिल नहीं होती और इस तरह ये खाप पंचायतें मुख्यत: एक जाति विशेष के कुछ गौत्रों के पुरूषों की ही पंचायतें बनकर रह गयी हैं। हो सकता है कभी इनका रूप सर्वजातीय रहा हो। लेकिन तब शायद सरोकार बड़े रहे होंगे। आज जब इन पंचायतों का एकमात्र सरोकार शादी-ब्याह में गौत्रों के चयन का ही रह गया है तो ऐसे में इनका यही रूप रह सकता है।

यहां इस का उल्लेख करना विषयांतर नहीं होगा कि यह समस्या मुख्यत: दिल्ली के आसपास के क्षेत्र की बनकर रह गयी है। बताया जाता है कि इसकी सीमा पश्चिम में हांसी, दक्षिण में चरखी दादरी, उत्तर में कैथल और पूर्व में दादरी है।

जाटों में यह देशवाली जाटों की ही समस्या है। बागड़ी जाटों की नहीं है। इस सिलसिले में चौटाला गांव का उदाहरण अक्सर दिया जाता है जिसका जिक्र मीडिया में भी आया है कि वहां गांव के भीतर ही शादियां हो जाती हैं। जिसकी एक वजह गांव का आकार में बड़ा होना होता है और दूसरी वजह होती कई गौत्रों का उस एक ही गांव में रहना।

बागड़ी जाट-गूजरों में जिस गौत्र में भाई की शादी होती है, उसी गौत्र में बहन की शादी भी हो सकती है। यानि साले का जो गौत्र है वह बहनोई का भी हो सकता है। कोई समस्या नहीं। फिर शादी-ब्याह में आटे-साटे की एक और परंपरा यहां चलती है। इस परंपरा को इस तरह समझा जा सकता है कि जैसे किसी गरीब परिवार के लडक़े शादी नहीं हो पा रही, तो उसकी बहन की शादी के बदले में उसकी शादी करायी जाती है। पहले बहन की उसी तरह के किसी लडक़े से करायी जाती है, जिसकी गरीबी की वजह से शादी नहीं हो रही होती। इस शादी के बदले बहन की ससुरालवाला परिवार अपने किसी रिश्तेदार की लडक़ी की शादी उसके भाई से करा देता है। यह बाकायदा तय ढ़ंग से होता है। इस माने में देशवालियों के मुकाबले बागड़ के रिवाजों में थोड़ी उदारता है।

इसी तरह जिस क्षेत्र विशेष की यह समस्या है वहां के प्रभावशाली परिवार भी सहज ही इस तरह के संकट से बचकर निकल जाते हैं। मीडिया की ही रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम उत्तर प्रदेश में गूजरों के ऐसे अनेक प्रभावशाली परिवार हैं जिन पर लीक से हटकर शादियां करने के बावजूद खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों का कोई असर नहीं हुआ है।
इस सिलसिले में एक और बात गौरतलब है और वह यह कि इन पंचायतों को जितना बड़ा जनसमर्थन हासिल होने की बात कही जाती रही है,वह सच नहीं है। इसका खोखलापन इसी एक तथ्य से उजागर हो जाता है कि खाप पंचायतों में सक्रिय लोग पंचायतों का चुनाव भी नहीं जीत पाते हैं। बल्कि खाप पंचायतें तो कई बार संवैधानिक पंचायत निकायों के खिलाफ ही खड़ी हैं। वास्तव में उन्हें कोई वैधता हासिल नहीं है। अगर नजर डालें तो इन पंचायतों में सक्रिय लोग कौन हैं? इनमें मुख्यत: उन लोग के वारिस हैं जिन्हें भारत के संविधान और संवैधानिक निकायों के अस्तित्व में आने से पहले इन पंचायतों का मुखिया चुना गया था और उत्तराधिकार की सामंती पंरपरा के अनुसार जो अब खुद इनके मुखिया है। फिर रिटायर्ड किस्म के सरकारी कर्मचारी हैं जिनकी समाज निर्माण में कभी कोई रचनात्मक भूमिका नहीं रही। इसके बाद आते हैं निठल्ले जो अक्सर ताश खेलते हुए या गप्पें हांकते हुए अपना जीवन बिताते हैं। फिर वे ग्रामीण लंपट तत्व आते जो न विधिवत शिक्षा ग्रहण कर पाए और न ही जिन्हें कोई रोजगार हासिल है। अर्थात जो अपने लिए कोई रचनात्मक भूमिका तलाश पाए।

ऐसे में खाप पंचायतों के भाईचारे की दुहाई के खोखलेपन को सामने लाना जरूरी है। और इस खोखलेपन का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि इस दौर जब एक तरफ पुरानी मान्यताएं टूट रही हैं, शिक्षा आदि के प्रसार के चलते सामाजिक बंधनों से निकलने की कसमसाहट सामने आ रही है, परिवार छोटे हो रहे हैं तथा एक माने में उनके सामंती मूल्य पीछे छूट रहे हैं तथा बिसराए जा रहे हैं और दूसरी तरफ सामंती जमाने में जिन मूल्यों को सकारात्मक माना जाता था, उन तक में गिरावट आ रही है तब वे उन्हीं सामंती मूल्यों बरकार रखने की कोशिश कर रहे हैं, जो जब उन्हें सकारात्मक माना जाता था, तब भी सकारात्मक नहीं थे।

और इन्हीं मूल्यों को बरकरार रखने की कोशिश में ये खाप पंचायतें अपने ही बच्चों के कत्ल तक करवा रही है। प्रत्यक्ष रूप से नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से तो करवा ही रही हैं। जब खुद जाटों और गूजरों की परंपरागत शादियों में दादी और नानी के गौत्रों को विदाई दी जा रही है तथा कुछ सवर्ण जातियों में तो गौत्र के पैमाने को काफी उदार बना दिया गया है और उसे बड़े लचीले ढ़ंग से लागू किया जाता है, जैसे उदाहरणस्वरूप वर-वधु की अच्छी जोड़ी मिल रही है, दोनों पक्ष शादी के लिए राजी हैं, पर मां के गौत्र मिल रहे हैं तो वर-वधु में से किसी को चाची-ताई के गोद दिखाकर वह शादी कर दी जाती है। जब ऐसे उदार और लचीले पैमाने सामने आ रहे हैं तब खाप पंचायतें शादी के लिए छोड़े जानेवाले गौत्रों में तरह-तरह से इजाफा कर रहे हैं जो कतई व्यवहारिक नहीं है।

ये खाप पंचायतें एक ऐसी हारी हुयी लड़ाई लड़ रही हैं जिसमें उनका सामना अपनी सोच में स्पष्ट, स्त्री-पुरूष संबंधों में नैतिकता को मान देनेवाले और उन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनेवाले साहसी युवक-युवतियों से है जो जीवन की बाजी लगाकर बढ़ती तादाद में सामने आ रहे हैं। जबकि खाप पंचायतों के पाले में खड़े हैं वे लंपट तत्व जिन्हें हत्याएं करने तक से गुरेज नहीं है और बलात्कार को तो वे अपनी मर्दानगी का तमगा ही समझते हैं। इसके लिए वे किसी रिश्ते को सम्मान नहीं देते। गांवों में बढ़ती बलात्कार की घटनाएं इसकी गवाह है जिसकी शिकार ज्यदातर कमजोर वर्ग की बच्चियां ही हो रही हैं। लेकिन वास्तव में तो वे करीब रिश्ते की लड़कियों पर भी उतनी बुरी नजर रखते हैं और मौके मिलने पर रिश्ते का कोई लिहाज नहीं करते।

खाप पंचायत किस्म का यह भाईचारा कितना विकृत हो चुका है इसका उदाहरण नोएडा की पिछले वर्ष की एक घटना है। गे्रटर नोएडा क्षेत्र में एक एम बी ए की छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और बलात्कार करनेवाले थे उसी क्षेत्र के एक गांव के लडक़े। जब पुलिस ने इन लडक़ों को पकड़ा तो पूरा गांव उनके पक्ष में खड़ा हो गया। लेकिन जिस घटना का हम जिक्र करने जा रहे हैं उससे तो खाप पंचायत किस्म के भाईचारे का खोखलापन पूरी तरह ही उजागर हो जाता है। कोई डेढ़-दो साल पहले दिल्ली के बवाना क्षेत्र में एक बाप ने अपनी बेटी का इसलिए बलात्कार करवा दिया क्योंकि उसने अपनी मर्जी से शादी की थी, जिससे परिवार की इज्जत को बट्टा लगा। और बलात्कार करनेवालों में उस लडक़ी का परिवार में ही रिश्ते का एक भाई भी था।

हरियाणा में एक कहावत है कि अपना मारेगा भी तो छाया में ही डालेगा। उर्दू में जिसे गुनाहे-अजीम कहा जाता है, उसे अंजाम देने के बाद उदारता के इस ढ़ोंग को क्या कहा जाए? जब मार ही दिया तो धूप या छाया मरनेवाले के किस काम की। लेकिन खाप पंचायतें ठीक यही कर रही हैं। मार भी रही हैं और भाईचारे की दुहाई भी दे रही हैं। विडंबना यही है।

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