नामवर सिंह से एक लम्बी बातचीत

नामवर सिंह से यह बातचीत संजीव कुमार और ज्ञानेंद्र कुमार संतोष ने की है.

नामवर सिंह

अपने आरंभिक साहित्यिक जीवन के बारे में बताएं?

बात उन दिनों की है जब मैं उदय प्रताप कालेज में इटरमीडिएट की पढाई कर रहा था। कविता लिखने में मेरी रुचि थी। 1941 से कविता से लेखक जीवन की शुरुआत मैंने की। मेरी पहली कविता ‘दीवाली’ इसी साल ‘क्षत्रिय मित्र’ पत्रिका (बनारस) में प्रकाशित हुई थी। इसी दौरान पहले शिवदान सिंह चौहान से परिचय हुआ और बाद में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा। क्योंकि इस संस्था को चौहान जी ने एक साहित्यिक संस्था के रूप में जिंदा किया था। यह घटना सन् 1946 के आस-पास की होगी जब मैंने अज्ञेय जी को अपने कालेज में बुलाया था। वे शिलौंग से आए थे। लेकिन अज्ञेय जी कविता और साहित्य पर कुछ बोले ही नहीं, जबकि लोग उम्मीद करते थे कि वे कवि हैं, कविता पर बोलेंगे या ‘शेखर एक जीवनी’ के लेखक हैं, इसलिए साहित्य पर बात करेंगे लेकिन लोगों को निराशा हुई। वे न कविता पर बोले, न साहित्य पर, वे असमिया मच्छर पर बोले। हां, चाय पर बात करते हुए वे ‘शेखर एक जीवनी’ पर जरूर बात की। क्योंकि मार्कंडेय ने उनसे शेखर एक जीवनी पर कुछ सवाल पूछे थे। यह अज्ञेय जी से मेरी पहली मुलाकात थी। उसके बाद वे इलाहाबाद आ गए रहने। तब मैं वहां यदा-कदा उनसे मिलने वहां जाया करता था।

वाम पंथ से आप कैसे जुड़े?

बनारस कांग्रेस का तो गढ़ था ही। कांग्रेस के कमलानंद त्रिपाठी थे, सोशलिस्ट पार्टी के संपूर्णानंद थे, काशी विद्यापीठ में नरेन्द्रनाथ जी थे। कम्युनिस्ट पार्टी भी बहुत मजबूत थी। वहां से रूस्तम सैटीन थे। उन्हीं दिनों मैं कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा। हमलोगों का मुख्य केंद्र होता था गोदौलिया चौराहा।

बनारस और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के बारे में कुछ बताएं?

इंटर करने के बाद 1947 में मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीए में दाखिला ले लिया था और हॉस्टल में रहता था। उसका नाम महेंद्रवी लॉज था जो संकट मोचन मंदिर के पास था। पचास-साठ लड़के उन दिनों उस लॉज में रहा करते थे। मैं रोज पहले गंगा स्नान करता और उसके बाद संकट मोचन मंदिर जाता था। उन दिनों यह मेरा प्रतिदिन का रूटीन था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ही 1951 में हिन्दी में एम.ए. किया। उसके बाद 1953 में जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अस्थायी रूप में व्याख्याता के पद पर मेरी नियुक्ति तो मुझे हॉस्टल छोड़ना पड़ा। और मैं लोलार्क कुंड के पास ही एक किराये के मकान में रहने लगा। वहां मैं अपनी मां और भाइयों के साथ रहा करता था। उन दिनों साहित्यकारों में शंभुनाथ सिंह और त्रिलोचन शास्त्री विद्वान व्यक्ति थे लेकिन उनके पास कोई डिग्री नहीं थी। मैं इन दोनों से काफी मिलता-जुलता था और साहित्य की चर्चा किया करता था। दोनों आस-पास ही रहा करते थे। एक बार त्रिलोचन जी से गंगा तैर कर पार करने की बात पर मेरी ठन गई। वे कहते थे कि मैं गंगा तैर कर पार कर लेता हूं। बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहने की उनकी आदत थी। वो रोज-रोज कहा करते थे इसलिए एक दिन मैंने भी ठान लिया कि चलो गंगा के उस पार। एक बार तैरकर मैं गया रेती पर और वहां थोड़ी देर रूकने के बाद मैंने तो किसी तरह गंगा पार कर लिया लेकिन त्रिलोचन जी बहाव में बहुत दूर तक चले गए। उस दिन पता चला कि त्रिलोचन जी ने कभी तैर कर गंगा पार नहीं किया। हांकने की उनकी आदत थी। लेकिन मैंने उसी दिन कान पकड़ कसम खाई कि आज के बाद कभी ऐसा काम नहीं करूंगा। 

आचार्य द्विवेद्वी से आपकी मुलाकात कैसे हुई? 

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आपकी नियुक्ति कैसे हुई? सन् 1950-51 में गुरुजी (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी) से मेरी मुलाकात काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ही हुई। एमए करने के बाद वहीं एक दिन उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में पंचवर्षीय योजनाएं शुरू हो रही हैं। तुम अपने यहां से पंचवर्षीय योजना भेजो। जब योजना मंजूर हो गया तो वहां दो पद अस्थायी रूप में सृजित हुई। लेकिन इस नियुक्ति के लिए भी बाजाब्ता साक्षात्कार हुए थे। उसी पंचवर्षीय योजना के तहत पंडितजी ने एक पद पर मुझे नियुक्त किया और दूसरे पद पर रामदरश मिश्न को। यह नियुक्ति चूंकि पंचवर्षीय योजना के तहत थी इसलिए यह नियुक्ति अस्थायी ही मानी गई। बहरहाल छह साल पढ़ाने के बाद विश्वविद्यालय से मेरी छुट्टी हो गई। 

आपने सीपीआई से चुनाव भी लड़ा था?

सन् 1959 के लोकसभा उप-चुनाव में चकिया चन्दौली से मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का उम्मीदवार था। लेकिन मैं चुनाव हार गया। यह सीट थी राममनोहर लोहिया की। जब उपचुनाव में उन्होंने लड़ने से मना कर दिया तो सोशलिस्ट पार्टी ने मेरी जाति(राजपूत) के ही उम्मीदवार को खड़ा कर दिया। वहां मेरी जाति बिरादरी के बहुत लोग थे। उप-चुनाव में असफलता के साथ-साथ मैं विश्वविद्यालय से भी मुक्त हो गया।

चुनाव में असफलता और नौकरी खोने के बाद आपने क्या किया?

 चुनाव हारने और नौकरी जाने के बाद थोड़े दिनों तक : मैं 1959-60 में सागर विश्वविद्यालय (म.प्र.) के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर रहा। उसके बाद मैं फिर बनारस लौटा और 1960 से 1965 तक बनारस में रहकर ही स्वतंत्र लेखन कार्य करता रहा। फिर बनारस में मेरे लिए कुछ खास नहीं था इसलिए मैं दिल्ली आ गया। चूकि मैं पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था तो पार्टी ने दिल्ली से एक पत्रिका निकालने का फैसला किया और उसे निकालने की जिम्मेदारी मुझे दी गई। उन दिनों मैं ‘जनयुग’ पत्रिका निकाला करता था। उन दिनों राजकमल में भारी परिवर्तन हुए थे। श्रीमती शीला संधू राजकमल की मैनेजिंग डायरेक्टर हो गईं। लेकिन शीला संधू हिंदी नहीं जानती थी इसलिए लेखक अपनी किताब वापस लेने लगे थे। तो उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीपाद अमृत डांगे से कहा कि मुझे एक पार्ट टाइम व्यक्ति चाहिए जो हिंदी जानता हो। पार्टी का काम तो मैं करता ही था इसलिए पार्टी ने मुझे वहां भेज दिया क्योंकि वहां से मुझे इसके बदले एक हजार रुपए मिलने वाले थे। मैं वहां साहित्य सलाहकार के रूप में कार्य करने लगा। मैं भी घूम- । घूम कर साहित्यकारों से मिलकर यह बताने लगा कि : आप अपनी पुस्तक वापस न लें। राजकमल प्रकाशन : एक आलोचना पत्रिका भी निकालती थी। शीला संधू । ने मुझे आलोचना पत्रिका के संपादन का दायित्व भी । सौंपा। उन दिनों मैं मॉडल टाउन में रहता था। दिल्ली : विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले बहुत से लोग उन दिनों । मॉडल टाउन में ही रहते थे। पहले विश्वनाथ त्रिपाठी के यहां रहा, बाद में अलग मकान लेकर रहने लगा। उन दिनों वह साहित्यकारों का ‘हब’ था। बाद में राजकमल प्रकाशन ने मुझे आलोचना का संपादक तो रहने दिया लेकिन साहित्य सलाहकार के पद से हटा दिया। लेकिन सिर्फ आलोचना के संपादकी से काम नहीं चलने वाला था। इसलिए मैं तिमारपुर के सस्ते किराये के मकान में रहने लगा। उन दिनों मेरे मित्र आईपीएस मार्कंडेय सिंह जो बाद में चंद्रशेखर के जमाने में दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर हुए वे क्लास फेलो थे, यूपी कॉलेज के दिनों में। वे भी दिल्ली में ही थे उनसे भी मिलना-जुलना हमेशा होता था।

जोधपुर विश्वविद्यालय जाना कैसे हुआ?

बालकृष्ण राव आगरा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे। उन्होंने मुझे के.एम. मुंशी इंस्टीट्यूट का डायरेक्टर का पद ऑफर किया। मैं के.एम. इंस्टीट्यूट में ही था कि मुझे एक दिन अचानक एक टेलीग्राम मिला जोधपुर से। वह तार जोधपुर विश्वविद्यालय से था जिसमें मुझे हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में बुलाया गया। मैंने यह तार राव साहब को दिखाया तो उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें रोकूगा तो नहीं क्योंकि यह पोस्ट सिर्फ पांच वर्ष के लिए है और वह पोस्ट स्थायी है लेकिन मैं तुमसे एक महीने का वेतन वापस लूंगा। खैर मेरे रहते रामविलास जी ने वहां डायरेक्टर के पद पर ज्वाइन किया और मैंने एक महीने तक आगरा से दिल्ली अप-डाउन किया। एक महीने पूरे होने पर मैंने जोधपुर विश्वविद्यालय में ज्वाइन किया। वहां वाइस चांसलर वी.वी. जॉन थे। वहां मैंने नये सिरे से पाठ्यक्रम बनाया।

जे एन यू कब और कैसे आए?

1974 में मुझे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उप-कुलपति नाग साहब का नियुक्ति पत्र मिला। उन्होंने मुझे भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष के रूप में जेएनयू बुलाया था, और मैं गर्मियों की छुट्टी से पहले ही आ गया लेकिन ज्वाइन मैंने जुलाई में किया। उन्हीं दिनों पंडितजी के बाद साहित्य अकेडमी के हिंदी समिति का अध्यक्ष मुझे बनाया गया।

संघ लोक सेवा आयोग में हिंदी के लिए अपनी भूमिका पर प्रकाश डालें।

उन दिनों संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष थे ए.आर. किदवई (अखलाक उर-रहमान किदवई। एस.आर. किदवई (सिद्दीकुर रहमान किदवई) हमारे साथ जेएनयू में उर्दू पढ़ाते थे। हो सकता है ए.आर. किदवई को उन्होंने मेरे बारे में बताया होगा। एक दिन ए.आर. किदवई साहब का फोन आया कि आओ मुझसे मिलो। मैं मिलने गया तो उन्होंने कहा कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है और देश के सिविल सेवा के अधिकारी हिंदी न जानें यह ठीक नहीं, इसलिए मैं सिविल सर्विस की परीक्षा में हिंदी इंट्रोड्यूस करना चाहता हूं। तुम्हारी क्या राय है तो मैंने कहा कि स्वागतयोग्य कदम है। बताइए इसमें मुझे क्या करना है। उन्होंने कहा कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में हिंदी को इंट्रोड्यूस करना है इसलिए पाठ्यक्रम बनाओ। मैंने कहा कि एक तीन या पांच व्यक्तियों की कमिटि बनानी पड़ेगी तो उन्होंने कहा कि तुम नाम बताओ। मैंने दो नाम और बताए और वे राजी हो गए और कहा कि तुम्हारे लिए यहां से गाड़ी जाया करेगी और उन दोनों लोगों को आने-जाने का खर्च उन्हें मिल जाया करेगा। फिर हमलोगों ने मिलकर संघ लोक सेवा आयोग के हिंदी का सिलेबस तैयार किया। सिलेबस के बाद मैंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की कॉपी जांचने का भी काम किया। बाद में उन्होंने मुझे इंटरव्यू बोर्ड में भी रखा। क्योंकि उससे पहले हिंदी में साक्षात्कार नहीं लिया जाता था। इसका श्रेय ए.आर. किदवई को जाता है। संघ लोक सेवा आयोग के बाद ए.आर. किदवई राज्यपाल बनकर बिहार गए। तो फिर बिहार भी उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि कॉलेजों में व्याख्याता के पद खाली पड़े हैं, मैं उन्हें जल्द से जल्द भरना चाहता हूं। तुम हवाई जहाज से आओ और राज भवन में ठहरोगे और मेरी गाड़ी तुम्हें राजभवन से बिहार लोक सेवा आयोग लेकर जाएगी। और तुम्हारे खाने-पीने की भी व्यवस्था राजभवन में ही होगी। तुम यहां किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं मिलोगे क्योंकि बिहार बहुत ही बदनाम राज्य है। अगर यहां तुम्हारी बदनामी होगी तो मेरी भी बदनामी होगी। उसके बाद बिहार में अब तक कॉलेजों में कोई नियुक्ति नहीं हुई है। ये ए.आर. किदवई के साथ यह मेरा अनुभव है।

सुनते हैं कि आपातकाल के दौरान ही एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से आपके संबंधों की शुरुआत हुई थी। हां आपातकाल के दौरान ही उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी।

उस कार्यक्रम में श्रीमती इंदिरा गांधी बतौर मुख्य अतिथि आई थीं और मैं मुख्य वक्ता था। मैंने इंदिरा गांधी को संबोधित नहीं किया। चूंकि उन्होंने देश में आपातकाल लगाया था इसलिए वह मेरे गले नहीं उतरती थीं। मेरा संबोधन इस प्रकार था-‘आदरणीय बच्चन जी और मित्रों।’ हाल ही में ज्ञानपीठ का एक समारोह था। मैं प्रवर समिति का अध्यक्ष था उसके नाते मुझे स्वागत करना था। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। सारा भाषण लिखा हुआ था। लेकिन मैंने जो संबोधन किया वह इस प्रकार था-‘बंधुवर नेमाडे, श्री मोदी, आदरणीय मंच और सभागार में उपस्थित सज्जनों।’ मैंने माननीय या आदरणीय आदि संबोधन श्री मोदी के लिए भी नहीं लगाया। 

अटल जी के बारे में कोई संस्मरण हैं तो सुनाएं।

ग्वालियर में अटलजी खूब कविता सुनाया करते थे। वहां शिवमंगल सिंह सुमन मेरे बड़े भाई जैसे ही थे। वे भी बहुत अच्छी कविता पढ़ा करते थे। जब वे गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल हुए तो ग्वालियर कई बार उन्होंने मुझे बुलाया था। ग्वालियर में एक बार कवि सम्मेलन में गया तो वहां अटलजी को कविता सुनाते सुना- ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता हूं, मिटाता हूं।’ वाजपेयीजी को पहले से जानता था और उन्हें कई बार कवि सम्मेलनों में कविता पढ़ते सुना था। जब अटलजी देश के प्रधानमंत्री थे तो गुजरात दंगों के बाद जावेद अख्तर के साथ उनसे मिलकर मेमोरेंडम देने गया। इस प्रतिनिधि मंडल में मुझे हिंदू प्रतिनिधि बनाकर लाया गया था। वाजपेयी जी ने शाम पांच बजे का टाइम मिलने के लिए दिया था। हमलोगों पांच मिनट देर से पहुंचे। जैसे ही पहुंचे तो उन्होंने कहा कि कामरेड लोग भी टाइम के पंक्चुअल नहीं होते! आप लोग पांच मिनट लेट हैं। आपलोग प्रधानमंत्री से भी इंतजार करवाते हैं। हम लोग तो मेमोरेंडम लिखकर ले गए थे लेकिन वाजपेयी जी ने पूछा कि कहिए क्या कहना है? जब जावेद ने लिखा हुआ मेमोरेंडम आगे बढ़ाया तो उन्होंने कहा कि यह तो हम देख लेंगे, आप लोगों को कहना क्या है? तो जावेद अख्तर ने मेरी तरफ इशारा किया। तब मैंने कहा कि “आपने गुजरात वाली घटना पर कहा था कि यह घटना हमारे माथे पर कलंक है। आपके माथे पर चंदन का टीका ही शोभा देता है, कलंक का टीका नहीं। आप उसे पोंछ क्यों नहीं देते?’ वाजपेयी जी ने छूटते ही कहा कि पोंछ तो दूँ पर उसके बाद सिर रहेगा कि नहीं! मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि देश का प्रधानमंत्री अगर ऐसा सोचता है तो मुझे कुछ नहीं कहना है। यह घटना मैं कभी भूल नहीं सकता।

चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह से भी आपकी मित्रता रही है इन दोनों के स्वभाव में क्या समानता और भिन्नता थी?

विश्वनाथ प्रताप सिंह को तो मैं अपने उदय प्रताप कॉलेज के दिनों से जानता हूं। वे भी उसी कालेज में मेरे साथ पढ़ते थे। उन दिनों विश्वनाथ प्रताप सिंह की जान को खतरा था इसलिए हमेशा एक बंदूकधारी उनके साथ रहता था। जब वे इलाहाबाद रहने लगे तब भी मैं उनके घर आता-जाता था। यहां जब वे सिर्फ सांसद थे तब भी मैं उनके बुलाने पर उनके घर जाता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह जब प्रधानमंत्री बने तब भी मुझे दिल्ली अपने निवास पर बुलाते थे और खाना खिलाते थे। इस तरह कहें तो विश्वनाथ प्रताप सिंह से मेरा बहुत ही घरेलू संबंध था। वहीं चंद्रशेखर से हमारा संबंध मार्कंडेय सिंह की वजह से था। चंद्रशेखर अच्छे राजनेता थे तो विश्वनाथ प्रताप सिंह अच्छे कवि भी थे। वे अच्छी कविता लिखते थे। इनकी कविताओं को मैंने चुना भी था। जब वे प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने मुझे कविता संग्रह की भूमिका लिखने को कहा तो मैंने कहा कि लोग कहेंगे कि आप प्रधानमंत्री होकर कविता छपवा रहे हैं, इसलिए मैं भूमिका नहीं लिखंगा। अगर आप प्रधानमंत्री नहीं होते तो मैं आपकी कविताओं की भूमिका लिख देता। वे अच्छे कवि थे। हाइकूनमा छोटी-छोटी कविताएं लिखा करते थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह बहुत अच्छे पेंटर भी थे। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री नहीं रहने पर मैंने उनकी पुस्तक चंद्रशेखर की जेल डायरी की भूमिका लिखी है। मार्कंडेय सिंह की वजह से चंद्रशेखर के घर पर बराबर जाया करता था।

गांधीजी के बारे में आपके शुरुआती विचार क्या थे?

बचपन में मैं कामता प्रसाद विद्यार्थी जी के यहां जाया करता था। उनके यहां सस्ता साहित्य मंडल से छपी पुस्तकें आया करती थीं। वहीं मैंने गांधीजी के ‘सत्य के प्रयोग’ पुस्तक पढ़ी। ‘हिंद स्वराज’ आदि किताबें भी मैंने वहीं पढ़ीं। सच कहूं तो सबसे पहले मैं गांधीजी से ही प्रभावित हुआ।

स्वतंत्रतापूर्व किस राजनीतिक दल से आपकी वैचारिक समानता थी?

कांग्रेस से मेरी वैचारिक समानता रही थी। उन दिनों बनारस से हंस पत्रिका निकलती थी और शिवदान सिंह चौहान उसके संपादक थे। जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा तो मार्क्सवाद की तरफ झुकाव हुआ। दूसरे शब्दों में कहूं तो प्रगतिशील लेखक संघ के नाते मैं मार्क्सवादी था। कई बंगाली लेखकों से मित्रता हुई जो कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। उन दिनों बनारस में कम्युनिस्ट पार्टी मजबूत थी। रूस्तम सैटिन और पीसी जोशी मुझे कम्युनिस्ट पार्टी के और नजदीक लाए। कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत विभाजन के दिनों एक बुकलेट छापी थी-‘गांधी जिन्ना फिर मिलें’। कम्युनिस्ट पार्टी विभाजन नहीं चाहती थी। उस समय एक पी.सी. जोशी की लाइन थी और दूसरी वी.पी. रणदिवे की लाइन थी। पी.सी. जोशी नेहरूवादी थी इसलिए बाद में उनको हटा भी दिया गया। वी.पी. रणदिवे एक्सट्रीम लेफ्ट लाइन के थे। मैं स्वभावतः पी. सी. जोशी और रूस्तम सैटिन वाली लाइन का ही था। मैं इसी लाइन को अंत तक मानता रहा हूं, मैं एक्सट्रीम लेफ्ट का कभी नहीं रहा।

आपने सीपीआई से लोकसभा का उप-चुनाव भी लड़ा था फिर पार्टी की सक्रिय सदस्यता कब छोड़ी?

मैंने पार्टी से कभी इस्तीफा तो दिया नहीं इसलिए पार्टी छोड़ने की बात नहीं कही जा सकती। हां जब कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल में इंदिरा गांधी का समर्थन किया तो कम्युनिस्ट पार्टी से मेरा मोह भंग हुआ और मैंने कम्युनिस्ट पार्टी का मेंबरशिप रिन्य नहीं कराया।

भारत के बौद्धिक वर्ग में आज भी वाम पंथ का मजबूत आधार है इसके बावजूद वाम पंथ सिमट रहा है ऐसा क्यों?

कारण तो कुछ लोग यह कहेंगे कि सोवियत संघ जो समाजवाद का केंद्र हुआ करता था, जहां सबसे पहले-पहल वाम पंथ स्थापित हुआ, जब वहीं समाजवाद खत्म हो गया तो और जगह रहकर क्या करेगा! यानी जब मक्का में ही इस्लाम खत्म हो जाएगा तो दूसरी जगह पर उसके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। अगर मार्क्स के नियम को ही मानें तो उसके अपने आंतरिक अंतर्विरोध ही समाजवाद के खात्मे का कारण बना है। मार्क्स के अनुसार, जब पूंजीवाद अपने अंतर्विरोधों के कारण खत्म हो सकता है तो वह समाजवाद पर भी लागू होगा। इसलिए अपने अंतर्विरोधों के कारण समाजवाद रूस, चीन, क्यूबा आदि देशों से खत्म हो गया। नियम या सिद्धांत है तो वह हर जगह समान रूप में लागू होगा। लेकिन इससे मार्क्स अप्रासंगिक नहीं होते।

समाजवाद का अंतर्विरोध क्या है?

समाजवाद का अंतर्विरोध है वर्गहीन समाज। सपना था साम्यवाद का, लेकिन समाज में एक शासक वर्ग और दूसरा शासित वर्ग पैदा हो गया। डिक्टेटरशीप के खात्मे के लिए समाजवाद पहला स्टेज है। लेकिन समाज में आज भी डिक्टेटरशीप विद्यमान है। यही समाजवाद का अंतर्विरोध है।

आज आप रेणु को किस स्थान पर रखेंगे?

कुछ लोग रेणु को प्रेमचंद से बड़ा मानते थे। लेकिन रेणु ने भले ही प्रेमचंद से कम लिखा हो पर रेणु में गहराई बहुत अधिक है। मेरा एक लेख है ‘व्यापकता और गहराई’ । लोग उस समय भी कहा करते थे कि प्रेमचंद में व्यापकता तो है लेकिन गहराई नहीं है। उसके बरक्स जैनेन्द्र और अज्ञेय में गहराई बहुत अधिक दिखाई पड़ती है जबकि इनमें व्यापकता नहीं है। व्यापकता और गहराई में डाइलेक्टिकल संबंध है। कुंए और तालाब की तुलना करें तो तालाब में व्यापकता होगी लेकिन कुंए में गहराई होगी। दूसरी तरफ अगर तालाब की व्यापकता कम होगी तो उसकी गहराई भी कम हो जाएगी। लेकिन कुंए में गहराई होती है लेकिन व्यापकता नहीं। मसलन- गीता। गीता भले ही बहुत पतली पुस्तक है लेकिन गीता के दर्शन में जो गहराई है वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें कथा तो कोई है नहीं। इसी तरह ‘उसने कहा था’ एक छोटी कहानी है, उसमें व्यापक जीवन नहीं है लेकिन गहराई है। प्रेमचंद के ‘गोदान’ और रेणु के ‘मैला आंचल’ की तुलना करें तो मैला आंचल में गोदान से व्यापकता कम है लेकिन गहराई अधिक है। हालांकि कभी-कभी यह होता है कि व्यापकता कम होने के साथ-साथ गहराई भी कम होती है। लेकिन यह बात तालाब के बारे में तो सही है लेकिन कुंए के बारे में सही नहीं है। कई मीडिया वालों के पास सूचनाएं तो होती है लेकिन उनमें राजनीतिक समझ नहीं होती। अज्ञेय कवि हैं। ‘शेखर एक जीवनी’ शायद उनकी आत्मकथा है। लेकिन ‘शेखर’ के बरक्स ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ टिकेगी। उसी तरह जैनेन्द्र ने जीवन का बहुत बड़ा फलक नहीं लिया है लेकिन जैनेन्द्र ‘त्याग-पत्र’ की वजह से टिकेंगे। गहराई के मामले में भी समुद्र समुद्र ही रहेगा। जैसे ‘महाभारत’ में कई गीताएं हैं। महाभारत तो महाभारत ही है। जैसे कि हिंद महासागर। हिंद महासागर में गहराई भी है और व्यापकता भी है। महाभारत के सामने लोग बाल्मिकी रामायण को दूसरे नंबर पर ही रखते हैं। यद्यपि कवित्व और काव्य बाल्मिकी रामायण में ज्यादा है जो व्यास के महाभारत में नहीं है। इस लिहाज से रामायण का जो महत्व है वह महाभारत का नहीं है। लोगों ने महाभारत को इतिहास कहा है और रामायण को काव्य।

मुस्लिम समुदाय की अशिक्षा, बदहाली और गरीबी के क्या कारण है? 

अगर इस्लाम, ईसाई और हिंदुत्व की तुलना करें तो दुनिया के पैमाने पर ईसाइयत का विस्तार बहुत अधिक है। उसकी तुलना में इस्लाम बहुत छोटा है। मेरी यह समझ है कि दुनिया की एक बड़ी आबादी ईसाई है, भोगोलिक स्तर पर हिंदुत्व का फैलाव कम है। वहीं इस्लामिक देश भोगोलिक दृष्टि से ज्यादा हैं। जहां तक मुस्लिम पिछड़ेपन की बात है तो इस्लाम की संकीर्णता के चलते ही इस्लाम का विकास नहीं हो पाया। उदाहरणस्वरूप – पांच वक्त की नमाज, मुहर्रम मनाओ, एक महीना रोजा रखो आदि। ये सब इस्लाम की संकीर्णताएं हैं जिसकी वजह से उसका विकास नहीं हुआ। इस्लाम का इतिहास देखें तो यह सबसे कम समय का है। हम अगर वेद को मानें तो सबसे पुराना तो हिंदुत्व ही है। उसके बाद ईसाई धर्म का इतिहास है। हिदुत्व के बहुत सारे तत्व ईसाई धर्म ने लिया है। किसी धर्म विस्तार इस बात पर निर्भर है कि वह कितना उदार या संकीर्ण है। ईसाइयत इस्लाम की तुलना में ज्यादा उदार है इसलिए इसका विकास ज्यादा हो रहा है। इस मामले में हिंदुत्व सबसे ज्यादा उदार है क्योंकि उसके पास कोई एक किताब नहीं है। न एक ईश्वर है, न एक धर्मग्रंथ। इसलिए अंग्रेजों ने हिंदुस्तान को बदलने की कोशिश बहुत की पर हिंदुस्तान ईसाई मुल्क नहीं बना। चर्च खोले, बहुत कुछ किया, लेकिन कुछ आदिवासियों को जरूर पैसा का प्रलोभन देकर ईसाई बनाया। इससे पहले इस्लाम आया, धर्म परिवर्तन भी हुआ लेकिन हिंदुस्तान को इस्लाम में बदल नहीं सके। जो धारण किया जा सके वह धर्म है। हिंदू जन्म से ही होता है, बनता नहीं है। यह अकेला धर्म है जिसमें धर्मांतरण नहीं है। इसलिए ‘मनुस्मृति’ में इसे ‘मानव धर्म’ कहा गया है। हिंदू धर्म में जो खुलापन है उसी के चलते बहुत से ईसाइयों और मुस्लिमों ने हिंदू धर्म स्वीकार किया। खासकर सूफियों ने हिंदू धर्म से बहुत कुछ लिया है। 

पिछले कुछ सालों में दलितों का विकास हुआ है लेकिन दलित नेतृत्व हाशिए पर जा रहा है।

इस पर अंबेडकर ने बहुत विचार किया है। खास चीज है ‘सत्ता की हैरारकी’ । अंबेडकर समझते थे इस हैरारकी को। इन लोगों ने एक शब्द चलाया ‘दलित’ । जाति व्यवस्थ हिंदू समाज की ताकत और बुराई दोनों है। यह जाति इतनी दूर तक शामिल है कि यह दलितों में भी है। जैसे दलितों की एक जाति महार, अपने को चमार से ऊपर समझता है। बाबू जगजीवन राम चमार थे और अंबेडकर महार। इसलिए राजनीति में भी एक वर्ग नहीं बन पाया। वैसे हमारे यहां आरंभ में वर्ण व्यवस्था थी, जाति व्यवस्था नहीं थी।

स्त्री विमर्श की तुलना में दलित विमर्श ज्यादा प्रचारित हो रहा है लेकिन दलित लेखन से ज्यादा रचनात्मक स्त्री लेखन प्रतीत हो रहा है। 

जाहिर है स्त्रियों की तादाद ज्यादा है। स्त्री कहने का मतलब है आधी दुनिया और जब आप दलित कहते हैं तो उस मतलब दस फीसदी के लगभग है। दलित विमर्श मूलतः राजनीतिक है लेकिन स्त्री विमर्श ज्यादा मानवीय है। इसलिए स्त्री लेखन ज्यादा रचनात्मक और वैविध्यपूर्ण है।

क्या स्त्री पराधीनता का कारण जैविक है?

स्त्री पराधीनता का कारण मैं जैविक नहीं मानता। मेरे पास आंकड़े नहीं है लेकिन दुनिया में लगभग बराबर बराबर स्त्री और पुरुष हैं। जो काम पुरुष कर सकता है वह काम स्त्री भी कर सकती है। हमारा समाज पुरुष प्रधान है लेकिन हमारे यहां ऐसे भी दौर रहे हैं जब स्त्री प्रधान रही है। हमारे यहां कारू कामाख्या को ‘स्त्री देश’ ही कहा जाता है। देश में ऐसी जनजातियां भी हैं जहां स्त्री की प्रधानता है। इसलिए हमारे यहां शक्ति की पूजा होती है और कहा जाता है कि बिना शक्ति के शिव ‘शव’ हैं। शिव में ‘इ’ शक्ति है, उसे हटा दें तो शिव ‘शव’ हो जाएगा।

साहित्य में प्रगतिशील साहित्य हावी रहा है लेकिन बदले राजनीतिक माहौल में दक्षिण पंथी साहित्य की प्रवृत्ति उभरने लगी है।

मैं एक ही सिद्धांत मानता हूं। साहित्य में ‘सह’ शब्द है। साहित्य में ‘शब्द’ भी सुंदर हो और ‘अर्थ’ भी सुंदर हो तो साहित्य होता है। ‘सह’ भाव साहित्य का धर्म है। इसलिए वही साहित्य श्रेष्ठ होगा जो साहित्य धर्म का पालन करेगा। मतलब जाति में समानता, स्त्री-पुरुष में समानता, धनी-गरीब में समानता। इसे ही साहित्य का सह धर्म या ‘सह-अस्तित्व’ कहते हैं। ‘शांतिपूण सह-अस्तित्व’ साहित्य का महत्वपूर्ण धर्म हैं। इसमें विरोधी लोग भी इस शांतिपूण सह अस्तित्व का पालन करें। ‘जियो और जीने दो’ का मतलब है कि हम जिससे सहमत नहीं हैं उसे भी जीने दें। साहित्य का एक ही सिद्धांत है- ‘शांतिपूण सह अस्तित्व’ । इसे मानव समाज का धर्म बनाना चाहिए।

आलोचना में आप शीर्षस्थ मान लिए गए हैं आप से संवाद करने वाला कोई नहीं है। इस बौद्धिक सन्नाटे का अपकी साहित्यिक सक्रियता पर क्या असर पड़ रहा है?

मुझे अपने बारे में कोई भ्रम नहीं है। मैं इस मुगालते में नहीं हूं। आलोचना के क्षेत्र में बहुत लोग हैं और अच्छा काम कर रहे हैं। मैं किसी को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता। इसलिए कि ‘संतन को कहां सीकरी सो काम, आवत-जात पनहिया टूटी बिसयो गर हरि नाम’ । जो मुझे दिखाई पड़ता है वही कहता हूं, मुंहदेखी नहीं कहता।

ऐसा लगता है कि जिस तरह ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की कथा है, क्या उसी तरह ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के वास्तविक नायक नामवर सिंह ही नही हैं? 

पुस्तक लिखते समय मुझे इसका अहसास नहीं हुआ। इसके बाद भी नहीं हुआ। मैं यह विनम्रता के कारण नहीं कह रहा हूं। मैं अपनी सीमाएं जानता हूं। आप उन पुस्तकों का नाम बताएं जो कागज पर नहीं उतर सकी?

 "हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पै दम निकले। 
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।"

यदि अवसर हो तो किस विषय पर लिखना चाहेंगे?

मैं बोलकर लिखाता नहीं, मैंने जो भी लिखा है अपने हाथ से लिखा है। और अब अपनी ऐसी स्थिति नहीं है कि कलम लेकर कुछ लिख सकूँ। इसलिए मैंने यह इरादा ही छोड़ दिया।

“इरादे बांधता हूं, छोड़ता हूं, तोड़ देता हूं,  
कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं वैसा न हो जाए।"

कुछ बड़ा पाने के लिए कुछ बड़ा खोना पड़ता है। आपने बड़ा क्या खोया है? 

मैं बड़ा और छोटा के रूप में नहीं सोचता, और न ही इन दोनों छोरों से परे मैं अपने को मानता हूं। मेरी स्थिति इन चीजों से अलग है। न किसी से बड़ा होने की चाह है, न मैं अपने को किसी से छोटा समझता हूं। मैं जो हूं और इतने दिनों में जो निमित्त होकर बना हं उससे मैं अलग नहीं हो सकता। मेरी नजर में सब बराबर हैं। मैं अब किसी होड़ में शामिल नहीं हूँ।

अगर आप अपने को आलोचना के मैदान से बाहर मान रहे हैं तो मैदान में किसे मानते हैं?

जो मैदान में आना चाहे, आलोचना का मैदान खुला  है “उठा ले जो बढ़ाकर हाथ, पैमाना उसी का है।”

भारतीय काव्यशास्त्र चिंतन परंपरा में आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं?

अभिनवगुप्त। वैसे बड़े तो आनन्दवर्द्धन हैं जिन्होंने ध्वनि की खोज की। लेकिन ‘यथोत्तरं मुनिनाम प्रमाण्यम्’ यानी एक मुनि के बाद जो दूसरा मुनि आता है वह श्रेष्ठ होता है। अगर आनंदवर्द्धन न हुए होते तो अभिनवगुप्त न होते। आधार तो आनंदवर्द्धन का ही है लेकिन जो पांडित्य कश्मीरी शैववाद का है वह अन्यत्र दुर्लभ है। अभिनवगुप्त ने ध्वनि को जिस रूप में प्रतिष्ठित किया वैसा पांडित्य किसी और में नहीं दिखता।

भारतीय दर्शन की परंपरा में आप किसे श्रेष्ट मानते हैं?

निस्संदेह शंकराचार्य। भारतीय दर्शन में शंकर जिस ऊंचाई पर पहुंचे वहां तक कोई नहीं पहुंच पाया। अद्वैतवाद जैसा दर्शन किसी और का नहीं है। इसलिए शंकराचार्य से श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता।

आज लोकप्रिय साहित्य को आलोचक निम्न श्रेणी या लुगदी साहित्य कह रहे हैं, जबकि एक जमाने में बाब देवकीनंदन खत्री को पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे। इसे आप कैसे देखते हैं?

यह आचार्य रामचंद्र शुक्ल की टिप्पणी है। आचार्य शुक्ल ने यह टिप्पणी जिस दौर के लिए की है उस दौर के लिए इस टिप्पणी को सही मान सकते हैं। अंग्रेजी में दो शब्द हैं-‘पॉपुलर’ और ‘पॉपुलिस्ट’ । ‘पॉपुलिस्ट’ वह है जो वाह-वाही ले उड़े और ‘पॉपुलर’ वह है जो लोकप्रिय हो। प्रेमचंद पॉपुलर हैं। पॉपुलिस्ट- बाजारू है जबकि पॉपुलर लोकप्रिय। मेरे विचार से साहित्य में पॉपुलर होना ठीक है लेकिन पॉपुलिस्ट होना ठीक नहीं। 

आज बाजार हमारी जिंदगी पर हावी है, बाजार हमें संचालित करने लगा है। ऐसे दौर में क्या साहित्य भी बाजारू होने लगा है?

अभी तक तो नहीं हुआ है। लोगों में यह विवेक बचा हुआ है। बाजारू शब्द बहुत ही खराब है। जैसे बाजारू औरत ठीक नहीं होती वैसे ही बाजारू लोकप्रियता ठीक नहीं। बाजारू से मतलब सस्ती लोकप्रियता है। सस्ती लोकप्रियता बेहद खतरनाक है।

(साभार- यथावत, अंक- जुलाई 2015)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *