बाबा फरीद और हमारा समाज- सुमेल सिंह सिद्धू

सत्यशोधक फाउंडेशन व देस हरियाणा पत्रिका द्वारा आयोजित हरियाणा सृजन यात्रा के दौरान हांसी स्थित चार कुतुब में आयोजित सेमिनार में पंजाबी व सूफी साहित्य के जाने-माने विद्वान डॉ. सुमेल सिंह सिद्धू ने बाबा फरीद और हमारा समाज विषय पर व्याख्यान दिया। सेमिनार का संचालन करते हुए देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि आज जान लेने वाले सड़क पर हैं, लेकिन देने वाले नहीं हैं। संतों-भक्तों व मध्यकाल के महापुरूषों के विचारों को खंगालने की जरूरत है, जोकि हमारी विरासत है। इस व्याख्यान की प्रस्तुति देस हरियाणा के सह-संपादक अरुण कुमार कैहरबा ने की है

वक्तव्य के दौरान सुमेल सिंह सिद्धू

यह कितना अद्भुत कार्य है कि आप लोग हरियाणा के सब हिस्सों में जाकर हरियाणा सृजन यात्रा निकाल रहे हैं। यह अलग किस्म की तीर्थ यात्रा है कि हरियाणा की सांस्कृतिक व वैचारिक बुनियादें हैं, उन स्थानों पर जाकर उसे दोबारा खड़ा किया जाए। इस किस्म की कोशिशें हमारे उत्तर भारत में खत्म हैं। आप लोगों के हौंसले और जीवंतता को सलाम।

हरियाणा सृजन उत्सव व सृजन यात्रा आदि के जरिये देस हरियाणा की पूरी टीम जिस तरह से काम कर रही है,  यह कोई रस्मी बात नहीं है। हम लोग ऐसी जगह पर खड़े ही नहीं हैं, जहां पर किसी रस्म को निभाया जाए। यह हम सबके विशेष तौर पर पंजाब में हमारे सीखने लायक मुकाम है। मैं इसलिए यहां नहीं आया कि मुझे कुछ बोलना है, बल्कि मुझे आपके साथ होना है। अब फासले ऐसे ही कम होंगे। ऐसे ही रास्ते खुलते हैं। ऐसे ही नई सांझदारी खड़ी होती है और आज हम हांसी में हैं, और हांसी के भी उस मुकाम पर हैं, जहां चार कुतुब, कैसे-कैसे महान विद्वान साधक बंदगी करने वाले, जिन्होंने समाज को जोड़ा।

आप सोच कर देखिए कि हांसी उस समय का रिमोट (दूर-दराज) स्थान है। यह किसी शाहराह / हाईवे पर नहीं है। यह बहुत बड़े राजदरबारों के नजदीक नहीं है। मुलतान में भी बाबा फरीद एक सबसे उजाड़ जगह पर जाकर वहां पर अपनी खानकाह खड़ी करते हैं। यह चिश्तिया सिलसिले की वैचारिकता का एक खास बिंदु है कि ये अपने आपको राजघरानों से तोड़ कर दूर रखते हैं हमेशा। बाद में हम देखते हैं कि ये संरक्षण के चक्कर में राजाओं के नजदीक आते हैं, तब हमें उसकी आलोचना भी हुई मिलती है कि यह सूफियों का तरीका नहीं है कि इस तरह से बड़े राज दरबारों के नज़दीक होना और उनसे पुश्तपुनाही की आस करना। राज दरबारों के साथ रिश्ते का इनका कोई चलन नहीं रहा है। यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। इनके सारे वैचारिक मसाइल को समझने के लिये आज हम लोगों ने वह जगह देखी है, जहां बाबा फरीद ने अपना चिल्ला गाड़ा, 12 साल उन्होंने यहां पर पर रहकर शिक्षा हासिल की। हांसी का इतना बड़ा मुकाम है।

चिश्तियों में यह था उस समय कि ख़लीफा वही होगा, जिसके पास ज्ञान की, उस विचारधारा की खास समझ होगी। उससे कमतर कोई रहेगा तो गद्दी खाली छोड़ दी जाएगी। यह देखा जाता है कि ज्ञान समझदारी में कौन आगे निकलता है और फिर उसे खलीफा की गद्दी मिलेगी। जब बाबा फरीद कुरान पढ़ते थे। उसको जैसे वे अता करते थे, उसके अंदर गजब की मिठास थी। इसलिए यह कहा गया कि जब वे कहते हैं तो ये तो शकर के, चीनी के या मिठास के खजाने हैं। शकरगंज का मतलब यह रहाजब वे पढ़ते थे तो उनकी बातचीत या कुरान की व्याख्या, इस्लाम या सूफीवाद की बातचीत सुनकर अचंभित रहते थे।

बाबा फरीद दो लिहाज से हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक तो इस लिहाज से कि वे चिश्तिया सिलसिले के खलीफ़ा हुए। ख़्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी के बाद चिश्तिया सिलसिले में किसी को अपना खलीफ़ा नियुक्त नहीं किया गया था। चिश्तियों में यह था उस समय कि ख़लीफा वही होगा, जिसके पास ज्ञान की, उस विचारधारा की खास समझ होगी। उससे कमतर कोई रहेगा तो गद्दी खाली छोड़ दी जाएगी। यह देखा जाता है कि ज्ञान व समझदारी में कौन आगे निकलता है और फिर उसे खलीफा की गद्दी मिलेगी। जब बाबा फरीद पढ़ते थे। कुरान की जो पढ़ाई थी, उसको जैसे वे अता करते थे, उसके अंदर गजब की मिठास थी। इसलिए यह कहा गया कि जब वे कहते हैं तो ये तो शक्कर के, चीनी के या मिठास के खजाने हैं। शकरगंज का मतलब यह रहा। जब वे पढ़ते थे तो उनकी बातचीत या कुरान की व्याख्या, इस्लाम या सूफीवाद की बातचीत सुनकर अचंभित रहते थे।

सूफियों के साहित्य में एक वाकया मिलता है हमें कि ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी यह बात कहते हैं कि फरीदुद्दीन (बाबा फरीद) को देखकर मुझे तुम पर रश्क होता है कि मेरे पास एक भी ऐसा शिष्य नहीं है, जैसा यह शिष्य तुमने हासिल किया है। इस पंक्ति को मैंने पढ़ा और मैं चौंक गया। यह बहुत कम मिलता है कि दो उस्ताद किसी शागिर्द की यूं तारीफ कर रहे हों। अक्सर अपने अध्यापकों या उस्तादों की हम तारीफ करते हैं। यह एक ऐसा दुर्लभ वाकया है, जब उस्ताद किसी विद्यार्थी की तारीफ कर रहे हैं। इसके साथ ही मुझे याद आया कि 20वीं शताब्दी में भगत सिंह के नेशनल कॉलेज लाहौर के जो अध्यापक थे, जब उनसे पूछा गया कि भगत सिंह के बाद कोई और विद्यार्थी क्यों नहीं निकला, नेशनल कॉलेज ठप्प क्यों हो गया। उनका यह जवाब था कि भगत सिंह को पढ़ाने के बाद किसी और छात्र को पढ़ाने का मन नहीं हुआ। हमने कोई ऐसा छात्र नहीं देखा है, जिसकी पकड़ इतनी ज्यादा हो। जिसमें ज्ञान का इतना कौतूहल हो। हमारे पास ये दो गजब के ऐसे उदाहरण हैं कि बाबा फरीद के उस्ताद ये बात कह रहे हैं और भगत सिंह के साथ यह हो रहा है।

बाबा फरीद मुलतान से थे। अरबी इस्लाम की भाषा है, उसमें पारंगत थे। फारसी साहित्य की भाषा थी। यही निजाम की भाषा थी। इन दोनों के वे आलिम थे। जब वे खलीफा बने तो महरौली में ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह के आस-पास, वहां चिश्तियों की बस्ती थी, जहां वे मुकीम थे। वहां बाबा फरीद महसूस करते हैं कि हम लोग सुल्तान की बगल में हैं। जब आप दरबारों के नजदीक होते हैं तो आपके अंदर भी वो चीजें शुरू हो जाती हैं, वही साजिशें कि कौन किसके साथ है। इस किस्म की जुगतें और साजिशों से उन्हें लगता था कि उनका जो काम है, वे उसे ठीक से नहीं कर रहे हैं। एक तो उनके ऊपर इसका वजन था। साथ ही नक्शबंदियों का दरबार था, वे सुल्तान के साथ हिल-मिलकर रहते थे। उनका दरबार शहंशाही किस्म का होता था, जिसमें मसनदें लगी हुई हैं। जबकि चिश्तिया एकदम सादे। कोई ऐसी चीज नहीं जो इन्हें सादगी, बंदगी व आम लोगों से दूर कर सके।

बाबा फरीद के साथ एक बात और थी कि वह आम लोगों की संगत को बहुत ज्यादा पसंद करते थे। हांसी से उन्हें उनके जानने वाले लोग मिलने गए तो वहां दरबानों ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया कि पहले समय लेना पड़ता है। बाबा फरीद जब शाम को बाजार में निकले तो उन्हें वे मिले। उन्होंने कहा कि तुम आए क्यों नहीं? उन लोगों ने कहा कि आपके तो लोगों ने हमें दौड़ा दिया, हम कैसे आएं। इस बात के ऊपर बाबा फरीद ने मलाल महसूस किया कि यह गलत हो रहा है। वे एक दिन चुपचाप सुबह के वक्त अपनी खिलाफत को अपनी गद्दी, चिश्तिया सिलसिले की जो निजामत उनके हाथ में थी, इसके लीडर थे, सौंप दिया।

चिश्तिया सिलसिला ऐसा है, जो हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा फैला हुआ है। बाकी सिलसिले कम हैं या किसी एक स्थान पर केन्द्रित हैं। चिश्तिया सिलसिले की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि ये लोग जहां रहे, वहीं की बोली को उन्होंने अपनाया। उसी जुबान में, बोली में, उसी लहजे और राग-रागनियों में जो कुछ देख रहे हैं, उस पर लिखा। चरखा देख रहे हैं तो चरखे के बीच में से सारी तसव्वुफ की बात की जाएगी। हल चलाता देख रहे हैं तो उसके माध्यम से सारी बात की जाएगी। बगुला देख रहे हैं, नदी बह रही है, औरतें काम कर रही हैं, गहना क्या पहना है, काम कैसा है, फसल कैसी हुई है इसी से जोड़ कर ही उन्होंने अपनी बात को कहा। उसके चलते अरब देशों की, तुर्की या सीरिया की जो सारी की सारी बिम्बावली थी कि बहुत सारी बात उनके संदर्भों में करते थे। उस पृष्ठभूमि (लैंडस्केप) का हवाला देकर करते थे, क्योंकि कुरान में उसका हवाला आता है। आप चिश्तिया में यह पाइयेगा कि उसमें हांसी की जो उस समय तस्वीर थी, उसके सारे रंग उसमें मिल जाएंगे। मुलतान के सारे उजाड़ रूही बियाबान के सारे रंग बाबा फरीद के कलाम में हमें मिल जाएंगे। उन्होंने वहां पर अरबी-फारसी में भी लिखी अपनी बातें। लेकिन वहां पर जाकर उन्होंने सबसे बड़ा काम किया वह हमारे खित्ते (क्षेत्र) जिसे हम सांझा पंजाब कहते थे, इसके लिए उन्होंने सबसे बड़ा काम यह किया कि अरबी-फारसी के जानकार, दिल्ली में सबसे बड़े तसव्वुफ के तख्तनशीन, जुबानों और इल्मो-फज़ल के जानकार, अपने लोगों के बीच होने के लिए यह सब छोड़कर जाना एक बड़ा फैसला था। लोगों की चाहत के चलते तो आपको बात भी उन्हीं की जुबान में करनी है यह मेरे लिहाज से एक इंकलाबी कदम था।

पहली बार हम ये पाते हैं, कम से कम पंजाबी के लिहाज से कि इस्लाम की बातचीत, तसव्वुफ व इल्मो-फज़ल की बातचीत मुलतानी जुबान में करते हैं, जिसे हम लहंदी जुबान भी बोलते हैं। मुलतानी जुबान का बहुत बड़ा दखल दिल्ली पर भी रहा। बड़ी जुबान थी यह। सिंध से आते हुए मुलतान एक बहुत बड़ा केंद्र था। अभी भी इंज़माम उल हक हैं तो हांसी ही के, बसे वे मुलतान में हैं। वे जब यहां आए तो बहुत बिलखे कि मैं हांसी में अपने पुरखों की जगह हांसी जाना चाहता हूँ। इस बात पर भी गौर कीजिएगा कि हांसी का जो मुलतान के साथ रिश्ता है, वह आप ही लोगों का है। इंज़िमाम-उल-हक जितने मुलतान व पाकिस्तान वालों के हैं, शायद वे भी यह मानते होंगे कि वे उतने ही हांसी व हरियाणा वालों के भी हैं। आप रोहतक के नजदीक से आए हैं। फैज अहमद फैज की वह नज़्म-हम देखेंगे.. जिसे गाने नहीं दिया जा रहा है, उसको जिस मोहतरमा ने निभाया और गाया, वह खुद रोहतक की हैं, इकबाल बानो साहिबा।

वहां जाकर जो खानकाह उन्होंने खड़ी की, उस खानकाह में और जुबानों के साथ-साथ पहली बार पंजाबी में या मुलतानी में शिक्षा दी जानी शुरू हुई। लोगों के साथ मोहब्बत व लगाव को उन्होंने एक कितना बड़ा मुकाम दिया बाबा फरीद ने। उनकी शायरी या कलाम जब हम पढ़ते हैं तो यह मानिएगा कि उससे सादा जुबान आपको पंजाबी में नहीं मिलेगी। आज से वो करीब साढ़े सात सौ साल पहले हुए हैं। बहुत कम हैं ऐसे शब्द जो आपको समझ ना आएं। सिख या पंजाबी जानने वाले बाबा फरीद को जब पढ़ते हैं या जब आप उदास हों तो वे आपके अंदर उतर जाते हैं, जब आप खुद से बात करना चाहते हों, या आपका बहुत गहरी बात किसी राग में करने का मन करे कि आपका दुःख घटे।

औरतों के अंदर बाबा फरीद बहुत बोले जाते हैं। कुछ ही दिन पहले पंजाबी की मशहूर उपन्यासकारा दिलीप कौर टिवाणा जी का देहांत हुआ है। मैंने ये पाया कि उनके उपन्यासों के जो शीर्षक हैं, वे बाबा फरीद की वाणी के ही वाक्यांश उन्होंने लिए हुए हैं। ‘दुनी सुहावा बाग’, ‘जिवैं पुछै आसमान’, ‘वाट हमारी’ आदि। मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने कभी गौर किया है कि आपके उपन्यासों के शीर्षक सीधे बाबा फरीद से आ रहे हैं। वो चौंकी और उन्होंने कहा कि मैंने इससे पहले कभी गौर ही नहीं किया है कि ये बाबा फरीद से मैं ले रही हूँ

औरतों के अंदर बाबा फरीद बहुत बोले जाते हैं। कुछ ही दिन पहले पंजाबी की मशहूर उपन्यासकारा दिलीप कौर टिवाणा जी का देहांत हुआ है। मैंने ये पाया कि उनके उपन्यासों के जो शीर्षक हैं, वे बाबा फरीद की वाणी के ही वाक्यांश उन्होंने लिए हुए हैं। ‘दुनी सुहावा बाग’, ‘जिवैं पुछै आसमान’, ‘वाट हमारी’ आदि। मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने कभी गौर किया है कि आपके उपन्यासों के शीर्षक सीधे बाबा फरीद से आ रहे हैं। वो चौंकी और उन्होंने कहा कि मैंने इससे पहले कभी गौर ही नहीं किया है कि ये बाबा फरीद से मैं ले रही हूँ। वे पढ़ाती हैं और जानती भी हैं। लेकिन लिखते हुए उनके मन में नहीं था कि वे सचेत रूप से बाबा फरीद के कलाम के वाक्यांश ले रही हैं। उन्होंने कहा कि अचेत रूप से ये सारा कुछ होता रहा।

ये बात मेरे लिए खासा मायने रखती है कि बाबा फरीद हमारे साथ हवा व फिज़ा में रहते हैं कि पता ही नहीं चलता कि हम अपनी बात कह रहे हैं या उनके वाक्यांशों का प्रयोग कर रहे हैं। यह बहुत बड़ा मुकाम होता है कि आपका कलाम लोगों के अंदर रच-बस जाए। इसकी एक वजह है कि मुलतानी जुबान में लोच बहुत है, उसके अंदर, छोटी-छोटी बात के अंदर भरभूर लय है।
वे कहते हैं कि जब हमें गाली देनी होती है तो हम पंजाबी बोलते हैं। नहीं तो हम लोग अपनी जुबान- जिसे सरायकी या लहंदी कहते हैं, इसमें तो हम गाली भी नहीं दे सकते। इसमें पता ही नहीं चलता कि किसी ने आपके साथ तल्खी में बात की है।
बाबा फरीद का एक श्लोक देखिए-
खालक खलक में, खलक बसै रब मांह।
मंदा किसनूं आखियै जब तिस बिन कोउ नांह।।

जब ये बात मानी गई कि लोगों के साथ उनकी ही जुबान में बात होगी तो उसकी बुनियाद, उसका मापदंड, उसका ढाँचा बाबा फरीद ने तय करके दे दिया कि इससे कम बात नहीं होगी। उससे पहले पंजाबी में छुट-पुट कलाम कुछ नाथों व सिद्धों से मिलता है। लेकिन वह मात्रा में बहुत कम है और वैचारिक तौर पर उतना गठा हुआ नहीं है। तसव्वुफ व इस्लाम की बात छोड़ भी दें तो बाबा फरीद के कलाम में हमें पहली बार लोगों की बात हुई दिखती है। इसमें कोई ऐसे हवाले भी नहीं हैं। कोई हजरत मोहम्मद साहब का नाम भी नहीं आता है। कोई काबा, किबला, मक्का, मदीना किसी का नाम नहीं आता है। आस-पास की बात चलती रहती है। छोटी-छोटी बातें हैं – लम्मी-लम्मी नदी बहै, केल करेंदे हंजू (हंस वहां खेल रहा है), नदी कंड्डे रूखड़ा, दुनि सुहावा बाग आदि चीजें आपको धीरे-धीरे करके मिलती रहती हैं, बिल्कुल आस-पास की। जैसे हम कहीं जा रहें हों तो वो कहे कि देखो कितने खूबसूरत वृक्ष खड़े हैं। कुछ इस किस्म के बिम्ब बाबा फरीद के कलाम में हमें मिलते हैं। लेकिन उसके अंदर उन्होंने बहुत गहराई लाकर खड़ी कर दी है। उसका शैल्पिक गठन है, वह बहुत आगे का है। उनके दो सौ साल बाद तक हमें कोई कलाम पंजाबी का नहीं मिलता है।
पंजाबी उस समय बोलचाल की भाषा थी। साहित्य की, सोचने की व विचार की भाषा ये नहीं थी। इसको विचार, सोच व ख्याल की भाषा बनाया बाबा फरीद शकरगंज ने। इस खित्ते को यह उनका सबसे बड़ा योगदान है कि पंजाबी व इसके आस-पास की भाषा के साहित्य की बुनियाद अब खड़ी हुई है। गुरू नानक साहब हैं, शेख इब्राहिम से उनकी मुलाकात हुई, उन्होंने कहा कि किसलिए आए हो। उन्हें दूर रोक लिया कि पहले कुछ सुनाओ। बाबा नानक का गायकी में बड़ा मुकाम था। संगीत के बड़े जानकार थे। अपनी किस्म के विद्वान थे, लोगों के साथ जुड़े हुए। तो उन्होंने पूरी भावना से अपने कलाम को रखा। फिर उन्होंने खुश होकर बाबा फरीद की पंजाबी कलाम की वह पोथियां उन्हें दी।

चार क़ुतुब, हांसी

बाबा फरीद की वाणी का जो सबसे शुद्ध रूप है, वह गुरू ग्रंथ साहब के अंदर ही मिलता है। बाकी के अंदर मिलावट होती रहती है, क्योंकि बहुत सारी चीजें जबानी-कलामी चलती हैं। अगली पीढ़ियों तक पहुंचते हुए उसमें लोक भाषा के कुछ अंश आ जाते हैं। कुछ अपनी तरफ से जुड़ जाता है। लेकिन गुरू नानक साहब के पास बाबा फरीद की वाणी का विशुद्ध रूप हमें मिलता है। इतना कि हरेक गुरू साहब ने बाबा फरीद के साथ बातचीत की है गुरु ग्रंथ साहब में। एक तो गुरु ग्रंथ साहब का ढाँचा बहुत कमाल है कि अगर कबीर साहब ने कुछ लिखा है तो उसे संपादित करते समय पांचवें गुरू को लगता है कि इसे रेखांकित करना चाहिए। जो कुछ वे सोचते हैं, उसे कबीर ही के मुहावरे में आगे रख देते हैं। दोनों रहें। बहुत सारे ऐसे शब्द हैं जिसमें उन्होंने फरीद-फरीद कह कर लिखा हुआ है। फरीद साहब के अंदर कईं चीजें हैं। गजब है उनका कहना-
फरीदा भूम रंगावली, मंझ विसूला बाग।

मतलब यह धरती रंग-बिरंगी है और इसके बीच में विषैला बाग है – हमारे लोभ लालच का। अगर इसे देखें कि हिन्दोस्तान एक बहुत सुहावना बाग है, जो बहुत रंगारंग है, लेकिन इसी के अंदर इसको चलाने वाला एक निजाम या उसका एक हिस्सा विषैला भी है। तो यह जबरदस्त विरोधाभास रखते हैं वे अपने सारे कलाम में। एक साथ दो अतियों को हमारे सामने रखते हैं और उसमें पढ़ने वाले के लिए चयन के लिए रखते हैं कि इसमें से अब तुम चुनाव करो, क्या करते हो। एक नैतिक चुनाव है। यही नैतिक चुनाव ही बाद में जाकर एक सामाजिक और राजनैतिक चुनाव भी बनता है। किस तरफ खड़े हो तुम – निजाम या रियासत की तरफ हो या लोगों की तरफ हो।
चिश्तियों ने हिन्दुस्तान को इस चीज के साथ बांध कर रख दिया। इस बात को बाबा फरीद ने एक खास परिपक्वता दी। अपने सारे किरदार से अपने सारे रद्दोअमल से उन्होंने इस बात को साबित और स्थापित किया।

चिश्तियों में एक दो और बातें बहुत दिलचस्प हैं, जिनके बारे में हमें जानने की जरूरत है। एक बात तो यह कि लंगर में जो रसद होगी, उसको शाम तक आपको खत्म करना है। ऐसा नहीं कि कल तक उसे बचा कर रखेंगे। कल की कल देखी जाएगी। इसको आगे नहीं लेकर जाना है। यह बहुत जरूरी तत्व है। दूसरे, उन्होंने लोकभाषाओं में लिखा। भाषाओं में सूफियों की वजह से एक काम शुरू हुआ। तीसरा, जिसको हम समाअ्त बोलते हैं। बाकी इस्लाम के अंदर संगीत को लेकर बड़ी पाबंदी है। यह मानते हैं कि संगीत कुरान के मूल पाठ से ध्यान भंग करता है। इन्होंने संगीत को अपनी बात कहने का बड़ा माध्यम माना।

चिश्तियों के साथ इस बात को लेकर दूसरे सिलसिलों की खूब लड़ाई रही। यहां तक कि वारिस शाह, जिन्होंने हीर-रांझा लिखा। सोचिए आप कि रांझा के पास और कुछ हो या ना हो बांसुरी उनके पास हमेशा रहती है। वह बांसुरी समाअ्त का या चिश्ती सूफी सिलसिले का ही एक प्रतीक है कि वह इसके माध्यम से अपनी बात कहता है। जब वह उदास हो जाता है, जब वह हार जाता है, खिन्न हो जाता है, उसकी बात नहीं मानी जाती तो फिर वो एक कोना पकड़ कर अपनी बांसुरी बजाता है। तो सुनने कौन आता है। यह फिर एक दिलचस्प बात है कि औरतें, बूढ़े, बच्चे, पशु-पक्षी और काम करने वाले लोग-मजदूर व छोटे किसान।

बाबा फरीद समाअ्त व बांसुरी बजाने के साथ समाज के इस बड़े हिस्से को जोड़ देते हैं। इन्हीं लोगों को जो समाज के पिछड़े-दमित तबकों से हैं, लिंग के लिहाज से, जाति व उम्र के लिहाज से। यही लोग हैं जो बाबा फरीद के भी चेले बनते हैं। चिश्तिया लोग उनके अंदर खासे लोकप्रिय रहे। ये सिलसिला इस लिहाज से बाबा फरीद के लगभग 450 साल बाद सैयद वारिस शाह होते हैं। वहां तक आपको दिखाई देता है कि किस तरह से चल रहा है कि समाअ्त की बात उसके अंदर कैसे आती है।

तीसरी बात जो मैंने कही थी कि इनके अंदर योग्यता है। ऐसे ही नहीं बन जाएगा। यह पुश्तैनी नहीं है। इसके लिए आपको काबिल बनना होगा। अपनी मेधा को आपको साबित करना होगा। सिख गुरुओं के अंदर भी चिश्तिया सिलसिले का असर था कि ये जो गद्दी है पुश्तैनी नहीं होगी। ये भी योग्यता के लिहाज से उसे ही मिलेगी, जो सबसे ज्यादा काबिल होगा। जो वैचारिकी को अच्छे से समझता है। लंगर वहीं से आता है। कीर्तन की और भी परंपराएं हैं -लंगर, संगीत, सबका आपस में बैठकर भजन करना। तो ये कुछ चीजें हैं जो सिख, हिन्दू, इस्लामी परंपरा में चिश्तियों के हवाले से ये जुड़ती हैं।

बाबा फरीद के दो श्लोक मैं आपको सुनाता हूँ। इस पर आप गौर करें। इससे उनकी शख्सियत, विचारधारा व कहने का पता चलता है। बड़ी मशहूर हैं। आपने भी सुनी ही होंगी-
फरीदा गलिये चिक्कड़ दूर घर, नाल प्यारे नेह।
चलां तां भीज्जै कंबली, रहां तां टूट्टै नेह।।
गली में कीचड़ है, घर दूर है, मेरी अपने महबूब से मोहब्बत है। यदि जाती हूँ तो कंबली भीग जाएगी। हमें नहीं पता लेकिन जिनको चिकनी मिट्टी का अनुभव है, वे इस बात को समझ सकते हैं। ना तो पानी सूखे और उस पर चलना मुहाल हो जाता है। हम लोग बठिंडा से हैं। हमने ऐसी मिट्टी देखी ही नहीं। जहां बरसात होती है तो कुछ देर में पानी सूख जाता है। गुरदासपुर की तरफ गए तो वहां पर चिकनी मिट्टी के कारण पानी सूखे ही ना और फिसलन। वहां जाकर फरीद जी की ये पंक्तियां याद आई – गलियां चिक्कड़ दूर कर। यदि फरीद को समझना है तो उनके लैंडस्केप (landscape) को समझना होगा। इनके आस-पास को समझना होगा। अपने यहां की मिट्टी में पानी का जमाव कैसा है, कैसा नहीं है, आपको उसके बारे में जानकारी भी देते जाते हैं। यह गजब का काम है।

जब ये अध्यात्म या रहस्यवाद की बात करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि इन्होंने पदार्थिक हालात को आपके सामने नहीं रखा है। गहने, रसोई का काम, पशु-पक्षी किस किस्म के हैं, कितनी लंबी यात्रा है, ये आपके सामने सारे हवाले चलते रहते हैं।
गलिये चिक्कड़ दूर घर, नाल प्यारे नेह।
चलां तां भीज्जै कंबली, रहां तां टूट्टै नेह।

चलूंगी तो ये मुश्किलें हैं। लेकिन अगर रह गई, तो ना तो कीचड़ होगा, ना ही कंबली भीगेगी। अब आप भी तो बहाना कर ही सकते थे कि अब कौन जाए। कुरुक्षेत्र में बैठ कर भी तो इनको आप इन चारों शख्सियतों (हरियाणा सृजन यात्रा हाली, बालमुकुंद गुप्त, संत गरीबदास व फ़रीद के स्थलों पर गई थी ) को याद कर ही सकते थे। आप आए हैं, तो चलने से ही चीजें बदलती हैं। एक रिश्ता बनता है। उससे बच तो जाएंगे लेकिन नेह टूट जाएगा। वे आपके सामने नैतिक चुनाव का मंजर खड़ा करते हैं कि अब चुनो। क्या चुनिएगा? अब इसी चयन पर आपकी अगली जिंदगी का नक्शा बनेगा। अब अगले श्लोक में वे समाधान देते हैं। वो समाधान बहुत दिलचस्प है- 
भीज्जौ सिज्जौ कंबली, अल्लाह बरसौ मेह।
जाएं मिलां तिहं सज्जणा, मेरा टूट्टै नाहीं नेह।।

वे कहते हैं अल्लाह की रहमत बरस रही है। ये क्या भिगाएगी हमें। अपनी भीगी हुई कंबली को लेकर। सिज्जौ का मतलब है – छीजी हुई। अब कबीर साहब को याद करें – झीनी-झीनी बीनी चदरिया। इस चीज को कि जिस हाल में भी हैं, वैसे ही जाना होगा। अब फैसला कर लिया तो वही बरसात अल्लाह की रहमत हो गई। अल्लाह बरसौ मेह। जाएं मिलां तिन सज्जणां।
बाबा फरीद इतने बड़े चिंतक हैं कि उनकी बात में आप यह नहीं पाइयेगा कि यहां कोई गड़बड़ हो गई और दूसरी जगह निभी नहीं। उनके चिंतन की परंपरा उनके कलाम में अपनी सादगी में सामने आती है। यहां पर आकर उनका मिलने का जज्बा मुंहजोर हो गया है- जाएं मिलां तिन सज्जणा। इतने में ही आप बह जाते हैं कि मेरा प्रेम नहीं टूटना चाहिए। मुझे उनसे मुझे मिलना ही है।
उनको बचपन से मैं सुनते आ रहा हूँ, पढ़ते आ रहा हूँ। बाद में कुछ साल पहले मेरे भीतर यह रोशन हुआ कि वे क्या कह रहे हैं। कितनी बड़ी बात है इसमें। फिर आपको पता चलता है। पाकिस्तान से नज़म हुसैन सैयद साहब, प्रोफ़ेसर किशनसिंह ने इन चीजों को विधिवत तरीके से अध्ययन किया। उन्होंने जोड़ा इनको कि यही शाह हुसैन की क़ाफ़ी आपने भी शायद सुनी होगी-
मैं भी झोक रांझण दी जाणा, नाल मेरे कोई चल्ले।
नै भी डूंगी तुला पुराणा, सिहां दा पत्तण मल्ले।।

सृजन यात्री चार क़ुतुब के भीतर

उन्होंने ऐलान किया कि मुझे रांझण की झोक जाना है, क्या कोई मेरे साथ चलने वाला है। मुझे जाना ही है। मेरा टूट्टै नाहीं नेह। गलिये चिक्कड़ दूर घर। रांझण की झोक जाना है। घर दूर है और गली में चिक्कड़ है। गलिये चिक्कड़ अब दरिया बन गया है। नै भी डूंगी मतलब उसका तट बहुत गहरा है। ऐसे ही नहीं जाया जा सकता। तुला पुराणा मतलब पुल पुराना है, जोकि मेरा वजन सहन नहीं कर पाएगा। इसलिए डूबना तय है। कहती है कि सिहां दा पत्तण मल्ले। जहां पर पर वह उथला है, वहां पर शेर काबिज हैं। तीनों लिहाज से मौत लाजिम है। लेकिन रांझे की झोक मुझे जरूर जाना है। मेरा उनसे इकरार हुआ है।

अब आप यह देखिए कि बाबा फरीद ही की जमीन के ऊपर शाह हुसैन अपने इसको रांझे-हीर के साथ जोड़ दे रहे हैं। मैं भी झोक रांझण दी जाणा नाल मेरे कोई चल्ले। यूं करते-करते वारिस शाह जब किस्सा हीर लिखते हैं तो वो चिनाब दरिया में छलांग लगाते हुए रांझे को और उसे विस्तार देते हुए बड़े नाटकीय ढ़ंग से उसे दिखाते हैं कि क्या हुआ? कैसे वह नहीं जा पाया और कैसे उसे ले जाया गया। यह कितना मुश्किल है।

वारिस शाह का जो दौर है, 18वीं सदी का पंजाब, बंदाबहादुर के साथ। पंजाब के लोग तो उसे अलग कर रहे हैं। लेकिन सारी फौज तो हरियाणा से जुटी थी। बड़ खालसा से, नारनौल से और यूं चलते-चलते कुरुक्षेत्र का ही क्षेत्र है वह समाना, लोहगढ़, मुख़लिसगढ़ व अंबाला आदि इस तरफ ही आता है। मुगलों का राज कमजोर हो रहा है। पंजाब के अंदर बगावतें उठ रही हैं। हरियाणा में भी किसान विद्रोह उठ रहा है। एक माहौल है कि एक साम्राज्य ढ़ह रहा है। नई ताकतें खड़ी हो रही हैं। वहां पर वारिस शाह, जो खुद चिश्ती सिलसिले के हैं। वो एक बंद लिखते हैं बाबा फरीद के ऊपर-
मौदूद दा लाडला पीर चिश्ती, शकर-गंज मसउद भरपूर है जी ।
ख़ानदान विच्च चिश्त दे कामलियत, शहर फकर दा पटन मामूर है जी ।
बाहियां कुतबां विच्च है पीर कामल, जैंदी आजज़ी ज़ुहद मनज़ूर है जी ।
शकर गंज ने आण मुकाम कीता, दुख दरद पंजाब दा दूर है जी।
मौदूद साहब के बारे में माना जाता है कि चिश्तिया सिलसिले की शुरुआत उन्होंने की थी। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सीमा पर उनकी दरगाह बताई जाती है। वारिस शाह इसमें चिश्ती सिलसिले की पूरी जानकारी दे रहे हैं। मौदूद से चिश्ती सिलसिला शुरू हुआ। शकरगंज उनका नाम है। फिर उनका कुतुबों में बड़ा मुकाम है। अपने जौहद के लिए वे जाने जाते थे। ये उनके कलाम के बारे में वे पूरी कुंजी पकड़ा दे रहे हैं। खानदान- ए- चिश्त में पटण का शहर बसाया, जो अभी भी मामूर है। पूरी तरह से उसकी आबोताब कायम है। अंत में वे एक लाइन कहते हैं-
शकरगंज ने आण मुकाम कीता
दुख-दर्द पंजाब दा दूर है जी।
शकरगंज ने मुलतान या पाकपटण आकर जब मुकाम किया, तब कहीं जाकर पंजाब का दुख-दर्द दूर होना शुरू हुआ। इस पंक्ति में उनकी अकीदत दिखती है। उनका अपने खलीफा के प्रति, जिनके वे अपने आप को शागिर्द भी कहते हैं। अकीदत व उन्स दिखता है। एक सच्चाई भी दिखती है कि वारिस शाह जब कोई बात कहते हैं तो वे वैसे ही नहीं कह देते।
मैंने इसे ऐसे पाया कि जब भी हम लोग आपस में बैठ कर कोई शुभ वचन करते हैं, बढ़िया बात करते हैं, एक दूसरे से उलझते और बहसते हैं, लेकिन ज्ञान और विवेक की किसी चीज को खड़ा भी करते हैं तब हम शकरगंज की हाज़री में ही होते हैं। भले ही हम कहीं भी हों। भले ही वो क्लासरूम हो। भले ही वो कोई सेमिनार रूम हो या भले ही दो किसानों की आपस में बातचीत हो। और कोई स्टूडियो में टेलीविजन पर अच्छी बातचीत हो रही हो तो हम समझ लें कि वहां पर शकरगंज हैं। आज तो हम उन्हीं की जगह पर आए हैं, जहां से ये सारा सिलसिला शुरू होता है। आज का दिन उनको याद करने के लिए बहुत बड़ा सौभाग्य है। आज हमारे साथ कोई बरकत है। उनका श्लोक आता है-
दिलों मोहब्बत जिन, सेई सच्चिया।
सच्चाई उन्हीं के पास आएगी, जिनके दिल मोहब्बत से भरे हुए हैं। यदि वास्तव में सच्चाई है तो वह वहीं पर आकर रहेगी। नहीं तो वह एक किस्म का डिसिप्लिन ही रहेगा। वह हमारे ऊपर कठोर मर्यादित किस्म का अंकुश के तौर पर रहेगा। सूफियों ने कमाल किया। इतनी बड़ी बात को पूरी सादगी और ऐलानिया ढंग में कहा है।
दिलों मोहब्बत जिन, सेई सच्चिया
जिन मन हौर, मुख हौर काँडे कच्चिया।
जिनके मन में और है और मुख में और है, वे तो कच्चे बर्तन के समान हैं, उनकी क्या बात करनी? मुद्दा यह कि दिलों मोहब्बत जिन, सेई सच्चिया।
कबीर साहब बाबा फरीद से सौ साल बाद हुए। गुरुग्रंथ साहब में कबीर साहब की भी कुछ ऐसी ही बाणी शामिल है, जो कि बाकी हिन्दी में दिखाई नहीं देती। लोगों को पता भी नहीं है कि ये कबीर के श्लोक या शब्द हैं, जो गुरुग्रंथ साहब में है। वहां पर आता है। पढ़ा तो मैं चौंक गया –
कबीर जो तुध साध पिरमकी,
तो सीस की बनाय लियो गोय।।
खेलत-खेलत हाल कर,
जो होय से होय।।
कबीर साहब शीश की गेंद बना लेने की बात करते हैं। चाहे उससे हॉकी खेलो या फुटबाल। चिंदी-चिंदी हो जाए तो हो जाए। सब देखा जाएगा। पहले तुम इसे गेंद बनाओ। कबीर साहब इसे यहां तक ले जाए। वही चुनाव का मसला है। इश्क़ के इख़लाक से ये चीज शुरू होती है। गुरुनानक के अंदर आकर कबीर साहब की यह पंक्ति और फरीद साहब की वह पहली पंक्ति गजब की रोशनी और उजास भर देती हैं और वे इसे बुलंदी पर लेकर जाते हैं। जिसको कबीर साहब साध कह रहे हैं, गुरुनानक उसे कहते हैं-
जो तौ प्रेम खेलण का चाउ।
सिर धर तली गली मेरी आउ।।
कि सिर को उतारो और अपनी हथेली पर लेकर आओ, यदि प्रेम का खेल खेलना है। आगे वे कहते हैं-
इत मार्ग पैर धरीजै।
सिर दीजै, काण ना कीजै।।
वारिस शाह किस तरह बात करते हैं। लोग समझते हैं कि लड़के-लड़की के इश्क की दास्तान है। है भी। उससे आगे इश्क के मुकाम क्या-क्या हैं। प्यार के लिए शहीद भी होते हैं। हीर को शहीद माना गया है। उसमें वो कहता है-
सर दित्तयां बाज ना इश्क पक्के।
इश्क को पकना चाहिए। ऐसे ही नहीं है वो। पकने को यदि तसव्वुफ की सात मंजिलों के साथ इसको जोड़ कर देखें तो। जिसमें आखिर के मुकाम में आपका रंग सुर्ख भी होता है और सब्ज भी होता है।
सिर दित्तयां बाज ना इश्क पक्के।
ऐ नहीं सुखालियां यारियां वे।।
ये दोस्तियां आसान नहीं हैं। सिर देने के बाद ही यह पकेंगी। ‘दिलों मोहब्बत जिन, सेई सच्चिया’, मोहब्बत और सच्चाई की परीक्षा यह है कि क्या आप अपने अकीदे के लिए सिर देने के लिए तैयार हो या नहीं।
शहादत को समझने के लिए मैं पढ़ते आया। सिख गुरुओं का जो कलाम है। सूफियों का जो कलाम है। पंजाब का यह खित्ता, इसे हरियाणा भी अब बोल लें, हिमाचल और पाकिस्तानी पंजाब भी बोल लें। क्योंकि ये बंटवारे हमने नहीं किए। यह हमारे ऊपर थोपे गए हैं। इसको  हम पंजाब ही कहते थे। पंजाब की वैचारिकी की बुनियाद इन तीन लोगों ने रखी है।
बाबा फरीद गंजेशकर फरीदुद्दीन, जहां हम खड़े हैं। दूसरे हैं कबीर साहब, तीसरे हैं गुरुनानक। इन तीन लोगों ने इस इलाके को खास आब दी है। इन तीनों का यह सबसे खूबसूरत कलाम गुरु गंथ साहब में विद्यमान है। उसमें कबीर साहब की वह चीजें हैं, सारा निर्गुण का सबसे गंभीर कलाम यहां पर है। फरीद साहब का सबसे विशुद्ध कलाम हमें यहां पर मिलता है। बाकी गुरुनानक साहब और दूसरे गुरुओं का तो उसमें है ही।

बाबा फरीद ने यही हमें सिखाया कि जरा देहातों में दूर जाया जाए। अपने आप को जरा दांव पर लगाया जाए। उनको क्या पता था कि यहां पर सफलता होगी ही। लेकिन उनका जाना बड़ी बात है। आप लोग भी उसी सफर में हैं। हम लोग भी उसी सफर में रहें। इसी में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।

इन तीन लोगों ने बुनियाद रखी इस खित्ते के अंदर कि हमें रहना कैसे है। हमें रहने की तमीज उन्होंने दी कि आपको इश्क में मुब्तिला होकर रहना है। प्रेम में रहना है। सच्चाई को इसी के माध्यम से हासिल कर सकिएगा। प्रेम जब भी दिखाया गया है, उससे नहीं है जो नजदीक है। वह उससे है जो आपसे जरा कमतर है या आपका दुश्मन हो सकता है। आपके लिए कोई भी बेगाना नहीं है। दूसरे के लिए कुर्बान हो जाना है। उसमें मुझे लगा कि शहीद होने पर इतना बल है कि शाह हुसैन, जो लाहौर में दातागंज की दरगाह है। जिनका काशफ-उल-महजूब नामक फारसी में पहला ट्रीटेज है जो उन्होंने सूफीवाद के ऊपर लिखा। अल हुजविरी, वहां पर मेला चरागां होता है, तो शाह हुसैन साहब वहीं पर गाते थे और कलाम कहते थे। वो कहते हैं-
शाह हुसैन शहादत पाए ओ।
जो मरण मित्रां दे अग्गे।।
वे लाहौर में यह कह रहे हैं। गुरु अर्जुन साहब उन्हीं के समकालीन हैं, वे इधर अमृतसर में कह रहे हैं-
जिस प्यारे सौं नेह, तिस आगै मर चलियै।

बाबा फरीद को देखिए, शाह हुसैन और वारिस शाह को देखिए। बाद में गदरियों (गदर पार्टी वाले) को देखिये। इन सब चीजों के अंदर है कि पंजाब में इश्क कमाया जाएगा। इसको कमाना भी बोलते हैं। ऐसे ही नहीं है। इश्क कमाइये और इसके लिए सिर हथेली पर रखिए। पंजाबी होने के लिए या इस खित्ते में रहने के लिए पहले अपना शीश काट कर हथेली पर रखने की आजमाइश के लिए तैयार हो। इश्क कमाने के लिए एक तड़प जगे।

एक लगन के बिना समाज का कुछ नहीं किया जा सकेगा। हम लोगों से जुड़ें। लोगों के साथ स्नेह को दोबारा से हासिल करें। उसको कमाएं। उस रास्ते पर चलें। बाबा फरीद ने हमारे सामने और आप जिस हजरत के पास से होकर आए हैं, संत गरीबदास जी, हाली पानीपती, बालमुकुंद गुप्त जी, मेरा तो सबके सामने सिर झुकता है। ऐसी ही बैठकें, ऐसी ही यात्राएं हों। हम लोग अपने लोगों को दोबारा ढूंढ़ें। अपने साथ बातचीत दोबारा शुरू करें। बाबा फरीद ने यही हमें सिखाया कि जरा देहातों में दूर जाया जाए। अपने आप को जरा दांव पर लगाया जाए। उनको क्या पता था कि यहां पर सफलता होगी ही। लेकिन उनका जाना बड़ी बात है। आप लोग भी उसी सफर में हैं। हम लोग भी उसी सफर में रहें। इसी में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।  

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