मानवीय संवेदना व जिजीविषा हमेशा ज़िंदा रहती है – सुभाष चंद्र

पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय।विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

पुराणमित्येवनसाधुसर्वंनचापिकाव्यंनवमित्यवद्यम्।
सन्त: परीक्ष्यान्यतरद्भजन्तेमूढःपरप्रत्ययनेयबुद्धिः॥

( पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय।विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।)

यह सार्वभौम सत्य की तरह स्वीकार है कि अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत से कन्नी काटकर नहीं, बल्कि उससे गहराई से जुड़कर ही मनुष्य अपने भविष्य की दिशा तय कर सकता है। अपनी विरासत से संबंध के बारे में महाकवि कालिदास ने मालविकाग्निमित्रम् नाटक के प्रारंभ में ही उपरोक्त सूत्र दिया है। संकट के समय में मानव की संघर्षशील चेतना को जगाकर साहित्य ने मानव को हमेशा ही ताक़त दी है और दुनिया में बड़े-बड़े परिवर्तनों की पृष्ठभूमि बना है। 

वर्तमान शासन सत्ताएँ अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को विकृत करने का संकट पैदा कर रही हैं। मानवता के समक्ष वास्तविक चुनौतियों के बरक्स मिथ्या व आभासी चुनौतियाँ पेश कर रही हैं और लोग इस जाल में फँस भी रहे हैं।बाज़ार व्यक्ति को टिक-टॉकी रचनात्मकता व अभिव्यक्ति के मंच तो दे रहा है, लेकिन हर दुख-पीड़ा, विडम्बना को प्रहसन के आनंद-कुण्ड में तबदील कर रहा है। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के अभाव में अपनी रचनात्मक प्रतिभा व ऊर्जा की अभिव्यक्ति के लिए आभासी मंच ही उसकी पहुँच में हैं, जिसके आनंद लोक में वह खूब गोते लगा रहा है। इस प्रक्रिया में मनुष्य ऐतिहासिक से क्षणजीवी प्राणी में तबदील हो रहा है। 

सांस्कृतिक-साहित्यिक जगत में हरियाणा को देश में तो कुछ कमतर आंका ही जाता है, बल्कि प्रदेश में भी अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत के प्रति एक अजीब सा रिश्ता है। सभ्यता की वस्तुओं, उपकरणों, यंत्रों, परिधानों को लेकर महिमांडन व गर्वोक्तियां तो हैं, लेकिन जीवन के सांस्कृतिक मूल्यों पर चर्चा का अभाव और साहित्यिक विरासत के प्रति घोर विस्मृति है।

शेख़ फ़रीद, संत गरीबदास, अल्ताफ़ हुसैन हाली, बालमुकुंद गुप्त जैसे महान साहित्यकार इस धरती पर हुए। ग्रामीण व कम शिक्षित समाज श्रद्धावश पीरों-फकीरों-संतों की छतरियों-मढ़ियों-मज़ारों पर जाता है, लेकिन शिक्षित वर्ग ने तो विरासत के प्रति पीठ ही कर ली है। सूफ़ियों के चिश्तिया सिलसिले के मुखिया अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित महान रचनाकार शेख फरीद 12 साल हाँसी में रहे, लेकिन यदि बिल्कुल उसी शहर के प्रबुद्ध निवासियों की भी चेतना का हिस्सा नहीं है तो कहने के लिए बचता ही क्या है।  

अपनी विरासत के प्रति संवेदनशीलता व आलोचनात्मक विवेक ही भविष्य के मार्ग सूचक-बोधक है। अपनी विरासत की ओर हरियाणा के लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए सत्यशोधक फाउंडेशन व देस हरियाणा द्वारा 29 फरवरी से 1 मार्च तक हरियाणा सृजन यात्रा का आयोजन किया। देस हरियाणा से जुड़े प्रदेश भर के 18 साहित्यकार व संस्कृतिकर्मी इसमें शामिल हुए। कुरुक्षेत्र स्थित पत्रिका के कार्यालय में एकत्रित हुए और शहीद ऊधम सिंह चौंक पर शहीद को नमन करके यात्रा की शुरुआत की। 

सृजन यात्रा का पहला पड़ाव पानीपत रहा। यहाँ प्रख्यात शायर एवं शिक्षाविद् मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली की मजार पर संगोष्ठी हुई, जिसमें पानीपत व आसपास के रचनाकार शामिल हुए। हाली के जीवन मूल्यों, संघर्षों, साहित्यिक सरोकारों व समाज सुधार के कार्यों पर चर्चा हुई। दूसरा पड़ाव, देश के जाने-माने पत्रकार, संपादक व साहित्यकार बाबू बालमुकुंद गुप्त के गांव गुड़ियानी (जिला रेवाड़ी) में झमाझम बरसात में सृजन यात्रियों का काफिला पहुंचा। रेवाड़ी व झज्जर के रचनाकारों ने गुप्त जी की हवेली में जोरदार स्वागत किया। संगोष्ठी में देस हरियाणा के बाबू बालमुकुंद गुप्त विशेषांक सहित कई पुस्तकों का विमोचन हुआ। साहित्यकारों, पत्रकारों व शिक्षाविदों ने गुप्त जी की रचनाएं पढ़ीं और उनके साहित्यिक योगदान पर व्याख्यान दिए। गांव में 1857 की क्रांति के दौरान फांसी पर चढ़ाए गए सौ से अधिक अज्ञात शहीदों को श्रद्धांजलि दी।

सृजन यात्रा का तीसरा पड़ाव झज्जर जिला के गांव छुड़ानी स्थित कबीर की परंपरा के संत कवि व सुधारक गरीबदास का धाम रहा। संत गरीबदास ने सामाजिक रूढ़ियों, पाखंडों, अंधविश्वासों, जात-पात व साम्प्रदायिक विभाजन का विरोध किया था और लोगों को संकीर्णताओं से निकाल कर मानवता की राह दिखाई थी। संत गरीबदास के जीवन व साहित्य पर महंत श्री दयासागर जी के साथ बातचीत की गई।

इसके बाद सृजन यात्रा चौथे पड़ाव बाबा फरीद की साधना स्थली हांसी पहुंची। चार कुतुब (जहां चार सूफी शेख कुतुब जमालुद्दीन हांसवी, बुरहानुद्दीन, मुनव्वरूद्दीन और नुरूद्दीन की दरगाहें हैं) में संगोष्ठी हुई।। बठिंडा से पधारे इतिहासकार व संस्कृति चिंतक सुमेल सिंह सिद्धू ने वक्तव्य दिया जिसमें बाबा फरीद की विरासत को उद्घाटित किया।

हरियाणा सृजन यात्रा ने हरियाणा की विरासत की ओर प्रबुद्ध जनों का ध्यान आकर्षित किया। साहित्यिक-सांस्कृतिक दायरों में इसकी चर्चा हुई और इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। सृजन यात्रा से शुरू हुई इस विचार प्रक्रिया का विस्तार हुआ हरियाणा सृजन उत्सव में (14-15 मार्च, सैनी धर्मशाला, कुरुक्षेत्र)। भारतीय संविधान की प्रस्तावना के पाठ से हरियाणा सृजन उत्सव की शुरुआत हुई। देश के जाने-माने कानूनविद कनक तिवारी ने ‘हम भारत के लोग और भारत का संविधान’ विषय पर उद्घाटन भाषण दिया। इस दौरान ‘गांधी-अंबेडकर-भगत सिंह के चिंतन की सांझी जमीन’, ‘शैक्षिक परिदृश्य और विश्वविद्यालय परिसरों का माहौल’, ‘हरियाणवी समाज की सृजन और बौद्धिक उदासीनता’ जैसे ज्वलंत विषयों पर परिसंवाद हुए। खचाखच भरे हाल में दो दिन तक कवि सम्मेलन, नाटक, पुस्तक प्रदर्शनी व साहित्यिक चर्चाओं का सिलसिला चलता रहा। इस अंक में हरियाणा सृजन यात्रा व चौथे हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान हुई चर्चाओं को प्रस्तुत किया गया है।

कोरोना महामारी ने निश्चित तौर पर मानव-जीवन को अपनी जकड़ में लिया, लेकिन इससे निपटने के शासन सत्ताओं के तुगलकी तरीक़ों ने इसे महात्रासदी में तब्दील किया है। बग़ल में पोटली दबाए, कंधे पर थैले लटकाए, सिर पर गठरी उठाए, लाठी के सहारे घिसटते बुजुर्गों, पीठ-गोद-गर्भ में बच्चे संभालती महिलाएँ, पुलिस की लाठी खाते लाचार मानव-सैलाब। उफ, हृदयविदारक दृश्य। 

सत्ता का संवेदनहीन व जनविरोधी चरित्र फिर उद्घाटित हुआ। जो वर्ग जितना कमजोर है, उतना अधिक पिसा है। करोड़ों लोगों के रोजगार छिने मगर चंद पूंजीशाहों के लिए यह आपदा एक अवसर बन गई। श्रम व पर्यावरण संबंधी क़ानूनों में बदलाव भी इन्हीं दिनों में हो गया जिसके दूरगामी असर पडेंगे। सरकारों के कानफोड़ू आश्वासन चाहे खोखले साबित हुए हों, लेकिन इस दौरान जिस तरह लोग पीड़ितों की मदद के लिए आगे आए उससे एक बार फिर यही स्थापित हुआ है कि संकट प्राकृतिक हो या व्यवस्थाजनित मानवीय संवेदना व जिजीविषा हमेशा ज़िंदा रहती है। साहित्यकार व कलाकार अपने-अपने कला माध्यमों के जरिये महामारी व व्यवस्थाजनित महात्रासदी की अभिव्यक्ति करेंगे ही। 

अंक आपके सामने है, आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।

सुभाष चंद्र

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