हिन्दी के प्रथम आचार्य : महावीर प्रसाद द्विवेदी

आचार्य द्विवेदी को हिन्दी नवजागरण का केन्द्रीय पुरुष कहा जा सकता है. वे अपने समय और परिवेश के अत्यंत सजग आलोचक हैं. (लेख से)

महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी साहित्य के इतिहास में हिन्दी नवजागरण का तीसरा चरण ‘द्विवेदी युग’ के नाम से जाना जाता है. ‘साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहने वाले आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी( जन्म- 15.5.1864 ) का जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर नामक गाँव में हुआ था. उन्होंने साहित्य की सेवा के लिए दो सौ रूपए महीने की रेलवे की सरकारी नौकरी छोड़कर तेईस रूपए महीने पर ‘सरस्वती’ के संपादन का दायित्व संभाला था. वे एक साथ कवि, निबंधकार, अनुवादक, संपादक और आलोचक हैं, किन्तु उन्होंने ‘सरस्वती’ के माध्यम से भाषा परिष्कार का जो महान कार्य किया वह अतुलनीय है.

साहित्य के अलावा इतिहास, पुरातत्व, अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान आदि में भी उनकी गहरी पैठ थी. उन्होंने ‘बेकन विचार रत्नावली’, ‘शिक्षा’, और ‘स्वाधीनता’ के नाम से क्रमश: बेकन के निबंधों, हर्वर्ट स्पेंसर की पुस्तक ‘एज्यूकेशन’ और जॉन स्टुअर्ट मिल की पुस्तक ‘आन लिबर्टी’ का हिन्दी में अनुवाद किया है.

द्विवेदी जी संस्कृत के पण्डित तो थे ही, उन्होंने अंग्रेजी, बंगला, मराठी, गुजराती साहित्य का भी गंभीर अध्ययन किया था. साहित्य के अलावा इतिहास, पुरातत्व, अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान आदि में भी उनकी गहरी पैठ थी. उन्होंने ‘बेकन विचार रत्नावली’, ‘शिक्षा’, और ‘स्वाधीनता’ के नाम से क्रमश: बेकन के निबंधों, हर्वर्ट स्पेंसर की पुस्तक ‘एज्यूकेशन’ और जॉन स्टुअर्ट मिल की पुस्तक ‘आन लिबर्टी’ का हिन्दी में अनुवाद किया है. इन सबके अध्ययन से उनकी एक स्वस्थ वैज्ञानिक दृष्टि बन चुकी थी. अंग्रेजी के कवियों में वे सबसे अधिक वर्ड्सवर्थ से प्रभावित थे.

सैद्धांतिक दृष्टि से द्विवेदी जी रसवादी आलोचक माने जाएंगे, किन्तु उनका रसवाद लोकहित की भावना से मर्यादित है. रसवाद की यही परंपरा आगे चलकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल में अपनी पराकाष्ठा तक पहुंच गई है. उनकी आलोचना शैली सैद्धांतिक भी है और व्यावहारिक भी. ‘रसज्ञ रंजन’ और ‘नाट्यशास्त्र’ जैसी कृतियों में उनकी सैद्धांतिक आलोचना देखी जा सकती है. उनकी व्यावहारिक आलोचना में भी जहां- तहां उनकी सैद्धांतिक मान्यताएं देखी जा सकती हैं. 

उनकी मूल्य दृष्टि भविष्योन्मुखी है. ‘कविता का भविष्य’ नामक अपने एक महत्वपूर्ण निबंध में उन्होंने कहा है, “भविष्य का लक्ष्य इधर ही होगा. अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूरों को अपने काव्यों का नायक बनाना नहीं चाहता था. वह राज-स्तुति, वीर-गाथा, अथवा प्रकृति –वर्णन में ही लीन रहता था, परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत का रहस्य सबको विदित होगा. जगत का रहस्य क्या है ? इसपर एक ने कहा है कि असाधारणता में यह रहस्य नहीं है. जो साधारण है, वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौन्दर्य से युक्त है. इसी सौन्दर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य के कवियों का काम होगा.” ( महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली, खणड-2, पृष्ठ 98)

हिन्दी आलोचना को द्विवेदी जी ने नया रूप दिया है. साहित्य से रूढ़िवाद को हटाने के लिए उन्होंने रीतिवादविरोधी अभियान चलाया. उन्होंने भक्त कवियों और नायिकाभेद लिखने वाले रीतिवादी कवियों को एक दूसरे से अलग किया. उनके अनुसार सूर और तुलसी के साथ देव और मतिराम का नाम लिखना भी अनुचित है. इस विषय को लेकर उन्होंने मिश्रबंधुओं का तीव्र विरोध किया था क्योंकि तुलना करते हुए मिश्रबंधुओं ने तुलसी और सूर के साथ देव का नाम भी रखा था. द्विवेदी जी तुलसी और सूर को होमर, वर्जिल, शेक्सपियर, मिल्टन, व्यास, वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति की श्रेणी का कवि मानते हैं. उनके अनुसार हिन्दी में यदि कोई कविरत्न कहे जाने योग्य कवि या महाकवि हैं, तो वे सूर या तुलसी ही हैं. रस, भाव, अलंकार, छंदशास्त्र और नायिका भेद आदि के विवेचन -विश्लेषण से मनुष्य जाति का बहुत ही कम उपकार हो सकता है. रीतिविरोधी होने के कारण ही आचार्य द्विवेदी ने भारतेन्दु को बहुत ऊँचा स्थान दिया है.  

‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादक बनने के बाद द्विवेदी जी ने अपने लिए चार सिद्दांत बनाए और जीवन भर उसपर कायम रहे. वे चार सिद्दांत हैं- वक्त की पाबंदी, रिश्वत से परहेज, ईमानदारी से कार्य और ज्ञान वृद्धि हेतु सतत प्रयास. जनवरी 1903 से दिसंबर 1920 तक उन्होंने ‘सरस्वती’ का संपादन किया. उन्होंने साहित्य के क्षेत्र को व्यापक बनाते हुए ‘सरस्वती’ में इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि सभी विषयों को समेटा. संपत्ति शास्त्र जैसे विषय पर पहली बार हिन्दी में पुस्तक लिखी. इसके लेखन के पीछे उनका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवादी लूट के दिनों में भारतीय अर्थशास्त्र का अध्ययन भी था. अंग्रेजी राज में भारत की साम्राज्यवाद- सामंतवाद विरोधी भूमिका का विस्तार से वर्णन आचार्य द्विवेदी ने ‘सम्पत्ति शास्त्र’ में किया है. उनकी दृष्टि अत्यंत व्यापक और प्रगतिशील है. ब्रिटिश साम्राज्यवाद की विद्रूपताओं को उजागर करते हुए उन्होंने नस्लवाद, दास- प्रथा जैसी वैश्विक समस्याओं की कड़ी आलोचना की है. मार्च 1908 की ‘सरस्वती’ में उन्होंने ‘गुलामों का व्यापार’ शीर्षक लेख लिखा जिसमें वे लिखते हैं, “ ईश्वर की दृष्टि में सब मनुष्य-  काले और गोरे समान और स्वतंत्र हैं. तथापि अमेरिकन लोगों ने लगभग सौ वर्ष तक नीग्रो जाति के काले मनुष्यों की स्वाधीनता कबूल न की. वे लोग नीग्रो जाति के लोगों को मनुष्य के बदले अपना माल समझते थे.” ( महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रतिनिधि संकलन, पृष्ठ-40). वास्तव में दास- प्रथा का अंत तभी हुआ जब औद्योगिक विकास क्रम में पूँजीपतियों को श्रम-शक्ति बेचने वाला सर्वहारा वर्ग सुलभ हो गया और दास- प्रथा आर्थिक दृष्टि से लाभदायी न रह गई. किन्तु काले-गोरे का भेद फिर भी बना रहा. द्विवेदी जी ने इस नस्लवाद की भी अच्छी खबर ली है. 

  रामविलास शर्मा ने लिखा है, “साहित्य क्षेत्र में उन्होंने तय कर लिया था कि हिन्दी गद्य का विकास करना है, आधुनिक हिन्दी को विविध विषयों के विवेचन का माध्यम बनाना है, कविता में ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करना है और साहित्य से रीतिकाल को निकाल कर बाहर करना है. लगभग 20 वर्ष तक एकाग्र मन से इस निश्चित उद्देश्य की सिद्धि में वे लगे रहे और उन्हें सफलता प्राप्त हुई.” ( महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण की भूमिका, भूमिका, पृष्ठ -17)

‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादक बनने के बाद द्विवेदी जी ने अपने लिए चार सिद्दांत बनाए और जीवन भर उसपर कायम रहे. वे चार सिद्दांत हैं- वक्त की पाबंदी, रिश्वत से परहेज, ईमानदारी से कार्य और ज्ञान वृद्धि हेतु सतत प्रयास.

आचार्य द्विवेदी ने भारत में अंग्रेजी की स्थिति, भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने की समस्या, भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क भाषा की समस्या, हिन्दी- उर्दू संबंध, हिन्दी तथा जनजातीय भाषाओं के संबंध आदि पर विस्तार से विचार किया है. द्विवेदी जी के भाषा परिमार्जन की इस भूमिका पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की टिप्पणी है, “ यद्यपि द्विवेदी जी ने हिन्दी के बड़े- बड़े कवियों को लेकर गंभीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य प्रस्तुत नहीं किया, पर नयी निकली पुस्तकों की भाषा आदि की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का भारी उपकार किया. यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारो ओर दिखायी पड़ती थी, उनकी परंपरा जल्दी न रुकती. इनके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी, उन्होंने अपना सुधार किया.” ( हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ-528 ) 

काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली के विकास में द्विवेदी जी की भूमिका का उल्लेख प्राय: सभी करते हैं किन्तु एक संपादक के रूप में मैथिलीशरण गुप्त उनकी ही खोज थे. मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ के अनेक अंश उन्होंने ‘सरस्वती’ में प्रकाशित किए थे. 

 रामचंद्र तिवारी के शब्दों में, ”प्राचीनता से उचित का ग्रहण और अनुचित का त्याग, नवीनता से विवेकपूर्ण स्वीकृति, शास्त्र के स्थितिशील तत्वों की उपेक्षा, समाज संस्कार को महत्व, उपयोगिता, सोद्देश्यता, सदाशयता, स्वाभाविकता, सरसता और प्रभावोत्पादन की क्षमता को काव्य के आवश्यक तत्वों के रूप में प्रतिष्ठित करने का आग्रह आदि वे मूलभूत मान्यताएं हैं जिन पर द्विवेदी जी की आलोचना आधृत है. इसी दृष्टि से आपने भारतेन्दु युग के लेखकों, मिश्रबन्धुओं के ‘हिन्दी नवरत्न’ तथा मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ की आलोचना की.” ( आलोचना के सौ बरस, पृष्ठ- 6)

हिन्दी आलोचना के विकास में द्विवेदी जी की सामाजिक चेतना की तुलना उन्नीसवीं सदी के पाश्चात्य प्रगतिशील विचारकों से करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, “ महावीरप्रसाद द्विवेदी की सामाजिक चेतना की तुलना 19वीं सदी के पाश्चात्य प्रगतिशील विचारकों की सामाजिक चेतना से की जाए तो देखा जाएगा कि बीसवीं सदी का आरंभ होते- होते हिन्दी बुद्धिजीवियों की सामाजिक चेतना तेजी से बदल रही है और पूर्ववर्ती पाश्चात्य विचारकों की चेतना के समानान्तर आगे बढ़ रही है. यही कारण है कि इतिहास और समाजशास्त्र के विवेचन में द्विवेदी जी की विचारधारा इतनी आधुनिक और वैज्ञानिक दिखाई देती है और दार्शनिक विषयों का विवेचन वह नवीन बुद्धिवादी तार्किक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं. यह स्थिति दर्शन और इतिहास के क्षेत्र में ही नहीं है, इनके साथ साहित्य के क्षेत्र में भी वही चेतना सक्रिय है.” ( महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, पृष्ठ-277).

उन्होंने आगे लिखा है, “द्विवेददी जी ने एक निश्चित मत और निश्चित कार्यक्रम के अनुसार हिन्दी के ज्ञान काण्ड को समृद्ध करने का बीड़ा उठाया था. उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि हिन्दी गद्य का विकास किए बिना, इस गद्य में ज्ञान- साहित्य लिखे बिना जातीय संस्कृति का विकास संभव न होगा.“ (महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, पृष्ठ-383)

 द्विवेदी जी के महत्व का आकलन करते हुए उन्होंने अन्यत्र लिखा है, ‘द्विवेदी जी की युगान्तरकारी भूमिका यह है कि उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से अनेक समस्याओं का विवेचन गहराई से किया. छायावादी साहित्य द्विवेदी –युग के प्रति विद्रोह का साहित्य माना जाता है. थोड़ी देर के लिए कलात्मक साहित्य को छोड़कर छायावादी कवियों की विचारधारा पर ध्यान दीजिए. निराला ने अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन, वर्णाश्रम धर्म, नारी की पराधीनता, भाषा की समस्या आदि पर जो कुछ लिखा है उसपर ध्यान दीजिए तो पता चलेगा कि हिन्दी नवजागरण के संबंध में निराला का यह लेखन महावीरप्रसाद द्विवेदी के ही कार्य की अगली कड़ी है.” ( महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, भूमिका ) और रामविलास जी आगे के प्रगतिशील आलोचकों को सलाह देते हुए कहते हैं, “ मेरी समझ में भारत के बड़े से बड़े मार्क्सवादी विचारक द्विवेदीजी के लेखन से अब भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.  जो लोग मार्क्सवादी नहीं हैं वे यह देखें कि द्विवेदी जी के चिन्तन की दिशा कौन सी है, वे उनके चिन्तन से आगे बढ़ रहे हैं या उससे पीछे लौट रहे हैं. इस तरह का अध्ययन मार्क्सवाद का ज्ञान कराने के लिए नहीं है, वह अपने देश और प्रदेश की सामाजिक –सांस्कृतिक परिस्थितियों के ज्ञान के लिए आवश्यक है.” (महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, पृष्ठ- 19) 

आचार्य द्विवेदी को हिन्दी नवजागरण का केन्द्रीय पुरुष कहा जा सकता है. वे अपने समय और परिवेश के अत्यंत सजग आलोचक हैं. ‘भारत भारती’ की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है, “यह सोते हुए को जगाने वाला, भूले हुए को ठीक राह पर लाने वाला, निरुद्योगियों को उद्योगशील बनाने वाला, आत्म-विस्मृतों को पूर्व –स्मृति दिलाने वाला, निरुत्साहितों को उत्साहित करने वाला तथा उदासीनों के हृदय में उत्तेजना उत्पन्न करने वाला है.” ( विचार विमर्श, पृष्ठ -185). 

द्विवेदी जी संभवत: हिन्दी के अकेले ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी पत्नी के निधन के बाद उनकी स्मृति में मन्दिर बनवाया था और उसमें अपनी पत्नी की मूर्ति स्थापित की थी. उनके गांव दौलतपुर में आज भी यह मन्दिर विराजमान है जिसे ‘स्मृति मंदिर’ के नाम से पुकारा जाता है.

काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली के विकास में द्विवेदी जी की भूमिका का उल्लेख प्राय: सभी करते हैं किन्तु एक संपादक के रूप में मैथिलीशरण गुप्त उनकी ही खोज थे. मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ के अनेक अंश उन्होंने ‘सरस्वती’ में प्रकाशित किए थे. 

29 दिसंबर 1938 को आचार्य द्विवेदी का निधन हो गया. हिन्दी के प्रति निष्ठा और ईमानदारी के कारण अपने अन्तिम दिनों में आचार्य द्विवेदी को काफी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा. इस आचार्य प्रवर को मध्य प्रदेश के रायगढ़ के राजा के दीवान डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र को कुछ आर्थिक सहायता के लिए मार्मिक पत्र लिखना पड़ा था और वहीं से कुछ मासिक वृत्ति की व्यवस्था हो सकी थी जिसके बलपर उनकी बची हुई तीन वर्ष की वृद्धावस्था कट सकी.

निस्संदेह आचार्य द्विवेदी ने एक आलोचक के रूप में परवर्ती आलोचकों के लिए पथ प्रदर्शक का काम किया.

Contributors

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *