तीन कविताएं- दयाल चंद जास्ट

दयाल चंद जास्ट

1.

कितना दुखद होता है वह लम्हा
जब औरत की होती है खरीद-फरोख्त
होती है जबरन शादी
 
होता है उसके साथ दुष्कर्म
और पुलिस लेती रहती है सपना
कि गली-गली और कूचे-कूचे सब सुरक्षित हैं।
 
कितना दुखद होता है वह लम्हा
जब कोई बेरोजगार रह जाता है नौकरी लगने से
होती रहती है प्रतिभाओं के साथ ज्यादती
वह रोता है अपनी डिग्रियों को देखकर
और अफसर खेलते हैं नोटों में
प्रचार कि साफ-सुथरी भर्ती हुई है।
 
कितना दुखद होता है वह लम्हा
जब हार जाता है सच्चा इंसान
बिक जाते हैं गवाह
और बिक जाते हैं जज साहब
वह उम्र-भर सडता है सलाखों के पीछे
कि न्याय भटक जाता है पथ से।
 
कितना दुखद होता है वह लम्हा
जब अन्न-भंडार भरे होते हैं मंडियों में
और भूख से मर जाए कोई बच्चा
होता रहता है आयात-निर्यात
सड जाता है लाखों टन अनाज हर वर्ष
कि अनुमान से ज्यादा पैदावार हुई है।  

2.

सदियों से मेरा नाम 
नहीं लिया गया 
आजादी के दौरान
और 
आजादी के बाद
किये गए विकास कार्यों
मैंने
बार-बार जोड़ा है
अपनी बिखरती हड्डियों को
खेत के लिए
समाज के लिए
सदियों से।
 
मैंने भी सपने लिए हैं
नए दौर के
बिना हो-हल्ले
बिना सौर के
अपने लिए
परिवार के लिए
नयी व्यवस्था में
अपने देश की
 
रोटी के लिए
वजूद के लिए
मैंने नहीं तोड़े नियम
और
सत्ता है कि
मेरा दम घोंटती रही हर बार
सत्ता के लिये।
 
सुन तो लिया है ना आपने
रामायण के दौरान भी मैं था
महाभारत में भी मैं था
1857 में मैं था
1947 के बाद भी मैं ही हूँ
जो चुपचाप लगा हूँ अपने काम में
जो आता है मेरे देश के काम।
 
मेरी उदासीनता एक प्रश्न है
मेरा मौन एक बिगुल है
ये देश मेरा देश है
मेरा खुद का संसार है
मैं खुद ही जीना चाहता हूं
क्योंकि अब मैं आजाद हूँ
और
इसके लिये मैं राजद्रोह भी करूँगा।

 3.

जो प्रातः प्यार बरसाएगी
सबके तकरार मिटाएगी
दिल मे लेकर आएगी कोई खास जगह
उस दिन की है इंतजार मुझे।
 
जुल्म-ज्यादती कहीं न हो
सहुकारे की बही न हो
आत्महत्या कहीं न हो किसी तरह
उस दिन की है इंतजार मुझे।
 
जिंदगी ये हराम न हो
देश मेरा बदनाम न हो
बुरा कोई पैगाम न हो
अब तो आये कोई नेक सुबह
उस दिन का है इंतजार मुझे।
 
मजहब सारे एक रहें
नेकी करें और नेक कहें
न लड़ें न लड़ाई सहें
होगी मानवता की फतेह
उस दिन का है इंतजार मुझे।
 

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