दस हरियाणवी गज़लें- मंगत राम शास्त्री

मंगत राम शास्त्री- जिला जींद के ढ़ाटरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री (शिक्षा शास्त्री), हिंदी तथा संस्कृत में स्नातकोत्तर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। ज्ञान विज्ञान आंदोलन में सक्रिय भूमिका। “अध्यापक समाज” पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत, रागनी एंव गजल विधा में निरंतर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। “अपणी बोली अपणी बात” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित।

1.

 
बोल्लण का लहजा,आत्तम-विश्वास ले बैठ्या.
झूठ्ठी लीला के माहिर का रास ले बैठ्या..
 
मारे चमक दमक नै कुछ परचार नै मारे
हाम्नै यू प्यारा सा हर्फ़ विकास ले बैठ्या.
 
सदा सदी तै लगी तरसणा ना हुयी पूरी
अंबर धरती मिलणे का आभास ले बैठ्या.
 
बिना लड़े ही मान गये जो हार, उननै तो
हार तै ज्यादा हारण का अहसास ले बैठ्या.
 
के बेरा था चाल चलैगा भेड़िया शातिर
नहीं पिछाण्या उसका शेर-लिबास ले बैठ्या.
 
सारा दिन घर बार खपैं सैं गाम म्हं औरत
मरदां नै तो ज्यादातर यू ताश ले बैठ्या.
 
सब कुछ साफ़ दिखाई देगा,देखियो अजमा
शीस्शै के चमकारे का परकास ले बैठ्या.
 
औरां की देक्खा देक्खी सब मान ली साच्ची
“खड़तल” नै भी न्यूं अन्धा-विश्वास ले बैठ्या.

 
2.

 
ढोल बजांदी, मंगल़ गांदी, पूंछ हिलांदी दिक्खै सै.
पत्तल़चाट्टां की टोल़ी तो काख बजांदी दिक्खै सै..
 
भगती से अंधभगती बढ़ती, टुकड़े फैंक बढाई जा
पिछलगुवां की भीड़ मनै तो झूट्ठण खांदी दिक्खै सै.
 
या दुनिया सै पैसे-रुतबे आल़े ऊत-मलंगां की
माड़ै नै गल़ लांदी कोनी बस धमकांदी दिक्खै सै.
 
आज सियासत ठाड्डै के तो करदे माफ कसूर नै भी
निर्धन कै बिनखोट भी झूट्ठी तोह्मद लांदी दिक्खै सै.
 
कर कै खावणिया तो न्यूंएं टोट्टे के म्हं सड़ता रै
लूट खसोट मचावणियां की होई चांदी दिक्खै सै.
 
दुख-दर्दां का एक समन्दर मारै झाल भितरले म्हं
ज्यांहे तै आंख्यां म्हं धारा खारी आंदी दिक्खै सै.
 
देखकै लच्छण हाकिम के कुछ लोग तो न्यूं भी कहण लगे
जन शाही के नां पै तानाशाही छांदी दिक्खै सै.
 
आज तिरी कल उसकी होगी, परसों होगी तीज्जै की
कुरसी ना जागीर किसे की आंदी-जांदी दिक्खै सै.
 
के काड्ढैगा किरसन टोह्कै,मीरां नै ले टोह् खड़तल
अपणे गीत्तां पै उस नै वा रोज नचांदी दिक्खै सै.


3.


 साफ कहणिये कड़वे-खारे लाग्गैं सैं.
जुमलेबाज्जां के जयकारे लाग्गैं सैं..
 
देक्खो लोग्गो किसा जमान्ना आया रै
कातिल के हक म्हं भी नारे लाग्गैं सैं.
 
जल़ ज्यागा जो घणी कसेरै गा धूणी
राख तल़ै म्नै दबे अंगारे लाग्गैं सैं.
 
खाल्ली पीप्पे बिन रुजगार बजैं घर म्हं
शील़े चूल्हे- गींठ्ठी-हारे लाग्गैं सैं.
 
बिन किश्ती मैं क्यूकर आऊँ मिलणे नै
तिरणा भूल्या दूर किनारे लाग्गैं सैं.
 
रात अंधेरी म्हं जो जुगनू चमक रहे
मेरी राह् म्हं वें उजियारे लाग्गैं सैं.
 
मारण और मरण का सै यू खेल गजब
मनै रुखाल़े भी हत्यारे लाग्गैं सैं.
 
जिनके बोल चुभैं आंख्यां म्हं कुणक जिसे
“खड़तल”वें जन किसनै प्यारे लाग्गैं सैं.


 
4.
 

दिखा मिठाई जीभ जल़ी ललचाई जा गी.
पर आंख्यां देक्खी मक्खी ना खाई जा गी..
 
लालच दे कै जाल़ म्हं चिड़ी फसाई जा गी.
मगर जाल़ की रस्सी तोड़ बगाई जा गी..
 
मलहम ला कै घा की चीस सहलाई जा गी.
पर मौके पै सारी याद कराई जा गी..
 
ढोल बजा कै साच्ची बात दबाई जा गी.
पर इब पहले ढोल की पोल खुलाई जा गी..
 
रौब दिखा कमजोर की बीर डराई जा गी.
पर भय की जड़ राम तै पाड़ दिखाई जा गी..
 
साच छुपा कै “खड़तल”झूठ फलाई जा गी.
पर आखिर तक सच की लड़ी लड़ाई जा गी..


 
5.


यार मेरा मेरै तै जुदा भी नहीं
आदमी सै बडा पर खुदा भी नहीं.
 
काम तो वो भतेरे गजब के करै
पर सभी मान लें तयशुदा भी नहीं.
 
मोड़ का बोझ वो के बतावै भला
वो बिचारा तो शादीशुदा भी नहीं.
 
बात खड़तल लिखै तो सै साच्ची मगर
मीर,हाली न वो नेरुदा भी नहीं.


 
 6.

            
ठाड्डे बेबस होन्दे देक्खे।
तेग्गे सूई टोन्दे देक्खे।।
 
माँ बापू बाल़्कां कै स्यामी
नाड़ तल़े नै गोन्दे देक्खे।
 
फूल बिछाए थे जिन खात्तर
वें भी काण्डे बोन्दे देक्खे।
 
सगे बखत पै परखे जां सैं
भाई श्यान लकोन्दे देक्खे।
 
दौलत की या कारस्तानी
कमल़े स्याणे होन्दे देक्खे।
 
ऐश अमीरी के लालच म्हं
साधू आप्पा खोन्दे देक्खे।
 
खुद नै जो भगवान कहैं थे
जेल हुई तो रोन्दे देक्खे।
 
लठ बजवाकै मुल्ला पण्डित
एक जगह पै सोन्दे देक्खे।
 
मनीम आढतियां कै आग्गै
चिलम तमाखू मोन्दे देक्खे।
 
बाल़क घट गे बैदे बढ गे
मास्टर पूड़ी पोन्दे देक्खे।
 
राज अर् ब्याज खुदे कै चहिये
बडे बडे भी रोन्दे देक्खे।
 
ई वी एम सरकार बणावै
वोटर न्यूं जंग झोन्दे देक्खे।
 
चांद्पै बुढिया चरखा कात्तै
धी नै पिता बल़ौन्दे देक्खे।
 
कोरट के म्हं गोल़ी चाल्ली
मुन्सिफ़ बहरे होन्दे देक्खे।
 
छान टपकदी देख हंसै तूं
हमनै लैन्टर चोन्दे देक्खे।
 
कोठ्ठी म्हं सुपन्यां के कातिल
खून्नी लत्ते धोन्दे देक्खे।
 
खड़तल नै तो अपणे घर कै
गारा के भी लोन्दे देक्खे।

 
7.
  


जड़ै बिलाई दूध रुखाल़ै।
उड़ै किसी तूं गड्डो भाल़ै।।
 
समो बगी जा सै जहरिल्ली
मती जल़ावै गात उबाल़ै।
 
बहै दुरंगी आज हवा भी
इनै सुखावै उसनै पाल़ै।
 
किसा जमान्ना आया लोग्गो
बिना पिताएं झूठ उछाल़ै।
 
घड़े जिसा हो कच्चा बाल़क
उसा ढल़ैगा जैसा ढाल़ै।
 
नहीं किसे की सुणता हाकिम
सदा वो खुद की जीभ जुगाल़ै।
 
करै भुरपिया खेल तमास्सा
बुझी दिखाकै आप्पे बाल़ै।
 
हवा दिए ना तूं नफरत तै
अगन लगे पै कोण संभाल़ै।
 
तनै बताणी होगी उसकी
कमा कमा जो जीवन गाल़ै।
 
मनै कही थी साच्ची कहिये
कदे फिरै फिर आल़ दुवाल़ै।
 
पड़ै पकड़नी राही न्या की
नहीं गुजारा बीच बिचाल़ै।
 
किनै भका राख्या सै खड़तल
सही बतादे सच ना टाल़ै ।

 
8.


पैंतिस का इब रोल़ा कोनी।
छत्तिसमां भी बोल़ा कोनी।।
 
यू भी ठा कै जांद्दा रैह्गा
इस पै कुणसा झोल़ा कोनी।
 
थोडे़ ज्यादा सब काल़े सैं
दूध जिसा कोइ धोल़ा कोनी।
 
सब मिटणे माट्टी के पुतल़े
सदा रहै कोइ चोल़ा कोनी।
 
सारी भींत सनी गोब्बर तै
हाथ धरण नै कोल़ा कोनी।
 
पत्ता राख तुरप चाल्लणिया
शातिर हो सै भोल़ा कोनी।
 
पल्टी मार रहबरी करते
माणसपण का तोल़ा कोनी।
 
आट्टो पाट्टी गाम हुया सै
पहलम बरगा ठोल़ा कोनी।
 
साच्ची कहणा सुख तै रहणा
इस तै झुठ्ठा गोल़ा कोनी।
 
जिब तै बदल्या सोच नजरिया
खड़तल गेल्यां टोल़ा कोनी।


9.


जिन्दगी नै जब कदे मैं टोहूं सूं.
मौत कै नजदीक ज्यादा होऊं सूं.
 
कर दिया लाचार सिस्टम नै बेशक
मान कै पर हार मैं ना रोऊँ सूं.
 
साथ देणा छोड़ दें जब पैर मेरे
मैं हथेल़ी का सहारा टोहूं सूं.
 
वो रचा कै ढोंग रब का, ऐश करैं
मैं मगर वो ढोंग सिर पै ढोऊं सूं.
 
दावतां म्हं ना कदे साज्झा मेरा
पीढ़ियां तै भूख की जंग झोऊं सूं.
 
भक्त सिंह तो बण नहीं सकदा लेकिन
इन्कलाब तो आज भी मैं बोऊं सूं.
 
बांटणे खैरात आवै जब जालिम
ना पसारूं हाथ भूखा सोऊं सूं.


10.


बोया बीज उगैगा एक दिन बड़का भी होवैगा.
पेड़ बचैगा तो पत्त्यां का खुड़का भी होवैगा..
 
सदा अंधेरी ना रहणी या रात बगी जावै सै
राख भरोस्सा सूरज पै कल तड़का भी होवैगा.
 
घर म्हं रहकै लड़-भिड़ ले पर दूर नहीं जाणा सै
दूर गया जो ना आया तो बिड़का भी होवैगा.
 
गरमी तै ए भांप बणैं सैं फेर बणैं बाद्दल़ भी
देख घमोरी घबरावै ना छिड़का भी होवैगा.
 
धीरज परखै सै जो तेरा थोड़े दांद गडो कै
इब्बे ना रोक्या तो तड़कै बुड़का भी होवैगा.
 
लोग मरैं सैं भुक्खे और तनै मस्ती भावैं सैं
आज बिना छोंक्की खा ले कल तिड़का भी होवैगा.
 
लोड़ नहीं पैनिक होवण की सहज-समाई चहिये
खड़तल बचे रहे तो खुड़का-दुड़का भी होवैगा.

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