मीडिया समीक्षा का मार्क्सवादी आदर्श : जवरीमल्ल पारख – अमरनाथ

जवरीमल्ल पारख इंदिरागांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के निदेशक पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद मीडिया के पूर्णकालिक समीक्षक के रूप में सक्रिय हैं और उनसे अभी बहुत मूल्यवान प्राप्त होने की उम्मीद है. हम प्रो. जवरीमल्ल पारख को उनके जन्मदिन के अवसर पर हिन्दी मीडिया, सिनेमा और साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में किए गए व्यापक अवदान का स्मरण करते हैं, उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य और सतत सक्रियता की कामना करते हैं.

जवरीमल्ल पारख

मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित जवरीमल्ल पारख (जन्म 8.8.1952) संस्कति, सिनेमा और मीडिया के गंभीर समीक्षक हैं. ‘हिन्दी सिनेमा का समाजशास्त्र’, ‘लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ’, ‘जनसंचार माध्यमों का सामाजिक संदर्भ’, ‘जनसंचार माध्यमों का वैचारिक परिप्रेक्ष्य’, ‘जनसंचार माध्यमों का राजनीतिक चरित्र’, ‘जनसंचार माध्यम और सांस्कृतिक विमर्श’, ‘साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा’, ‘संस्कृति और समीक्षा के सवाल’, ‘नई कविता का वैचारिक परिप्रेक्ष्य’, ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य : मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन’ आदि मीडिया, सिनेमा और साहित्य पर केन्द्रित उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं.


जवरीमल्ल पारख की मान्यता है कि जनसंचार माध्यमों का संबंध सामाजिक परिवर्तनों से बहुत गहरा है और उसकी उपेक्षा नामुमकिन है. इसीलिए जरूरी है कि जनसंचार के साधनों के प्रति जनता में हम सही समझ विकसित करें. यदि हम पहले से ही यह मानकर चलते हैं कि जनसंचार का उपयोग जनता को जागरूक बनाने और उन्हें सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल करने के लिए नहीं किया जा सकता तो इसका अर्थ यही है कि हमने जनसंचार के साधनों को निहित स्वार्थों के भरोसे छोड़ दिया है. जवरीमल्ल पारख की सारी समीक्षा मीडिया के प्रति जागरूक और उसके सही इस्तेमाल के प्रति हमें सचेत करती है. फिल्मों के बारे में उनकी चिन्ता है कि पिछले दो दशकों से भी ज्यादा दिनों से इस तरह की फिल्मों का निर्माण लगभग नहीं के बराबर हुआ है जिसमें भारत के मेहनतकश लोगों के जीवन को व्यक्त किया गया हो. लोकप्रिय सिनेमा में तो मेहनतकश और गांव लुप्त से हो गए हैं.


सिनेमा के विषय में उनकी मान्यता है कि हिन्दी का लोकप्रिय सिनेमा बुनियादी तौर पर यथास्थिति का समर्थक है. लेकिन लोगों को यथास्थिति का समर्थक बनाए रखने के लिए उसे नए- नए तरीके और नयी नयी तकनीकें अपनानी पड़ती हैं. उन्हें अपने को बराबर प्रासंगिक बनाए रखना पड़ता है. उन्हें यह आभास भी देना पड़ता है कि वे परिवर्तन के समर्थक हैं, उस परिवर्तन के जो जनता के हित में हो. लेकिन इन कोशिशों में सिनेमा के संसार में उन फिल्मकारों के लिए भी जगह निकल आती है जो सचमुच जनसमर्थक परिवर्तनकामी सिनेमा का निर्माण करना चाहते हैं.


सिनेमा के मूल्यांकन को लेकर उनका दृष्टिकोण वर्गीय भी है और वैश्विक भी. रामजी तिवारी की पुस्तक ‘ऑस्कर अवार्ड्स : यह कठपुतली कौन नचावे’ की समीक्षा करते हुए वे स्पष्ट कहते हैं, ऑस्कर के वर्चस्व का सीधा संबंध विश्व राजनीति पर अमरीकी वर्चस्व से है और अमरीकी वर्चस्व का संबंध पूंजीवादी राजनीतिक व्यवस्था से है. उनका मानना है कि ‘”आज वैश्विक स्तर पर जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जिसमें अमरीकी हस्तक्षेप और जुड़ाव दिखायी न देता हो.’’

इस पुस्तक के लेखक रामजी तिवारी ने सिनेमा के जिन तीन मॉडलों की चर्चा की है उसमें वे तीसरे मॉडल के रूप में हॉलीवुड की चर्चा करते हैं. हॉलीवुड मॉडल उनके अनुसार, ‘‘अधिक से अधिक पूंजी कमाने के हित में वाणिज्यिक और कॉरपोरेट संस्थानों द्वारा सिनेमा का उपयोग’’ का है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सिनेमा से आदर्शों और विचारो को तिलांजलि दे दी गयी और सिनेमा का क्षेत्र ‘सिर्फ़ और सिर्फ़ धन कमाने के एक लाभप्रद क्षेत्र के रूप में तब्दील होता चला गया’. लेकिन अमरीकी सिनेमा को सिर्फ इस लाभप्रद क्षेत्र के रूप में देखने से इसके राजनीतिक अंतर्वस्तु की उपेक्षा हो सकती है. उक्त पुस्तक की समीक्षा के बहाने जवरीमल्ल पारख लिखते हैं, “सच्चाई यह है कि दुनिया के किसी भी देश के सिनेमा की तुलना में हॉलीवुड का सिनेमा सर्वाधिक राजनीतिक सिनेमा है. लेखक का यह कहना बिल्कुल सही है कि अमरीका अपने को दुनिया का संरक्षक मानता है. दुनिया के पचास देशों में उसके सैन्य अड्डे हैं. अमरीका द्वारा उठाया गया किसी भी तरह का कदम उसकी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं के अनुरूप होता है. इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि हॉलीवुड सिनेमा का संबंध भी उसकी इन आकांक्षाओं से हो और लेखक का यह विचार बिल्कुल सही है कि वहां की फिल्मों के बारें में भी विचार हमें अमरीका की इसी विश्वदृष्टि को ध्यान में रख कर ही करना चाहिए. लेकिन लेखक का मानना है कि “अमरीकी फिल्मकार विश्व में होने वाली उथल-पुथल को आमतौर पर ईमानदारी से नहीं दिखाते. मसलन, द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में बनने वाली फिल्में प्रायः फासीवादी दमन चक्र पर मौन है. कुछ ही फिल्मों में इस पहलू को उठाया गया है. स्टीवन स्पिलबर्ग की फिल्म शिंडलर्स लिस्ट को वह अपवाद की तरह मानते हैं।विश्वयुद्ध में सोवियत संघ की भूमिका पर अमरीकी फिल्में प्रायः मौन रहती हैं।. इसी तरह वियतनाम युद्ध पर बनी अधिकतर फिल्में अमरीकी नज़रिए को पेश करती हैं. वियतनाम युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों द्वारा किये गये अमानुषिक कृत्यों पर अमरीकी फिल्में न सिर्फ़ पर्दा डालती हैं, दूसरे पक्ष के बारे में भी असत्य का प्रचार करती है. लेकिन ऐसी ही फिल्मों ‘डियर हंटर’ और ‘प्लाटून’ को ऑस्कर अवार्ड से नवाजा गया. फिल्मों की लंबी सूची दे कर इस किताब में बताया गया है कि जिन विषयों पर अमरीका से बाहर कई महान फिल्में बनी हैं उन पर आमतौर पर हॉलीवुड का सिनेमा या तो प्रायः चुप रहता है या थ्रिलर विधा में हिंसा प्रधान फिल्में बनाता है.“ (pahleebar.wordpress.com/ जवरीमल्ल पारख )
इस संदर्भ में वे पूरे विश्वास के साथ यह भी स्वीकार करते हैं कि “भले ही भारतीय फिल्मों ने आज तक कोई ऑस्कर न जीता हो, लेकिन उत्कृष्टता की दृष्टि से भारतीय फिल्में विश्व सिनेमा से कमतर नहीं हैं.”( उपर्युक्त)

साहित्य के मूल्यांकन के संबंध में उनका मानना है कि, “साहित्य की रचना ही अपने समय और समाज से प्रभावित नहीं होती उसका अध्ययन, विवेचन और मूल्यांकन भी प्रभावित होता है. जिस साहित्य को हमारे से पूर्व के अध्येताओं ने जिस रूप में ग्रहण किया हम भी उसे उसी रूप में ग्रहण करने के लिए बाध्य नहीं हैं. हमारे सामने आज भूमंडलीकरण के जरिए नवउपनिवेशीकरण की जो कोशिशें प्रकट हो रही हैं, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिक फासीवाद का जो खतरा दिखाई दे रहा है उससे आज की रचना धर्मिता का प्रभावित होना स्वाभाविक है….. स्पष्ट ही ये सभी पक्ष आलोचना और विवेचना को भी प्रभावित करेंगे. आलोचना और मूल्याँकन की यह प्रक्रिया न सिर्फ वर्तमान रचनाधर्मिता के संदर्भ में प्रासंगिक है, वह पूर्व की साहित्य परंपरा के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है. वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में अतीत को जानने –समझने की इन कोशिशों का महत्व यह है कि इससे वर्तमान को बनाने में अतीत की भूमिका को नए रूप में समझने की दृष्टि मिलती है, साथ ही यह भी जान सकते हैं कि वे कौन से उपेक्षित पक्ष थे जिनकी ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिए जाने के कुछ अनपेक्षित परिणाम भी प्रकट हुए हैं, जिनको समझना वर्तमान को समझने और भविष्य को बनाने के लिए जरूरी है.” ( आधुनिक हिन्दी साहित्य –मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन, पृष्ठ-5)


इसी तरह प्रेमचंद के साहित्य पर फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों के सामने उपस्थित चुनौतियों पर टिपप्णी करते हुए वे प्रकारान्तर से प्रेमचंद के लेखन के वैशिष्ट्य पर बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हैं और लिखते हैं, “दरअसल प्रेमचंद ने अपना लेखन सिनेमा माध्यम को ध्यान में रखकर नहीं लिखा था. उनका लेखन सतह से देखने पर सरल लगता हो, लेकिन वह अपने समय के बहुत ही जटिल और अंतर्विरोधों से भरे सामाजिक यथार्थ का प्रतिनिधित्व करता है. उनके पात्र भी बहुत जटिल किस्म के हैं और उनमें इतने स्तर हैं कि उनमें से किसी की भी उपेक्षा चरित्र को कमजोर बना सकती है. किसी भी फ़िल्मकार के लिए प्रेमचंद की रचनाओं को सिनेमा के लिए रूपांतरित करना बहुत बड़ी चुनौती रहा है. प्रेमचंद जैसी प्रतिभा वाले लेखक के लिए वैसा ही प्रतिभाशाली फ़िल्मकार होना भी ज़रूरी है. शायद यही वजह है कि उनकी क्लासिक रचनाओं के उत्कृष्ट और चुनौतीपूर्ण रूपांतरण भी उन्हीं फ़िल्मकारों द्वारा संभव हुए हैं जिन्होंने इस काम को रचनात्मक चुनौती के रूप में ग्रहण किया था. आज भी फ़िल्मकारों के लिए प्रेमचंद वैसी ही रचनात्मक चुनौती बनकर उपस्थित हैं.“ (,समकालीन जनमत, ‘प्रेमचंद और हिन्दुस्तानी सिनेमा’, 31 जुलाई, 2020 )


जवरीमल्ल पारख इंदिरागांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के निदेशक पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद मीडिया के पूर्णकालिक समीक्षक के रूप में सक्रिय हैं और उनसे अभी बहुत मूल्यवान प्राप्त होने की उम्मीद है. हम प्रो. जवरीमल्ल पारख को उनके जन्मदिन के अवसर पर हिन्दी मीडिया, सिनेमा और साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में किए गए व्यापक अवदान का स्मरण करते हैं, उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य और सतत सक्रियता की कामना करते हैं.

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