मुक्तिबोध

जन-जन का चेहरा एक- गजानन माधव मुक्तिबोध

मुक्तिबोध
 

चाहे जिस देश, प्रान्त, पुर का हो
 जन-जन का चेहरा एक! 
 

 एशिया की, यूरोप की, अमरीका की 
 गलियों की धूप एक। 
 कष्ट-दुख सन्ताप की, 
 चेहरों पर पड़ी हुई झुर्रियों का रूप एक! 
 जोश में यों ताक़त से बँधी हुई 
 मुट्ठियों का एक लक्ष्य! 
 पृथ्वी के गोल चारों ओर के धरातल पर
 है जनता का दल एक, एक पक्ष। 
 जलता हुआ लाल कि भयानक सितारा एक 
 उद्दीपित उसका विकराल-सा इशारा एक 
 गंगा में, इरावती में, मिनाम में. 
 अपार अकुलाती हुई, 
 नील नदी, आमेज़न, मिसौरी में वेदना से 
 बहती-बहाती हुई ज़िन्दगी की धारा एक; 
 प्यार का इशारा एक, क्रोध का दुधारा एक 
 पृथ्वी का प्रसार 
 अपनी सेनाओं से किये हुए गिरफ़्तार, 
 गहरी काली छायाएँ पसारकर, 
 खड़े हुए शत्रु का काले-से पहाड़ पर 
 काला-काला दुर्ग एक, 
 जन-शोषक शत्रु एक। 
 आशामयी लाल-लाल किरणों से अन्धकार 
 चीरता-सा मित्र का स्वर्ग एक; 
 जन-जन का मित्र एक। 
 विराट् प्रकाश एक, क्रान्ति की ज्वाला एक, 
 धड़कते वक्षों में है सत्य का उजाला एक, 
 लाख-लाख पैरों की मोच में है वेदना का तार 
 हिये में हिम्मत का सितारा एक। 
 चाहे जिस देश, प्रान्त, पुर का हो 
 जन-जन का चेहरा एक। 

एशिया के, यूरोप के, अमरीका के 
 भिन्न-भिन्न वास-स्थान; 
 भौगोलिक, ऐतिहासिक बन्धनों के बावजूद, 
 सभी ओर हिन्दुस्तान, सभी ओर हिन्दुस्तानी। 
 'सभी ओर बहनें हैं, सभी ओर भाई हैं। 
 सभी ओर कन्हैया ने गायें चरायी हैं।
 ज़िन्दगी की मस्ती का अकुलाता भोर एक 
 बंसी की धुन सभी ओर एक। 
 दानव दुरात्मा एक, 
 मानव की आत्मा एक। 
 शोषक और खूनी और चोर एक। 
 जन-जन के शीर्ष पर, 
 शोषण का खड्ग अति घोर एक। 
 दुनिया के हिस्सों में चारों ओर 
 जन-जन का युद्ध एक, 
 मस्तक की महिमा 
 व अन्तर की ऊष्मा 
 से उठती है ज्वाला अति क्रुद्ध एक। 
 संग्राम का घोष एक, 
 जीवन-सन्तोष एक। 
 क्रान्ति का, निर्माण का, विजय का सेहरा एक, 
 चाहे जिस देश, प्रान्त, पुर का हो 
 जन-जन का चेहरा एक!  

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