गाँव एक गुरुद्वारे दो – सुरेंद्र पाल सिंह

बात सामान्य सी है लेकिन सामान्य लगने वाली बातों के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि असामान्य बातें आँखों से ओझल होनी शुरू हो जाती हैं। हिंदू मन्दिर तो सदियों से केवल द्विजों के लिए ही शास्त्रसम्मत विधान से बनते रहे हैं लेकिन कोई गुरुद्वारा जब समुदाय के आधार पर बने तो सवालिया निशान लगना वाजिब है। मगर जब कोई बात आम हो जाए तो खास नहीं लगती। फिर भी आम के पीछे छुपे हुए खास को देखना आवश्यक है जिससे हमें सामाजिक डायनामिक्स की शांत और सहज दिशा और दशा का भान होता है।

बात सामान्य सी है लेकिन सामान्य लगने वाली बातों के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि असामान्य बातें आँखों से ओझल होनी शुरू हो जाती हैं। हिंदू मन्दिर तो सदियों से केवल द्विजों के लिए ही शास्त्र सम्मत विधान से बनते रहे हैं लेकिन कोई गुरुद्वारा जब समुदाय के आधार पर बने तो सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। मगर जब कोई बात आम हो जाए तो खास नहीं लगती। फिर भी आम के पीछे छुपे हुए खास को देखना आवश्यक है जिससे हमें सामाजिक डायनामिक्स की शांत और सहज दिशा और दशा का भान होता है।

औरंगज़ेब के चचेरे भाई फ़िदाई खान ने सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्द्ध में पिंजौर में एक शानदार मुग़ल बाग़ बनवाया था। जब शाही ख़ानदान वहाँ पहुँचा तो रिवाज के मुताबिक़ स्थानीय राजा की ज़िम्मेवारी थी कि उनकी आवभगत करे। उस वक़्त स्थानीय राजा की रियासत का नाम था भुवाना जो पिंजौर से क़रीब 10-12 किलोमीटर की दूरी पर नोल्टा गाँव के नज़दीक वर्तमान में लगभग चार सौ की आबादी वाला गाँव है। औ वहाँ पुराने किले के खण्डहर आज भी नुमायां हैं। कहा जाता है कि भुवाना के राजा ने एक ऐसी चाल चली कि आवभगत की बेग़ार से हमेशा के लिए पिण्ड छूट जाए। सेवा पानी के लिए ऐसे नौकर चाकर, दास दासियां भेजी गई जिनके गले में गलगंड थे जो आयोडीन की कमी से बड़ी बड़ी रसोली की तरह दिखाई देते हैं। शाही हरम की औरतों को उन्हें देखकर वितृष्णा होना लाज़मी था और जब उन्हें ये बताया गया कि यहाँ के पानी को पीने से ऐसी बीमारी होना अत्यंत सामान्य बात है तो उन्होंने फिर से इधर का रुख़ नहीं किया।

भुवाना रियासत के अधीन अगल बगल के गाँवों में से एक गाँव की कहानी का पाठ आज हम करने जा रहे हैं। इस गाँव का नाम है इस्लामनगर। इस्लामनगर गाँव तीन हिस्सों में बँटा हुआ है और प्रत्येक हिस्से को पँगा कहा जाता है। इन पँगों के नाम हैं – उपरला पँगा, गबला पँगा और निचला पँगा। बँटवारे से पहले यह इलाक़ा मुस्लिम बहुल था और बँटवारे के वक़्त यहाँ की क़रीब क़रीब सारी आबादी पाकिस्तान चली गई। और इस प्रकार से यहाँ का बँजर और जंगल वाला इलाक़ा ग़ैर आबाद हो गया।

सत्तर के दशक में जब देश के पहले सुनियोजित शहर चंडीगढ़ की तामीर की जा रही थी तो वहाँ के अनेक गाँवों को खाली करवाया गया था। सुखना झील की साइड में सकेतड़ी के अगल बगल वाले गाँव यथा नेपली, खोलगामा, नत्थेवाला, करहेड़ी, केंदुवाला आदि जब खाली करवाए गए तो वहाँ के बाशिंदे इस्लामनगर के तीनों हिस्सों में आकर बस गए। इसी प्रक्रिया में आसपास कुछ नई बसासत भी बनी जिन्हें कच्ची झुग्गियाँ, ऊपरली माजरी और निचली माजरी के नाम से जाना जाता है।

इस्लामनगर के तीनों हिस्से इतने पथरीले, बँजर और पानी की किल्लत वाले थे कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों की वज़ह से इन्हें पँगा कहा जाने लगा। पानी के लिए इन्हें काफ़ी दूर चलकर कौशल्या नदी तक जाना पड़ता था।

कहानी के मुख्यबिंदु तक पहुँचने से पहले तीन पँगों के सामुदायिक समीकरणों पर बातचीत करना आवश्यक है। उपरला पँगा और गबला पँगा अगल बगल में हैं जिनके नज़दीक अस्सी के दशक में महर्षि बावरा ने एक आश्रम बनाया था जिसमें मन्दिर और शिक्षण संस्था हैं। इसी दौरान इस इलाक़े को महाभारतकालीन युग से जोड़ कर विराट नगर कहा जाने लगा। प्रत्येक पँगे में औसतन 30-40 परिवार बसते हैं। उपरले पँगे की आबादी में बंजारे सिक्ख, जुलाहे हिंदू और गुज्जर मुसलमान हैं और गबले पँगे में ब्राह्मण और गुज्जर मुसलमान परिवार रहते हैं। निचला पँगा दूसरे पँगों से क़रीब एक किलोमीटर की दूरी पर है और यहाँ की पूरी आबादी रैदासी सिक्खों की है, एक लुबाना सिक्ख परिवार को छोड़कर।

21वीं सदी की शुरुआत में हरियाणा सरकार ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के माध्यम से इस इलाक़े में शहरीकरण का एक नया अध्याय पिंजौर -कालका अर्बन कॉम्प्लेक्स मास्टर प्लान के नाम से शुरू किया जिसके अनुसार हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण ने हिमशिखा के नाम से एक सेक्टर, ऑरीओ और डीएलएफ ने भी एक- एक सेक्टर के लिए ज़मीन ख़रीदी। स्वाभाविक रूप से इस्लामनगर और माजरी गाँव वालों को उनकी ज़मीन की अच्छी खासी रक़म मिली और उनके लाइफ़ स्टाइल में बड़ा परिवर्तन आया। अब इन्होंने अच्छे घर बनाए, गाड़ियाँ ख़रीदी और काम के लिए पुरानी बँजर धरती वाली खेती छूट गई। अच्छी शिक्षा ना होने की वज़ह से छोटे मोटे रोज़गार शुरू हो गये और कुछ परिवारों ने अच्छी ज़मीन लेकर आधुनिक खेती शुरू कर दी।

उपरले और गबले पँगें वालों के नज़दीक उनकी आस्था के अनुसार एक मस्जिद और कुछ मन्दिर हैं। लेकिन निचले पँगे वालों को एक अच्छे गुरुद्वारा की दरकार थी।इस पँगे में सबसे समृद्ध लुबाना सिक्ख परिवार है और इस परिवार ने गाँव के बीच में एक शानदार गुरुद्वारे की इमारत बनवा दी है। बाक़ी रैदासी सिक्ख परिवारों को इस गुरुद्वारे से अपनापन महसूस नहीं हो पा रहा है। वे किसी भी प्रकार से समृद्ध और ऊँचे सामाजिक रुतबे वाले परिवार के अधीन नहीं हैं। गाँव में उनकी संख्या भी बहुतायत में है। तो, अब निचले पँगे की बहुतायत ने गाँव से बाहर डीएलफ़ वैली के एक कोने में साँझे रूप से एक बड़े गुरुद्वारे की कार सेवा आज से दो अढ़ाई साल पहले शुरू कर दी है जिसका मुख्य ढाँचा लगभग तैयार हो चुका है। फ़िलहाल, लम्बे अर्से से एक रिहायशी इमारत से गुरुद्वारा का काम चल रहा है।

यह है एक गाँव दो गुरुद्वारों की कहानी जो जताती है कि हमारे समाज में सामुदायिक गतिकी और अस्मिता की भावना किस प्रकार से सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक पक्षों की दिशा और दशा को सहज़ रूप में ही प्रभावित करती रहती है। यहाँ सवाल पक्ष या विपक्ष का नहीं है बल्कि सामाजिक डायनामिक्स को वस्तुनिष्ठ तरीक़े से समझने का है जो सामाजिक बदलाव की वकालत करने वालों के लिए समाज की ज़मीनी हक़ीक़त को समझने के लिए आवश्यक पाठ है।

सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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