शिक्षा, शिक्षक और बदलावः एक चुनौती, एक अवसर – मुलख सिंह 

शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि दिमाग में कई ऐसी सूचनाएं एकत्रित कर ली जाएं जिसका जीवन में कोई इस्तेमाल ही नहीं हो। हमारी शिक्षा जीवन निर्माण, व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण पर आधारित होनी चाहिए। ऐसी शिक्षा हासिल करने वाला व्यक्ति उस व्यक्ति से अधिक शिक्षित माना जाना चाहिए जिसने पूरे पुस्तकालय को कण्ठस्थ कर लिया हो। अगर सूचनाएं ही शिक्षित होती तो पुस्तकालय ही संत हो गये हाते। – स्वामी विवेकानंद

साभार – उर्वशी साहनी

किसी भी काम की शुरुआत में इंसान को उसके  अंजाम का लगभग पता होता है। एक मूर्तिकार छैनी-हथौडा उठाकर पत्थर पर पहला वार तभी करता है जब उसके मस्तिष्क में मूर्ति साकार रूप ले चुकी होती है । बाद में उसी रूप को साकार करने का प्रयास होता है।कच्ची मिट्टी को कुम्हार चाक पर चढ़ाने से पहले ही अपने दिमाग में घड़े, दीपक या किसी और रूप में बना चुका होता है। किसान को बीज बोने से पहले ही पता होता है कि कब पौधे उगेंगे,कब फूल खिलेंगे,कब फल आएगा, कब-कितने खाद-पानी की जरूरत होगी और कितनी उपज हो सकती है। इसी तरह हम हर मानवीय प्रयास के औचित्य को तर्क की कसौटी पर परख सकते हैं। पर जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो मामला काफी भिन्न नजर आता है।

शिक्षा मानव समाज की सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है जो न सिर्फ पूर्वजों के अनुभवों से कमाए ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का काम है बल्कि उस ज्ञान को नई जरूरतों और परिस्थितियों के मद्देनजर लगातार संशोधन करते जाने  का भी है। इस ज्ञान संचार की प्रक्रिया का मकसद शिक्षार्थी के रूप में ऐसा व्यक्तित्व विकसित करने का होता है जिसका व्यक्तिगत के साथ सामाजिक संदर्भ हो क्योंकि मानव एक सामाजिक प्राणी है और मानव समाज की उन्नति का राज इसका सामाजिक श्रम ही है जो सब सुविधाओं का जनक है।

शिक्षा प्रक्रिया शुरू करने से पहले और इस दौरान अध्यापक के दिमाग में शिक्षार्थी के भविष्य के व्यक्तित्व का स्पष्ट चित्र रहना चाहिए और उसकी अध्यापक के रूप में सभी विद्यालयी और सामाजिक गतिविधियों का  मनोरथ इसके आसपास ही रहना चाहिए। पर मानवीय जीवन इतना विविध और संभावनाओं से भरा है कि उसकी तुलना किसी मूर्ति या मिट्टी के घड़े से नहीं की जा सकती। इसलिए जब शिक्षा को परिभाषित करने की बात आती है तो शिक्षा शास्त्रियों और दार्शनिकों में एकमत नहीं रहता। कोई इसे आंतरिक शक्तियों का विकास करना कहता है और कोई इसे सामाजिक व्यवहार ग्रहण करने का साधन। कोई सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित करता है और दूसरा मस्तिष्क के अधिकतम विकास तक। वास्तव में शिक्षा में उपरोक्त सभी पहलू आसानी से समा जाते हैं।

हमारे समाज में शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख समस्या यही आ रही है कि न तो खुद शिक्षकों के बड़े भाग को समाज में अपनी भूमिका के महत्व का बोध है और न ही उन्हें यह साफ है कि उसे बालक को कैसा बनाना है। इससे दिशाहीनता का संकट पैदा होता है। दूसरा पक्ष कि शिक्षा किसके लिए हो ? व्यक्ति, परिवार या समाज के लिए? या यह राज्य, व्यवस्था या बाजार के लिए हो ? इसका स्पष्ट निर्धारण न होने से सब ओर धुंध सी छाई हुई है। न अध्यापक इसे समझ पा रहा है, न अभिभावक।

अच्छे जीवन निर्वाह की मूल जरूरत के साथ-साथ व्यक्ति व परिवार का हित निजता और निजी संपत्ति में है,समाज की अभिव्यक्ति संस्थाओं द्वारा होती है और सब संस्थाओं में संवाद लगातार कम होता जा रहा है क्योंकि रीति-रिवाज और संस्थाएँ, परिवार, धर्म या राज्य के साथ जटिल रूप में संबद्ध हैं। राज्य पर बाजार हावी है और अंततः यह व्यवस्था का हितैषी साबित होता है। चूँकि शिक्षा क्षेत्र में राज्य ही वित्त और नीति निर्धारक है इसलिए वह इसके द्वारा व्यवस्था का पोषण करता है और शिक्षा का अंतिम ध्येय असामाजिक, स्वार्थी, मार्केट केन्द्रित व्यक्तित्व और स्थापित सामाजिक मूल्यों की मजबूती ही साबित होता है। यथार्थ में एक सफल शिक्षित व्यक्ति का बिंब इन्हीं केन्द्रों के इर्द गिर्द घूमता है ।

एक सामाजिक संस्था के रूप में स्कूल समाज पर कितना प्रभावशाली होगा, यह भी साफ नहीं है। अगर स्कूल के द्वारा समाज को बदलना है (क्योंकि अक्सर शिक्षा के बारे में कहा जाता है कि यह सामाजिक बदलाव का साधन है) तो उसकी प्रभावशीलता इतनी अवश्य होनी चाहिए कि वह उससे ज्यादा सशक्त तरीके से मूल्यों, विचारों और व्यवहार को प्रवाह दे पाए जितना समाज, परिवार,बाजार मीडिया, धर्म और शासन सब मिलकर चला रहे हैं। तो क्या इस बदलाव को लाने के लिए परिवार, समाज, धर्म, बाजार और शासन स्कूल को अपनी हद में दखल देने और बदलने की अनुमति देंगे? यह बदलाव की डगर आसान नहीं है और तब तो और भी मुश्किल जब शिक्षा और स्कूल को, अध्यापक को यह पूरी तरह यह स्पष्ट ही नहीं है कि उसका लक्ष्य- उद्देश्य क्या है या उसे करना क्या है।

देश की शिक्षा के काफी बड़े भाग का निजीकरण हो चुका है और शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश इस बदलाव को, जो कि शिक्षा का मुख्य काम है, को और भी दूर कर देता है क्योंकि उसका मनोरथ पूंजी निवेश से लाभ कमाना है यानी कारोबार है और धार्मिक शिक्षण संस्थाओं का उद्देश्य लाभ कमाना तथा धर्म विशेष का प्रचार करना है। अध्यापक वहां उस स्थिति में भी नहीं है कि वह विद्यार्थियों पर संस्था की लाइन से हटकर कुछ अलग से गतिविधियाँ चला सके क्योंकि वह खुद ही बहुत ज्यादा शोषण और बंधन का शिकार होता है। अंततः निजी शिक्षा राजकीय शिक्षा से भी ज्यादा मौजूदा व्यवस्था की सहायक बनती है।

अतः जहाँ जरूरत शिक्षा के उद्देश्यों को ठीक से परिभाषित करने की है जो शिक्षा दर्शन पर लगातार विमर्श चलाकर की जा सकती है वहीं दूसरी जरूरत शैक्षणिक संस्थानों और शिक्षक की स्वायत्तता बहाली की भी है जिनकी वफादारी राज्य, बाजार और धर्म के प्रति न होकर मानव और समाज के प्रति हो। इस स्वायत्तता की प्राप्ति का रास्ता ज्ञान, संगठन और संघर्ष से होकर जाता है। डगर लंबी जरूर है पर दिशा निर्धारित करना बेहद जरूरी है ।

संपर्क – 9416255877

(साभार – देस हरियाणा, अंक 27-28 )

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